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Friday, November 23, 2018

शास्त्रों के अनुसार मन और उसका कार्य

मन की अवस्थाएँ
जाग्रत अवस्था
जाग्रत अवस्था या जागते हुए ही सभी प्राणी सब कार्यों को करते हैं ।
स्वप्नावस्था – उपनिषदों के अनुसार
‘स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषां प्रस्वापीति ।
अत्रायं पुरुष: स्वयंज्योतिर्भवति ।’ (वृह– 4/3/9)
जब यह स्वप्न देखता है, उस अवस्था में यह सारी वस्तुओं से भरी हुई इस दुनिया की मात्राओं (सूक्ष्म अंशों अर्थात् वासनाओं) को लेकर आप ही नष्ट करके आप ही बना कर अपने प्रकाश से अपनी ज्योति से स्वप्न को देखता है, यहाँ (इस अवस्था में) यह पुरुष स्वयं ज्योति होता है ।
‘न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्ति, अथ रथान् रथयोगान् पथ: सृजते, न तत्रानन्दामुद: प्रमुदोभवन्ति, अथाऽऽनन्दान् मुद: प्रमुद: सृजते, न तत्र वेशान्ता: पुष्करिण्य: स्त्रवन्त्यो भवन्ति, अथ वेशान्तान् पुष्करिणी: स्त्रवन्ती: सृजते । स हि कर्ता’ (वृहदारण्यकोपनिषद् 4/3/10)
न वहाँ रथ, न घोड़े, न सड़कें होती हैं, पर वह रथ, घोड़े और सड़कें रच लेता है, न वहाँ आनन्द, मोह और प्रमोद होते हैं, पर वह आनन्द, मोद और प्रमोद रच लेता है, न वहाँ तालाब, झीलें और नदियाँ होती हैं, पर वह तालाब, झीलें और नदियाँ रच लेता है ।
‘अत्रैष देव: स्वप्ने महिमानमनु भवति ।’
(प्रश्नोपनिषद 4/5)
यहाँ यह देव (मन) स्वप्न में महिमा को अनुभव करता है ।
यद्दृष्टंदृष्ट मनुपश्यति, श्रुतंश्रुत मेवार्थ मनुश्रृणोति, देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुन: पुन: प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च, श्रुतंचाश्रुतंचानुभूतं चाननुभूतं च, सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्व: पश्यति ।
(प्रश्नोपनिषद 4/5)
(स्वप्न में यह मन) देखे हुए को फिर से देखता है, सुने हुए को फिर सुनता है, जो भिन्न–भिन्न देशों और भिन्न दिशाओं में अनुभव किया हुआ है, उसको फिर–फिर अनुभव करता है । देखा हुआ और न देखा हुआ, सुना और न सुना हुआ, अनुभव किया हुआ और अनुभव न किया हुआ, विद्यमान और अविद्यमान, सब कुछ देखता है और सब कुछ (राजा, नौकर, नेता, शिक्षक, सैनिक आदि–आदि) बन कर देखता है ।
स एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मा । तद्यद्यपीदंशरीरमन्धंभवत्यन्ध: सभवति, यदि स्त्राम मस्त्रामो, नैवैषोऽस्यदोषेणदुष्यति । न वधेनास्य हन्यते नास्यस्त्राम्येणस्त्राम:  ।
(छान्दोग्योपनिषद् 8/10/1–2)
यह जो स्वप्न में महिमा अनुभव करता हुआ विचरता है, यह आत्मा है । अत: यह स्थूल शरीर यदि अन्धा भी हो जाए तो वह (स्वप्नद्रष्टा) अन्धा नहीं होता है । यदि वह काना हो तो भी वह (स्वप्नद्रष्टा) काना नहीं होता है । न इसके दोष से वह दूषित होता है, न इसके वध से वह मरता है, न इसके कानापन से वह (स्वप्नद्रष्टा) काना होता है ।
सुषुप्ति अवस्था –उपनिषदों के अनुसार
तद्यथाऽस्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्यस श्रान्त: हत्य पक्षौ संलयायैव ध्रियते एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति, यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते, न कञ्चन स्वप्नं पश्यति ।
(वृहदारण्यकोपनिषद 4/3/19)
जिस प्रकार एक बाज या कोई और तेज पंछी इस आकाश में इधर–उधर उड़ करके थका हुआ दोनों पंखों को लपेट कर घोंसले की तरफ मुड़ता है, इस प्रकार यह (आत्मा) इस अवस्था की ओर दौड़ता है, जहाँ गहरा सोया हुआ न कोई कामना चाहता है, न कोई स्वप्न देखता है ।
‘स यथा शकुनि: सूत्रो प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयते, एवमेव खलु सोम्यैतन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायपन मा लब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते, प्राणबन्धन,हि सोम्य मन इति ।’
(छान्दोग्योपनिषद 6/8/2)
जैसे शिकारी के तागे से दृढ़ बँधा हुआ कोई पंछी दिशा दिशा में उड़ने का प्रयास करके कहीं आश्रय न पाकर उसी जगह का आश्रय लेता है, जहाँ वह बँधा हुआ है । ठीक इसी प्रकार हे सोम्य! यह मन (जागृत और स्वप्न में) विभिन्न दिशाओं में घूमकर और कहीं आश्रय न पाकर प्राण का ही सहारा लेता है, क्योंकि यह मन हे सोम्य! प्राण से बँधा हुआ है (प्राण के सहारे है) ।
तद् यत्रैतत् सुप्त: समस्त: सम्प्रसन्न: स्वप्नं न विजानात्येषआत्मेति
(छान्दोग्योपनिषद् 8/11/1)
जब यह सोया हुआ, आराम करता हुआ सम्प्रसन्न (हलचल से रहित पूरे आराम से) हुआ स्वप्न को नहीं देखता है, वह आत्मा है ।
अथ यदा सुषुप्तो भवति, यदा न कस्यचन वेद, हिता नाम नाड्योद्वासप्तति: सहस्त्राणि हृदयात् पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभि: प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते ।
(बृहदारण्यकोपनिषद 2/1/19)
जब यह (मन) गहरी नींद में सोया हुआ होता है, जब इसे किसी की खबर नहीं होती, उस समय वह उन हिता नामी नाड़ियाँ जो हृदय से सारे शरीर में पहुँचती हैं, उन (नाड़ियों) के द्वारा चल कर पुरीतत् नाड़ी में सोता है ।
