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Friday, November 23, 2018

शिष्य अर्जुन और गुरू कृष्ण: आज का विद्यार्थी और सुयोग्य शिक्षक : तुलनात्मक अध्ययन

चिन्तन की धारा का प्रवाह, सौन्दर्य की अनुभूति सब कुछ अनुभूतिपरक ही तो है । अनुभूतियाँ बाह्य भी हो सकती हैं, आन्तरिक भी, सत्य भी असत्य
भी । अनुभूति जब आत्मपरक होती है, तब वही आत्मा की आवाज, आत्मानुभूति कहलाती है । आत्मानुभूति ही मनुष्य का प्रथम लक्ष्य है और आत्म–साक्षात्कार अन्तिम लक्ष्य । आत्मानुभूति कैसे हो? यही गीता का प्रारम्भ है और आत्म–साक्षात्कार गीता का अन्त ।
चिरन्तन सत्य को कुरुक्षेत्र के माध्यम से गुरू शिष्य परम्परा का निर्वाह करते हुए सरल एवं बोधगम्य भाषा में जनसाधारण को बता दिया गया है । गुरू कृष्ण यूँ तो सभी बातें एक ही श्लोक में अपने शिष्य अर्जुन को कह देते हैं—
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर: ॥
गीता 3/30 । ।
गुरू अपने सुयोग्य किन्तु भ्रमित एवं व्यथित शिष्य से कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तोषरहित होकर युद्ध कर ।
यदि शिष्य सद्गुरू को अपनी समस्त चिन्ताओं को सौंपकर चिन्तारहित हो जाए व कर्तव्यकर्म करता रहे तो सहज ही आत्मज्ञान व आत्मसाक्षात्कार सम्भव है । मैं गुरू–शिष्य के इस संवाद को आज के शिक्षार्थी के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करना चाहूँगी । तनाव व कुण्ठा बच्चे के मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव डालती है । बच्चे को भूखा रखने से भी अधिक अहितकर है कि वह तनावग्रस्त रहे । गीता मुख्यत: मनुष्य को तनावरहित जीवन जीने का मार्ग निर्देशित करती है ।
अर्जुन जब शस्त्र छोड़ कर बैठ गया तब उनके गुरू श्रीकृष्ण ने कहा—
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥
गीता 2/2 । ।
और
क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥
गीता 2/3 । ।
अर्थात् हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुष द्वारा आचारित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति की वृद्धि करने वाला ही है । इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती है । हे परन्तप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिए खड़ा हो जा ।
विद्यार्थी का मोह त्याग—यदि इसी बात को विद्याध्ययन के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो पाठशाला के लिए तैयार होकर गया छात्र वहाँ पहुँच कर घर के मोह में ही पड़ा रहे और वहाँ से भागने के लिए आतुर हो जाए तब भी तो उसे मोह भंग की ही शिक्षा प्रदान करनी पड़ेगी ।
मोह का सम्बन्ध केवल आध्यात्म से ही न होकर व्यावहारिक जीवन से भी है । घर की सुख–सुविधाओं और आराम का आदी बच्चा जब विद्यालय जाता है तब उसे घर की सुख–सुविधाओं के साथ–साथ अपनी माता के सान्निध्य का मोह भी त्यागना पड़ता है ।
इन्द्रियनिग्रह
अर्जुन कहता है—
कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव:   पृच्छामि   त्वां   धर्मसम्मूढ़चेता: ।
यच्छेªय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥
गीता 2/7 । ।
अर्थात् कायरतारूप दोष में उपहृत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए ।
श्रीकृष्ण जी कहते हैं—
मात्रास्पर्शास्तु  कौन्तेय  शीतोष्णसुखदु:खदा: ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत  ॥
गीता 2/14 । ।
और
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदु:खसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
गीता 2/15 । ।
अर्थात् हे कुन्ती पुत्र! सर्दी–गर्मी और सुख–दु:ख के देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति, विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन करय क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दु:ख–सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को इन्द्रिय आदि विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है ।
विद्यार्थी के लिए इन्द्रिय निग्रह आवश्यक—विद्यार्थी के लिए भी प्रथम आवश्यकता इन्द्रियनिग्रह की है । सर्दी–गर्मी, सुख–दु:ख की परवाह न करके जो सतत् विद्याध्ययनरत रहता है, वही ज्ञानप्राप्ति कर पाता है । इन्द्रिय सुख को प्रधानता देने वाला विद्यार्थी ज्ञानार्जन की ओर अग्रसर नहीं हो पाता है ।
लोकाचार व कर्तव्यपालन
आगे भगवान अर्जुन को लोकाचार की बात भी समझाते हैं—
अथ  चेत्त्वमिंम  धर्म्यं  सङ्ग्रामं न करिष्यसि ।
तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥2/33॥
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥2/34॥
भयाद्रणादुपरतं    मंस्यन्ते    त्वां महारथा: ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥2/35॥
अवाच्यवादांश्च   बहून्वदिष्यन्ति   तवाहिता: ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दु:खतरं नु किम् ॥2/36॥
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय: ॥2/37॥
गीता 2/33 से 2/37 । ।
श्रीकृष्ण जी कहते हैं—‘यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है । जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे । तेरे बैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निन्दा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दु:ख क्या होगा ? युद्ध करके या तो तू मारा जा कर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम जीत कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा । इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा ।
विद्यार्थी का कर्त्तव्यपालन—जिस प्रकार पिता का कर्तव्य है परिवार के लिए धनोपार्जन करना, माता का कर्तव्य है बच्चों का पालन–पोषण करना । उसी प्रकार विद्यार्थी का कर्तव्य है विद्याध्ययन करना । लोकाचार भी यही कहता है कि जो बच्चा पढ़ाई करता है, उसकी सब लोग प्रशंसा करते हैं, जो नहीं पढ़ता है उसकी निन्दा होती है । विद्याध्ययन में निष्काम भाव से रत विद्यार्थी जीवन में सफलता प्राप्त करता है । इसलिए गीता का सन्देश मानव जीवन के सभी पहलुओं के लिए है कि सभी को अपने–अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए । इससे लोक–परलोक हर जगह मनुष्य आनन्द का उपभोग करता है ।

निरासक्त कर्म
निरासक्त कर्म की शिक्षा देते हुए श्रीकृष्ण जी कहते हैं—
कर्मण्येवाधिकारस्ते    मा    फलेषु   कदाचन ।
मा कमफलहेतुर्भूर्मा  ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥2/47॥
योगस्थ:  कुरु कर्माणि  सङ्गं त्यक्त्वा  धनञ्जय ।
सिद्धîसिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥2/48॥
गीता 2/46 से 2/48 । ।
अर्थात् तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फल में नहीं । इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो ।
हे धनंजय! तू आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर । समत्व (जो कुछ भी कर्म किया जाए, उसके पूर्ण होने और न होने में तथा उसके फल में समभाव रहने का नाम ‘समत्व’ है) ।
यदि पूर्ण मनोयोग से निरासक्त भाव से कर्म किया जाएगा तो सफलता भी अवश्य ही मिलेगी ।
स्थितप्रज्ञ
अर्जुन के द्वारा स्थितप्रज्ञ के विषय में पूछने पर श्रीकृष्ण जी कहते हैं—
प्रजहाति  यदा  कामान्सर्वान्पार्थ  मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥2/55॥
दु:खेष्वनुद्विग्नमना:   सुखेषु     विगतस्पृह: ।
वीतरागभयक्रोध:   स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥2/56॥
य:   सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य    शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2/57॥
यदा  संहरते  चायं   कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश: ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2/58॥
गीता 2/55 से 2/58 । ।
श्रीकृष्ण जी बोले—हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा में ही संतुष्ट रहता है । उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है ।
दु:खों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा नि:स्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है ।
जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ, शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है उसकी बुद्धि स्थिर है । कछुआ सब ओर से अपने अङ्गों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिए) ।
विद्यार्थी की स्थिरबुद्धि ही ज्ञानप्राप्ति का सुगम साधन है—स्थिर बुद्धि ज्ञान प्राप्ति की पहली आवश्यकता है । ज्ञानार्जन की ओर अग्रसर विद्यार्थी शाँत मस्तिष्क से, सुख–दु:ख, वातावरण के प्रभाव से ऊपर उठकर विद्याश्रम के नियमों में बँधकर ही स्थिररूप से ज्ञान प्राप्त कर पाता है । विद्यार्थी को यदि घर बाहर का कोई भी सुखद या दु:खद समाचार उद्वेलित नहीं करता है, तब ही उसकी बुद्धि स्थिर समझनी चाहिए । विद्यार्थी की एकाग्रता की मूलभूत आवश्यकता बुद्धि की स्थिरता है । अर्जुन को जिस प्रकार की एकाग्रता मछली की आँख बेंधने के लिए थी, उसी प्रकार की एकाग्रता विद्याध्ययन के लिए चाहिए ।
विभ्रमित अर्जुन
विभ्रमित हुए चित्त वाला अर्जुन कहता है—
ज्यायसी  चेत्कर्मणस्ते   मता  बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्माणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥
गीता 3/1 । ।
अर्थात् हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयङ्कर कर्म में क्यों लगाते हैं ?
