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Saturday, January 5, 2019

स्वावलम्बन


पतंग ने पक्षी से कहा–‘मैं तुमसे ऊँची उड़ सकती हूँ।’
पक्षी ने कहा–‘भले ही तुम मुझसे ऊँची उड़ जाओ किन्तु तुम ऊँचे उड़ कर भी स्वयं कुछ नहीं कर सकतीं, स्वावलम्बी नहीं हो।’


‘तुम क्या कर सकते हो?’
‘मैं अपनी मीठी बोली से दूसरों का मन बहला सकता हूँ। अपना भोजन स्वयं इकट्ठा कर सकता हूँ। तुम्हारी लम्बी धारदार डोर तो किसी के लग जाए तो वह शरीर के किसी अंग को काट भी सकती है।’
पक्षी की उपेक्षा करके पतंग और तन कर ऊपर की ओर उड़ चली। तभी किसी दूसरी पतंग ने उसे काट दिया और वह नीचे गिर पड़ी।
नीचे गिरते हुए वह अपनी असमर्थता, के बारे में सोच रही थी। इतने में नीचे बैठा हुआ पक्षी स्वयं उड़ कर बहुत दूर ऊपर चला गया।
`तभी पतंग ने देखा कि एक मजदूर अपनी दिनभर की कमाई से दाल–रोटी बना कर खा रहा है और एक भिखारी––––भूख से चिल्ला रहा है, माँग रहा है कि कुछ खाने को मिल जाए।
`पतंग ने भिखारी से कहा–‘स्वावलम्बी बनो।’
स्वावलम्बी बनो।
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स्वार्थपरता का पर्दा


वक्त था दोपहर का, पेड़ के नीचे एक कुत्ता बैठा था। वह प्रतीक्षा कर रहा था कि कोई मनुष्य आए, कुछ खाने को लाए, जिससे उसे भी कुछ हिस्सा मिल जाए।

उसी समय एक मनुष्य आया और पेड़ की छाया में बैठकर खाने की पोटली खोल कर खाने लगा, किन्तु उस खाने में कुत्ते को हिस्सा नहीं मिल सका क्योंकि तभी एक दूसरा मनुष्य आया और पहले व्यक्ति से खाने की पोटली छीन कर भागने लगा।
कुत्ते ने रोका और कहा–‘तुम छीनकर भागने की बजाए प्रेम से माँगते या याचना करते और दोनों लोग मिलकर खाते तो कितना अच्छा होता। हम कुत्ता होकर भी बिना भूख के छीना झपटी नहीं करते हैं किन्तु मनुष्यों में संग्रह की प्रवृत्ति होने के कारण प्रेम और सहानुभूति खत्म होती जा रही है।’
जबकि भगवान ने प्रेम, सहानुभूति, दया, करुणा ये सारे गुण मनुष्य में सहज, स्वाभाविक रूप में दिए हुए हैं। किन्तु––––मनुष्य ने उसमें स्वार्थपरता का पर्दा डाला हुआ है।
प्रेम, सहानुभूति, दया व करुणा मनुष्य के सहज स्वाभाविक गुण हैं।
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साहसी बच्ची


एक पाँच वर्षीया बालिका अपने मामा के यहाँ आई हुई थी। रात्रि में वह अपनी नानी के पास सो रही थी। अचानक उसे कुछ खटपट की आवाज सुनाई दी। उसने उठकर देखा कि अन्दर कमरे की तरफ से आवाज आ रही है।
धीरे–धीरे वह दबे पाँव उठी और अंधेरे में ही उस आवाज की तरफ बढ़ने लगी। उसने छेद से देखा कि अन्दर कोठरी में कुछ लोग सामान बाँध रहे हैं और कोठरी का दरवाजा बन्द है। वह फिर वापस अपने कमरे में गई। कमरे का ताला उठाकर चुपके से आई व कोठरी को बाहर से बन्द कर वापस नानी के पास आ गई, अब नानी को जगाकर सारी बातें बतार्इं।
नानी व उस बच्ची ने शोर मचा दिया। घर व गाँव वाले लोग इकट्ठे हो गये। पुलिस बुला ली गई। चोर पकड़ लिये गये।

उस बालिका को उसके साहस के लिए सरकार की ओर से पुरस्कार मिला। इस प्रकार गाँव के लोगों को उस बालिका के साहस के कारण आये दिन होने वाली चोरियों से मुक्ति मिली।
मुसीबत में साहस से काम लो
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समय की गणना


‘एक वर्ष में कितने दिन होते हैं?’
‘तीसौ न पैंसठ दिन।’ सब विद्यार्थी एक साथ बोले।
आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों से जब गणित के नए अध्यापक रमाकान्त सर ने पहले ही दिन यह प्रश्न पूछा तो बच्चों के चेहरे पर मुस्कान उभर आयी कि इतना छोटा सा जवाब तो सभी को मालूम होगा।
लेकिन आगे उन्होंने पूछा–‘यदि प्रतिदिन पन्द्रह मिनट कोई काम किया जाए तो एक वर्ष में कितने घंटे काम होगा?’
अब बच्चे गणना करने लगे–
365 x 15 मिनट = 5475 मिनट
5475 X 60 = 91 घंटे पन्द्रह मिनट
सबसे पहले सुरेश बोला–‘सर इक्यानबे घंटे पन्द्रह मिनट।
‘ठीक है, अन्य बच्चों को भी कर लेने दो ।’
जब सब बच्चे कर चुके तब गुरुजी ने कहा– सोचो! यदि किसी कार्य में प्रतिदिन पन्द्रह मिनट का समय दिया जाए तो एक वर्ष में इक्यानबे घंटे पन्द्रह मिनट काम हो जाएगा ।
स्वाति ने कहा–‘सर! यदि हम रोज पन्द्रह मिनट भी अधिक पढ़ें तो एक वर्ष में इक्यानबे घंटे पन्द्रह मिनट अधिक पढ़ाई हो सकेगी ।
बिल्कुल ठीक कहा स्वाति तुमने! मैं यह नहीं कहता कि तुम लोग दिन भर पढ़ते ही रहो। पढ़ो भी, खेलो भी, पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं में भी भाग लो व समाचार पत्र पढ़ो, किन्तु समय बरबाद मत करो ।’
‘सर! समय को बरबाद करने से तात्पर्य!’ विनीत ने पूछा।
‘जैसे सर्दी के दिनों में नींद खुल जाने पर भी आलस्यवश आधा घंटा बिस्तर पर ही पड़े रहें । ऐसी स्थिति में यदि बिस्तर से उठने का मन नहीं भी है तो बिस्तर पर बैठ कर ही कोई किताब या समाचार पत्र पढ़ सकते हैं । इसी प्रकार पाँच–पाँच, दस–दस मिनट करके बहुत सा समय बचाया जा सकता है ।’
‘सर! समय का बड़ा महत्त्व है।’ –विनीत इतनी गम्भीरता से बोला कि सब हँस पड़े ।
‘अच्छा ! मैं तुम्हें एक नारा देता हूँ– समय बचाओ, सफलता पाओ ।’
सब बच्चे समवेत स्वर में बोले– ‘समय बचाओ, सफलता पाओ ।’
समय की कीमत पहचानो ।
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सफलता का रहस्य


‘आँटी सोमेश है।’
‘हाँ! लेकिन सो रहा है।’
‘सो रहा है? उसकी तबियत ठीक नहीं है क्या?’
‘तबियत तो ठीक है, लेकिन कल रात में दो बजे तक पढ़ाई की है, इसलिए अभी सो रहा है।’
अहमद चला गया किन्तु सोचने लगा कि सोमेश को कैसे समझाया जाए। उसने निश्चय किया कि जब सोमेश मिलेगा तो उसे समझाएगा।
शाम को सोमेश अहमद के घर आया।
‘अरे सोमेश तू! मैं तुम्हारे घर सुबह नौ बजे गया था, तब तुम सो रहे थे।’
‘हाँ मित्र! कल रात को दो बजे तक पढ़ाई की थी । इसलिए सुबह देर में तो उठना ही था।’
 
‘हाँ आँटी बता रही थीं ।’
‘जब मैं देर से सोता हूँ तो मेज पर पर्ची लिख कर रख देता हूँ कि इतने बजे सोया हूँ, जिससे सुबह माँ देख ले और मुझे न उठाये ।’
‘हाँ यह तो ठीक है किन्तु––––’ इतने में राबर्ट भी आ गया–‘आओ राबर्ट आओ ।’ दोनों बोले ।
‘क्या बातें हो रही हैं?’
‘हम सबके मतलब की बात है, अच्छा ही है कि तुम भी आ गए।’ –अहमद बोला।
‘हाँ तो सोमेश तुम कल रात में दो बजे सोये और सुबह दस बजे उठे । इससे तुम्हारी थकान बढ़ गई और कार्यशक्ति कम हो गई।’अहमद ने समझाते हुए कहा।
‘कैसे?’ कैसे कम हो गई कार्य शक्ति।’
‘रात्रि सोने के लिए होती है और दिन काम करने के लिए। तुम थके होने के बावजूद रात में देर तक जागते रहे, पढ़ते रहे। सुबह ताजी हवा चलती है, सूर्य की रोशनी होती है। उदित होते हुए सूर्य की जीवनदायी किरणों के प्रभाव से तुम वंचित रहे।’
बीच में बात काटते हुए सोमेश बोला–‘सही कहते हो शायद इसीलिए अभी से मेरे चश्मा लग गया।’
‘बिल्कुल ठीक! हाँ! और सुबह देर से उठने से हाजमा भी ठीक नहीं रहता फलस्वरूप स्वास्थ्य खराब हो जाता है।’
‘मेरे भी शरीर में हर समय दर्द बना रहता है। क्या करूँ? इतना पढ़ने के बाद भी अच्छे नम्बर नहीं आ पाते। मैं भी रात के दो–दो बजे तक पढ़ता हूँ।’ –राबर्ट बोला।
‘दोस्तों! तुम लोग गलत तरीके से पढते हो। रात को नौ बजे तक पढ़ो, फिर आराम से सो जाओ। सुबह पाँच बजे तरोताज़ा उठोगे। शरीर और मस्तिष्क दोनों ही कार्य करने में पूरी तरह सक्षम होंगे। स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा और पढ़ाई में भी मन लगेगा। पढ़ाई भी अधिक होगी और नम्बर भी अच्छे आएँगे।’
‘ठीक है पंडित जी! हम आपकी बात मानेंगे।’राबर्ट और सोमेश एक स्वर में बोले।
‘कल्याण हो।’जब आशीर्वाद की मुद्रा में अहमद ने अपना हाथ ऊपर उठाया तो तीनों एक साथ खिलखिला कर हँस पड़े।
रिजल्ट आया– तीनों ही मित्र बहुत अच्छे अंको से पास हो गए थे। सोमेश ने भावुक होते हुए कहा–‘अहमद! तुमने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी। रात को जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने से मेरे जीवन की दशा और दिशा दोनों ही बदल गयी। अब मेरा स्वास्थ्य भी ठीक रहता है और मन भी प्रसन्न रहता है ।’
इतने में राबर्ट बाहर से चिल्लाता हुआ आया–‘अम्मी! लड्डू खाइए, माँ ने अभी–अभी बनाए हैं।’
अम्मी ने आकर तीनों बच्चों के मुँह में लड्डू डाला और स्वयं भी खाया व आशीर्वाद दिया–‘खुदा करे, तुम लोग खूब पढ़ो-लिखो, अच्छे इन्सान बनो और तुम्हारी दोस्ती सदा कायम रहे।’
प्रकृति के नियमों का पालन करो।
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सक्सेना जी बने स्टूडेन्ट


पड़ोस के सक्सेना साहब मेरे पास बैठे हुए थे कि मेरा बेटा प्रवीन आया, बोला–‘पापा पचास रुपए दे दीजिए, प्रोजेक्ट का सामान लाना है।’