यत्रैष एतत् सुप्तो ऽभूद् य एष विज्ञानमय: पुरुष: । तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते ।
(बृहदारण्यकोपनिषद 2/1/17)
जब यह (मन) जो यह विज्ञान स्वभाव है, गहरा सोया हुआ था, तब वह इन इन्द्रियों के विज्ञान के द्वारा विज्ञान को लेकर जो यह हृदय के अन्दर आकाश है, वहाँ आराम करता है ।
गीता के अनुसार स्थिरबुद्धि या निश्चयात्मिका बुद्धि
गीता कहती है—
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर: ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता । ।
गीता 2/61 । ।
अर्थात् साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण हो कर ध्यान में बैठे, क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर होती है ।
जब मनुष्य भगवान के प्रति समर्पित हो जाता है, तब उसका मन शान्त हो जाता है । शान्त मन सफलता का आधार है ।
ध्यायतो    विषयान्पुंस:    सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते । ।
गीता 2/62 । ।
अर्थात् विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है ।
क्रोधाद्भवति  सम्मोह:  सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम: ।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति । ।
गीता 2/63 । ।
अर्थात् क्रोध से अत्यन्त मूढ़भाव उत्पन्न होता है, मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है ।
प्रसादे   सर्वदु:खानां   हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो  ह्याशु  बुद्धि: पर्यवतिष्ठते । ।
गीता 2/65 । ।
अर्थात् अन्त:करण की प्रसन्नता होने पर साधक के सम्पूर्ण दु:खों का अभाव हो जाता है । उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हट कर एक परमात्मा में ही भली भाँति स्थिर हो जाती है ।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुकतस्य भावना ।
न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम । ।
गीता 2/66 । ।
अर्थात् न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्त:करण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है ।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु     विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा     प्रसादमधिगच्छति । ।
गीता 2/64 । ।
अर्थात् ‘अपने अधीन किए हुए अन्त:करण वाला साधक अपने वश में की हुई, रागद्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ । अन्त:करण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है ।
मन सबल कैसे हो ?
शिवसंकल्प
देखें यजुर्वेद के कुछ मंत्रों को—
यज्जाग्रतो  दूरमुदैति  दैवं तदु  सुप्तस्य  तथैवैति ।
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–1
अर्थात् (यत्) जो (दैवम्) दिव्य शक्ति वाला मेरा मन (मे मन:)(जाग्रत:) जागते हुए (दूरम् उदैति) दूर–दूर जाता है । (तदु) वह (सुप्तस्य) सोते हुए भी (तथा एव) उसी प्रकार (एति) दूर चला जाता है । इन्द्रियों का (एक ज्योति:) एक मात्र प्रकाशक (ज्ञान में साधक) है । (तत) वह (मे मन:) मेरा मन (शिव संकल्पम्) शुभसंकल्प अर्थात् अच्छे विचार वाला (अस्तु) होवे ।
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीरा: ।
यदपूर्वं यक्षमन्त: प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–2
अर्थात् (येन) जिसके द्वारा (अपस) कर्मनिष्ठ लोग (मनीषिण:) मनस्वी लोग (यज्ञे) यज्ञों में, (विदथेषु) विशेष ज्ञानपूर्वक किये जाने वाले कार्यों में, (कर्माणि) करने योग्य कर्मों को (कृण्वन्ति) करते हैं, मेरा मन (यत्) जो (अपूर्वम्) अपूर्व है (प्रजानाम अन्त:) प्रजाओं के अन्दर (यक्षम) पूजनीय है (तत्) वह (मे मन:) मेरा मन (शिव संकल्प) शुभ विचार वाला (अस्तु) होवे ।
यत्प्रज्ञानमुत  चेतो  धृतिश्च  यज्ज्योतिरन्तरमृतं   प्रजासु ।
यस्मान्न ऋते किंच न कर्म क्रियते तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु ।
यजुर्वेद 34–3
अर्थात् (यत्) जो (प्रज्ञानम) ज्ञान का साधन है (उत) और (चेत:) चेतना का आधार (धृति: च) और निश्चय करने की वृत्ति वाला है । (यत्) जो (प्रजासु अन्त:) प्रजाओं के अन्दर (अमृतम्) मरणधर्म से रहित (ज्योति:) ज्ञान का प्रकाश है, (यस्मात् ऋते) जिसके बिना (किञ्चन) कोई भी (कर्म) कार्य (न) नहीं (क्रियते) किया जा सकता (तत्) वह (मे) मेरा (मन:) मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचार वाला (अस्तु) हो ।
येनेदं  भूतं   भुवनं  भविष्यत्परिगृहीतममृतेन  सर्वम् ।
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–4
अर्थात् (येन) जिस (अमृतेन) मरण धर्म से रहित (इदं) इस (सर्वम्) समस्त (भूतम्) भूतकाल को (भुवनम्) वर्तमान काल को (भविष्यत्) भविष्यतकाल को (परिगृहीतम्) अपनी चेतना की शक्ति से अपने में पकड़ा हुआ है, (येन) जिसके द्वारा (सप्त होता) सप्त होताओं वाले (यज्ञ: तायते) यज्ञ का वितान किया गया जा रहा है । (तत् मे मन:) वह मेरा मन (शिवसंकल्प वाला) शुभ विचारों वाला (अस्तु) हो ।