विद्यार्थी का विभ्रम —
भ्रमितविद्यार्थी दिशाहीन सा समर्थ गुरू की अपेक्षा करता है । आज का विद्यार्थी तो वैसे भी रोजगारपरक शिक्षा की अपेक्षा करता है । शिक्षाप्राप्ति के बाद भी वरिष्ठ छात्रों को रोजगार न मिलता देख वह भ्रमित हो जाता है व कर्महीनता की ओर बढ़ता है । उस समय उसको आवश्यकता होती है गुरू के सही मार्गदर्शन की । आज भी यदि विद्यार्थी परिणाम की चिन्ता छोड़ कर एकाग्रचित्त होकर विद्याध्ययन में रत हो जाए तो अवश्य ही जीवन में सफलता प्राप्त करेगा ।
विद्यार्थी जो भी पढ़े पूर्ण मनोयोग से पढ़े । आज भी हर क्षेत्र में रोजगार हैं किन्तु आवश्यकता है विषय पर, तथ्यों पर गहरी पैठ की ।
कर्म का महत्त्व
श्री भगवान कहते हैं—
न   कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं  पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्नयसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥3/4॥
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: ॥3/5॥
गीता 3/4 से 3/5 । ।
अर्थात् प्राणी न तो कर्मों का आरम्भ किये बिना निष्कर्मता को यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यानिष्ठा को ही प्राप्त होता है ।
नि:सन्देह कोई भी प्राणी किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता, क्योंकि सभी प्राणी प्रकृतिजनित गुणों द्वारा परवश हुए कर्म करने के लिए हैं ।
इसलिए पूर्ण निष्ठा से निरासक्त भाव से कर्म करना चाहिए ।

शास्त्रों के अनुसार मन और उसका कार्य

मन की अवस्थाएँ
जाग्रत अवस्था
जाग्रत अवस्था या जागते हुए ही सभी प्राणी सब कार्यों को करते हैं ।
स्वप्नावस्था – उपनिषदों के अनुसार
‘स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषां प्रस्वापीति ।
अत्रायं पुरुष: स्वयंज्योतिर्भवति ।’ (वृह– 4/3/9)
जब यह स्वप्न देखता है, उस अवस्था में यह सारी वस्तुओं से भरी हुई इस दुनिया की मात्राओं (सूक्ष्म अंशों अर्थात् वासनाओं) को लेकर आप ही नष्ट करके आप ही बना कर अपने प्रकाश से अपनी ज्योति से स्वप्न को देखता है, यहाँ (इस अवस्था में) यह पुरुष स्वयं ज्योति होता है ।
‘न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्ति, अथ रथान् रथयोगान् पथ: सृजते, न तत्रानन्दामुद: प्रमुदोभवन्ति, अथाऽऽनन्दान् मुद: प्रमुद: सृजते, न तत्र वेशान्ता: पुष्करिण्य: स्त्रवन्त्यो भवन्ति, अथ वेशान्तान् पुष्करिणी: स्त्रवन्ती: सृजते । स हि कर्ता’ (वृहदारण्यकोपनिषद् 4/3/10)
न वहाँ रथ, न घोड़े, न सड़कें होती हैं, पर वह रथ, घोड़े और सड़कें रच लेता है, न वहाँ आनन्द, मोह और प्रमोद होते हैं, पर वह आनन्द, मोद और प्रमोद रच लेता है, न वहाँ तालाब, झीलें और नदियाँ होती हैं, पर वह तालाब, झीलें और नदियाँ रच लेता है ।
‘अत्रैष देव: स्वप्ने महिमानमनु भवति ।’
(प्रश्नोपनिषद 4/5)
यहाँ यह देव (मन) स्वप्न में महिमा को अनुभव करता है ।
यद्दृष्टंदृष्ट मनुपश्यति, श्रुतंश्रुत मेवार्थ मनुश्रृणोति, देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुन: पुन: प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च, श्रुतंचाश्रुतंचानुभूतं चाननुभूतं च, सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्व: पश्यति ।
(प्रश्नोपनिषद 4/5)
(स्वप्न में यह मन) देखे हुए को फिर से देखता है, सुने हुए को फिर सुनता है, जो भिन्न–भिन्न देशों और भिन्न दिशाओं में अनुभव किया हुआ है, उसको फिर–फिर अनुभव करता है । देखा हुआ और न देखा हुआ, सुना और न सुना हुआ, अनुभव किया हुआ और अनुभव न किया हुआ, विद्यमान और अविद्यमान, सब कुछ देखता है और सब कुछ (राजा, नौकर, नेता, शिक्षक, सैनिक आदि–आदि) बन कर देखता है ।
स एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मा । तद्यद्यपीदंशरीरमन्धंभवत्यन्ध: सभवति, यदि स्त्राम मस्त्रामो, नैवैषोऽस्यदोषेणदुष्यति । न वधेनास्य हन्यते नास्यस्त्राम्येणस्त्राम:  ।
(छान्दोग्योपनिषद् 8/10/1–2)
यह जो स्वप्न में महिमा अनुभव करता हुआ विचरता है, यह आत्मा है । अत: यह स्थूल शरीर यदि अन्धा भी हो जाए तो वह (स्वप्नद्रष्टा) अन्धा नहीं होता है । यदि वह काना हो तो भी वह (स्वप्नद्रष्टा) काना नहीं होता है । न इसके दोष से वह दूषित होता है, न इसके वध से वह मरता है, न इसके कानापन से वह (स्वप्नद्रष्टा) काना होता है ।
सुषुप्ति अवस्था –उपनिषदों के अनुसार
तद्यथाऽस्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्यस श्रान्त: हत्य पक्षौ संलयायैव ध्रियते एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति, यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते, न कञ्चन स्वप्नं पश्यति ।
(वृहदारण्यकोपनिषद 4/3/19)
जिस प्रकार एक बाज या कोई और तेज पंछी इस आकाश में इधर–उधर उड़ करके थका हुआ दोनों पंखों को लपेट कर घोंसले की तरफ मुड़ता है, इस प्रकार यह (आत्मा) इस अवस्था की ओर दौड़ता है, जहाँ गहरा सोया हुआ न कोई कामना चाहता है, न कोई स्वप्न देखता है ।
‘स यथा शकुनि: सूत्रो प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयते, एवमेव खलु सोम्यैतन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायपन मा लब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते, प्राणबन्धन,हि सोम्य मन इति ।’
(छान्दोग्योपनिषद 6/8/2)
जैसे शिकारी के तागे से दृढ़ बँधा हुआ कोई पंछी दिशा दिशा में उड़ने का प्रयास करके कहीं आश्रय न पाकर उसी जगह का आश्रय लेता है, जहाँ वह बँधा हुआ है । ठीक इसी प्रकार हे सोम्य! यह मन (जागृत और स्वप्न में) विभिन्न दिशाओं में घूमकर और कहीं आश्रय न पाकर प्राण का ही सहारा लेता है, क्योंकि यह मन हे सोम्य! प्राण से बँधा हुआ है (प्राण के सहारे है) ।
तद् यत्रैतत् सुप्त: समस्त: सम्प्रसन्न: स्वप्नं न विजानात्येषआत्मेति
(छान्दोग्योपनिषद् 8/11/1)
जब यह सोया हुआ, आराम करता हुआ सम्प्रसन्न (हलचल से रहित पूरे आराम से) हुआ स्वप्न को नहीं देखता है, वह आत्मा है ।
अथ यदा सुषुप्तो भवति, यदा न कस्यचन वेद, हिता नाम नाड्योद्वासप्तति: सहस्त्राणि हृदयात् पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभि: प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते ।
(बृहदारण्यकोपनिषद 2/1/19)
जब यह (मन) गहरी नींद में सोया हुआ होता है, जब इसे किसी की खबर नहीं होती, उस समय वह उन हिता नामी नाड़ियाँ जो हृदय से सारे शरीर में पहुँचती हैं, उन (नाड़ियों) के द्वारा चल कर पुरीतत् नाड़ी में सोता है ।
यत्रैष एतत् सुप्तो ऽभूद् य एष विज्ञानमय: पुरुष: । तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते ।
(बृहदारण्यकोपनिषद 2/1/17)
जब यह (मन) जो यह विज्ञान स्वभाव है, गहरा सोया हुआ था, तब वह इन इन्द्रियों के विज्ञान के द्वारा विज्ञान को लेकर जो यह हृदय के अन्दर आकाश है, वहाँ आराम करता है ।
गीता के अनुसार स्थिरबुद्धि या निश्चयात्मिका बुद्धि
गीता कहती है—
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर: ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता । ।
गीता 2/61 । ।
अर्थात् साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण हो कर ध्यान में बैठे, क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर होती है ।
जब मनुष्य भगवान के प्रति समर्पित हो जाता है, तब उसका मन शान्त हो जाता है । शान्त मन सफलता का आधार है ।
ध्यायतो    विषयान्पुंस:    सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते । ।
गीता 2/62 । ।
अर्थात् विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है ।
क्रोधाद्भवति  सम्मोह:  सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम: ।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति । ।
गीता 2/63 । ।
अर्थात् क्रोध से अत्यन्त मूढ़भाव उत्पन्न होता है, मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है ।
प्रसादे   सर्वदु:खानां   हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो  ह्याशु  बुद्धि: पर्यवतिष्ठते । ।
गीता 2/65 । ।
अर्थात् अन्त:करण की प्रसन्नता होने पर साधक के सम्पूर्ण दु:खों का अभाव हो जाता है । उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हट कर एक परमात्मा में ही भली भाँति स्थिर हो जाती है ।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुकतस्य भावना ।
न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम । ।
गीता 2/66 । ।
अर्थात् न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्त:करण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है ।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु     विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा     प्रसादमधिगच्छति । ।
गीता 2/64 । ।
अर्थात् ‘अपने अधीन किए हुए अन्त:करण वाला साधक अपने वश में की हुई, रागद्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ । अन्त:करण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है ।
मन सबल कैसे हो ?