‘तुम्हारे स्कूल में ही प्रोजेक्ट क्यों नहीं बनवाया जाता है। अब रात के बारह बजे तक जाग कर प्रोजेक्ट बनाओगे।’
‘क्या करूँ पापा? जो काम करना है, वह तो करना ही है। लेकिन प्रोजेक्ट बनाने में मज़ा भी खूब आता है।’
‘ठीक है लेकिन अपनी सेहत का भी तो ध्यान रखना चाहिए।’ मैंने प्रवीन से कहा–‘जाओ माँ से रुपए ले लो।’ प्रवीन चला गया।
‘बच्चा जितनी अधिक मेहनत करेगा, उतना ही अच्छा रहेगा। अभी से ही मेहनत की आदत पड़ी रहेगी तो जीवन में कष्ट नहीं होगा।’ सक्सेना जी बोले।
‘ठीक है सक्सेनाजी! मेहनत की आदत तक तो ठीक है, किन्तु शरीर की क्षमता से अधिक मेहनत से सिवाय बीमारी के और कुछ नहीं मिलता। खाली पड़े रहना भी उतना ही घातक है जितना जरूरत से अधिक काम।’
‘शायद आप ठीक कहते हैं।’
इतने में ही सक्सेना जी का बेटा विवेक आया बोला–‘पापा! बाबा का फोन आया है, वह कल सुबह की गाड़ी से आ रहे हैं। अंकल प्रवीन कहाँ है? उससे नोट्स लेने हैं । मैं आज स्कूल नहीं गया था।’
मैंने कहा–‘प्रवीन चौराहे तक गया है, आता ही होगा। तुम स्कूल क्यों नही गए थे?
‘मेरी तबियत ठीक नहीं थी।’
मैंने देखा विवेक की आँखों के नीचे काले गड्ढे पड़े हुए थे। मैंने पूछा-‘विवेक कितने बजे सोते हो ?’
‘अंकल! होमवर्क पूरा करते–करते बारह–एक तो बज ही जाते हैं।’
‘उठते कितने बजे हो?’
‘पापा तो चार बजे उठाते हैं, लेकिन पाँच बजे तक उठ ही जाता हूँ।’
‘सक्सेना जी! आपने देखा विवेक की आँखों के नीचे काले गड्ढे पड़े हुए हैं।’
‘हाँ सतीश जी! यह अक्सर बीमार भी पड़ जाता है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि इसकी नींद पूरी न होती हो।’
‘बिल्कुल ठीक! शरीर भगवान की दी हुई एक मशीन है, जिसे कब और कितना आराम करना है। यह शरीर स्वयं बता देता है। हम आवश्यकता से अधिक आराम करेंगे तो शरीर के अंगों का सुचारू रूप से संचालन नहीं होगा। फलस्वरूप पाचन प्रभावित होगा और रोग घेरेंगे। इसी प्रकार अधिक काम करने पर शरीर को पूरा आराम न मिलने पर भी अनेकानेक रोग घेर लेते हैं।’
‘लेकिन अंकल! फिर काम कैसे पूरा होगा?’ विवेक ने कहा।
‘जब तुम पूरी नींद लोगे तो शरीर में स्फूर्ति रहेगी। काम जल्दी व सुव्यवस्थित होगा। पाठ भी जल्दी समझ में आएगा।’
‘अंकल! आप सही कह रहे हैं। जिस दिन पूरी नींद सो लेते हैं, मन प्रसन्न रहता है, पढ़ाई में भी मन लगता है और याद भी जल्दी होता है।’
‘अच्छा सतीश जी! अब मैंने निश्चय किया है कि रात को नौ बजे विवेक को सुला दिया करेंगे, जिससे सुबह पाँच बजे वह नींद पूरी होने पर अपने आप उठ जावे।’ सक्सेना जी ने उठते हुए कहा–‘और हाँ! आज से हम आपके स्टूडेन्ट बन गए।’
सब हँसने लगे।
पूरी नींद लेना आवश्यक है।
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विमलेश-आपदा का प्रबंधन


केन्द्रीय–विद्यालय की कक्षा नौ में गुरु जी आपदा–प्रबंधन के बारे में पढ़ा रहे थे।
गुरु जी ने कहा–‘आपदाएँ कई तरह की होती हैं-प्राकृतिक आपदा, मानवकृत आपदा व अन्य भी कई तरह की आपदाएँ होती हैं। हमें इन आपदाओं के कारण समझकर उनके प्रबंधन के बारे में विचार करना है।
पूजा ने कहा–‘सर!’ घरेलू–आपदाएँ, विद्यालय की आपदाएँ आदि भी हो सकती हैं। इसके प्रबंधन के बारे में भी पढ़ाएँगे।’
“हाँ पूजा! आपदाएँ कई प्रकार की होती हैं। आपदा घर, विद्यालय कहीं की भी हो सकती है, उस आपदा के कारण जानकर उसका बचाव कैसे हो, इसी को आपदा–प्रबंधन कहते हैं।
मैं तुम लोगों को एक प्रोजेक्ट देता हूँ, तुम लोग घर, विद्यालय, मानवकृत या प्राकृतिक आपदा, किसी भी आपदा से सम्बन्धित एक विषय लेकर उस आपदा के कारण व निवारण के विषय में लिखो।’
गुरुजी यह कह कर बैठे ही थे कि विमलेश उचक कर गुरुजी के पास आ गया और हाथ लहराते हुए बोला–‘गुरुजी! मैं किस आपदा के बारे में प्रोजेक्ट बनाऊँ।’
गुरुजी हँसकर बोले–‘नाटकीय ढंग से क्यों पूछ रहे हो, चाहे जिस आपदा पर प्रोजेक्ट बनाओ, यह तुम्हारी स्वेच्छा पर निर्भर है।’
दुर्गेश्वर बोला–‘सर’ ये तो स्वयं आपदा है।’
‘ऐसे नहीं कहते हैं।’ गुरुजी ने कहा।
पूजा के दिमाग में एक बिजली सी कौंधी उसे अपने प्रोजेक्ट का विषय मिल गया। सभी विद्यार्थियों ने विभिन्न आपदाओं के प्रबंधन पर प्रोजेक्ट बनाए किन्तु पूजा ने एक अनोखा प्रोजेक्ट बनाया, जिसका विषय था–‘विमलेश-आपदा का प्रबंधन।’
सबने प्रोजेक्ट जमा किया। जब पूजा का प्रोजेक्ट गुरुजी ने देखा तब पूछा– ‘पूजा ये क्या लिखा है।’

डरते–डरते पूजा बोली–‘सर! पढ़िए तो, यह एक अलग तरह की आपदा है। इसका प्रबंधन भी बहुत आवश्यक ह ।’
खैर––––गुरुजी पढ़ते गए, एक ओर तो उनका हँसते–हँसते बुरा हाल था। दूसरी ओर इस प्रोजेक्ट में गहराई के साथ संदेश भी था। पूजा का प्रोजेक्ट इस प्रकार था–
विमलेश-आपदा का प्रबंधन
पर्यावरणीय आपदाएँ जैसे भूकम्प, ज्वालामुखी या सुनामी लहरों से तो आत्मरक्षा के उपाय भी किए जा सकते हैं। साम्प्रदायिक दंगों व युद्ध की स्थिति पर भी काबू पाया जा सकता है किन्तु विमलेश-आपदा को सम्भालना हमारे वश में नहीं है। इसके लिए तो किसी मूर्धन्य विद्वान मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता है।
विमलेश-आपदा का परिचय
विमलेश हमारी कक्षा में पढ़ने वाला एक बुद्धिमान छात्र है। उसमें एक ही बीमारी है। वह सदा अपनी हरकतों से ध्यान–आकर्षित करने का प्रयास करता है। इस ध्यानाकर्षण प्रक्रिया में वह कई रास्ते अपनाता है। यथा–

* जोर–जोर से चिल्लाना।
* अकारण ताली बजाना।
* हर समय बोलते रहना।
* दो लोगों की बात के बीच में एकदम चिल्ला कर विघ्न डाल देना।
* अजीब तरह से हाथ–पैर, मुँह व पूरा शरीर हिलाना।
* विद्यालय से आते–जाते व साइकिल चलाते समय अपनी हरकतों से विद्यालय के बच्चों व राहगीरों का ध्यानाकर्षण करना आदि।
विमलेश–आपदा का विमलेश व अन्य लोगों पर दुष्प्रभाव
विमलेश के इन क्रियाकलापों के दुष्प्रभाव कई रूपों में होते हैं। यथा–
1– विमलेश पर दुष्प्रभाव-विमलेश की इस ध्यानाकर्षण प्रक्रिया का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव विमलेश पर ही पड़ता है। उसका विकास बाधित होता है। वह पूर्ण मनोयोग से पढ़ नहीं पाता है। जो ध्यान उसे अपनी पढ़ाई में लगाना चाहिए, वह दूसरों के ध्यानाकर्षण पर लगाता है। फलस्वरूप पढ़ाई बाधित होती है।
2– कक्षा के विद्यार्थियों पर दुष्प्रभाव– विमलेश के हर समय बोलते रहने व अजीब–अजीब हरकतों से कक्षा का वातावरण स्वस्थ नहीं रह पाता है फलस्वरूप अन्य विद्यार्थियों का अध्ययन भी बाधित होता है।
3– अध्यापकों पर दुष्प्रभाव– विमलेश की अजीबोगरीब हरकतों के कारण अध्यापक का ध्यान बार–बार उसकी ओर चला जाता है। उसको रोकने–टोकने व समझाने में भी कुछ समय लगता है। फलस्वरूप अध्यापन की गति भी प्रभावित होती है।
4– परिवार पर दुष्प्रभाव– विमलेश के बुद्धिमान होते हुए भी वह न तो पढ़ाई में, न ही अन्य किसी क्षेत्र में अव्वल आ पाता है। अत: माता–पिता उसके भविष्य को लेकर चिन्तित रहते हैं। उसके हर समय के चुलबुलेपन से उसके माता–पिता व भाई बहन परेशान रहते हैं।
विमलेश-आपदा का प्रबंधन
इस आपदा से बचाव के प्रबंधन में जो घटक प्रभावित हैं, वह सब ही उसका सार्थक उपाय भी कर सकते हैं यथा-माता–पिता, भाई–बहन, सहपाठी व अध्यापक। सबके सम्मिलित प्रयास से न केवल इस आपदा से ही छुटकारा पाया जा सकता है वरन् विमलेश समाज के लिए बहुत उपयोगी भी हो सकता है। कतिपय उपाय निम्नवत् हैं–
1– माता पिता उसे पर्याप्त समय दें।
2– अभिभावक, भाई–बहन व अध्यापक एवं सहपाठी सभी लोग उसकी पूरी बात ध्यान से सुनें। उसे यह लगे कि उसकी बातों का भी कोई महत्त्व है। जब उसकी बातों को महत्त्व दिया जाएगा तो वह स्वयं ही सार्थक बातें करने लगेगा।
3– उसकी बातें सुनकर प्यार व सहानुभूतिपूर्वक उसे उसकी गल्ती बताई जाए अर्थात् उसे गल्ती की दशा व दिशा दोनों से ही अवगत करवाया जाए। सुधारात्मक उपाय भी किए जाएँ।
4– उसे खेलने का भरपूर अवसर दिया जाए।
5– पढ़ाई में उसे जिस बिन्दु पर मार्गदर्शन की आवश्यकता हो या जिस बिन्दु पर पिछड़ापन हो, उसे दूर किया जाए। यदि वह किसी विषय में बहुत पिछड़ गया है तो उसे अतिरिक्त कक्षा या घर पर विषय–विशेष की ट्यूशन दी जाए।
आशा करती हूँ कि विमलेश-आपदा का प्रबन्धन इस भाँति करने से वह आपदा न होकर घर, विद्यालय, समाज व देश का उपयोगी अंग हो सकता है।
जब विमलेश सामान्य व्यवहार करने लगे तब यदि उसकी प्रतिभा को सही दिशा निर्देशन दिया जाए तो वह अपनी विशिष्ट प्रतिभा से घर, विद्यालय, समाज व देश का नाम भी रोशन कर सकता है।
*      *      *       *
गुरुजी ने इस प्रोजेक्ट को न केवल स्वयं ही पढ़ा वरन् इसे प्राचार्य जी, अन्य अध्यापकों तथा विमलेश के घर वालों को भी पढ़वाया व सभी ने मिलकर सम्मिलित सुधारात्मक उपाय भी किए।
कक्षा के विद्यार्थियों को भी समझाया कि विमलेश अच्छा लड़का है। उसकी पूरी बात सुनकर उसके साथ प्यार से व्यवहार करें तथा उसे अपने साथ खिलावें।
कक्षा के महत्त्वपूर्ण कार्य उसे सौपे जाने लगे, जैसे फीस एकत्रित करते समय उसका सहयोग लेना आदि। उसे कक्षा का द्वितीय मॉनीटर भी बना दिया गया।
कहना न होगा कि कुछ ही महीनों के प्रयास से विमलेश कक्षा में  सामान्य बच्चे की तरह व्यवहार करने लगा व पढ़ाई के स्तर में भी आश्चर्यजनक सुधार हुआ। खेलकूद में तो राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगा।
सभी सहपाठियों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करो ।
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लोभ



एक किसान पीपल के पेड़ के नीचे दोपहर को आराम कर रहा था। तभी उसने एक काला नाग देखा। वह हाथ जोड़ कर बैठ गया और कहा–‘नागदेवता मैं तुम्हें रोज दूध पिलाया करूँगा’ नाग वापस चला गया।