यस्मिन्नृच: साम यजूंषि यस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभाविवारा: ।
यस्मिन् श्चित्तं  सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–5
अर्थात् (रथनाभौ) रथ की नाभि में (आरा: इव) अरों की तरह (यस्मिन्) जिस (मन) में (ऋच:) ऋग्वेद (साम) सामवेद (यजूंषि) यजुर्वेद (प्रतिष्ठिता:) प्रतिष्ठित हैं अर्थात् ठहरे हुए हैं, (यस्मिन्) जिसमें (प्रजानाम्) प्रजाओं की (सर्वम्) समस्त (चित्तं) चिन्तनशक्ति (ओतम्) ओत–प्रोत है (तत्) वह (मे मन:) मेरा मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचार वाला (अस्तु) हो ।
सुषारथिरश्वानिव      यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव ।
हृत्प्रतिष्ठं  यदजिरं  जविष्ठं तन्मे  मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–6
(सुसारथि:) अच्छा सारथी (अश्वान्) घोड़ों को (इव) जैसे (ने नीयते) पुन: पुन: घुमाता है (तत् मे मन:) वह मेरा मन (अभीशुभि:) लगामों के द्वारा (वाजिन: अश्वान्) बलवान् घोड़ों को (सुसारथि: इव) उत्तम सारथि की तरह (यत्) जो मन (मनुष्यान्) मनुष्यों को (ने नीयते) सन्मार्ग से ले जाता है, (यत्) जो मेरा मन (हृत्प्रष्ठितम्) हृदय–चेतना स्थान में स्थित है (यत्) जो (अरिम्) गतिशील अर्थात् चंचल है, (जतिष्ठम्) शीघ्रगामी है, (तत् मे मन:) वह मेरा मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचारों वाला (अस्तु) हो ।
इन मन्त्रों में शिवसंकल्प अर्थात् सकारात्मक विचारों को ही महत्त्व दिया गया है ।
श्रद्धा का महत्त्व
(ऋग्वेद मण्डल 10 सूक्त 151 मंत्र 1–5)
श्रद्धा सूक्त ऋग्वेद के दशवें मण्डल का 151 वाँ सूक्त है । इस सूक्त के अनुसार श्रद्धा से ही मनुष्य की उन्नति हो सकती है । इस श्रद्धा से ही मनुष्य सर्वविध पदार्थों को प्राप्त कर सकता है ।
श्रद्धयाग्नि:  समिद्धयते  श्रद्धया  हूयते हवि: ।
श्रद्धां  भगस्य मूर्धनि  वचसा वेदयामसि ॥1॥
श्रद्धा से अग्नि जलाई जाती है । श्रद्धा से उसमें आहुति डाली जाती है । ऐश्वर्य के मूर्धा–शिर पर विराजमान उस श्रद्धा को हम अपनी वाणी से घोषित करते हैं, व्यक्ति–व्यक्ति को जनाते हैं ।
प्रियं श्रद्धे  ददत:  प्रियं श्रद्धे  दिदासत: ।
प्रियं भोजेषु यज्वस्विदं म उदितं कृधि ॥2॥
हे श्रद्धा! तू देने वाले का प्रिय कर, कल्याण कर भला कर । हे श्रद्धा! तू देने की इच्छा–विचार–संकल्प करने वाले का प्रियकर, भला कर । हे श्रद्धा! तू भोजों में, यज्ञों में मेरा प्रिय कर–कल्याण कर–भला कर, और यह उदयकर–अभ्युदय कर ।
यथा  देवा  असुरेषु  श्रद्धामुग्रेषु  चक्रिरे ।
एवं भोजेषु यज्वस्वस्माकमुदितं कृधि ॥3॥
देवजन शूर–वीर, प्राणरक्षक क्षत्रियों–सैनिकों पर जैसे श्रद्धा–विश्वास व भरोसा रखते हैं—करते हैं, ऐसे ही हे श्रद्धा! तू भोजों और यज्ञों में हमारा उदय कर ।
श्रद्धां  देवा  यजमाना  वायुगोपा उपासते ।
श्रद्धा हृदय्याकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु ॥4॥
देवजन, यजमान और प्राणायाम के अभ्यासी जन हार्दिक संकल्प से श्रद्धा की उपासना करते हैं ।
मन में कोई संकल्प होने पर भी लोग श्रद्धा की शरण में जाते हैं ।  है । श्रद्धा से धन प्राप्त होता है ।
श्रद्धां  प्रातर्हवामहे  श्रद्धां मध्यंदिनं परि ।
श्रद्धां सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह न: ॥5॥
अर्थात् हम प्रात: श्रद्धा का आह्वान करते हैं, हम मध्याह्न काल में श्रद्धा का सब ओर से आह्वान करते हैं, हम सूर्यास्त समय में श्रद्धा का आह्वान करते हैं । हे श्रद्धा! तू इस मानव जीवन में हमें श्रद्धामय बना ।
पुरुषार्थ
मा स्रेधत सोमिनों दक्षता महे,
कृणुध्वं   राय     आतुजे ।
तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति,
न    देवास:   कवत्नवे ॥
ऋग्वेद 7/32/9
अर्थात् हे सौम्य गुण वाले मनुष्यों! तुम पथभ्रष्ट न हो, महान् लक्ष्य के लिए पुरुषार्थ करो । धन प्राप्ति के लिए प्रयत्न करो, पुरुषार्थी ही विजयी होता है । सुखपूर्वक निवास करता है और धनादि से पुष्ट होता है । देवगण अकर्मण्य के सहायक नहीं होते, आलसी के लिए कहीं स्थान नहीं है ।
अयं में हस्तो भगवान्, अयं में भगवत्तर: ।
अयं में विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शन: ॥
ऋग्वेद 10/60/12
अर्थात् यह मेरा (दाहिना हाथ) ऐश्वर्यशाली है, यह मेरा (बायाँ हाथ) उससे भी अधिक सौभाग्यशाली है । यह मेरा हाथ सभी रोगों को दूर करने वाला है और यह हाथ स्पर्श से कल्याण करने वाला है ।
अध स्वप्नस्य निर्विदेऽभुञ्जतश्च रेवत: ।
उभा   ताबस्त्रि     नश्यत: ।
—ऋग्वेद 1/191/12
अर्थात् प्रात:काल का स्वप्न अच्छा नहीं होता यप्रात:काल सोना ठीक नहीं हैद्ध है, जो धन का उचित उपयोग नहीं करते हैं । वे दोनों शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ।
अन्तर्बोध
स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी कहते हैं—