शिवसंकल्प
देखें यजुर्वेद के कुछ मंत्रों को—
यज्जाग्रतो  दूरमुदैति  दैवं तदु  सुप्तस्य  तथैवैति ।
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–1
अर्थात् (यत्) जो (दैवम्) दिव्य शक्ति वाला मेरा मन (मे मन:)(जाग्रत:) जागते हुए (दूरम् उदैति) दूर–दूर जाता है । (तदु) वह (सुप्तस्य) सोते हुए भी (तथा एव) उसी प्रकार (एति) दूर चला जाता है । इन्द्रियों का (एक ज्योति:) एक मात्र प्रकाशक (ज्ञान में साधक) है । (तत) वह (मे मन:) मेरा मन (शिव संकल्पम्) शुभसंकल्प अर्थात् अच्छे विचार वाला (अस्तु) होवे ।
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीरा: ।
यदपूर्वं यक्षमन्त: प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–2
अर्थात् (येन) जिसके द्वारा (अपस) कर्मनिष्ठ लोग (मनीषिण:) मनस्वी लोग (यज्ञे) यज्ञों में, (विदथेषु) विशेष ज्ञानपूर्वक किये जाने वाले कार्यों में, (कर्माणि) करने योग्य कर्मों को (कृण्वन्ति) करते हैं, मेरा मन (यत्) जो (अपूर्वम्) अपूर्व है (प्रजानाम अन्त:) प्रजाओं के अन्दर (यक्षम) पूजनीय है (तत्) वह (मे मन:) मेरा मन (शिव संकल्प) शुभ विचार वाला (अस्तु) होवे ।
यत्प्रज्ञानमुत  चेतो  धृतिश्च  यज्ज्योतिरन्तरमृतं   प्रजासु ।
यस्मान्न ऋते किंच न कर्म क्रियते तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु ।
यजुर्वेद 34–3
अर्थात् (यत्) जो (प्रज्ञानम) ज्ञान का साधन है (उत) और (चेत:) चेतना का आधार (धृति: च) और निश्चय करने की वृत्ति वाला है । (यत्) जो (प्रजासु अन्त:) प्रजाओं के अन्दर (अमृतम्) मरणधर्म से रहित (ज्योति:) ज्ञान का प्रकाश है, (यस्मात् ऋते) जिसके बिना (किञ्चन) कोई भी (कर्म) कार्य (न) नहीं (क्रियते) किया जा सकता (तत्) वह (मे) मेरा (मन:) मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचार वाला (अस्तु) हो ।
येनेदं  भूतं   भुवनं  भविष्यत्परिगृहीतममृतेन  सर्वम् ।
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–4
अर्थात् (येन) जिस (अमृतेन) मरण धर्म से रहित (इदं) इस (सर्वम्) समस्त (भूतम्) भूतकाल को (भुवनम्) वर्तमान काल को (भविष्यत्) भविष्यतकाल को (परिगृहीतम्) अपनी चेतना की शक्ति से अपने में पकड़ा हुआ है, (येन) जिसके द्वारा (सप्त होता) सप्त होताओं वाले (यज्ञ: तायते) यज्ञ का वितान किया गया जा रहा है । (तत् मे मन:) वह मेरा मन (शिवसंकल्प वाला) शुभ विचारों वाला (अस्तु) हो ।
यस्मिन्नृच: साम यजूंषि यस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभाविवारा: ।
यस्मिन् श्चित्तं  सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–5
अर्थात् (रथनाभौ) रथ की नाभि में (आरा: इव) अरों की तरह (यस्मिन्) जिस (मन) में (ऋच:) ऋग्वेद (साम) सामवेद (यजूंषि) यजुर्वेद (प्रतिष्ठिता:) प्रतिष्ठित हैं अर्थात् ठहरे हुए हैं, (यस्मिन्) जिसमें (प्रजानाम्) प्रजाओं की (सर्वम्) समस्त (चित्तं) चिन्तनशक्ति (ओतम्) ओत–प्रोत है (तत्) वह (मे मन:) मेरा मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचार वाला (अस्तु) हो ।
सुषारथिरश्वानिव      यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव ।
हृत्प्रतिष्ठं  यदजिरं  जविष्ठं तन्मे  मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–6
(सुसारथि:) अच्छा सारथी (अश्वान्) घोड़ों को (इव) जैसे (ने नीयते) पुन: पुन: घुमाता है (तत् मे मन:) वह मेरा मन (अभीशुभि:) लगामों के द्वारा (वाजिन: अश्वान्) बलवान् घोड़ों को (सुसारथि: इव) उत्तम सारथि की तरह (यत्) जो मन (मनुष्यान्) मनुष्यों को (ने नीयते) सन्मार्ग से ले जाता है, (यत्) जो मेरा मन (हृत्प्रष्ठितम्) हृदय–चेतना स्थान में स्थित है (यत्) जो (अरिम्) गतिशील अर्थात् चंचल है, (जतिष्ठम्) शीघ्रगामी है, (तत् मे मन:) वह मेरा मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचारों वाला (अस्तु) हो ।
इन मन्त्रों में शिवसंकल्प अर्थात् सकारात्मक विचारों को ही महत्त्व दिया गया है ।
श्रद्धा का महत्त्व
(ऋग्वेद मण्डल 10 सूक्त 151 मंत्र 1–5)
श्रद्धा सूक्त ऋग्वेद के दशवें मण्डल का 151 वाँ सूक्त है । इस सूक्त के अनुसार श्रद्धा से ही मनुष्य की उन्नति हो सकती है । इस श्रद्धा से ही मनुष्य सर्वविध पदार्थों को प्राप्त कर सकता है ।
श्रद्धयाग्नि:  समिद्धयते  श्रद्धया  हूयते हवि: ।
श्रद्धां  भगस्य मूर्धनि  वचसा वेदयामसि ॥1॥
श्रद्धा से अग्नि जलाई जाती है । श्रद्धा से उसमें आहुति डाली जाती है । ऐश्वर्य के मूर्धा–शिर पर विराजमान उस श्रद्धा को हम अपनी वाणी से घोषित करते हैं, व्यक्ति–व्यक्ति को जनाते हैं ।
प्रियं श्रद्धे  ददत:  प्रियं श्रद्धे  दिदासत: ।
प्रियं भोजेषु यज्वस्विदं म उदितं कृधि ॥2॥
हे श्रद्धा! तू देने वाले का प्रिय कर, कल्याण कर भला कर । हे श्रद्धा! तू देने की इच्छा–विचार–संकल्प करने वाले का प्रियकर, भला कर । हे श्रद्धा! तू भोजों में, यज्ञों में मेरा प्रिय कर–कल्याण कर–भला कर, और यह उदयकर–अभ्युदय कर ।
यथा  देवा  असुरेषु  श्रद्धामुग्रेषु  चक्रिरे ।
एवं भोजेषु यज्वस्वस्माकमुदितं कृधि ॥3॥
देवजन शूर–वीर, प्राणरक्षक क्षत्रियों–सैनिकों पर जैसे श्रद्धा–विश्वास व भरोसा रखते हैं—करते हैं, ऐसे ही हे श्रद्धा! तू भोजों और यज्ञों में हमारा उदय कर ।
श्रद्धां  देवा  यजमाना  वायुगोपा उपासते ।
श्रद्धा हृदय्याकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु ॥4॥
देवजन, यजमान और प्राणायाम के अभ्यासी जन हार्दिक संकल्प से श्रद्धा की उपासना करते हैं ।
मन में कोई संकल्प होने पर भी लोग श्रद्धा की शरण में जाते हैं ।  है । श्रद्धा से धन प्राप्त होता है ।
श्रद्धां  प्रातर्हवामहे  श्रद्धां मध्यंदिनं परि ।
श्रद्धां सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह न: ॥5॥
अर्थात् हम प्रात: श्रद्धा का आह्वान करते हैं, हम मध्याह्न काल में श्रद्धा का सब ओर से आह्वान करते हैं, हम सूर्यास्त समय में श्रद्धा का आह्वान करते हैं । हे श्रद्धा! तू इस मानव जीवन में हमें श्रद्धामय बना ।
पुरुषार्थ
मा स्रेधत सोमिनों दक्षता महे,
कृणुध्वं   राय     आतुजे ।
तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति,
न    देवास:   कवत्नवे ॥
ऋग्वेद 7/32/9
अर्थात् हे सौम्य गुण वाले मनुष्यों! तुम पथभ्रष्ट न हो, महान् लक्ष्य के लिए पुरुषार्थ करो । धन प्राप्ति के लिए प्रयत्न करो, पुरुषार्थी ही विजयी होता है । सुखपूर्वक निवास करता है और धनादि से पुष्ट होता है । देवगण अकर्मण्य के सहायक नहीं होते, आलसी के लिए कहीं स्थान नहीं है ।
अयं में हस्तो भगवान्, अयं में भगवत्तर: ।
अयं में विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शन: ॥
ऋग्वेद 10/60/12
अर्थात् यह मेरा (दाहिना हाथ) ऐश्वर्यशाली है, यह मेरा (बायाँ हाथ) उससे भी अधिक सौभाग्यशाली है । यह मेरा हाथ सभी रोगों को दूर करने वाला है और यह हाथ स्पर्श से कल्याण करने वाला है ।