अब किसान नियम से नागदेवता के लिए एक कटोरे में दूध लाकर उनके बिल के सामने रख देता। नाग दूध पीने के बाद उसमें एक सोने की मुहर डाल देता था। इस प्रकार प्रतिदिन एक सोने की मुहर मिलने से किसान की सारी दरिद्रता दूर हो गयी।
एक दिन किसान को कहीं बाहर जाना था। अत: उसने अपने बेटे को नागदेवता को दूध पिलाने का आदेश दिया। दूसरे दिन बेटा दूध लाकर रख गया। जब कटोरा उठाने आया तो उसमें उसने एक सोने की मुहर देखी। इसी प्रकार लगातार दो दिन तक मोहर पाने के बाद उसने सोचा कि लगता है साँप की बाँबी में कोई खजाना है, क्यों न बाँबी खोद कर खजाना निकाल लिया जाय।
लोभवश उसने कुछ विचार न किया और बाँबी खोद डाली। नाग ने बाहर निकल कर उसे डस लिया।
इस प्रकार बहुत लोभ नहीं करना चाहिए।
लोभ से सदा हानि ही होती है।
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मूर्ख वैज्ञानिक


एक बार दो दोस्त जंगल की सैर करने निकले। उनका नाम रमेश तथा सुरेश था। उन लोगों ने तुरन्त मरे हुए प्राणी में प्राणों का संचार करने की विद्या सीखी थी। चलते–चलते रास्ते में एक शेर मिला, जिसे किसी शिकारी ने गोली से मार दिया था।
रमेश ने कहा–‘चलो प्रयोग करके देखें कि हम इस शेर को जीवित कर पाते हैं या नहीं।’
सुरेश ने कहा–‘पागल मत बनो। अगर यह शेर जीवित हो गया तो हम दोनों को मार कर खा डालेगा।’
सुरेश ने रमेश को बहुत समझाया, जब रमेश किसी तरह नहीं माना, तब सुरेश पेड़ के ऊपर चढ़ गया।
तब रमेश ने अपने प्रयोग द्वारा शेर को जीवित किया। जीवित होते ही शेर ने दहाड़ कर झपट्टा मारकर रमेश को मार डाला।


सुरेश अपने दोस्त की दुर्दशा देखकर उसकी मूर्खता पर आँसू बहाता रह गया।
ज्ञान का उपयोग विवेक के साथ करो।
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मुझे गेंद नहीं चाहिए


‘मुझे कास्को गेंद चाहिए। कितनी छोटी सी चीज़ माँग रहा हूँ। अन्य बच्चों के पास तो बड़ी–बड़ी चीजें हैं।’ नितिन बोला।
‘बेटा! दुनिया में सभी लोग एक समान नहीं हो सकते। अन्य बच्चों के माता–पिता धनी हैं। हमारे पास भी गुज़ारे लायक धन है भगवान ने जितना दिया है, उसका धन्यवाद करना चाहिए।’ माँ ने कहा।
‘यदि हम इतने गरीब हैं कि एक गेंद भी नहीं खरीद सकते तो भगवान को किस बात का धन्यवाद दें?’
‘भर पेट भोजन मिल रहा है, पर्याप्त वस्त्र हैं, अपना मकान है। तुझे अच्छी शिक्षा मिल रही है। हम सभी स्वस्थ हैं, आनन्दित हैं, सुमति है और क्या चाहिए?’ दादी ने समझाते हुए कहा ।
‘लेकिन दादी! अन्य लोगों के पास ज्यादा पैसा क्यों है? हमारे पास कम क्यों है?’

‘यह तो अपना–अपना भाग्य है ?’
पापा ने हस्तक्षेप करते हुए कहा– नितिन! तुम कल सुबह मेरे साथ सैर करने चलना। तुम्हें तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा।’
‘लेकिन मुझे तो सुबह स्कूल जाना है।’
‘कल स्कूल मत जाना।’ पापा ने हँसते हुए कहा।
‘नहीं मैं स्कूल की नागा नहीं करूँगा।’
जब सभी लोग हँसने लगे तब नितिन को याद आया कि कल इतवार है । ‘––––अरे––––’ वह भी हँसने लगा ।
दूसरे दिन नितिन पापा के बिना जगाए ही जग गया और सैर के लिए तैयार हो गया सर्दी के मौसम के अनुसार अच्छी तरह गर्म कपड़े पहन लिए।
चलते–चलते दोनों स्टेशन के पास पहुँचे।
पापा ने कहा–‘देखो!’
नितिन ने देखा फुटपाथ पर पड़े हुए लोग ठंड से ठिठुर रहे थे।
वह लोग आगे बढ़े-फुटपाथ के किनारे एक स्त्री–पुरुष और तीन छोटे–छोटे बच्चे बैठे थे। दोनों तरफ र्इंटे रख कर चूल्हा जला कर खाना बना रहे थे।
‘पापा! ये लोग यहीं रहते हैं।’
‘हाँ बेटा! मैं रोज इसी तरह के मजदूरों को देखता हूँ, यह लोग इसी समय पूरे दिन का खाना बना कर एक थैले में बनाने, खाने के बर्तन व अपना सामान लेकर मजूदरी करने चले जाएँगे। बच्चे भी इन्हीं के साथ जाएँगे। मजदूरी मिल गई तो ठीक अन्यथा दूसरे दिन शायद भोजन भी न मिले।’
‘फिर यह लोग शाम को यहीं वापस आएँगे।’
‘जरूरी नहीं है कि पुलिस वाले दूसरे दिन इन्हें यहाँ सोने ही दें । ऐसी स्थिति में ये लोग फिर अन्य कहीं बसेरा ढूँ ढ़ेंगे।’
‘बस पापा बस! जब पैसे बचें तो इनके बच्चों के लिए स्वेटर खरीद दीजिएगा। मुझे गेंद नहीं चाहिए।
सब पर दया करो।
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माँ की पढ़ाई


‘प्रिया! चलो नाश्ता कर लो।’
‘माँ! मुझे भूख नहीं है।’
‘भूख हो या न हो, थोड़ा–थोड़ा खाते रहना चाहिए।’
‘माँ! मेरी योग–शिक्षिका बताती हैं– बिना भूख लगे नहीं खाना चाहिए।’
‘मुझे अधिक पढ़ाओ मत! चुपचाप खा लो।’
‘नहीं, अब हम बिना भूख लगे नहीं खाएँगे।’ नितिन बोला।
‘क्यों?’ माँ ने कुछ गुस्से में कहा।
‘क्योंकि बिना भूख के खाने से अपच हो जाता है।’
अब माँ सोचने लगी– ‘सत्य तो है, पहले इन लोगों की तबियत अक्सर खराब रहती थी। अब तो बिल्कुल ठीक है, बुखार भी नहीं आया। एक दिन स्कूल जाकर इनके टीचर से मिलूँगी।
एक दिन माँ विद्यालय गर्इं। चपरासी से कहा– ‘मुझे योग–शिक्षिका जी से मिलना है।’
चपरासी उन्हें योग–शिक्षिका के पास ले गया।
‘प्रणाम मैडम!’
‘प्रणाम!’

‘मेरे दो बच्चे नितिन और प्रिया आपके विद्यालय में पढ़ते हैं। आपकी बहुत तारीफ करते हैं। कहते हैं कि बिना भूख लगे नहीं खाना चाहिए। यह हमारी टीचर ने बताया है।’
‘हाँ! बिना भूख लगे खाने से अपच हो जाता है। इसलिए कड़ी भूख लगने पर ही खाना चाहिए भूख न लगने का अर्थ है कि शरीर में पहले से अपचा भोजन है। जब शरीर उसे पचा लेता है, तब भूख लगती है।’
‘बिना भूख लगे खाने से बीमार क्यों हो जाते हैं?’
‘अपचा भोजन विकार के रूप में जमा होता रहता है। यही विकार विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होता रहता है।’
‘बहुत अच्छी बातें आपने बतार्इं। अन्य कुछ उपयोगी जानकारी भी दें।’ माँ बोलीं।
‘रात को जल्दी सो जाना चाहिए। सुबह अपने आप जल्दी नींद खुल जाएगी। बाकी बातें फिर बच्चों को पढ़ाना है।’
‘प्रणाम! मैं आपकी बातों को ध्यान में रखूँगी।’ माँ ने आदर के साथ कहा।
बच्चे विद्यालय से आए तब माँ ने कहा–‘बच्चों! आज मैं तुम्हारे विद्यालय गई थी। योग टीचर से मिली थी। बहुत अच्छा लगा। तुम लोग रात को जल्दी सो जाया करो।
    और–––भोजन भी कड़ी भूख लगने पर ही किया करो।’
  दोनों बच्चे– (एक साथ खुशी से) ‘हमारी प्यारी माँ!’ लिपट जाते हैं।
    नितिन शरारत से बोला–‘आज तो माँ भी पढ़ आई।’
माँ– (नितिन की नाक पकड़ कर) ‘शरारती कहीं का।’
प्रकृति के नियमों के पालन से मनुष्य स्वस्थ रह सकता है।
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भगवान जो करता है, अच्छा करता है


‘भगवान जो करता है, अच्छा ही करता है।’ मंत्री जी बोले।
राजा हँसने लगे–‘मंत्री जी! अगर आपके ऊपर कोई विपत्ति आ जावे, तब भी आप यही कहेंगे।’
‘अवश्य ही सरकार।’
‘ठीक है समय आने पर देखेंगे।’
एक बार राजा और मंत्री अपने सैनिकों के साथ वन–विहार को निकले। झाड़ियों में फँस कर राजा की अंगुली कट गई। राजा दर्द  के मारे चिल्लाने लगे। एक ओर राजा की मरहम–पट्टी हो रही थी, दूसरी ओर मंत्री जी ने कहा– ‘सरकार! भगवान जो करता है अच्छा ही करता है। भगवान की दया है कि अधिक चोट नहीं लगी।’
राजा दर्द से पहले ही त्रस्त थे। मंत्री के उपदेश सुनकर आगबबूला हो उठा। उसने सैनिकों से कहा–‘इस मंत्री को खूब पीटो, तब इसे पता चलेगा कि भगवान जो करता है, वह अच्छा करता है कि नहीं।’
राजा के आदेश पाकर न चाहते हुए भी सैनिक मंत्री की पिटाई करने लगे। मंत्री जी पिटते रहे और कहते रहे–‘भगवान जो करता है, अच्छा ही करता है, इस पिटाई में भी मेरी कुछ भलाई ही होगी।’
यह सुनकर राजा को दर्द की अवस्था में भी हँसी आ गई, उन्होंने कहा–
‘सैनिकों! मंत्री जी को अब छोड़ दो, पिट–पिट कर भी कह रहे हैं कि पिटाई में भी भगवान कुछ भलाई कर रहा है। लगता है मंत्री जी पागल हो गए हैं, भला पिटाई में क्या भलाई हो सकती है।’
मंत्री जी पिटाई के कारण लंगड़े हो गये थे, फिर भी उन्होंने कहा–
‘सरकार! हमारे लिए जो भी होता है, सभी क्रियाकलापों में भगवान की दया छुपी होती है। हम समझ नहीं पाते हैं। मैं तो यही मानता हूँ कि मेरी पिटाई में भी भगवान की कुछ न कुछ दया छुपी है।’
राजा सहित सभी सैनिक भी हँसने लगे। राजा ने कहा–‘मंत्री जी! अब आपका दिमाग खराब हो गया है। अब आप राजकाज के लायक नहीं रहे। आप आराम करिए। आज तक के आपके निष्ठापूर्ण कार्य को देखते हुए आपको राज्य की ओर से पेंशन दी जाएगी।’
यह बातें हो ही रही थीं कि कुछ डाकू आ गए। अपनी धर्मान्ध कुप्रथा के अनुसार देवी माँ को बलि चढ़ानी थी। डाकुओं के सरदार ने कहा–‘राजा को ले चलो, देवी माँ प्रसन्न हो
जाएँगी।’
डाकू लोग राजा को पकड़कर सरदार के पास ले गए और कहा–‘सरदार! राजा की अंगुली कटी हुई है।’ सरदार बोला–‘अरे बेवकूफों तुम्हें पता नहीं है क्या, देवी को बिना अंगदोष के मनुष्य की ही बलि चढ़ायी जाती है। राजा को छोड़ दो, मंत्री को पकड़ लाओ।’