एक बार पहले–पहल मैं प्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी के यहाँ गया ।  पहले–पहल तब मैं भी उन्हें नहीं पहचानता था, वे भी मुझे नहीं पहचानते थे । तब मैंने पूछा कि प्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी कौन हैं, उनकी कुटिया कहाँ है ? वे खुद ही थे—बोले—हे नाथ नारायण वासुदेव! आओ! चला गया ।
जब बैठ गया तब खिलाया–पिलाया और फिर लिखकर दिया कि आज रात को हमने स्वप्न देखा था, हमारी एक समस्या थी कि हमारे यहाँ तेरह महीने का अखण्ड कीर्तन होगा उसमें कथा कौन सुनाएगा ? मन में यह चिन्ता थी । रात में हमको स्वप्न आया और तुमको देखा । तुम आ गए । तो अब ? अब तो स्वप्न कारण हो गया और जाग्रत कार्य हो गया ।
ऐसी एक नहीं अनेक बातें हम जानते हैं और जिन पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है । मैं गोरखपुर गया, तो हनुमान प्रसादजी की पत्नी ने बुलाया मुझे, घर में भोजन करने के लिए । यह बात होगी—सन् 34–35 के लगभग की । 32 वर्ष हो गए ।  जब मैं गया तो वे बोलीं—‘आ गए’! हनुमान प्रसाद जी ने कहा कुछ नहीं । बाद में मालूम पड़ा कि उन्हें रात में स्वप्न आया था कि हमारे घर में भागवत की पुस्तक लेकर कोई ब्राह्मण आएँगे और मैं आ गया । बहुत प्रेम करते थे, अब भी बहुत प्रेम करते हैं और हनुमानप्रसाद जी तो मुझे अपना भाई ही मानते हैं ।
माण्डूक्य प्रवचन, अलातशान्ति प्रकरण
पूरी धरती ही एक परिवार है
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव
यद्    भद्रं    तन्न   आ     सुव ।
हे देव! हमारी सभी बुराइयों को दूर कर दो, जो कल्याणकारी हो, वह प्रदान करो ।
अन्यो अन्यस्तै वल्गु वदन्त एव ।
एक दूसरे के लिए हम अच्छा ही कहें । परस्पर प्रिय वचन बोलते हुए आगे बढ़ो ।
सम्राऽस्यसुराणां ककुन्मनुष्याणाम् ।
देवानांमर्धभागसि, त्वमेकवृषो भव ।
अर्थात् मनुष्य संसार में सर्वश्रेष्ठ होकर रहे, आसुरी वृत्तियों पर पूर्ण नियंत्रण रखें । कम से कम आधे दैवी गुण जीवन में अवश्य हों ।
सुरा मन्युर्विभीदको अचित्ति: ।
सुरा, क्रोध, द्यूत और अज्ञान पाप के कारण हैं ।
संज्ञानं  न   स्वोभि:    संज्ञानमरणोभि:
संज्ञानमश्विना युवम्, इहास्मासु नि:यच्छतम् ।

अयं  निज:   परोवैति  गणना लघुचेतसाम्
उदार  चरितानां  तु  वसुधैव   कुटुम्बकम् ।
यह अपना है, यह पराया है, ऐसा छोटे चित्त वाले ही सोचते हैं । उदार चरित्र वाले के लिए तो सारी धरती ही एक परिवार है ।
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग भवेत ।
सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, हम सबका कल्याण देखें, कोई भी दु:ख का भागी न हो ।
सह नाववतु, सह नो भुनक्तु । सहवीर्यं करवावहै तेजस्विनावधीतमस्तु,     मा  विद्विषावहै
शान्ति:       शान्ति:     शान्ति: ।
ईश्वर हम गुरु और शिष्य दोनों की रक्षा करें । हम साथ–साथ भोजन करें । हमारी शक्ति में वृद्धि हो, हमारा पठन–पाठन तेजस्वी हो, किसी से विद्वेष न
करें ।
समानी व  आकूति:  समाना  हृदयानि व: ।
समानमस्तु वोमनो,  यथा व  सुसहासति ॥

हमारे विचार समान हों, सबके  हृदय, मन व चित्त एक हों, जिससे हम सबका मन सुन्दर हो ।
समानी प्रपा सह वोऽन्नभाग: समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि ।
सम्यञ्चोऽग्निं    सपर्यत—अरा नाभिमिवाभित: ॥
हम अन्न और ज्ञान को मिल कर प्राप्त करे । गुरु कहते हैं कि मैं तुम्हें युक्त करता हूँ कि मिल कर काम करो ।
बाइबिल (नया विधान) के अनुसार विश्वास
सन्त मत्ती
विश्वास करने वाले के लिए सब कुछ सम्भव है—
तुम्हारे माँगने से पहले ही तुम्हारा पिता जानता है कि तुम्हें किन–किन चीजों की जरूरत है । (6–9)
यदि तुम दूसरों के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा परन्तु यदि तुम दूसरों को क्षमा नहीं करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा नहीं करेगा । (6–14–15)
यह कहते हुए चिन्ता मत करो—हम क्या खायें, क्या पियें, क्या पहनें । (6–31) ––––तुम्हारा स्वर्गिक पिता जानता है कि तुम्हें इन सभी चीजों की जरूरत है । (6–32) तुम सबसे पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीजें तुम्हें यों ही मिल जायेंगी । (6–33) कल की चिन्ता मत करो । कल अपनी चिन्ता स्वयं कर लेगा । आज की मुसीबत आज के लिए बहुत है । (6–34)
माँगो और तुम्हें दिया जायेगाय ढूँढ़ो और तुम्हें मिल जायेगाय खटखटाओ और तुम्हारे लिए खोला जाएगा । (7–7) क्योंकि जो माँगता है, उसे दिया जाता हैय जो ढूँढता है, उसे मिल जाता है और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाता है । (7–8) बुरे होने पर भी यदि तुम लोग अपने बच्चों को सहज ही अच्छी चीजें देते हो, तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता माँगने वालों को अच्छी चीजें क्यों नहीं देगा ? (7 । ।)
दूसरों के प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो । (7/12)
बेटी, ढारस रखो । तुम्हारे पाप क्षमा हो गए हैं । (9–2–)