अध स्वप्नस्य निर्विदेऽभुञ्जतश्च रेवत: ।
उभा   ताबस्त्रि     नश्यत: ।
—ऋग्वेद 1/191/12
अर्थात् प्रात:काल का स्वप्न अच्छा नहीं होता यप्रात:काल सोना ठीक नहीं हैद्ध है, जो धन का उचित उपयोग नहीं करते हैं । वे दोनों शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ।
अन्तर्बोध
स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी कहते हैं—
एक बार पहले–पहल मैं प्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी के यहाँ गया ।  पहले–पहल तब मैं भी उन्हें नहीं पहचानता था, वे भी मुझे नहीं पहचानते थे । तब मैंने पूछा कि प्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी कौन हैं, उनकी कुटिया कहाँ है ? वे खुद ही थे—बोले—हे नाथ नारायण वासुदेव! आओ! चला गया ।
जब बैठ गया तब खिलाया–पिलाया और फिर लिखकर दिया कि आज रात को हमने स्वप्न देखा था, हमारी एक समस्या थी कि हमारे यहाँ तेरह महीने का अखण्ड कीर्तन होगा उसमें कथा कौन सुनाएगा ? मन में यह चिन्ता थी । रात में हमको स्वप्न आया और तुमको देखा । तुम आ गए । तो अब ? अब तो स्वप्न कारण हो गया और जाग्रत कार्य हो गया ।
ऐसी एक नहीं अनेक बातें हम जानते हैं और जिन पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है । मैं गोरखपुर गया, तो हनुमान प्रसादजी की पत्नी ने बुलाया मुझे, घर में भोजन करने के लिए । यह बात होगी—सन् 34–35 के लगभग की । 32 वर्ष हो गए ।  जब मैं गया तो वे बोलीं—‘आ गए’! हनुमान प्रसाद जी ने कहा कुछ नहीं । बाद में मालूम पड़ा कि उन्हें रात में स्वप्न आया था कि हमारे घर में भागवत की पुस्तक लेकर कोई ब्राह्मण आएँगे और मैं आ गया । बहुत प्रेम करते थे, अब भी बहुत प्रेम करते हैं और हनुमानप्रसाद जी तो मुझे अपना भाई ही मानते हैं ।
माण्डूक्य प्रवचन, अलातशान्ति प्रकरण
पूरी धरती ही एक परिवार है
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव
यद्    भद्रं    तन्न   आ     सुव ।
हे देव! हमारी सभी बुराइयों को दूर कर दो, जो कल्याणकारी हो, वह प्रदान करो ।
अन्यो अन्यस्तै वल्गु वदन्त एव ।
एक दूसरे के लिए हम अच्छा ही कहें । परस्पर प्रिय वचन बोलते हुए आगे बढ़ो ।
सम्राऽस्यसुराणां ककुन्मनुष्याणाम् ।
देवानांमर्धभागसि, त्वमेकवृषो भव ।
अर्थात् मनुष्य संसार में सर्वश्रेष्ठ होकर रहे, आसुरी वृत्तियों पर पूर्ण नियंत्रण रखें । कम से कम आधे दैवी गुण जीवन में अवश्य हों ।
सुरा मन्युर्विभीदको अचित्ति: ।
सुरा, क्रोध, द्यूत और अज्ञान पाप के कारण हैं ।
संज्ञानं  न   स्वोभि:    संज्ञानमरणोभि:
संज्ञानमश्विना युवम्, इहास्मासु नि:यच्छतम् ।

अयं  निज:   परोवैति  गणना लघुचेतसाम्
उदार  चरितानां  तु  वसुधैव   कुटुम्बकम् ।
यह अपना है, यह पराया है, ऐसा छोटे चित्त वाले ही सोचते हैं । उदार चरित्र वाले के लिए तो सारी धरती ही एक परिवार है ।
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग भवेत ।
सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, हम सबका कल्याण देखें, कोई भी दु:ख का भागी न हो ।
सह नाववतु, सह नो भुनक्तु । सहवीर्यं करवावहै तेजस्विनावधीतमस्तु,     मा  विद्विषावहै
शान्ति:       शान्ति:     शान्ति: ।
ईश्वर हम गुरु और शिष्य दोनों की रक्षा करें । हम साथ–साथ भोजन करें । हमारी शक्ति में वृद्धि हो, हमारा पठन–पाठन तेजस्वी हो, किसी से विद्वेष न
करें ।
समानी व  आकूति:  समाना  हृदयानि व: ।
समानमस्तु वोमनो,  यथा व  सुसहासति ॥

हमारे विचार समान हों, सबके  हृदय, मन व चित्त एक हों, जिससे हम सबका मन सुन्दर हो ।
समानी प्रपा सह वोऽन्नभाग: समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि ।
सम्यञ्चोऽग्निं    सपर्यत—अरा नाभिमिवाभित: ॥
हम अन्न और ज्ञान को मिल कर प्राप्त करे । गुरु कहते हैं कि मैं तुम्हें युक्त करता हूँ कि मिल कर काम करो ।
बाइबिल (नया विधान) के अनुसार विश्वास
सन्त मत्ती
विश्वास करने वाले के लिए सब कुछ सम्भव है—
तुम्हारे माँगने से पहले ही तुम्हारा पिता जानता है कि तुम्हें किन–किन चीजों की जरूरत है । (6–9)
यदि तुम दूसरों के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा परन्तु यदि तुम दूसरों को क्षमा नहीं करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा नहीं करेगा । (6–14–15)
यह कहते हुए चिन्ता मत करो—हम क्या खायें, क्या पियें, क्या पहनें । (6–31) ––––तुम्हारा स्वर्गिक पिता जानता है कि तुम्हें इन सभी चीजों की जरूरत है । (6–32) तुम सबसे पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीजें तुम्हें यों ही मिल जायेंगी । (6–33) कल की चिन्ता मत करो । कल अपनी चिन्ता स्वयं कर लेगा । आज की मुसीबत आज के लिए बहुत है । (6–34)
माँगो और तुम्हें दिया जायेगाय ढूँढ़ो और तुम्हें मिल जायेगाय खटखटाओ और तुम्हारे लिए खोला जाएगा । (7–7) क्योंकि जो माँगता है, उसे दिया जाता हैय जो ढूँढता है, उसे मिल जाता है और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाता है । (7–8) बुरे होने पर भी यदि तुम लोग अपने बच्चों को सहज ही अच्छी चीजें देते हो, तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता माँगने वालों को अच्छी चीजें क्यों नहीं देगा ? (7 । ।)
दूसरों के प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो । (7/12)
बेटी, ढारस रखो । तुम्हारे पाप क्षमा हो गए हैं । (9–2–)
सामूहिक प्रार्थना—मैं तुमसे यह भी कहता हूँ यदि पृथ्वी पर तुम लोगों में दो व्यक्ति एकमत होकर कुछ भी माँगोगे, तो वह उन्हें स्वर्गिक पिता की ओर से निश्चय ही मिलेगा । (18/19)
और जो कुछ तुम विश्वास के साथ प्रार्थना में माँगोगे, वह तुम्हें मिल जाएगा ।’ (21–22)
सन्त मारकुस
यदि आप कुछ कर सकें! ––––विश्वास करने वाले के लिए सब कुछ सम्भव है । (9–23) जब तुम प्रार्थना के लिए खड़े हो और तुम्हें किसी से कोई शिकायत हो, तो क्षमा करो, जिससे तुम्हारा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा कर दे । (11–25)
ईसा ने उनसे आगे कहा—जाओ, तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है । उसी क्षण उसकी दृष्टि लौट आयी और वह मार्ग में ईसा के पीछे हो लिया ।’ (10–52)
सन्त लूकस
किसी के विरुद्ध निर्णय न दो और तुम्हारे विरुद्ध भी निर्णय नहीं दिया जायेगा । क्षमा करो और तुम्हें भी क्षमा मिल जाएगी । (6/37) दो और तुम्हें भी दिया जायेगा । दबा–दबाकर, हिला–हिलाकर भरी हुई, ऊपर उठी हुई, पूरी की पूरी नाप तुम्हारी गोद में डाली जाएगीय क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा । (6/38)

वेदों में मानसिक स्वास्थ्य

मन की स्थिरता व सबलता
आत्मिक संकल्प
यदाकूतात् समसुस्त्रोद्धृदो  वा  मनसो वा  संभृतं चक्षुषो वा ।
तदनु प्रेत सुकृतामु लोकं यत्र ऋषयो जग्मु: प्रथमजा: पुराणा: । ।
यजुर्वेद 18/58