डाकू मंत्री को लेकर चलने लगे तो मंत्री को लंगड़ाता देखकर डाकुओं ने उन्हें भी छोड़ दिया। इतनी देर में सैनिकों को सम्भलने का मौका मिल गया और उन्होंने डाकुओं को खदेड़ दिया।
अब मंत्री जी मौन थे। राजा कह रहे थे–‘मंत्री जी! आप सत्य कहते हैं, भगवान जो करता है, अच्छा ही करता है। अगर मेरी अंगुली न कटी होती या आपकी पिटाई के कारण आप लंगड़े न हुए होते तो आज मेरी या आपकी बलि चढ़ गई होती। आप पागल नहीं हैं, आदर के पात्र हैं। आप अपने पद पर बने रहें। मैं आपको मुँह माँगा पुरस्कार दूँगा।’
‘सरकार! पुरस्कार तो मुझे मिल गया। आपने इस बात को स्वीकार कर लिया कि भगवान जो करता है, अच्छा करता है। आप देश के राजा हैं–‘यथा राजा तथा प्रजा’ अत: आपकी इस मान्यता से प्रजा भी लाभान्वित होगी ही। जब प्रजा भी भगवान के हर विधान को मंगलमय मानेगी तो देश में हर ओर खुशहाली आ जाएगी।’
भगवान का हर विधान मंगलमय है ।
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पानी का मूल्य


‘पानी फेंक दो, फिर खाली बोतल से कैच–कैच खेलेंगे।’
‘नहीं–नहीं पानी मत फेंको, पानी बहुत कीमती होता है।’
‘अरे पागल हो क्या? पानी भी कहीं कीमती होता है?’
‘हमारे घर में तो पानी बहता रहता है, कोई खर्च नहीं होता है।’
‘अगर पानी न मिले तो क्या हो?’
‘अच्छा चलो कुछ और खेला जाए, फालतू बातें करने से क्या फायदा?’
बच्चे खेलने लगते हैं। पार्क में बैठी हुई सुलभा आँटी यह सब सुन रही थीं। सोचने लगी कि यदि अभी से इन्हें सही बात बता दी जाए या यूँ कहें कि दिमाग में बात ठीक प्रकार से बैठा दी जाए तो समाज का कम से कम कुछ हिस्सा तो सुधर ही जाएगा।
उन्होंने बच्चों को अपने पास बुलाया, बैठाया और प्यार से बोलीं–
 
‘अगर तुम्हारे पास केवल दस रुपए हैं और तुम किसी ऐसी जगह पर हो, जहाँ दस रुपए में केवल पानी मिले या केवल खाना मिले तो तुम क्या लोगे?’
‘पानी लेंगें।’ एक बच्चा बोला।
‘क्यों ?’
‘अगर पानी नहीं पियेंगे तो मर भी सकते हैं, बिना खाये तो फिर भी कुछ दिन रह सकते हैं।’ यह बात राजू ने कही, जो कह रहा था कि पानी बहुत कीमती होता है।
‘और यदि तुम्हारे पास दस रुपए भी न हों और तुम्हें बहुत तेज़ प्यास लगी हो तब?’ सुलभा आँटी ने पूछा।
‘मैं ढाबे वालों के बरतन माँज दूँगा।’ रवि ने कहा ।
‘बरतन माँजना तुम्हें आता भी है?’ गुंजन ने रवि को चिढ़ाते हुए कहा।
‘बरतन न माँज पाने की स्थिति में मैं अपनी कमीज़ उतार कर दे दूँगा।’ राजू बोला।
‘इसका मतलब पानी तुम्हारी कमीज़ से मँहगा है।’ सुलभा आँटी समझाते हुए बोलीं।
‘हाँ आँटी! पानी तो हर चीज़ से मँहगा हुआ क्योंकि हम जान बचाने के लिए पानी का कोई भी दाम चुकाने के लिए तैयार हो जाएँगे ।’ गुंजन ने राजू से पहले ही बोल दिया।
‘सचमुच पानी बहुत कीमती होता है, मैं फालतू में ही रवि से पानी फेंकने को कह रहा था।’ पंकज को अपनी ग़लती का एहसास हुआ।
‘तो अब कभी पानी मत बर्बाद करना।’ सुलभा को खुशी हुई कि बच्चों को पानी का महत्त्व अच्छी तरह से समझ में आ गया ।
‘हम कभी पानी बर्बाद नहीं करेंगे।’ बच्चे समवेत स्वर में बोले।
जल–संसाधन का संरक्षण (बचत) करो।
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पतलू की मुसीबत

पतलू एक दुबला–पतला, सीधा–सादा लड़का था। एक दिन उसकी छोटी बहन ने एक कप तोड़ दिया। माँ ने सोचा कि पतलू ने ऐसा किया है। उसने गुस्से में पतलू की पिटाई कर दी।
पतलू रोने लगा। वह स्कूल आया। वहाँ पर सोचता रहा कि माँ ने बिना जाने ही मेरी पिटाई कर दी। गुड़िया ने कप तोड़ा था। वह तो बोल नहीं पाती है, लेकिन माँ को मेरी बात तो सुननी चाहिए थी। पतलू का ध्यान कक्षा में नहीं था।
इतने में टीचर ने पूछा–‘अभी मैंने क्या बताया है?
पतलू चुपचाप खड़ा हो गया, क्योंकि उसे नहीं मालूम था कि क्या पढ़ाया जा रहा है। अत: टीचर ने भी उसे सजा दी।
टीचर के सजा देने के कारण उसका मन उदास था। अत: वह घर में भी उदास बना रहा।
शाम को माँ ने पतलू को उदास देखकर सारी बातें पूछीं, फिर प्यार से समझाया कि तुम घर की बात स्कूल में ले गये, स्कूल

की बात घर में लाये । इसीलिए परेशान हो। मन को दु:ख पहुँचाने वाली घर की बात घर में छोड़ दिया करो, स्कूल की स्कूल में।
हर परिस्थिति में प्रसन्न रहो।
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दुर्घटना से देर भली

“और सुन यह ऑफिस टाइम होता है, इसलिए इधर और उधर दोनों तरफ देखकर ही सड़क पार किया कर।”
माँ की तमाम हिदायतों के बावजूद प्रशान्त की हरकतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह हाथ छोड़कर साइकिल चलाता और मस्त रहता। वह कहता–‘मुझे कुछ नहीं होता।’
माँ ने समझाया–‘बेटा! दुर्घटना से देर भली। धीरे–धीरे साइकिल चलाया करो। जल्दबाजी में अगर चोट लग गयी
तो।’
बीच में बात काट कर वह बोला–‘हड्डी टूट जाएगी तो बहुत अच्छा है, स्कूल तो नहीं जाना पड़ेगा।’
माँ ने उसके कान खींचते हुए कहा–‘चुप नालायक कहीं का, ऐसी गन्दी बातें बोलता है।’
प्रशान्त हँसता हुआ खेलने चला गया।
और एक दिन वही हुआ, जिसका माँ को डर था। सामने से ट्रक आ रही थी। ट्रक ड्राइवर ने जोर का ब्रेक लगाया किन्तु ब्रेक लगाते–लगाते भी प्रशान्त की साइकिल को ज़ोर का धक्का लगा और ट्रक जोर की चीख के साथ रुक गई।
प्रशान्त बच तो गया किन्तु पैर में फ्रैक्चर हो गया। ट्रक ड्राइवर भला आदमी था। उसने प्रशान्त को अपनी ट्रक पर लिटाया व साइकिल को भी ट्रक पर रखा। सड़क के दो लोग भी साथ हो लिए और निकटस्थ अस्पताल में ले गये। इस बीच प्रशान्त से फोन नं॰ पूछ कर उसके घर पर फोन कर दिया। अस्पताल में उसकी माँ भी आ गई व प्रशान्त की फर्स्ट एड भी हो गई। एक्सरे से पता चला कि उसके बाएँ पैर में बुरी तरह फ्रैक्चर है। प्लास्टर चढ़ा दिया गया।
एक सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद डॉक्टर ने उसे घर ले जाने की अनुमति दे दी किन्तु पूरी तरह ठीक होने के लिए उसे लगभग तीन महीने तक बिस्तर पर रहना पड़ा। बिस्तर पर पड़े–पड़े वह ऊब गया।

अब उसके दोस्त उससे मिलने आते तो वह उनसे कहता–
‘रास्ते में साइकिल धीरे चलाओ, सदा सड़क के दोनों ओर देखकर ही सड़क पार किया करो। दुर्घटना से देर भली।’
यातायात के नियमों का पालन करो।
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तोते का दाह संस्कार

‘माँ! आज तोता लेट कर सो रहा है।’
‘हाँ बुआजी! जल्दी आइए वरना तोता जग जाएगा।’
‘बच्चों तोता लेटकर नहीं सोता है।’
‘वही तो हम भी कह रहे हैं, तोता लेट कर नहीं सोता है किन्तु आज लेटा है।’
‘देखो तुम लोग इतना शोर कर रहे हो, यह फिर भी नहीं उठ रहा है न। यह तो––––’
‘हाँ! इसकी तबियत खराब होगी। चलिए इसे डॉक्टर को दिखा देते हैं।’
‘इसे डॉक्टर को दिखाने की जरूरत नहीं है । यह तो––––’
बुआ जी की बात पूरी होने के पहले ही पूजा बोली–‘बुआजी! यहाँ डॉक्टर सक्सेना बहुत अच्छे हैं। हम लोग जब बीमार पड़ते हैं, तब उन्हीं को दिखाते हैं।’

‘बुद्धू! पशु–पक्षियों के डॉक्टर अलग होते हैं। चलो मामा जी से पूछते हैं कि यहाँ पर जानवरों का अस्पताल कहाँ है?’  छुट्टियों में ननिहाल आए हुए नितिन ने ममेरी बहन पूजा से कहा।
तब तक मामा–मामी भी वहाँ आ गए। नानी तख्त पर बैठी हुई सब्जी काट रही थीं और सब तमाशा देख रही थीं। वे बच्चों की नादानी पर मुस्करा रही थीं।
‘अरे मामा जी जल्दी करिए, तोते को पशु–पक्षियों के डॉक्टर के पास ले चलिए, इसकी तबियत बहुत खराब है। देर होने पर मर भी सकता है।’
‘ठीक कहा तुमने नितिन! तोता मर ही चुका है।’

‘क्या?’ सभी बच्चों का मुँह आश्चर्य और दु:ख के साथ खुला रह गया।
‘हाँ! क्योंकि तोता या कोई भी पक्षी लेटकर नहीं सोता है। जब पक्षी मर जाता है तब ही लेटता है।’मामी जी बोलीं।
‘वही तो मैं भी इतनी देर से कहना चाह रही थी।’बुआ जी ने कहा।
बच्चों ने पिंजरा नीचे उतार लिया और सब बच्चे उदास होकर तोते के चारों ओर बैठ गए। अपूर्वा तो रोने लगी।
मामा जी बोले–‘चलो बच्चों उठो, आज तुम लोगों को लखनऊ का चिड़ियाघर दिखाने ले चलेंगे। वहाँ पर तुम्हें बहुत से पशु–पक्षियों के बारे में जानकारी मिल सकेगी। चलो जल्दी तैयार हो जाओ ।’
बच्चों के उत्तर की प्रतीक्षा किए बगैर वह मामी जी से बोले–‘पूड़ी–सब्जी बना दो, साथ ले जाएँगे। हो सकता है देर लगे, बच्चे तब तक भूखे हो जाएँगे।’
पर बच्चे उदास बैठे रहे। सबसे बड़ा गौरव था । वह दार्शनिक अन्दाज़ में बोला–‘पापा! पहले इसके दाहसंस्कार का इंतजाम करिए। ऐसी स्थिति में तो हम भोजन भी नहीं करते। घूमना तो दूर की बात है।’
‘बेवकूफी की बात मत करो अभी जमादार आएगा, तब उसे इसको दे देंगे। वह इसे फेंक देगा।’
‘पापा! क्या मैं मर जाऊँगा तो मुझे भी जमादार को फेंकने के लिए दे देंगे।’
‘बदतमीज!’ कहते हुए मामाजी का एक जोरदार थप्पड़ गौरव के गाल पर पड़ा। हालांकि बाद में वह पछताने लगे।
गौरव की आँखों से आँसू निकलने लगे। अन्य बच्चे भी रोने लगे, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि गौरव ने क्या गलत कह दिया है।
अब नानी बच्चों के पास आकर प्यार से बोलीं–‘बच्चों चलो उठो! पशु–पक्षियों का दाहसंस्कार नहीं होता है। तुम लोगों के लिए दूसरा तोता खरीद देंगे।’
अब गौरव फफक कर रो उठा–‘दादी! हमें दूसरा तोता नहीं चाहिए। यह कोई मिट्टी का खिलौना नहीं था। यह तोता तो हमारे साथ खेलता था। कभी उड़कर हमारे कन्धे पर बैठ जाता था, कभी अपनी कटोरी का खाना न खाकर हमारी थाली का भोजन जूठा कर देता था। जब हम उसे पकड़ने के लिए दौड़ते थे तब वह ऊपर उड़कर किसी कोने में बैठ जाता था। जब हम थक कर बैठ जाते थे, तब चुपके से हमारे कन्धे पर बैठ जाता था।’
‘हाँ नानी। हम उसे भूल नहीं सकते वह हमारा दोस्त था। दिन भर तो वह हमारे साथ खेलता था। शाम को वह अपने आप अपने पिंजरे में चला जाता था और पिंजरा बन्द करने के लिए आवाज देता था। पिंजरे को वह अपना सोने और खाने का कमरा समझता था।’
इतने में जमादार की आवाज आई। मामा जी ने तोता उसे दे दिया । कोई बच्चा डर के मारे कुछ बोल तो न सका किन्तु सभी बच्चे उदास थे व दिन भर ठीक से कुछ खा पी न सके।
उनका निश्छल मन यह नहीं सोच पा रहा था कि मनुष्यों की भाँति पशु–पक्षियों का भी दाहसंस्कार क्यों नहीं होता है। उनकी मृत्यु पर शोक क्यों नहीं मनाया जाता है?––––क्यों?
प्राणिमात्र पर दया मनुष्य का सहज स्वाभाविक गुण है।
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डकैत अंकल, मिठाई खा लो