सामूहिक प्रार्थना—मैं तुमसे यह भी कहता हूँ यदि पृथ्वी पर तुम लोगों में दो व्यक्ति एकमत होकर कुछ भी माँगोगे, तो वह उन्हें स्वर्गिक पिता की ओर से निश्चय ही मिलेगा । (18/19)
और जो कुछ तुम विश्वास के साथ प्रार्थना में माँगोगे, वह तुम्हें मिल जाएगा ।’ (21–22)
सन्त मारकुस
यदि आप कुछ कर सकें! ––––विश्वास करने वाले के लिए सब कुछ सम्भव है । (9–23) जब तुम प्रार्थना के लिए खड़े हो और तुम्हें किसी से कोई शिकायत हो, तो क्षमा करो, जिससे तुम्हारा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा कर दे । (11–25)
ईसा ने उनसे आगे कहा—जाओ, तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है । उसी क्षण उसकी दृष्टि लौट आयी और वह मार्ग में ईसा के पीछे हो लिया ।’ (10–52)
सन्त लूकस
किसी के विरुद्ध निर्णय न दो और तुम्हारे विरुद्ध भी निर्णय नहीं दिया जायेगा । क्षमा करो और तुम्हें भी क्षमा मिल जाएगी । (6/37) दो और तुम्हें भी दिया जायेगा । दबा–दबाकर, हिला–हिलाकर भरी हुई, ऊपर उठी हुई, पूरी की पूरी नाप तुम्हारी गोद में डाली जाएगीय क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा । (6/38)

बच्चों के स्वस्थ विकास में परिवार की भूमिका

गर्भावस्था से ही शिशु के मानसिक व बौद्धिक विकास पर उसकी माता के विचारों का प्रभाव पड़ने लगता है । माँ की जैसी भावनाएँ होंगी, उसका पूरा–पूरा प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है । अत: गर्भवती माता को चाहिए कि आन्तरिक ध्यान द्वारा आत्मशुद्धि करे । इस प्रकार वह अपने भावी शिशु के जीवन को सार्थक बनाने की दिशा में प्रयत्नशील हो सकती है ।
माँ ध्यानावस्था में बैठकर अपने गर्भ में पल रहे परमपिता परमात्मा के उस अंश को प्रभुभक्त होने के लिए प्रार्थना करे ताकि जन्म लेने के पूर्व ही वह प्रभुभक्त हो सके । शिशु के जन्म के बाद भी माँ के द्वारा किए गए भजन, पूजन व ध्यान का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव शिशु पर निश्चित रूप से पड़ता है । ध्यान करना निर्विचार होने की अवस्था है जो गर्भस्थ शिशु के बौद्धिक, मानसिक, चारित्रिक व आत्मिक विकास में सहायक होगा । भविष्य में यही बच्चे राष्ट्र के कर्णधार होंगे ।
मनुष्य जाने या अनजाने हर समय कुछ–न–कुछ विचार करता रहता है । उसका मस्तिष्क इन विचारों से कभी खाली नहीं रहता है । इससे उसकी शान्ति हर क्षण क्षीण होती रहती है ।
परमात्मा आनन्दस्वरूप है, ज्योतिर्मय है । अत: ध्यान करने वाला भी आनन्दमय व ज्योतियुक्त हो जाएगा । जहाँ ज्योति व आनन्द है, वहाँ विकार व अन्य सांसारिक कुवासनाएँ नहीं रह सकेंगी । कहा गया है – जिसके हृदय में उस प्रभु का स्मरण होगा, उसे सद्बुद्धि होगी । व्यक्ति की सद्बुद्धि ही उसकी सद्गति, परिवार, समाज व राष्ट्र की उन्नति, सुख–शान्ति व समृद्धि का आधार है ।
सद्बुद्धि होने पर बालक विश्वप्रेम करेगा अर्थात् सारे जगत को सर्वशक्तिमान प्रभु की रचना, उसकी ही सृष्टि मानकर चलेगा । यह वृत्ति बाल्यकाल में तभी उदित हो सकती है, जबकि उसी कोमल अवस्था में उसे सृष्टि–नियंता की शक्ति अथवा उसके अस्तित्व से परिचित करवाया जाए । 
इसका एक माध्यम प्रकृति–प्रेम अथवा सभी जीव–जन्तुओं, वनस्पति आदि से प्रेम करना सिखाना अथवा सीखने के अवसर प्रस्तुत करना हो सकता 
है । बच्चे स्वभाव से ही फूलों, तितलियों, पशु–पक्षियों आदि को पसन्द करते हैं, उनसे खेलना चाहते हैं, उन्हें प्यार करना चाहते हैं । यदि उसी अवस्था में उन्हें प्रकृति का साथ उपलब्ध करवाया जाए तो वह सहज–स्वाभाविक ढंग से ही प्रकृति के साथ स्नेह–सम्बन्ध स्थापित कर सकेंगे ।
साथ–ही–साथ प्राकृतिक चीजों को भगवान की संरचना बताकर बच्चे को प्रकृति–प्रेम, मानव–प्रेम, जगत–प्रेम, ईश–प्रेम की ओर ले जाया जा सकता है । यह बच्चे के निजी जीवन में सुख और सार्वजनिक सामाजिक जीवन में शान्ति का समावेश कराने में सहायक हो सकता है ।
अभिभावकों का सहयोग
बच्चे के मनोविज्ञान को समझकर अभिभावक उसके समुचित विकास में बहुत अधिक सहयोग दे सकते हैं ।
अभिभावकों को सफाई एवं स्वास्थ्य के नियमों की जानकारी होना भी आवश्यक है । घर की बनावट ठीक हो, उसमें रोशनी और हवा आने–जाने का समुचित प्रबंध हो । शिशु को सारे दिन कमरे में ही बन्द न रखा जाए बल्कि उसे खुली ताजी हवा व धूप भी मिलनी चाहिए ।
बच्चे को नियत समय पर सन्तुलित एवं पौष्टिक भोजन भी मिलना चाहिए । भोजन पौष्टिक होने के साथ–साथ हल्का व सुपाच्य हो । पौष्टिक भोजन देने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उन्हें महँगे फल, मेवा आदि ही दिए जाएँ । हरे पत्ते वाली सब्जी, मौसम के फल जैसे – अमरूद, केला, खीरा आदि जो भी उपलब्ध हों दिए जा सकते हैं । मौसमी फल तथा मौसमी सब्जियाँ सस्ते भी होते हैं तथा स्वास्थ्यवर्धक भी । भोजन उतना ही दिया जाए जिसका पाचन समुचित रूप से हो सके । बिना भूख के या आवश्यकता से अधिक भोजन शरीर में पोषण उत्पन्न न करके विकार उत्पन्न करता है ।
बच्चे की निम्नलिखित प्रमुख मनोसामाजिक आवश्यकताएँ होती
हैं—
1– प्यार की आवश्यकता