यह जो शक्तिबिन्दु आत्मिक ईक्षण से, आत्मिक संकल्प से, अच्छी  तरह चुआ हुआ है । हृदय से, बुद्धि से या मन से या आँखों से चुए हुए इसे तुमने सम्यक्तया धारण कर लिया है तो उसे ही लेकर चल पड़ो । इस तरह तुम उस श्रेष्ठ कर्मों वालों के लोक में पहुँच जाओगे जहाँ जिस लोक को तुमसे पहले उत्पन्न हुए ऋषि लोग पहुँचते रहे हैं ।
अर्थात् आत्मसंकल्प व सत्संकल्प से सत्कर्मी परमात्मा की प्राप्ति करें ।
सत्वचिंतन
यथा वातच्यावयति भूम्या रेणुमन्तरिक्षाच्चाभ्रम् ।
एवा  मत्  सर्वं  दुर्भूतं  ब्रह्मनुत्तमपायति । ।
अथर्ववेद10/1/13
जैसे वायु द्वारा भूमि से रेणु या धूल और आकाश से मेघ को सरका देता
 है । वैसे ही मुझसे ब्रह्मवेत्ताओं द्वारा हटाया गया पाप दूर चला जाए । अर्थात् सत्चिंतन करके हम पाप को दूर करें । सत्य ही है कि मन से अगर हम अच्छा चिंतन करेंगे तो जीवन सभी प्रकार से सुखी हो सकता है ।
संकल्पबल
अध्यक्षो वाजी मम काम उग्र: कृणोतु मह्यम सपत्नमेव ।
विश्वे देवा मम नाथं भवन्तु सर्वे देवा हवमायन्तु म इमम् । ।
अथर्ववेद 9/2/7
हे प्रभु! मेरा प्रबल संकल्प ज्ञानबल से युक्त है और ऊपर से ठीक–ठीक दिखने वाला है । यह संकल्प मेरे लिए संसार को सर्वथा प्रतिद्वन्द्वी रहित कर देवे । सब देव मुझसे सम्बद्ध हो जाएँ और ये सब देव मेरी इस पुकार पर आ जाएँ । अर्थात् हम अपने संकल्पबल से स्वयं अपने जीवन को समृद्ध करने की सामर्थ्य रखते हैं ।
संकल्पबल से सिद्धि की कामना
अवधीत कामो मम ये सपत्ना उरूं लोकमकरन्मह्यमेधतुम् ।
मह्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रो मह्यं षडुर्वीर्धृतमावहन्तु । ।
अथर्ववेद 9/2/11
हे परमेश्वर! मेरे संकल्पबल ने मेरे जो प्रतिद्वन्द्वी बाधक हैं उन्हें नष्ट कर दिया हैय मेरे लिए विस्तृत खुला हुआ द्युलोक कर दिया है । मेरे लिए वृद्धि व विस्तार कर दिया है । अब मेरे लिए चारों उपदिशाएँ झुक जाएँ और छहों विस्तृत दिशाएँ मेरे लिए क्षरित हुए इष्ट फल को ले आएँ ।
मन का ठहराव हो
कथं वातो नेलयति कथं न रमते मन: ।
किमाप: सत्यं प्रेप्सन्तीर्नेलयन्ति कदाचन । ।
अथर्ववेद 10/7/37
यह प्राण क्यों नहीं ठहरता है? मन क्यों कहीं नहीं रमता है? क्यों सत्यस्वरूप को प्राप्त करना चाहते हुए भी जीवों के कर्म प्रवाह कभी भी नहीं ठहरते हैं, सदा चल रहे हैं ?
नि:सन्देह जिस क्षण उस परम सत्य को पा लेंगे, उस क्षण हमारा प्राण चैन पाएगा, मन निरुद्ध हो जाएगा, हमारी  सब की सब चेष्टाएँ सर्वथा बन्द हो जाएँगी और हम उस परम आनन्द में स्थिर हो जाएँगे ।)
आत्मव्यवहार का सुधार
उलूकयातुं शुशुलूकयातुं जहि श्वयातुमुत कोकयातुम् ।
सुपर्णयातुमुत  गृध्रयातुं  दृषदेव  प्रमृण रक्ष इन्द्र । ।
अथर्ववेद 8/4/22
हे आत्मन्! हमारे उल्लू के समान आचरण को, भेड़िये के चलन को, कुत्ते जैसे व्यवहार को और कोक चिड़िया के आचरण को नष्ट कर दे । बाज की चाल (मद) को तथा गिद्ध जैसे बर्ताव (लोभ) को भी (इन छहों में से एक–एक राक्षस को) तू अपनी दारणशक्ति द्वारा इस तरह विनष्ट कर दे जैसे शिला से मिट्टी का ढेला या मिट्टी का बर्तन फूट जाता है । अर्थात् हमारा आचरण सदा अच्छा हो ।
हम माधुर्ययुक्त हों
मधुमन्मे निक्रमणं  मधुमन्मे  परायणम् ।
वाचा वदामि मधुमद् भूयासं मधुसन्दृश: । ।
अथर्ववेद 1/34/3
हे परमेश्वर! मेरा निकट जाना मार्धुयमय हो तथा मेरा दूर हटना भी माधुर्यपूर्ण हो । मैं वाणी से माधुर्ययुक्त ही बोलता हूँ । इसलिए हे माधुर्यस्वरूप परमात्मा! मैं सर्वत्र मधुरूप या माधुर्य को ही देखने वाला हो जाऊँ ।
सहनशक्ति
अहमस्मि  सहमान उत्तरो नाम भूम्याम् ।
अभीषाडस्मि विश्वाषाडाशामाशां विषासहि: । ।
अथर्ववेद 12/1/54
हे प्रभु! मैं सहन करने वाला हूँ । इस भूमि पर उत्कृष्टतर प्रसिद्ध हूँ । जीवों में मनुष्य की गणना उत्कृष्टतर मानी जाती है । मैं मुकाबले में आए हुए को सहने वाला हूँ, अन्य भी सब कुछ सहने वाला हूँ । प्रत्येक दिशा में प्रत्येक इच्छापूर्ति के लिए सब कुछ विशेषतया बार–बार सहने वाला ही होऊँ ।
सुन्दरवाणी
इयं या परमेष्ठिनी वागदेवी ब्रह्मसंशिता ।
ययैव ससृजे घोरं तयैव शान्तिरस्तु न: । ।
अथर्ववेद 19/9/3
यह जो परमेश्वर में ठहरने वाली और ज्ञान से तीक्ष्ण की गई वाणी रूपी देवी है, जिससे कि नि:सन्देह बड़े–बड़े घोर कृत्य किए जाते हैंय उस वाणी से हमारे लिए, पूरे संसार के लिए शान्ति फैले ।
मन से सबल हों
सं जानामहै मनसा सं चिकित्वा मा युष्महि मनसा दैव्येन ।
मा घोषा उत्स्थुर्बहुले विनिर्हते, मेषु: पप्तदिन्द्रस्याहन्यागते । ।
अथर्ववेद 7/52/2
हम मन द्वारा मिलकर के विचारें और सोचना–समझना मिलकर करें, मन से कभी वियुक्त न हों, बिछुड़ें नहीं । अन्धकार आ जाने पर या विशाल द्यावापृथिवी के टूटने पर भी हमारे अन्दर हाहाकार के शब्द न उठें । दिन आ जाने पर, अनुकूल स्थिति पा जाने पर हमारे ऊपर ईश्वरीय मार न पड़े ।
शिवसंकल्प
देखें यजुर्वेद के कुछ मंत्रों को
यज्जाग्रतो  दूरमुदैति  दैवं तदु  सुप्तस्य  तथैवैति ।
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–1
अर्थात् (यत्) जो (दैवम्) दिव्य शक्ति वाला (मे मन:) मेरा मन (जाग्रत:) जागते हुए (दूरम् उदैति) दूर–दूर जाता है । (तदु) वह (सुप्तस्य) सोते हुए भी (तथा एव) उसी प्रकार (एति) दूर चला जाता है । इन्द्रियों का (एक ज्योति:) एक मात्र प्रकाशक (ज्ञान में साधक) है । (तत) वह (मे मन;) मेरा मन (शिव संकल्पम्) शुभसंकल्प अर्थात् अच्छे विचार वाला (अस्तु) होवे ।
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीरा: ।
यदपूर्वं यक्षमन्त: प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–2
अर्थात् (येन) जिसके द्वारा (अपस) कर्मनिष्ठ लोग (मनीषिण:) मनस्वी लोग (यज्ञे) यज्ञों में, (विदथेषु) विशेष ज्ञानपूर्वक किये जाने वाले कार्यों में, (कर्माणि) करने योग्य कर्मों को (कृण्वन्ति) करते हैंय मेरा मन (यत्) जो (अपूर्वम्) अपूर्व है (प्रजानाम अन्त:) प्रजाओं के अन्दर (यक्षम) पूजनीय है (तत्) वह (मे मन:) मेरा मन (शिव संकल्प) शुभ विचार वाला (अस्तु) होवे ।
यत्प्रज्ञानमुत  चेतो  धृतिश्च  यज्ज्योतिरन्तरमृतं   प्रजासु ।
यस्मान्न ऋते किंच न कर्म क्रियते तन्मे मन> शिवसंकल्पमस्तु ।
यजुर्वेद 34–3
अर्थात् (यत्) जो (प्रज्ञानम) ज्ञान का साधन है (उत) और (चेत:) चेतना का आधार (धृति: च) और निश्चय करने की वृत्ति वाला है । (यत्) जो (प्रजासु अन्त:) प्रजाओं के अन्दर (अमृतम्) मरणधर्म से रहित (ज्योति:) ज्ञान का प्रकाश है, (यस्मात् ऋते) जिसके बिना (किञ्चन) कोई भी (कर्म) कार्य (न) नहीं (क्रियते) किया जा सकता (तत्) वह (मे) मेरा (मन:) मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचार वाला (अस्तु) हो ।
येनेदं  भूतं   भुवनं  भविष्यत्परिगृहीतममृतेन  सर्वम् ।
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–4
अर्थात् (येन) जिस (अमृतेन) मरण धर्म से रहित (इदं) इस (सर्वम्) समस्त (भूतम्) भूतकाल को (भुवनम्) वर्तमान काल को (भविष्यत्) भविष्यतकाल को (परिगृहीतम्) अपनी चेतना की शक्ति से अपने में पकड़ा हुआ है, (येन) जिसके द्वारा (सप्त होता) सप्त होताओं वाले (यज्ञ: तायते) यज्ञ का वितान किया गया जा रहा है । (तत् मे मन:) वह मेरा मन (शिवसंकल्प वाला) शुभ विचारों वाला (अस्तु) हो ।