‘बच्चों चलो तैयार हो जाओ, आज घूमने चलेंगे। माँ ने जल्दी–जल्दी काम निबटाते हुए बच्चों को आवाज दी।
घूमने के नाम पर बच्चे तुरन्त उठ गए व खुशी–खुशी तैयार भी हो गए। राजू और पिंकी की बुआ के बच्चे शिवम व प्रियम भी आए थे। अत: वे बहुत खुश थे। तैयार होकर सबने लस्सी पी। माँ ने रास्ते के लिए पूड़ी सब्जी बना ली, पापा ने पैकिंग करके एक थैले में रख लिया।
चारों बच्चे तथा माता–पिता शहर जाने के लिए बस पर बैठे। उनका घर गाँव में था। गाँव से शहर लगभग चालीस किलोमीटर दूर था। अत: वे लोग सबेरे जल्दी ही चल दिये थे।
जहाँ बस चली तो पिंकी माँ की गोद में सिर रख कर सो गई। थोड़ी दूर चलने पर बस तेज हिचकोले के साथ रुकी। पिंकी की नींद खुल गई।
उठते ही बोली–‘माँ भूख लगी है, पूड़ी सब्जी दो।’
पापा ने एक पैकेट निकाल कर पिंकी को दिया। पिंकी को खाते देखकर सब बच्चों को भूख लग आयी। पापा ने सबको एक–एक पैकेट निकाल कर दे दिया।
‘देखा पैकेट बना देने में कितनी आसानी हो गई वरना बस में खाना निकाल कर देने में कितनी परेशानी होती।’ पापा बोले।
‘हाँ! आप सही कह रहे हैं। मैंने सोचा था कि बस से उतर कर खाएँगे, लेकिन बच्चों का क्या भरोसा, कब भूख लग आए। अगर खाना इकट्ठा बँधा होता तो वाकई परेशानी होती।’ माँ ने कहा।
जब बच्चे खा चुके तब राजू ने सबके खाली पैकेट एक जगह इकट्ठा कर लिए व कहा–‘बस से उतरने पर कूड़ेदान में डाल देंगे।’
इतने में एक गड्ढा आने के कारण बस उछली। अन्य यात्रियों को जहाँ पीड़ा हुई, वहीं बच्चे खुशी से ताली बजा कर चिल्लाने लगे। शहर आने पर वे बस से उतर कर सबसे पहले चिड़ियाघर गए।
शिवम् ने कहा–‘मामा जी! हाथी की सवारी करेंगे।’
जब बच्चे हाथी पर चढ़ने के लिए आए तो पिंकी को हाथी ने सूँड़ में लपेट लिया। पिंकी के साथ ही सभी लोग चिल्लाने लगे किंतु हाथी ने पिंकी को पीठ पर बैठा लिया। अब सब आश्वस्त हुए।
महावत ने सबको बताया–‘जानवर अकारण किसी को तंग नहीं करते। हाथी बच्चों को बहुत प्यार करते हैं। इसीलिए उसने बच्ची को उठा कर पीठ पर बैठा लिया।’
अब सब बच्चों ने महावत से कहा–‘हाथी से कहिए कि हमें भी सूँड़ से उठा कर अपनी पीठ पर बैठाए।’
‘बेटा हाथी अपनी मर्जी से सूँड़ में लपेटता है।’ इतने में हाथी की पीठ पर बैठी हुई पिंकी चिल्लाने लगी–‘भइया तुम लोग भी ऊपर आ जाओ, मुझे अकेले डर लग रहा है।’
खैर हाथी की पीठ पर सब बच्चे चढ़ गए। हाथी मस्त चाल से चलने लगा।

राजू ने कहा– ‘पापा हमें आइसक्रीम खरीद कर दे दीजिए। हाथी पर बैठ कर खाने में बड़ा मजा आएगा।’
महावत ने मीठी घुड़की दी, बेचारे बच्चे चुप हो गए। इतने में प्रियम् ने गाना शुरू कर दिया। शिवम् उछला तो महावत चिल्लाया–‘उछल–कूद मत करो, हाथी बिगड़ जाएगा तो हम सब मरेंगे।’
अन्तत: महावत ने बड़बड़ाते हुए सबको हाथी से उतार दिया, बोला–‘बड़े शरारती बच्चे हैं।’
सब हाथी से उतर कर आइसक्रीम खाने लगे। चिड़ियाघर और म्यूजियम देखने के बाद सब लोग बाजार गए, कपड़े खरीदे, चाट खाई और वापस बसस्टेशन आकर बस पर बैठ गए। बस पर बैठते ही थके होने के कारण बच्चे सो गए। पापा माँ से बोले–‘तुम भी झपकी लगा लो, तब तक मैं सब सामान व बच्चों को देख रहा हूँ।’
थोड़ी दूर चलने पर बस में एक नवविवाहित जोड़ा व कुछ बाराती भी सामान सहित बस में बैठ गए।
बच्चे बस रुकने व शोर–शराबे के कारण जाग गए। सब उत्सुकतापूर्वक बारात व दूल्हा–दुल्हन को देखने लगे। बस चलने लगी। तब बारातियों को मिठाई के पैकेट बाँटे गए।
प्रियम् अपनी जबान निकाल कर बोला–‘आ जा मेरे मुँह में मिठाई आ जा।’ सब हँस पड़े। मिठाई बाँटने वाले ने सुन लिया। उसने बच्चों को भी एक–एक पैकेट मिठाई दी।
बच्चों ने माता–पिता की अनुमति लेकर मिठाई उदरस्थ करनी प्रारम्भ करी ही थी कि अब बस अगले पड़ाव पर रुकी। उतरने वाले उतर गए, चढ़ने वाले चढ़ गए। बस चलने वाली थी कि मुँह पर कपड़ा बाँधे हुए कुछ लोग बस पर चढ़ गए। उनमें से एक आदमी ड्राइवर के पास जाकर खड़ा हो गया और बस चलाने का आदेश दिया। अन्य लोग बारात के पास जाकर खड़े हो गए। सबने बन्दूकें निकाल लीं व बारातियों से कहा–‘निकाल कर रख दो सब।’

बच्चे भी समझ गए कि ये डकैत हैं। सभी यात्री भयभीत थे। बच्चों ने इशारों में ही योजना बनाई। शिवम उठकर एक डकैत के पास गया, बोला-‘डाकू अंकल मिठाई खाएँगे ।’
‘हुँ–––––हूँ तेरी ये हिम्मत।’ डाकू गुर्राया ।
‘गल्ती हो गई डाकू अंकल।’ डरने का नाटक करता हुआ शिवम् बोला। इतने में बच्चों ने बिना मौका दिए हुए मिठाई डाकुओं की आँख की तरफ फेंकी। जब तक डाकू सम्भलते, सब बच्चों सहित बस के अन्य यात्री डाकुओं पर एक साथ टूट पड़े।
इतने में कंडक्टर ने अपने मोबाइल से फोन करके घटना तथा बस रुकने की निश्चित जगह पुलिस को बता दी। बस वहाँ रुकी, तब तक पुलिस भी आ गई थी। यात्रियों ने डाकुओं की चटनी बना दी थी। डाकू पकड़ लिए गए।
अब सबसे शरारती शिवम् ने बारातियों से कहा–‘अंकल सभी यात्रियों को मिठाई खिलाइए ताकि मन से कड़वाहट निकल जाए और सब मीठे मुँह से अपने घर जावें। हाँ, हमारे लिए दो–दो पैकेट, डाकुओं को इतना पीटने के बाद पेट में चूहे कूदने लगे।’
अभी तक हतप्रभ रहे यात्रियों में मुस्कराहट छा गई। दूसरी तरफ दूल्हे के पिता भावावेश तथा खुशी में रो पड़े और उन्होंने बच्चों को छाती से लगा कर कहा–‘भगवान तुम्हारे जैसे बच्चे सबको दे।’
अब तक ड्राइवर भी हादसे से उबर चुका था। अत: बस चलने लगी। पूरी बस में एक ओर मिठाई बँटने लगी, दूसरी ओर बच्चों ने गाना शुरू कर दिया।
मुसीबत में साहस से काम लो।
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चावल के दाने

रविवार का दिन था। सब लोग साथ में भोजन कर रहे थे।
वन्दना ने भोजन समाप्त करने के बाद भी थोड़े से दाल–चावल थाली में छोड़ दिए।
पापा ने कहा–‘वन्दना ! तुम उतना ही भोजन लिया करो, जितना खा सको, तुम अक्सर जूठा छोड़ देती हो, जो फेंकना पड़ता है।’
‘क्या करूँ पापा? मैंने लिया तो अन्दाज़ से ही था, लेकिन बच गया। आप ही तो कहते हैं कि जबर्दस्ती खाने से पेट खराब होगा।’
‘हाँ! जबर्दस्ती तो नहीं खाना चाहिए किन्तु भोजन फेंकना भी उचित नहीं है। इसलिए थोड़ा कम भोजन लो, जब और भूख लगे तब दोबारा ले लो, इससे खाना जूठा नहीं बचेगा व फेंकना नहीं पड़ेगा।’
माँ ने कहा–‘अच्छा वन्दना! बताओ हमारे देश की आबादी कितनी है?’
‘लगभग एक अरब बाइस करोड़।’
‘शाबाश, अगर हर व्यक्ति रोज केवल एक चावल का दाना फेंके तो कितने दाने फेंके गए।’
‘एक अरब बाइस करोड़ दाने।’
‘यदि एक ग्राम चावल में लगभग दस दाने आवें तो एक अरब बाइस करोड़ दाने का कितने क्विंटल चावल हो जाएगा।’
वन्दना दौड़कर कागज, पेंसिल ले आई व गणना करने लगी।
एक ग्राम में– 10 दाने
एक किलोग्राम में– 10 x1000 =10,000 दाने
एक क्विंटल में– 10000 x100 =10,00,000 (दस लाख दाने)
10,00,000 (दस लाख) दाने में– एक क्विंटल
एक अरब बाइस करोड़ (1,22,00,00,000) दाने में
12,20,000,000/ 10,00,000 =1,220 क्विंटल

बाप रे बाप एक अरब चावल के दानों में एक हजार दो सौ बीस क्विंटल चावल। पूरा का पूरा गोदाम भर जाएगा।
‘हाँ अब कुछ सोचो। मात्र एक चावल का दाना प्रतिदिन प्रति व्यक्ति बरबाद न करे तो प्रतिदिन एक हजार दो सौ बीस क्विंटल चावल बच सकता है।
तुम जानती हो वन्दना। एक मजदूर एक दिन में लगभग ढाई सौ ग्राम चावल खा सकता है। बताओ एक हजार दो सौ बीस क्विंटल चावलों से कितने मजदूरों का पेट भर सकता है?’
वन्दना ने गणना करके बताया–
‘चार लाख अट्ठासी हजार मजदूरों का पेट भर सकता है। यह सोच कर ही अपने से ग्लानि हो रही है कि प्रति व्यक्ति, प्रति दिन एक दाना बचाने से देश के चार लाख अट्ठासी हजार लोगों का पेट भर सकता है और मैं––––कितना खाना फेंकती थी।’
माता–पिता के कुछ कहने से पूर्व ही वन्दना उछल कर दादी से लिपटते हुए बोली–‘दादी! मैं समझ गयी हूँ, अब मैं एक दाना भी बरबाद नहीं करूँगी। आप तो समझाते–समझाते हार गर्इं थीं। अब समझ में आया। दादी! मुझे माफ कर दो।’
दादी उसे प्यार करते हुए बोलीं–‘तू तो मेरी प्यारी बिटिया है। जब समझे तभी सवेरा। आज मैं तेरे लिए लड्डू बनाऊँगी।’
‘अरे वाह––––लड्डू वन्दना खुशी से चिल्लायी।
खाद्य पदार्थों की बरबादी मत करो।
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खेल का महत्त्व