2– प्रशंसा एवं आत्म–पहचान की आवश्यकता ।
3– सुरक्षा की आवश्यकता ।
बच्चा स्नेह, सुरक्षा, प्रशंसा व सौहार्द्र के वातावरण में पलकर ही व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर पाता है । बच्चा अपनी प्रशंसा द्वारा अपनी एक विशेष पहचान बनाना चाहता है, किन्तु बच्चे की आवश्यकताओं को समझने के साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे में जितनी भी गलत आदतें पड़ जाती हैं जैसे—जिद्द करना, चोरी करना, घर से भागना, झगड़ालू होना आदि वह सब एक प्रकार के मनोरोग हैं । इन समस्याओं के उत्पन्न होने के तीन प्रमुख कारण हैं—
1– बहुत अधिक लाड़ प्यार
2– बहुत अधिक तिरस्कार
3– परिवार के सदस्यों का बच्चों  बच्चों के प्रति परस्पर विरोधी व्यवहार ।
इसलिए बच्चों के साथ सन्तुलित व्यवहार करना चाहिए, न तो उन्हें आवश्यकता से अधिक लाड़–प्यार देना चाहिए, न ही उनकी एकदम उपेक्षा ही कर देनी चाहिए ।
प्राय: देखा जाता है कि जिन बच्चों  को घर में अधिक मारा–पीटा जाता है, उनमें आक्रामक प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है । उनको घर में जो मारता है, उसे तो वह मार नहीं पाते हैं, अत: वह अपने से छोटे या कमजोर बच्चों को मारकर बदला लेते देखे जाते हैं ।
इसके अतिरिक्त माता–पिता के बीच का तनाव या परस्पर विरोधी व्यवहार भी बच्चे को प्रभावित करता है । उदाहरणत: माँ ने किसी बात के लिए बच्चे को मना किया, पिता ने उसी काम को करने के लिए कहा तो बच्चा यह निर्णय नहीं कर पाता है कि वह क्या करे ।
बच्चे के अन्दर प्रौढ़ व्यक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक क्रियाशीलता होती है, वह हर समय व्यस्त रहना चाहता है । घर में मनोरंजन के साधन अवश्य होने चाहिए, जैसे–सस्ते खिलौने आदि । बच्चों को रुचिकर व शिक्षाप्रद कहानियाँ आदि भी घर में सुनानी चाहिए ।
बच्चों में उत्सुकता, कौतूहल उसी प्रकार कूट–कूट कर भरा होता है, जिस प्रकार शरारत और भोलापन । नई–नई बातंे जानने का उन्हें बहुत शौक होता
 है । कुछ बच्चे तो नए खिलौनों को तोड़कर यह देखना चाहते हैं कि उनके अन्दर क्या छिपा है ।
वस्तुत: बच्चे का व्यक्तित्व बनाना माता–पिता की परीक्षा होती है, इस व्यक्तित्व–निर्माण की प्रक्रिया में उनकी जिज्ञासाओं की पूर्ति करना भी माता–पिता का कर्तव्य है । नई बातें जानने की प्रवृत्ति प्राकृतिक है । बच्चे के जितने उत्सुकता भरे प्रश्नों का जवाब हम देंगे, बच्चे की जिज्ञासा उतनी ही बढ़ेगी व उसकी बुद्धि उतनी ही कुशाग्र होगी ।
माँ या अध्यापक को बच्चों के प्रश्नों को सुनकर झल्लाना नहीं चाहिए । बड़ी शान्ति व धैर्य से बच्चे के प्रश्नों को सुनकर उनका समाधान करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए । अच्छा तरीका यह है कि जब बच्चा कोई प्रश्न पूछे तब बच्चे से ही सम्बन्धित प्रश्न पूछकर उत्तर निकलवाने का प्रयत्न करना चाहिए । इससे हमको यह पता लग जाएगा कि बच्चा इस सम्बन्ध में क्या और कहाँ तक सोच सकता है ।
ऐसा करने से बच्चे को अपने दिमाग पर जोर देना पड़ेगा, जिससे उसकी बुद्धि कुशाग्र होगी व चिन्तन क्षमता बढ़ेगी । उसमें आत्मविश्वास भी बढ़ेगा कि बड़े लोग उसे उत्तर देने के योग्य समझते हैं ।
बच्चे को अधिक लम्बे–चौड़े उत्तर न दें, वरना वह ऊब जाएगा । संक्षिप्त उत्तर से ही उसकी जिज्ञासा शाँत करने का प्रयास करें । कई बार दृष्टिकोण में भी भिन्नता होती है । अध्यापक कहते हैं कि सवेरे नहाकर स्कूल आना चाहिए, माँ कहती हैं कि दोपहर को नहा लो । जब बच्चा देखता है कि कोई कुछ कहता है, कोई कुछ, तो वह चकरा जाता है । वह समझ नहीं पाता है कि सत्य क्या है ।
इस अवस्था में बच्चे को समझाएँ कि कुछ बातों में सबका दृष्टिकोण अलग–अलग हो सकता है । यह विचारों की भिन्नता उसे खुले दिमाग का बनाएगी, वह यह समझ लेगा कि लोगों के खान–पान, खाने के तरीके, वेशभूषा आदि में भिन्नता हो सकती है । अत: वह हर परिस्थिति में समायोजित कर 
लेगा ।
बच्चे को साथियों के साथ खेलने का अवसर प्रदान करना चाहिए, जिससे उसकी माँसपेशियों का सन्तुलित विकास हो सके, वह प्रसन्नचित्त रहे तथा अपनी भावनाओं को खेल द्वारा अभिव्यक्त कर सके ।
जैसे–जैसे बच्चा बड़ा होने लगता है उसके मन के भाव स्थायी होने लगते हैं । ये ही चरित्र का निर्धारण करते हैं । अत: अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को अच्छी रुचिकर एवं शिक्षाप्रद कहानियाँ सुनाएँ । अच्छे कार्य करने पर उन्हें पुरस्कृत करें ताकि उनके मन में अच्छी बातों के प्रति भाव स्थायी हो जाएँ । इस प्रकार बच्चों में सत्य, प्रेम, दया, सहानुभूति तथा सदाचार आदि के प्रति स्थायी भावों का निर्माण किया जा सकता है ।
बच्चे के मन में अपनी संस्कृति के प्रति आदर और सम्मान के बीज बोने चाहिए । बच्चे को सुसंस्कृत बनाने के लिए उसके सामने अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए, क्योंकि बच्चा जैसा घरवालों को करते देखता है, वैसा ही वह स्वयं करता है ।
इसके अतिरिक्त निम्नलिखित बातों का भी ध्यान रखना चाहिए—