यस्मिन्नृच: साम यजूंषि यस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभाविवारा: ।
यस्मिन्श्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–5
अर्थात् (रथनाभौ) रथ की नाभि में (आरा: इव) अरों की तरह (यस्मिन्) जिस (मन) में (ऋच:) ऋग्वेद (साम) सामवेद (यजूंषि) यजुर्वेद (प्रतिष्ठिता:) प्रतिष्ठित हैं अर्थात् ठहरे हुए हैं, (यस्मिन्) जिसमें (प्रजानाम्) प्रजाओं की (सर्वम्) समस्त (चित्तं) चिन्तनशक्ति (ओतम्) ओत–प्रोत है (तत्) वह (मे मन:) मेरा मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचार वाला (अस्तु) हो ।
सुषारथिरश्वानिव      यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव ।
हृत्प्रतिष्ठं  यदजिरं  जविष्ठं तन्मे  मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–6
(सुसारथि:) अच्छा सारथी (अश्वान्) घोड़ों को (इव) जैसे (ने नीयते) पुन: पुन: घुमाता है (तत् मे मन:) वह मेरा मन (अभीशुभि:) लगामों के द्वारा (वाजिन: अश्वान्) बलवान् घोड़ों को (सुसारथि: इव) उत्तम सारथि की तरह (यत्) जो मन (मनुष्यान्) मनुष्यों को (ने नीयते) सन्मार्ग से ले जाता है, (यत्) जो मेरा मन (हृत्प्रष्ठितम्) हृदय–चेतना स्थान में स्थित है (यत्) जो (अरिम्) गतिशील अर्थात् चंचल है, (जतिष्ठम्) शीघ्रगामी है, (तत् मे मन:) वह मेरा मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचारों वाला (अस्तु) हो ।
इन मन्त्रों में शिवसंकल्प अर्थात् सकारात्मक विचारों को ही महत्त्व दिया गया है । यदि हमारे विचार सकारात्मक होंगे तो सदा शुभ ही होगा ।
मन की स्थिरता
पुनरेहि  वाचस्पते  देवेन  मनसा  सह ।
वसोष्पते नि रमय मध्येवास्तु मयि श्रुतम् । ।
अथर्ववेद 1/1/2
हे वाणी व ज्ञान के पालक देव! तुम फिर मुझमें आओ । हे देव! मन की मननक्रिया के साथ आओ । हे वसु के पति! तुम मुझे रमण कराओ, रस दिलाओ, आनन्दित कराओ एवं मेरा सुना हुआ ज्ञान मुझमें ही ठहरे।
(हे प्रभु मैं जो कुछ सुनता हूँ या सत्चिन्तन करता हूँ, वह मुझमें ठहरता नहीं है । यह सद्ज्ञान मेरे मन में स्थिर करो ।)
ज्ञानरूपी जल दो
दिवो      नु     मां    वृहतो    अन्तरिक्षात्
अपां     स्तोको       अभ्यपप्तद्      रसेन ।
समिन्द्रयेण पयसाहमग्ने छन्दोभिर्यज्ञै: सुकृतां कृतेन । ।
अथर्ववेद 6/124/1
हे परमेश्वर! अपने ज्ञानप्रकाशमय द्युलोकरूपी महान अन्तरिक्ष से ही तेरे ज्ञान–कर्म–शक्तिरूप जलों का एक स्वल्पकण अपने तृप्तिदायक रस से युक्त मुझ पर गिरा । तेरे इस स्वल्प जल–कण द्वारा आत्मबल से पोषक ज्ञान से, शुभकर्मों से और पुण्यकर्मों के फल से संयुक्त हो गया हूँ अर्थात् आनन्द युक्त हो गया हूँ ।
मन:शक्ति
वयं सोम व्रते तव मनस्तनूषु निभ्रत: ।
प्रजावन्त:             सचेमहि । ।
ऋग्वेद 10/58/19
हे परमात्मा! अपने शरीरों में मन को अर्थात् मन:शक्ति को धारण किए हुए हम लोग तुम्हारे व्रत का पालन करते हैं । अर्थात् तुम्हारे बनाए हुए नियमों का अपनी मन:शक्ति द्वारा पालन करते हैं । अत: प्रार्थना है कि प्रजासहित हम लोग तुम्हारी सेवा करते रहें ।
दृढ़ निश्चय
अहमिद्धि पितुष्परि मेधामृतस्य जग्रभ ।
अहं                      सूर्यंइवाजनि । ।
ऋग्वेद 8/6/10
मैंने निश्चय ही पालक पिता सत्यस्वरूप परमेश्वर की धारणावती बुद्धि को सब तरफ से ग्रहण कर लिया है । अत: मैं सूर्य के समान तेजस्वी हो गया हूँ । अर्थात् हम सदा अपने मन में उत्तम चिंतन ही करें ।
आत्मबल
जुहुरे वि चितयन्तोऽनिमिषं नृम्णं पान्ति ।
आ   दृह्णम् ।     पुरं    विविशु: । ।
 ऋग्वेद 5/19/2
जो ज्ञानपूर्वक स्वार्थ त्याग करते हैं और लगातार जागते हुए अपने आत्मबल की रक्षा करते हैं, वे दृढ़ अभेद्य नगरी (अभयता व अमरता) में प्रविष्ट हो जाते हैं ।
मन का परिष्कार हो
सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत ।
अत्र सखाय: सख्यानि जानते भद्रैषां लक्षमीर्निहिताधि वाचि । ।
ऋग्वेद 10/71/2
जिस प्रकार चलनी द्वारा सत्तू को परिष्कृत किया जाता है, उसी प्रकार धैर्यशाली लोग मन द्वारा, मनन द्वारा वाणी को परिष्कृत करते हैं । वाणी के सखा हुए इन लोगों की वाणी में कल्याणी लक्ष्मी निवास करती है ।
मन में विक्षोभ न हो
यदाशसा    वदतो   मे    विचुक्षुभे    यद्     याचमानस्य
चरतो               जनाँ             अनु ।
यदात्मनि तन्वो मे विरिष्टं सरस्वती तद् आपृणद् घृतेन । ।
अथर्ववेद 7/57/1
हे प्रभु! मनुष्यों की सेवा करते हुए, उनके साथ आशा से बोलते हुए, भाषण करते हुए मेरा मन जो कभी–कभी विक्षोभ को प्राप्त होता है । इसी प्रकार लोगों के हित के लिए, उसे कुछ बताने पर, उनके दुर्व्यवहार से मेरा मन विक्षोभ को प्राप्त होता है । हे प्रभु! मेरे अन्त:करण पर जो चोट पहुँचती है, उन सबको हे सरस्वती! हे विद्यादेवी! अपने ज्ञानपूर्ण और स्नेहमय मरहम से भर दे ।
आतएतुमन: पुन: क्रत्वे दक्षाय जीवसे ।
ज्योक्   च   सूर्यं     दृशे । ।
ऋग्वेद 10/57/4
हे सुबन्धु! मन का तुझमें पुन: प्रवेश हो जाए । जिससे तू कर्म करने लगे, बल आ जाए, जीवन आ जाए और तू निरंतर सूर्य दर्शन करता रहे । अर्थात् हे प्रियजन! जो तू इतना हतोत्साहित हो गया है कि लगता है मानो तुझमें मन ही नहीं है तो तू अपने को सबल बना । 
पुनर्न: पितरो मनोददातु दैव्योजन: ।
जीवं      व्रातं   सचेमहि । ।
ऋग्वेद 10/57/5
हमारे पितर हमारे मन को फिरा दें और मन में देवों को स्थापित करें । हम परमात्मा का सब कुछ आनुषङ्गिक प्राप्त करें ।
यत् ते यमम् वैवस्वतम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/1
हे बन्धु! विवस्वान के पुत्र यम के पास या दूर पर जो तुम्हारा मन गया है, उसे हम लौटा लाते हैं । तुम इस संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते दिवम् यत् पृथिवीम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/2
मेरे मित्र! तुम्हारा जो मन अत्यन्त दूर स्वर्ग अथवा पृथिवी पर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते भूमिम् चतुर्भूष्टिम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/3
हे सखे! चारों तरफ लुढ़क पड़ने वाला जो तुम्हारा मन अतीव दूरदर्शनीय देश में गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत
दो ।
यत् ते चतस्त्र: प्रदिश: मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/4
हे प्रियजन! तुम्हारा मन जो चारों तरफ अतीव दूरस्थ प्रदेश में चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो । 
यत् ते समुद्रम् अर्णवम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/5
हे मानव! तुम्हारा जो मन अतीव दूरवर्ती और जल से परिपूर्ण समुद्र में गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर  भटकने मत दो ।