चीकू और मीकू दो मित्र थे। चीकू खेल, पढ़ाई तथा हर काम में आगे रहता था। मीकू दिन भर तथा रात में भी देर तक पढ़ता रहता था, किन्तु फिर भी पढ़ाई में पीछे रहता था। एक दिन उनकी अध्यापिका ने बच्चों से पूछा–‘तुम लोग विद्यालय से जाने के बाद क्या करते हो ?’
चीकू बोला–‘कपड़े बदलकर खाना खाते हैं। थोड़ी देर आराम करते हैं फिर खेलने जाते हैं, लौटकर थोड़ी देर पढ़ते हैं। सुबह उठने के बाद भी थोड़ी देर पढ़ते हैं।’
इसी प्रकार अन्य बच्चों ने भी अपने विषय में बताया।
मीकू गुमसुम–सा बैठा हुआ था। अध्यापिका ने प्यार से पूछा–‘मीकू बेटे! तुम घर जाने के बाद क्या करते हो?’
मीकू ने कहा–‘ कपड़े बदलकर खाना खाते हैं। फिर रात को देर तक पढ़ते रहते हैं। सुबह उठने के बाद भी पढ़ते हैं।’’
अध्यापिका ने कहा–‘खेलते नहीं हो।’
मीकू–‘नहीं’

अध्यापिका–‘यह तो ठीक नहीं है, जितना जरूरी पढ़ना है, उतना ही खेलना भी। पढ़ाई के समय पढ़ाई व खेल के समय खेलना चाहिए। शाम को हर बच्चे को थोड़ी देर जरूर खेलना चाहिए। इससे शरीर स्वस्थ रहता है, मन प्रसन्न रहता है। जब हम स्वस्थ व प्रसन्न रहेंगे तो, हमारा मन पढ़ाई में भी लगेगा।’
मीकू बोला–‘अब मैं भी रोज खेला करूँगा।’ इस प्रकार मीकू भी खेलने लगा। साथ ही पढ़ाई भी करता था। अब वह खुश रहता था व पढ़ाई में भी अच्छा हो गया था ।
स्वस्थ रहने के लिए खेल भी आवश्यक है।
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Friday, November 23, 2018

बच्चों के मानसिक रोग (निदान, कारण और समाधान)