1– बच्चों की भावनाओं का आदर करें ।
2– बच्चों की आपस में तुलना न करें, क्योंकि प्रत्येक बच्चे में व्यक्तिगत विशेषताएँ होती हैं ।
3– बच्चे में जो छुपी हुई क्षमता है, उसको विकसित करने का प्रयत्न करें ।
4– बच्चे में आत्मानुशासन की भावना विकसित करें ।
5– भाई–बहनों का एक–दूसरे के प्रति प्यार हो, घर का वातावरण भी प्रेमपूर्ण हो ।
समय–समय पर बच्चों को नागरिक के अधिकार और कर्तव्यों का व्यावहारिक ज्ञान करवाते रहना चाहिए । जैसे – सड़क पर बाएँ चलना, रास्ते में जगह–जगह छिलके व कूड़ा न फेंककर नियत स्थान पर ही कूड़ा फेंकना, देशभक्ति की भावना आदि । इससे बड़े होने पर उनमें नागरिकता की भावना का उचित विकास हो सकेगा और वह देश के आदर्श नागरिक बन सकेंगे ।

बच्चों के बचपन व कोमलता को सदा ध्यान में रखना


बच्चा प्रकृति का अमूल्य उपहार है । अत: आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रकृति प्रदत्त इस उपहार को सँभालकर रखें । उसको स्नेह एवं प्रेम से सींचे । उसकी हँसी को और अधिक मुखरित होने दें । उसके बचपन को समझें, उसकी हँसी में हम भी शामिल हों ।
बच्चा तन–मन से बहुत कोमल होता है । वह इतना सहज होता है कि उसे जहाँ अपनत्व व प्यार मिलता है वह उसका ही हो जाता है । अत: जो बात उसे हम प्यार से बता सकते हैं, वह मार–डाँट से नहीं । चिन्ता व तनाव बच्चे के मन पर बहुत बुरा प्रभाव डालते हैं, वह भय के कारण बात तो मान लेता है परन्तु धीरे–धीरे असहज होता जाता है । वह प्यार की भाषा के साथ–साथ भय की भाषा भी समझने लगता है, अर्थात् उसे जो मारता–डाँटता है, उसके डर के कारण वह उसकी बात मान लेता है ।
फिर भी इतना सत्य है कि वह भयवश पढ़ लेता है, रट लेता है या अन्य कार्य कर लेता है, किन्तु उसके विकास की सहज गति अवरुद्ध हो जाती है । जिन बच्चों को अधिक डाँटा–मारा जाता है, उनका मन सदैव आक्रोश से भरा रहता है । अवसर मिलने पर वे अपने से छोटों या निर्बल को सताने लगते हैं । कई बच्चे, जो सहज ही अपनी आक्रोश की भावनाओं को अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं, अपने से निर्बल बच्चे का गला तक दबाते देखे जाते हैं ।
बाल्यावस्था में पूरा प्यार–दुलार पाने वाला बच्चा बड़ा होकर कभी भी समाज का विद्रोही अंग नहीं बन सकता । यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि मनुष्य सदा सुखद घटनाएँ ही याद रखता है । इसी प्रकार बच्चे भी मार को भूल जाते हैं, प्यार को याद रखते हैं, क्योंकि प्यार उनके लिए सुखद होता है । इसलिए प्यार से दी हुई सीख अधिक याद रहती है ।
जिन बच्चों को प्यार कम मिलता है, उनमें बहुत–सी बुराइयाँ पनपने लगती हैं । आज हम अपने बच्चों का बचपन स्वयं खत्म करते जा रहे हैं । ढाई–तीन वर्ष के बच्चे विद्यालय व घर में पढ़ाई के बोझ तले अपना बालपन हमारी अहंतुष्टि के लिए होम करते जा रहे हैं । ‘बार–बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी’, अब दिवास्वप्न लगता है । इस भारी–भरकम पढ़ाई व होमवर्क ने तो बच्चों का बचपन ही खत्म कर दिया है ।
अब हमारे आँगन बच्चों की किलकारियों से सूने हो गए हैं । उनकी उन्मुक्त हँसी पता नहीं कहाँ चली गई है । आज के बच्चों की दिनचर्या विद्यालय, होमवर्क व टी.वी. हो गई है । उनको खेलने का समय ही नहीं मिलता है । रविवार भी होमवर्क व टी.वी. में चला जाता है । विद्यालय व घर दोनों ही जगह उबाऊ अनुशासन ने उनका जीवन दूभर कर रखा है ।
हमने बच्चों को एक शो–पीस की तरह समझना प्रारम्भ कर दिया है । मिलिट्री–अनुशासन की तरह खड़ा बच्चा हमें अच्छा लगता है । वह सॉरी और थैंक्यू की औपचारिकताएँ कर ले, हमें यही अच्छा लगता है । बाल–सुलभ चंचलता का भी कोई महत्त्व होता है, हम यह भूलते जा रहे हैं और इसका ऋण चुकाना पड़ रहा है हमारे नौनिहालों को ।
बहुधा यह देखा जाता है कि शिक्षक व अभिभावक अपनी बात बच्चे पर थोपने का प्रयत्न करते हैं । उसकी रुचि व योग्यता का ध्यान नहीं रखते । इससे बच्चा दब्बू हो जाता है । उसमें आत्महीनता की भावना आ जाती है । वह संकोची हो जाता
है । वह दु:खी और उदास रहता है । बच्चों की भावनाओं, व्यक्तिगत क्षमताओं व योग्यताओं को आदर देना चाहिए ।
हम एक बच्चे की दूसरे से तुलना न करें, क्योंकि प्रत्येक बच्चे में कोई–न–कोई विशेष क्षमता अवश्य होती है । आवश्यकता इस बात की है कि हम बच्चे की उस क्षमता को पहचान कर उसे विकसित करने का प्रयत्न करें । उसे स्वयं को अभिव्यक्त करने का अवसर प्रदान करें ।
बच्चों के लिए दुनिया की हर चीज नई है । हर आदमी व हर काम उनके लिए नया है । इस नवीनता के वातावरण में बच्चा पुलकित होता है, हर्षित होता है, हर चीज के बारे में जानकारी प्राप्त कर अपने को आनन्दित समझता है । इस समय कुछ पूछने पर फटकार दिए जाने पर उसके मन में एक ग्रन्थि बन जाती है, उसकी जिज्ञासा की प्रवृत्ति धीरे–धीरे समाप्त होने लगती है । अब वह अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए गलत रास्तों का प्रयोग करने लगता है या उच्छृंखल हो जाता है । बच्चे की जिज्ञासा को अतृप्त रखना, कुछ भी पूछने पर फटकार देना, उसे भूखा रखने से भी अधिक अहितकर है ।