यत् ते मरीची: प्रवत: मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते  आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/6
हे प्रिय बन्धु! तुम्हारा जो मन चारों तरफ विकीर्ण किरण–मंडल में पैठा हुआ है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते अपः यत् ओषधीः मनः जगाम दूरकम्।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/7
तुम्हारा जो मन दूरस्थ जल के भीतर व वृक्ष लतादि के मध्य में गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर  भटकने मत दो ।
यत् ते सूर्यम् यत् उषसम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/8
हे मानव! तुम्हारा जो मन दूरवर्ती सूर्य व उषा के बीच गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते पर्वतान् बृहत: मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/9
हे बन्धु! तुम्हारा जो मन पर्वतमालाओं के ऊपर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते विश्वम् इदम् जगत् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/10
तुम्हारा जो मन समस्त विश्व में अतीव दूर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते परा: पराव्रतो मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/11
तुम्हारा जो मन दूर से भी दूर, उससे दूर, किसी दूर स्थान पर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते भूतं च भव्यं च मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/12
तुम्हारा जो मन भूत व भविष्यत् किसी दूर स्थान पर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।

Thursday, November 8, 2018

उपनिषदों तथा योगदर्शन द्वारा पूर्वजन्म की पुष्टि


उपनिषदों तथा योगदर्शन द्वारा पूर्वजन्म की पुष्टि
तद्यथाऽहिनिर्ल्वयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीत: एव मेवेदें शरीरं शेते अथायमशरीरोऽमृत: प्राणो ब्रह्मैव तेज एव
(वृहदारण्यकोपनिषद 4/4/7)
    जैसा कि साँप की केंचुली भरी हुई फेंक दी हुई बर्मी (चींटियों के बनाए हुए मिट्टी के ढेर) पर पड़ी रहे, इसी प्रकार यह शरीर पड़ा रहता है और अब यह आत्मा शरीर से रहित हुआ अमृत प्राण (अमर जीवन) है, ब्रह्म ही है, तेज (प्रकाश स्वरूप) ही है
तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये, अथ संपत्स्ये
(छान्दोग्योपनिषद 6/14/2)
    उसके लिए उतनी ही देर है, जब तक वह देह से नहीं छूटता, इसके पीछे तब वह सत् (ब्रह्म) को प्राप्त होगा
यथा नद्य: स्यन्दमाना: समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्त: परात्परं पुरुषमुषैति दिव्यम्
(मुण्डकोपनिषद् 3/2/8)
    जैसे नदियाँ बहती हुई समुद्र में जाकर अपना नामरूप खो कर लीन हो जाती हैं, ऐसे ही ज्ञानी पुरुष नाम और रूप को त्याग कर परे से परे जो दिव्य पुरुष है, उसको प्राप्त होता है
एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरूप सम्पद्य स्वेन रूपणाभिनिष्पद्यते उत्तम: पुरुष:
(छान्दोग्योपनिषद 8/12/3)
    यह निर्मल हुआ आत्मा इस शरीर से उठ कर परमज्योति को प्राप्त होकर अपने असली रूप से प्रकट होता है, यह उत्तम पुरुष है
यदात्मतत्त्वैनतु ब्रह्मतत्वं दीपोपमेनेह युक्त: प्रपश्येत् अजं ध्रुवं सर्वंतात्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशै: (श्वेताश्वतरोपनिषद् 2/15)
    अर्थात् जब वह वहाँ सावधान होकर दीपक के सदृश आत्मतत्त्व से ब्रह्मतत्व को देखता है, जो अजन्मा है, अटल है और सब तत्त्वों से शुद्ध है, तब उस देव को जान कर वह सारी फाँसों से छूट जाता है
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान विभेति कुतश्चन
(तैत्तिरीयोपनिषद 2/9)
    जहाँ से वाणी मन को पा कर लौट आती है, वह आनन्दमूर्ति ब्राह्मण किसी से नहीं डरता है
यदाह्येवैष एतस्मिन्न दृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते अथ सोऽभयं गतो भवति
(तैत्तिरीयोपनिषद 2/7)
    अर्थात् जब यह इस (हृदयस्थ ब्रह्म) में अभय प्रतिष्ठा (स्थिति) पा लेता है, जो (ब्रह्म) अदृश्य है, अनिरुक्त है, और (किसी से) सहारा दिया हुआ नहीं है, तब वह अभय पद में पहुँच जाता है
    मानो वहाँ पहुँच कर उसकी यह प्रार्थना पूर्णरूप में सफल हो जाती है, जो वेद ने इस तरह दिखलाई है
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा : करोति तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् नित्यो नित्यानां चेतनश्चोतनामेको बहूनां यो विदधाति कामान् तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्ति: शाश्वती नेतरेषाम्
(कठोपनिषद् 5/12–13)
    अर्थात् अकेला सबको वश में रखने वाला, सब भूतों का अन्तरात्मा, जो समरूप (प्रकृति) को अनेक प्रकार का बना देता है, उसको जो वीर पुरुष आत्मा में स्थित देखते हैं, उनको सदा का सुख होता है, दूसरों को नहीं वह जो नित्यों का नित्य, चेतनों का चेतन है, जो अकेला ही सबकी कामनाओं को रचता है, उसको जो धीर पुरुष आत्मा में स्थित देखते हैं, उनको सदा ही शान्ति होती है, दूसरों को नहीं
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदिश्रिता: अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थय: अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धयनुशासनम् (कठोपनिषद 6)
    अर्थात् जब यह सारी कामनाएँ जो इसके हृदय में रहती हैं, छूट जाती हैं, तब मर्त्य (मरने वाला मनुष्य) अमृत होता है, यहाँ वह ब्रह्म को प्राप्त होता है जब यहाँ हृदय की सारी गाँठें खुल जाती हैं, तब मर्त्य अमर्त्य होता है, सारी शिक्षा इतनी दूर तक ही है (इससे आगे नहीं)
वृहच्च ताद्दिव्ययमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति दूरात् सुदूरे तदिहान्ति केच पश्यस्विहैन निहितं गुहायाम् चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तां पश्यते निष्कलंध्यायमान:
(मुण्डकोपनिषद 3/1/7–8)
    यह वृहत् है, अचिन्त्यरूप है, और सूक्ष्म से सूक्ष्मतर प्रतीत होता है, दूर से बड़ी दूर है, और वह यहाँ हमारे पास है, जो उसको देख रहे हैं उनके अन्दर यहाँ ही गुफा (हृदय) में दबा हुआ (खजाना) है आँख से जाना जाता है, वाणी से, दूसरी इन्द्रियों से, तप से और कर्म से हाँ ज्ञान की निर्मलता से जब इसका अन्त:करण शुद्ध होता है, तब यह उस निरवयव पर ध्यान जमाता हुआ उसको देख लेता है
एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राण: पञ्चधा संविवेश प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन विशुद्धे विभवत्येष आत्मा
(मुण्डकोपनिषद 3/1/9)
    यह अणु आत्मा चित्त से जानने योग्य है, जिसमें पाँच प्रकार से सहारा लिये है, प्रजाओं का हर एक चित्त प्राणों (इन्द्रियों) से बुना हुआ है, जिसके शुद्ध होते ही यह आत्मा महिमा वाला बन जाता है
संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ता: कृतात्मानो वीतरागा: प्रशान्ता: ते सर्वगं सर्वत: प्राप्य धीरा युक्तात्मान: सर्वमेवाविशन्ति
(मुण्डकोपनिषद 3/2/5)