शैशवावस्था तथा बाल्यकाल में बच्चे की कई मानसिक समस्याएँ हो सकती हैं । बड़ों की छोटी–सी भूल बच्चे की किसी समस्या को जन्म दे सकती
है । जैसे – नवजात शिशु की स्तन चूसने की इच्छा अतृप्त रह जाने के कारण अँगूठा चूसने की आदत, कैल्शियम की कमी से मिट्टी खाने की आदत, बच्चे में मानसिक असुरक्षा के कारण रात में चैंकना, हीनता की भावना से हकलाना व मानसिक तनाव के कारण बिस्तर पर पेशाब करना आदि ।
यदि बचपन में इन समस्याओं को हल्के में लिया जाता है तो बड़े होने पर यही मानसिक समस्याओं को जन्म देती हैं । जैसे – चूसने की इच्छा अतृप्त रह जाने पर बड़े होने पर असामान्य सेक्स–सम्बन्ध की इच्छा प्रबल हो सकती है ।
1– स्कूल फोबिया
कई बच्चे स्कूल जाना पसन्द नहीं करते । जिस व्यवहार से उन्हें स्कूल न जाना पड़े, उसे अपना लेते हैं, जैसे – पेट–दर्द, सिर–दर्द आदि का बहाना करना । इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि बच्चा स्कूल क्यों नहीं जाना चाहता । इसके कई कारण हैं – अध्यापक की मार–डाँट व भय, शारीरिक कमजोरी या विद्यालय में थक जाना, किसी कारण सहपाठियों द्वारा मजाक उड़ाया जाना, क्लास टेस्ट में दूसरों की अपेक्षा कम अंक मिलना । देखने में लगता है कि समस्या अचानक प्रारम्भ हुई, किन्तु बच्चा भीतर–ही–भीतर काफी समय से घबराहट का अनुभव करता है । बच्चा माँ–बाप से विद्यालय जाने के विषय में सीधे–सीधे न कहकर बहाना बनाता है, क्योंकि उसे मालूम है कि स्कूल तो उसे जाना ही पड़ेगा ।
कुछ बच्चे अपनी माँ पर इतने अधिक आश्रित होते हैं कि उन्हें विद्यालय में भी अपनी माँ के बिना अच्छा नहीं लगता । ऐसे बच्चों को हमउम्र बच्चों के साथ खेलने–कूदने तथा अपना कार्य स्वयं करने की आदत डालनी चाहिए ।
यदि विद्यालय–पूर्व क्रियाएँ सही तरीके से करवाई जाएँ तो बच्चे पूरी तरह से विद्यालय शिक्षा के लिए शारीरिक–मानसिक रूप से परिपक्व हो जाते हैं ।
अब समस्या यह है कि यदि बच्चे की विद्यालय–पूर्व शिक्षा सही रूप से नहीं हुई है और प्राथमिक स्तर पर आने पर उसके मन में विद्यालय के प्रति भय बैठ गया है, उसे विद्यालय जाना अच्छा नहीं लगता है, विद्यालय के नाम पर वह घबराने लगता है तब अभिभावकों को क्या करना चाहिए ?
सबसे पहले समस्या के मूल कारण को जानना चाहिए । इस समस्या के मूल कारण निम्न हो सकते हैं—
(क) शारीरिक कारण—सम्भव है कि बच्चा शारीरिक रूप से कमजोर हो, विद्यालय में थक जाता हो । यदि ऐसा है तो उसकी शारीरिक स्थिति को समझना चाहिए । हो सकता है बच्चा रात को देर से सोता हो, इस कारण सुबह जल्दी उठने में परेशानी होती हो, फलस्वरूप वह विद्यालय में थका–थका रहता हो । रात्रि में देर से सोने के कारण सुबह उठने पर बच्चों को शौच नहीं हो पाता है, पेट खराब होता है, बीमारी आती है, थकान रहती है, शिक्षा में अरुचि होती है । इसलिए घर में देर रात तक टी.वी. नहीं चलना चाहिए । बच्चों को रात में आठ बजे तक अवश्य सुला देना चाहिए, जिससे वह आठ–नौ घण्टे की नींद पूरी करके सुबह चार–पाँच बजे तक उठ जावें ।
(ख) कुपोषण—बच्चों को ताजा पौष्टिक भोजन दें, साथ में फल–सब्जी व दूध की मात्रा भी पर्याप्त हो । कुपोषण के कारण भी स्वास्थ्य खराब हो सकता है । शरीर थका–थका सा रहता है, फलत: बच्चे का विद्यालय में मन नहीं लगता है । बिस्किट, ब्रेड, नूडल्स, बोतलबन्द पेय, दालमोठ, बाजार की चाट आदि से स्वास्थ्य खराब होता है ।
(ग) खेलकूद व व्यायाम की कमी—बच्चों के लिए खेल बहुत आवश्यक है । खेलकूद में शारीरिक रूप से दौड़–भाग वाले खेल होने आवश्यक हैं । इनसे बच्चों के शरीर व मन दोनों का ही व्यायाम हो जाता है । उनका स्वास्थ्य ठीक रहता है व मन प्रसन्न रहता है ।
(घ) बच्चे का पढ़ाई में कमजोर होना—यदि बच्चा किसी कारण पढ़ाई में कमजोर है, उसे विद्यालय में अच्छा नहीं लगता है । वह विद्यालय न जाने के लिए तरह–तरह के बहाने बनाता है । ऐसी अवस्था में सबसे पहले उसकी विषयगत कमजोरियों को दूर करना चाहिए ।
(ङ) अध्यापक का भय—कुछ अध्यापक बात–बात पर बच्चों को डाँटते–मारते हैं या भयभीत करते हैं या मनोवैज्ञानिक तनाव प्रदान करते हैं । ऐसी अवस्था में बच्चे विद्यालय जाने से घबराते हैं । अभिभावक को अध्यापक से मिलकर वार्तालाप करना चाहिए । यदि प्रेमपूर्ण वार्तालाप के बाद भी अध्यापक अपना व्यवहार बदलने के लिए तैयार नहीं होते हैं तब विद्यालय प्राचार्य की मदद लेनी चाहिए ।
(च) सहपाठियों द्वारा मजाक उड़ाया जाना—कई बार किसी विशेष कारण से सहपाठी किसी बच्चे का मजाक उड़ाते हैं, जैसे बच्चे की विकलांगता, बदसूरत होना, हकलाकर बोलना, गरीब होना आदि ।
यदि ऐसा है तब पहले तो बच्चे को ही प्रेरणा देनी चाहिए कि वह चिढ़ाने वाले बच्चों का सामना करे । उन्हें मुँहतोड़ जवाब दे, किन्तु यदि समस्या ने अधिक गंभीर रूप ले लिया हो तो अभिभावक को चाहिए कि अध्यापक से मिलकर इस  समस्या का समाधान करें ।
(छ) टेस्ट में दूसरे बच्चों से कम अंक मिलना—महत्त्वाकांक्षा या प्रतिस्पर्द्धा की भावना अच्छी होते हुए भी बच्चे में बहुत अधिक प्रतिस्पर्द्धा की भावना होना या सदा कक्षा में पहले स्थान पर ही होने की भावना बहुत अधिक घातक हो जाती
है ।
सदा कक्षा में प्रथम आने वाला विद्यार्थी कभी चैथे, पाँचवें या दसवें स्थान पर आ जाता है तो बहुत अधिक महत्त्वाकांक्षी होने पर वह विचलित हो जाता है । फलस्वरूप विद्यालय उसे अच्छा नहीं लगता है और वह विद्यालय जाना पसन्द नहीं करता है ।
पहली बात तो प्रारम्भ से ही बच्चे के मन में यह भावना डालनी चाहिए कि जीवन में सफलता और असफलता दोनों के लिए ही तैयार रहना चाहिए । सदा आवश्यक नहीं है कि बच्चा प्रथम स्थान पर ही आए । दूसरी बात, यदि बच्चा बहुत महत्त्वाकांक्षी हो ही गया हो तो धीरे–धीरे उसके मन से इस भावना को निकालने का प्रयास करना चाहिए ।
महत्त्वाकांक्षी होना अच्छा होता है किन्तु लक्ष्य की प्राप्ति न होने पर नैराश्य यथ्तनेजतंजपवदद्ध से घिर जाना बहुत बुरा होता है । जितने भी लोग जीवन में सफल हुए हैं, उन्होंने जीवन में कभी–न–कभी असफलता का सामना अवश्य किया है ।
2– हकलाना
जब बच्चे बोलना सीख रहे हों, तब यह आदत पड़ सकती है । यदि समय पर देखभाल न की जाए तो विद्यालय जाने के समय तक यह रोग पूर्णत: विकसित हो जाता है ।
हकलाने के कई कारण हो सकते हैं – शारीरिक कमी, हीनता की भावना या दूसरों को अपनी तरफ आकर्षित करना । हकलाने वाले बच्चे को सर्वप्रथम बाल रोग विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए । यदि हकलाने का कारण शारीरिक है, तब तो इलाज हो ही जायेगा ।
कुछ बच्चे सामान्य स्थिति में ठीक बोलते हैं किन्तु तनावपूर्ण स्थिति में या किसी नए व्यक्ति के सामने हकलाने लगते हैं । इसका प्रमुख कारण है कि वे अपने को दूसरे से हीन महसूस करते हैं । दूसरे के सामने बच्चा घबरा जाता है और वह हकलाने लगता है ।
इस समस्या का प्रारम्भ बहुत छोटेपन से होता है । कई बार हम अपनी इच्छाओं व आकांक्षाओं का केन्द्रबिन्दु बच्चे को बना लेते हैं । सोचते हैं कि बच्चा दूसरे के सामने एक आदर्श बच्चे का रूप प्रस्तुत करे या हमारी कल्पनाओं को साकार करे । सब लोग उसे अच्छा कहें । इस कारण हम उसे ऐसा व्यवहार सिखाने का प्रयास करते हैं, जिससे समाज में उसकी प्रशंसा हो । बच्चे की प्रशंसा होने पर हम स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं ।
एक सीमा तक तो लोक–व्यवहार सिखाना बच्चे के हित में होता है, किन्तु जब यही चीज अधिकता में हो जाती है, तब बच्चे के लिए हानिकारक हो जाता
है । कई बार वह अपने को अच्छा प्रदर्शित करने के चक्कर में दूसरे के सामने घबरा जाता है व घबराहट के कारण हकलाने लगता है ।
पहली बात तो हम बच्चे को बच्चा समझें, उसको सहज रूप में विकसित होने दें तब यह समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी । यदि बच्चे में हकलाने की समस्या उत्पन्न हो गई हो तो इस समस्या को दूर करने के लिए बड़े धैर्य की आवश्यकता है । यदि हकलाने का कारण शारीरिक विकृति न होकर मानसिक है तब समस्या के मूल में बच्चे की घबराहट छुपी होती है । अत: इसके निवारणार्थ—
बच्चे को अधिक से अधिक वार्तालाप का मौका दें । बच्चा यदि धीरे–धीरे बोल रहा है या हकलाकर भी बोल रहा है तो उसे बोलने दें । अधिक टोकाटाकी न करें, लेकिन जब बच्चा बिना हकलाए बोले तब उसकी प्रशंसा किसी–न–किसी तरह अवश्य करें ।
उससे स्वयं भी अधिक–से–अधिक बातें करें । जैसे—कहानियाँ सुनाना, विद्यालय की बातें करना, परी कथा सुनाना आदि । उसे भी स्वयं कहानी रचना व वाचन के लिए प्रेरित करें ।
जब वह बिना झिझक बोलना सीख लेगा तब उसकी हकलाहट धीरे–धीरे स्वयं समाप्त हो जाएगी ।
यदि हकलाने वाला बच्चा विद्यालय जाता है तो यदि उसकी हकलाहट के कारण विद्यालय में मजाक बनाया जाता है तो अध्यापकों से मिलकर इस समस्या को दूर करने का प्रयास करें । अध्यापकों से कहें कि उसे भी बोलने के लिए प्रेरित करें । जो बच्चे उसका मजाक बनाते हैं, उन्हें ऐसा न करने के लिए समझाएँ ।
3– रात में चौंकना या बोलना
कुछ बच्चों में प्राय: रात में चौंकना, चिल्लाकर सोते से जाग जाना, अचानक भय से जगकर बैठ जाना आदि लक्षण मिलते हैं । इस दशा में बच्चा कई मिनट तक अशान्त रहता है । कई बार बच्चे दिन में सुनी हुई बात को नींद में बड़बड़ाने लगते हैं ।
इस समस्या का मुख्य कारण बच्चे में असुरक्षा की भावना होती है । साथ ही यदि घर में कलह–क्लेश होता रहता है या बच्चा किसी कारण से डर गया होता है या उसको कोई भयभीत करता है, तब वह नींद में बड़बड़ाता है या चौंकता है ।
कई बार बच्चे को स्कूल में या घर में पढ़ाई के लिए अधिक डाँटा जाता है, तब भी वह तनावग्रस्त हो जाता है और रात में चैंकने या बड़बड़ाने लगता है ।
इस समस्या का निवारण बहुत आवश्यक है अन्यथा भावी–जीवन के लिए कष्टकारक हो सकता है । बच्चे को भरपूर प्यार दें, उसके मस्तिष्क में किसी प्रकार का भय, तनाव व चिन्ता न पनपने दें । अभिभावक अपने प्यार से बच्चे के मन से असुरक्षा की भावना को दूर कर दें ।
4– चोरी करना
कुछ बच्चों में चोरी करने की आदत पड़ जाती है । इसके कई कारण हो सकते हैं । बहुत छोटे बच्चे अपने–पराए का भेद नहीं समझते हैं । बच्चे को जो चीज अच्छी लगती है वह उसे उठा लेता है । चार–पाँच वर्ष तक के बच्चे के लिए ऐसा करना खेल है । वह यह समझता भी नहीं है कि ऐसा करना चोरी है । बड़े लोगों के डर के कारण उसे छुपाने या छुपाकर रखने का प्रयास करता है । ऐसा होने पर अभिभावक दो तरह का व्यवहार कर सकते हैं—
बच्चे को समझाएँ कि ऐसा करना ठीक नहीं है क्योंकि यह चीज अपनी नहीं है, दूसरे की है । बच्चे से ही कहें कि उठाई हुई चीज वह स्वयं वापस करे । ऐसा करने से बच्चा वस्तुस्थिति समझ जाएगा व आगे से चोरी नहीं करेगा ।
कुछ अभिभावक बच्चे को डाँटना, मारना प्रारम्भ कर देते हैं । उसे झूठा, चोर आदि कहते हैं व यह भी कहते हैं कि तुमने हमारी बेइज्जती करवा दी । ऐसा करना ठीक नहीं है । बच्चा वस्तुस्थिति तो समझेगा नहीं, उल्टे अपमान महसूस करेगा व जिद्दी हो जाएगा ।
इसके अतिरिक्त बड़े बच्चों में चोरी की प्रवृत्ति के निम्न कारण व निवारण हो सकते हैं—
(क) बड़े बच्चे की उपेक्षा—अक्सर घर में छोटे बच्चे के आ जाने पर बड़े की उपेक्षा होने लगती है । अत: वह सबका ध्यानाकर्षित करने के लिए चोरी करना शुरू कर देता है । जैसे – घर की कोई आवश्यक वस्तु छुपा देना, जब घर के लोग उस वस्तु के लिए परेशान हों  तो ढूँढ़ने का नाटक करते हुए उस वस्तु को ढूँढ़कर दे देना, जिससे घर के सदस्य उसकी प्रशंसा करें व प्यार करें ।
धीरे–धीरे यही आदत चोरी में बदल जाती है । यदि इस प्रकार की स्थिति बार–बार आती है तब बड़े लोगों को ध्यान देना चाहिए कि कहीं बच्चा जान–बूझकर तो चीजें नहीं छुपा रहा है । साथ ही छोटे बच्चे के साथ ही बड़े बच्चे को भी समय व प्यार देना चाहिए ।
(ख) दोस्तों में हीरो बनने की लालसा—कई बार कुछ बड़े बच्चों में शर्त लगती है कि फलां चीज चुराकर दिखाओ या फलां काम करके दिखाओ तो हम तुम्हारा लोहा मानेंगे । इस अस्वास्थ्यकर प्रतिस्पर्द्धा में बच्चे कभी किसी अध्यापक की नजर बचाकर उनकी कोई चीज उठा लेते हैं या किसी सहपाठी का कोई सामान उठा लेते हैं और अपने उन साथियों के मध्य हीरो बन जाते हैं, जिनसे शर्त लगी थी ।
यह प्रवृत्ति जब अधिक विकसित होने लगती है तब बच्चे घर का सामान व रुपए भी चुराने लगते हैं व अपने साथियों के मध्य प्रशंसा के पात्र बनते हैं ।
यदि बच्चे को उसके अभिभावक पर्याप्त समय दें तब ऐसी प्रवृत्ति विकसित होगी ही नहीं, क्योंकि यदि बच्चे को मार–डाँट का भय न हो  तब वह अपनी सब बातें घर में बताता है । यदि फिर भी बच्चे ने कभी ऐसी हरकत की तो माता–पिता को शुरुआती दौर में ही आभास हो जाएगा । उसे समझाने–बुझाने से इसका समाधान भी हो जाएगा ।
(ग) कठोर अनुशासन—बच्चों के लिए दण्ड और पुरस्कार दोनों ही आवश्यक हैं । अनुशासन भी अच्छा है, किन्तु आवश्यकता से अधिक कुछ भी अच्छा नहीं होता है । घर में बच्चों की मनपसन्द कोई चीज बनी है या कोई फल, मिठाई या खाद्य वस्तु जो बच्चे को पसन्द है वह आई है । वह वस्तु उसे दण्डस्वरूप खाने के लिए न दी जाए व कहा जाए कि तुमने अमुक शरारत की थी या तुम्हारे परीक्षा में कम अंक आए हैं, इसलिए तुम्हें यह चीजें नहीं दी जा रही हैं ।
बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार करना ठीक नहीं है । बच्चे की गलती के लिए उसे डाँट दिया जाए यह तो ठीक है किन्तु दण्डस्वरूप खाने की चीज न देने से या तो वह अपने घर में चोरी करके खाएगा या दु:खी रहेगा या वह किसी मित्र या रिश्तेदार के यहाँ माँगकर या चुराकर खाएगा ।
5– ईर्ष्या की प्रवृत्ति
कोई बच्चा पढ़ने में बहुत तेज होता है तो स्वाभाविक रूप से घर व विद्यालय में उसकी प्रशंसा की जाती है । कभी–कभी किसी बच्चे से उसकी प्रशंसा सहन नहीं होती है व उस पढ़ाई में तेज बच्चे की कॉपी–किताबें चुरा लेता है ताकि वह परेशान हो और पढ़ न पाए । यही प्रवृत्ति धीरे–धीरे चोरी में बदल जाती है, तब बच्चा किसी के घर में कोई कीमती चीज देखकर भी उठा लेता है । ईर्ष्या और चोरी दोनों ही प्रवृत्तियाँ गलत हैं ।
जब बच्चे के मन में ईर्ष्या की भावना आती है, तब दूसरे के नुकसान के पहले तो उसका मन खराब हो जाता है । चाहे बात पढ़ाई की हो या धन की या किसी अन्य चीज की, ईर्ष्या की भावना ही गलत है । अभिभावकों को चाहिए कि बच्चे के मन में भरें कि तुम्हारे पास जितना है, उतना बहुत है । बहुत से लोग दुनिया में ऐसे भी हैं, जिनके पास हमसे बहुत कम है ।
उसे समझाएँ – ‘पढ़ाई में भी जिस विषय में तुम कमजोर हो उस कमजोरी को दूर करने का प्रयास करो । पढ़ाई में तेज बच्चे से ईर्ष्या करने से तुम पढ़ाई में तेज नहीं हो जाओगे ।’वैसे भी दुनिया में सभी बच्चे एक समान स्तर पर नहीं हो सकते । बच्चों को समझाएँ – ‘अपना पूरा प्रयास करो, जितनी सफलता मिलती है उसमें संतुष्ट रहो ।’अभिभावकों को यह देखना चाहिए कि बच्चे की किस बिन्दु पर कमजोरी है ।
6– बिस्तर पर पेशाब करना
कई बार बड़े बच्चे भी रात को या दिन में भी सोते समय बिस्तर पर पेशाब कर देते हैं । बच्चों के बिस्तर गीला करने के कुछ शारीरिक कारण भी हो सकते हैं, यदि शारीरिक कारण नहीं हैं तो मनोवैज्ञानिक कारण भी हो सकते हैं ।
(क) शारीरिक कारण
यदि बच्चे को कब्ज की शिकायत हो या पेट में कीड़े हों तब उसका मूत्राशय पर नियंत्रण नहीं रह पाता है और उसका बिस्तर पर पेशाब निकल जाता है । बच्चे को रात में सोते समय यदि कोई तरल पदार्थ (जैसे–दूध, जूस, पानी आदि) पिलाया जाता है तो गहरी नींद में होने के कारण पेशाब लगने पर वह जाग नहीं पाता है और उसका पेशाब निकल जाता है ।
कई बार जाड़े के दिनों में पेशाब लगने पर आलस्य के कारण बच्चे उठते नहीं हैं । यदि उठाया भी जाए तो भुनभुनाते हुए सो जाते हैं । ऐसी स्थिति में उनका पेशाब निकल जाता है ।
बच्चा बहुत कमजोर हो तब भी उसका अपने शरीर पर नियंत्रण नहीं रह जाता है, फलस्वरूप वह सोते में बिस्तर गीला कर सकता है ।
यदि बच्चे के पेशाब में अम्लता Acidity अधिक है तो उसके मूत्राशय के चारों ओर खुजली होती है, जिसके कारण उसके सोते समय उसका पेशाब निकल सकता है ।