    ऋषिजन जिन्होंने इसको पा लिया है, वह ज्ञान में तृप्त होते हैं, वह अपने आपको जाने हुए हैं, उनके राग दूर हो गए हैं और वह शान्त हैं हाँ वह धीर पुरुष हैं, जो सब ओर से सब जगह पहुँचे हुए (परमात्मा) को पाकर और उसी में अपनी आत्मा को लगा कर सबको ही चीर जाते हैं
    मरने के पीछे आत्मा की हस्ती के विषय में नचिकेता ने यम से प्रश्न किया है
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके एतद् विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीय:
(कठोपनिषद 1/20)
    अर्थात् मरे हुए मनुष्य के विषय में जो यह संशय हैकई कहते हैंवह है और दूसरे कहते हैं–‘नहीं है आपकी शिक्षाओं में इस बात को जान जाऊँ, वरों में से तीसरा वर यह है
    इस प्रश्न के उत्तर में यम उसको यह बतलाते हैं
जायते म्रियते वा विपाश्चन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित अजो नित्य: शाश्वातोऽयं पुराणो हन्यते हन्यमाने शरीरे
कठोपनिषद 1/18
    अर्थात् यह जो (इस शरीर में) चेतन है, वह जन्मता है, मरता है, यह किसी से बना है, इससे कुछ बनता है यह अजन्मा है, नित्य है, पुराना है, पर सदा एकरस है, शरीर के मरने पर यह नहीं मरता है
और
हन्ता चिन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् उभौ तौ विजानीतौ नायं हन्ति हन्यते कठोपनिषद्  1/19
    अर्थात् मारने वाला यदि समझता है कि मैंने मार डाला है, और मरने वाला समझता है कि मैं मरता हूँ तो वह दोनों नहीं जानते हैं, यह मारता है, मरता है
किञ्चित भेद के साथ यह दोनों श्लोक गीता में उद्धृत किये हैं
एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्
उभौ तौ विजानीतो नायं हन्ति हन्यते  19
जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वाऽभविता वा   भूय:
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो हन्यते हन्यमाने शरीरे 20
गीता अध्याय 2
    अर्थात् जो जानता है कि वह मारने वाला है और जो समझता है कि वह मरता है, वह दोनों नहीं जानते हैं, यह मारता है मरता है
    यह कभी जन्मता है, मरता है, यह होकर फिर कभी होगा ऐसा नहीं है, यह अजन्मा है, नित्य है, एकरस है, पुराना है, शरीर के मरने पर नहीं मरता
है
छान्दोग्य उपनिषद का उद्धरण
जीवापेतं वाच किलेदं म्रियते जीवो म्रियते
(छान्दोग्य 6/11/3)
(उद्धालक का श्वेतकेतु के प्रति उपदेश) जीव से अलग हुआ यह (शरीर) मरता है, कि जीव मरता है
–––––– यत्रयमणिमानं न्येति, जरयावोपतपतावाऽणिमानं निगच्छति तद्यथा ऽऽयं वोदुम्बरं वा पिप्पलं वा बन्धनात् प्रमुच्यते, एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्य: संप्रमुच्य पुन: प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति प्राणायैव
(वृहदारण्यक 4/3/36)
    अर्थात् जबकि वह बड़ी निर्बलता में जा पड़ता है बुढ़ापे से या सख्त बीमारी से निर्बलता में डूब जाता है तब जैसे आम या गूलर या पीपल (फल) डंडी से छूट जाता है
    इसी प्रकार यह पुरुष इन अंगों से छूट कर जीवन के लिए फिर उल्टा अपनी नियत योनि की ओर भागता है (जो उसने अपने कर्मों से कमाई है )
तस्य हैतस्य हृदयस्याग्नं प्रद्योतते, तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्कामति, चक्षुष्टो वा मूर्द्यो वाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेम्य:
(वृहदारण्यकोपनिषद 4/4/2)
    अर्थात् (जब इन्द्रियों की शक्तियाँ हृदय में एक हो जाती हैं तब) उसके हृदय का अग्नि प्रकाश वाला होता है, उस प्रकाश से यह आत्मा निकलता है या तो आँख से या मूर्धा (सिर) से या शरीर के दूसरे हिस्सों से
तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्कामति प्राण मनूत्कामन्तं सर्वे प्राण अनूक्रामन्ति
(वृहदारण्यकोपनिषद4/4/2)
    और जब निकलता है, तो मुख्य प्राण  उसके पीछे निकलता है, और जब मुख्य प्राण निकलता है तो सारे प्राण (इन्द्रिय) उसके पीछे निकलते हैं
तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञाच
(वृहदारण्यकोपनिषद् 4/4/2)
    उसकी विद्या (उपासना) और कर्म सहारा देते हैं, और पहली प्रज्ञा (बुद्धि) भी
यच्चितस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्त: सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति
(प्रश्नोपनिषद् 3/10)
          (अब मरने के समय) वह जैसे चित्त वाला है, उस (चित्त) के साथ वह प्राण की ओर आता है, और प्राण तेज (उदान) के साथ युक्त होकर आत्मा के सहित (उस सूक्ष्म शरीर को) अपने लिये तैयार किये हुए लोक में ले जाता है
अथैकयोर्ध्वं उदान: पुण्येन पुण्यं लोकं नयति, पावेन पापभुमाभ्यामेव मनुष्यलोकम्
(प्रश्नोपनिषद् 3/7)
    अब उदान, जो ऊपर को जाने वाला है, पुण्य से पुण्य लोक (देव लोक) को ले जाता है पाप से पापलोक (पशु कीट आदि के जन्म) का और दोनों (पाप, पुण्य) से मनुष्य लोक भी ले जाता है
योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वापदेहिन:
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्मं यथाश्रुत्तम्
(कठोपनिषद् 5/7)
          (मृत्योपरान्त) शरीर ग्रहण करने के लिये कोई शरीरधारी तो योनि में प्रवेश करते हैं, और दूसरे स्थावरभाव को प्राप्त होते हैं, अपने कर्म और ज्ञान के
अनुसार
गर्भेनु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा शतं मापुर आयसीररक्षन्न्धश्येनो जवसा निरदीयम्
(ऋग 04/27/1)
    गर्भ में होते हुए मैंने इन देवताओं के सारे जन्मों का पता लगा लिया है सौ लोहे के पुरां (किलो) ने मुझे (बंद) रखा पर मैं ऐसे वेग से निकल आया हूँ, जैसे बाज (निकलता) है
पुनर्जन्म के विषय में प्रमाण दिया गया है आशय यह है कि गर्भ में होते हुए अर्थात् बारबार जन्म ग्रहण करते हुए ही मैंने असली तत्त्व को पा लिया है, जैसे कोई लोहे के किलों में बंद किया जाए इस तरह मुझे अनेक शरीरों में बंद रखा (अनेक जन्म लिए) पर अब मैं इन बन्धनों को तोड़ कर निकल आया हूँ
पातञ्जल योगदर्शन,पूर्वजन्म के साक्षात्कार का वर्णन
    महर्षि पतञ्जलिकृत पातञ्जलयोग दर्शन के विभूतिपाद में विभिन्न विभूतियों का वर्णन है महर्षि पतञ्जलि ने वर्णित किया है कि किस प्रकार वैज्ञानिक तरीके से साधना करने से योगी मोक्ष या कैवल्य की प्राप्ति कर सकता है
    इसके लिए पहले मनुष्य को यम (अहिंसा, सत्य अस्तेय (चोरी करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (संग्रह का अभाव) तथा नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) आदि का पालन करना अनिवार्य है देखें
अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथान्तासंबोध: 39
पातञ्जलयोगदर्शन  2 39
    अर्थात् जब योगी में अपरिग्रह का भाव पूर्णतया स्थिर हो जाता है, तब उसे अपने पूर्व जन्मों और वर्तमान जन्म की सब बातें मालूम हो जाती हैं
संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम्
पातञ्जलयोगदर्शन  3 18
    अर्थात् संस्कारों का साक्षात् कर लेने से पूर्वजन्म का ज्ञान हो जाता है