(ख) मनोवैज्ञानिक तथा अन्य कारण
अपना ध्यानाकर्षित करना—कई बार छोटे बच्चे के घर में आ जाने के कारण बड़े बच्चे पर ध्यान नहीं दिया जाता है । फलस्वरूप वह ऐसी हरकतें करने लगता है जिससे उसकी तरफ भी घर के लोग आकर्षित हों । इस मनोवृत्ति के कारण वह जाने या अनजाने बिस्तर गीला कर देता है ।
बहुत अधिक लाड़–प्यार—बहुत अधिक लाड़–प्यार के कारण भी बच्चा सही आदतें नहीं सीख पाता है । कुछ लोगों में यह भावना होती है कि बच्चा जो कर रहा है, करने दो, बड़ा होने पर स्वयं सीख जाएगा । ऐसा ठीक नहीं है । बच्चे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी आवश्यक है, उसे कठोर अनुशासन में बद्ध न किया जाए, उसे नियमों में न बाँधा जाए यह सत्य है किन्तु सामाजीकरण की आदतों की नींव बचपन से डालनी आवश्यक है ।
अत्यधिक कठोरता—अत्यधिक कठोर अनुशासन भी बच्चे के लिए ठीक नहीं होता है । भयंकर जाड़े की रात है । बच्चे को रात में पेशाब लगी है, वह बिस्तर से नहीं निकलना चाहता है । वह बिस्तर से निकलता भी है तो शाल आदि ओढ़कर बाथरूम जाना चाहता है । यदि उसे ऐसा नहीं करने दिया जाता है तो वह डर के कारण बिस्तर से निकलता ही नहीं है व फिर सो जाता है और सोते में ही बिस्तर पर पेशाब निकल जाता है ।
भूत–प्रेत आदि का भय—बच्चों को डराने के लिए कई बार घर के बड़े लोग स्वयं ही भूत–प्रेत का डर मन में बैठा देते हैं या भूत–प्रेत की कथाएँ सुनकर उसके मन में भय बैठ जाता है । ऐसी स्थिति में रात में वह कमरे से बाहर निकलने में डरता है और सोते में ही उसका पेशाब निकल जाता है ।
यही भय धीरे–धीरे बच्चे के मन में स्थायी स्थान बना लेता है ।
7– झूठ बोलना
बहुत छोटे बच्चे को झूठ–सच में अन्तर पता ही नहीं होता है । वह खेल–खेल में ही अनायास झूठ बोलने लगता है, जैसे–बड़े लोगों ने उसका कोई खिलौना छुपाकर कहा—‘कौआ ले गया’फिर थोड़ी देर बाद कहा—‘देखो जादू से आ गया ।’ उसी प्रकार बच्चा भी खेल करता है—कोई चीज छुपाकर कहता है—‘देखो बिल्ली ले गई ।’ बड़े लोग हँसने लगते हैं, फिर वह उस चीज को दिखाकर कहता है—‘देखो मैं भी जादू जानता हूँ ।’
यह बात खेल तक तो ठीक है किन्तु बच्चे के और बड़ा होने पर यही आदत बढ़ती जाती है तो वह झूठ बोलने में परिवर्तित हो जाती है । इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि बच्चे के साथ इस प्रकार के खेल खेले ही न जाएँ या उसे सदा कठोर अनुशासन में ही रखा जाए या गम्भीर ही रहा जाए, किन्तु थोड़ा बड़ा होने पर यदि खेल झूठ बोलने की प्रवृत्ति में परिवर्तित होने लगे तो उसे झूठ और सच में अन्तर प्यार से समझा देना चाहिए ।
झूठ बोलने के और भी अनेक कारण व उनके निवारण प्रस्तुत हैं—
डाँट व मार के भय के कारण झूठ बोलना—अक्सर बच्चे घर व विद्यालय में मार व डाँट के भय के कारण झूठ बोलने लगते हैं । झूठ बोलने की शुरुआत घर से ही होती है । बच्चों से कोई चीज गिर गई या टूट गई, ऐसी स्थिति में उसे डाँट पड़ी या मार पड़ी । दुबारा ऐसी गलती होने पर उसने अनायास ही झूठ बोल दिया कि उसने तो ऐसा नहीं किया है । इस प्रकार झूठ बोलने से वह मार या डाँट से बच गया ।
धीरे–धीरे उसकी झूठ बोलने की आदत बढ़ती चली जाती है । बच्चा बड़ा होने पर विद्यालय गया । उसने होमवर्क नहीं किया या अन्य कोई गलती हो
गई । बच्चे ने झूठ बोल दिया – ‘हम लोग कहीं चले गए थे । इसलिए होमवर्क नहीं कर पाए ।’ शिक्षक ने उसे सजा नहीं दी । बच्च को ऐसा न करने के लिए प्यार से समझाएँ ।
सुधार के लिए बच्चे से गलती हो जाने पर उसे तुरन्त डाँटना या मारना शुरू न कर दें । उसकी पूरी बात धैर्य से सुननी चाहिए । यदि बच्चे से अनजाने में गलती हो गई है, जैसे कोई चीज गिर गई या टूट गई या खो गई तो उसे प्यार से समझाएँ व चीजें सम्भालकर रखना सिखाएँ । यदि बच्चा जान–बूझकर लापरवाही के कारण अपनी चीजें या घर का सामान इधर–उधर फेंकता रहता है तो उसे मीठी घुड़की दें ।
इसी प्रकार अध्यापक को भी धैर्य से काम लेना चाहिए–होमवर्क न करने पर वस्तुस्थिति को समझ लेना चाहिए । बच्चे के पास अधिक काम था, इस कारण वह होमवर्क नहीं कर पाया था, वह कुछ अस्वस्थ है या लापरवाही के कारण होमवर्क नहीं किया है या उसे पाठ समझ में नहीं आया है ।
पहली बात तो प्राथमिक कक्षाओं में (कक्षा एक से पाँच तक) होमवर्क देना ही गलत है । उसे जितना कार्य विद्यालय में करवा दिया जाए, उतना ही काफी
है । घर में उसे खेलने–कूदने, व्यवहार सीखने तथा अन्य क्रिया–कलापों जैसे – ड्रॉइंग, पेंटिंग, आर्ट, क्राफ्ट का काम या छोटी–छोटी कहानी, कविता आदि की पुस्तकें पढ़ने का समय मिलना चाहिए ।
बड़ी कक्षाओं में यदि होमवर्क दिया भी जाता है तो उसे पूरा न करने पर उसे सजा देना गलत है । बच्चे को सहज रहने दें । यदि बच्चा जान–बूझकर लापरवाही कर रहा है, तब उसे समझा दें किन्तु सजा न दें, क्योंकि चिन्ता व भय का बच्चे के मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है । इससे झूठ बोलना, जिद्दी होना, क्रोध करना आदि दुर्गुण पनपने लगते हैं ।
घर में बड़ों द्वारा झूठ बोलना – घर में बड़े अक्सर झूठ बोलते हैं, जैसे माँ को पिता से अपनी कोई गलती छुपानी है तब वह बच्चे से कहती हैं—‘पापा को मत बताना ।’
अवसर आने पर बच्चे से भी कोई गलती हो जाने पर वह गलती को छुपा लेता है और माँ से नहीं बताता है । इस प्रकार झूठ की नींव पड़ जाने पर बड़े हो जाने पर बच्चे का झूठ भी बड़ा होता जाता है ।
बड़ों को यदि किसी अपरिहार्य स्थिति में झूठ का सहारा लेना ही पड़ जाए तो कम–से–कम बच्चों को उस झूठ में शामिल न करें । जैसे – बच्चे से यह कहना – ‘पापा को मत बताना ।’ या किसी के आने पर बच्चे से यह कहलवा देना – ‘कह दो पापा घर पर नहीं हैं ।’ या किसी अनिच्छित व्यक्ति का फोन आ जाने पर बच्चे से कहलवा देना – ‘कह दो पापा मोबाइल घर पर भूल गए हैं, अभी घर पर नहीं हैं ।’
बड़ों को इस तरह की अपनी समस्याओं को स्वयं हल करना चाहिए, बच्चों को बीच में नहीं डालना चाहिए ।
यदि बच्चे की झूठ बोलने की आदत पड़ ही गई है तब उसे झूठ की बुराई और सच का महत्त्व छोटी–छोटी कहानियों के माध्यम से समझाया जा सकता
 है । साथ ही उसे यह भी बताना चाहिए कि एक सच को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ जाते हैं ।
झूठ खुल जाने पर समाज में बड़ी बेइज्जती होती है और उस बच्चे की सच बात को भी लोग झूठ मानने लगते हैं । इसलिए सदा सच ही बोलना चाहिए, चाहे इसके लिए थोड़ी देर के लिए हमें अपमान भी सहना पड़े किन्तु अन्तत: परिणाम अच्छा ही होता है ।
8– अँगूठा चूसना
प्रथम छह माह तक शिशु में चूसने की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है । इस आयु में शिशु का अँगूठा चूसना उसकी सामान्य अवस्था को दर्शाता है । कुछ बच्चे एक वर्ष की आयु तक अँगूठा चूसते देखे जाते हैं किन्तु इस आयु के बाद भी शिशु का अँगूठा चूसना एक समस्या बन जाती है ।
यह समस्या जन्म ही न ले, इसके लिए आवश्यक है कि माता बच्चे को प्यार से स्तनपान कराए । माँ स्तनपान कराते समय बच्चे को प्यार से देखती रहे तथा दूध पिलाने के साथ–ही–साथ धीरे–धीरे प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरती रहे । इससे बच्चे का पेट भरने के साथ–ही–साथ उसकी चूसने की प्रवृत्ति की संतुष्टि भी होगी और वह प्रसन्न भी रहेगा ।
प्रथम छह माह तक बच्चे की चूसने की प्रवृत्ति धीरे–धीरे शान्त हो जाती
 है । अत: बच्चे को तब तक स्तनपान कराते रहना चाहिए, जब तक वह स्तन से स्वयं मुँह न हटा ले ।
कई बार बच्चा दूध पीते समय बीच–बीच में हँसता है व माँ को आकर्षित करता है, वह बीच–बीच में खुश होकर माँ के साथ खेलना चाहता है । यदि उस समय माता झुंझलाहट में उसे डाँटती है व जल्दी दूधपीने के लिए प्रेरित करती है तब बच्चे पर इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत बुरा पड़ता है ।
माता को व्यस्तता के बावजूद शिशु को दूध पिलाने के लिए पूरा समय निकालना ही चाहिए । इससे शिशु स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है व उसे संतुष्टि का आभास होता हैय जो उसके पूरे जीवन के आनन्द का स्रोत है ।
जो बच्चे बोतल से दूध पीते हैं, उनकी भी चूसने की प्रवृत्ति की संतुष्टि नहीं हो पाती है । अत: माता का पहला प्रयास तो यह होना चाहिए कि वह बच्चे को स्तनपान ही कराए क्योंकि स्तनपान कराने से बच्चे का ही नहीं माता का भी स्वास्थ्य ठीक रहता है । स्तनपान से बच्चे के शरीर के लिए आवश्यक सभी तत्त्व तो उसे मिल ही जाते हैं, साथ ही उसे भावनात्मक सुरक्षा भी मिलती है, जो उसके सहज विकास के लिए आवश्यक है ।
यदि माता कार्यशील महिला है और वह हर समय अपना दूध नहीं पिला सकती है तब जितनी बार सम्भव हो अपना दूध पिलाए, जब माता घर पर न हो उस समय ही बच्चे को दूसरा दूध दिया जाए । माता जब भी बच्चे को दूधपिलाए, बच्चे को पूरा समय देना चाहिए ताकि बच्चे की भावनात्मक संतुष्टि हो सके ।
यदि माता के पर्याप्त दूध नहीं होता है तब दूसरा दूध पिलाते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए –
* बोतल के निपल के छेद को छोटा रखना चाहिए, ताकि बच्चों की चूसने की प्रवृत्ति की संतुष्टि हो सके ।
* बोतल का निपल भी जल्दी–जल्दी बदलते रहना चाहिए क्योंकि निपल का छेद बड़ा हो जाने पर दूध तेजी से निकलने लगता है और शिशु की चूसने की इच्छा अतृप्त रह जाती है ।
* बोतल का निपल मुलायम यैवजिद्ध होना चाहिए ।
* बोतल से दूध पिलाते समय भी माँ शिशु को अपनी गोद में लिटाकर सिर पर हाथ फेरती रहे, वह उसकी ओर प्यार से देखती रहे, जिससे शिशु स्तनपान के समान ही सुख प्राप्त कर सके ।
अँगूठा चूसने की आदत पड़ जाने पर क्या करें ?
यदि बच्चा एक वर्ष का हो जाता है और उसकी अँगूठा चूसने की आदत पड़ ही गई है तो उसे डाँटने–फटकारने की बजाय प्यार से समझाना चाहिए । निम्नलिखित कुछ उपाय भी किए जा सकते हैं –
* यदि बच्चा नींद में अँगूठा चूसता है तब सोते समय बच्चे के मुँह से अँगूठा निकाल देना चाहिए ।
* अँगूठा चूसने की समस्या आत्मकेन्द्रित है । अत: इसके बारे में अधिक टोका–टाकी न करें ।
* अँगूठे पर नीम की पत्ती पीसकर उसका लेप लगाया जा सकता है ।
* कई बार माताएँ बच्चे को चुसनी इसलिए चूसने को दे देती हैं ताकि बच्चा चुप रहे और वह अपना काम निपटा सकें, ऐसा करना गलत है । बच्चे को खिलौनों आदि की तरफ आकर्षित करें, चुसनी चूसने को न दें ।
* यदि माता के दूध नहीं होता है, तब बच्चे को बोतल या कटोरी–चम्मच से दूध पिलाएँ, किन्तु बच्चे को माता का स्तन चूसने दें । इससे बच्चे को भी भावनात्मक सहारा मिलता है और माता को भी आत्मसंतुष्टि मिलती है ।
चूसने की इच्छा अतृप्त रह जाने पर बड़े होने पर असामान्य सेक्स की इच्छा प्रबल हो सकती है ।