इसी सन्दर्भ में एक बात विचारणीय है कि प्राय: घर में बड़ा बच्चा अधिक शान्त, संतुष्ट व गम्भीर देखा जाता है । लोग यह कहते देखे जाते हैं कि छोटा बच्चा लाड़–प्यार में बिगड़ जाता है । छोटा सदैव छोटा ही रहता है । छोटे बच्चे के आ जाने से बड़ा अपनी जिम्मेदारी का एहसास करने लगता है, इसलिए वह शान्त हो जाता है ।
हो सकता है इस बात में भी कुछ सत्यता हो, किन्तु इसका एक प्रधान कारण है कि महिला को प्रथम बार गर्भवती होने के सुख का अहसास ही अलग होता है । माँ के मन में शिशु–सम्बन्धी नित नई सुखद कल्पनाएँ आती रहती हैं, वह शान्त, प्रसन्नचित्त व उत्साहित रहती है । उस समय केवल गर्भवती माँ ही नहीं वरन् उसके साथ पिता व घर के अन्य सदस्य भी आने वाले मेहमान की उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं, गर्भवती माँ के खान–पान व रहन–सहन का पूरा ध्यान रखते हैं ।
इस प्रकार प्रथम शिशु के गर्भ में होने के समय माँ को जो शान्त व स्नेहमय वातावरण मिलता है, वह अन्य शिशुओं के समय नहीं मिल पाता है । स्नेह का पूरा–पूरा प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है ।
प्रथम शिशु के जन्म के समय भी एक उल्लासपूर्ण वातावरण रहता है । जहाँ महिला संसार की सर्वोत्तम रचना करने के उल्लास के साथ मातृत्व के गरिमामय पद को प्राप्त करती है, वहीं पुरुष पितृत्व पद प्राप्त करने के सुखद एहसास से नवागन्तुक शिशु की पूरी देखभाल में लग जाता है ।
पहले बच्चे के लालन–पालन में माँ–पिता व परिवार वालों की जो सहज अनुरक्ति होती है, वह बाद के बच्चों में कम हो जाती है । इसीलिए बड़ा बच्चा अपेक्षाकृत अधिक शाँत, संतुष्ट व गम्भीर होता है ।
इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि स्नेह का शिशु के जीवन पर स्थायी प्रभाव पड़ता है । वस्तुत: शिशु को स्नेह देकर हम स्वयं भी अनिर्वचनीय सुख पाते हैं ।
विचारणीय प्रश्न है कि आज की कृत्रिमता में जीते हुए हम अपने बच्चों को क्या दे रहे हैं ? ढाई–तीन वर्ष का शिशु भारी बस्ते का बोझ उठाए ए बी सी डी लिखने या पहाड़ा रटने के लिए विवश है । वह होमवर्क के बोझ तले दबा हुआ है । क्या यही उसका बचपन है ? क्या हम उसे उन्मुक्त वातावरण प्रदान कर रहे हैं, जहाँ वह स्वच्छन्दतापूर्वक अपने बचपन का आनन्द ले सके ?
बचपन फिर लौटकर नहीं आता, यह एक ऐसी अनुभूति है, जो वृद्धावस्था तक मन को सहज ही पुलकित कर देती है । क्या हम बच्चे को सहज वातावरण देकर उसकी कोमलता, मासूमियत व भोलेपन का ध्यान रखते हुए उसको बचपन पूरे उल्लास के साथ जीने का अवसर दे सकेंगे ?
बच्चों को कहानियाँ सुनाना
बच्चों को कहानी सुनना बहुत अच्छा लगता है । दूरदर्शन के आगमन के पूर्व शाम होते ही संयुक्त परिवार में बच्चे अपनी दादी–नानी के पास कहानी सुनने पहुँच जाते थे । छोटे परिवार में भी यह कार्य माँ, पिता, दीदी, भइया या पास–पड़ोस की दादी–नानी करती थीं ।
संयुक्त परिवार में बच्चे का सामाजिक, मानसिक, बौद्धिक व भाषा का विकास सहज ही हो जाता था । उस समय अनौपचारिक शिक्षा का एक प्रधान माध्यम दादी–नानी की कहानियाँ थीं । जो बात हम बच्चों को सहज रूप में नहीं सिखा पाते हैं, वही बात वह कहानी के माध्यम से जल्दी सीख लेते हैं । उनके मन पर कहानी द्वारा स्थायी प्रभाव डाला जा सकता है । संक्षेप में कहानियों द्वारा निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं—
1– कल्पनाशक्ति का विकास होता है ।
2– भाषा का विकास तथा योग्यता–विस्तार अर्थात् किसी बात को विस्तार से कहने की क्षमता का विकास होता है ।
3– वाक्य संयोजन की प्रतिभा का विकास होता है ।
4– प्रकृति–प्रधान कहानियों को सुनने से प्रकृति के सचित्र सौन्दर्य–बोध का विकास होता है ।
5– नीतिपरक कथाएँ बाल–मस्तिष्क पर दीर्घकालिक प्रभाव डालती हैं ।
6– इतिहास की कठिनतम गुत्थियों को हम कहानी के माध्यम से बाल–मन तक सरलता से पहुँचा सकते हैं ।
7– बाल–हृदय में प्राचीन संस्कृति के प्रति अनुराग उत्पन्न करने के लिए कहानी एक सशक्त माध्यम है ।
इसी प्रकार विज्ञान कथाएँ, जानवरों की कहानियाँ, सामाजिक कहानियाँ तथा अन्य शिक्षाप्रद कहानियाँ बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायक हो सकती हैं ।
कहानी सुनाने की जरूरत
कहानियाँ अच्छी तरह सुनने की क्षमता का विकास करती हैं : ‘अच्छा श्रोता कौन है ? वह जो अन्त तक सुनता रहे ।’ यह बात थोड़ी अजीब है कि अच्छे श्रोता हमारे उस देश में दुर्लभ हो गए हैं, जहाँ कहानी सुनना और सुनाना  एक पुरानी और मजबूत मौलिक संस्कृति रही है । मेरा अन्दाज है कि इस परिस्थिति का सम्बन्धबचपन में कहानी सुनाने की अवहेलना से है । ऐसा लगता है कि आधुनिक भारत के पास बच्चों को नियमित रूप से कहानी सुनाने का समय ही नहीं है । इस कमी के परिणाम अब स्पष्ट होते जा रहे हैं ।
* कहानियाँ सुनने से अन्दाज लगाने का प्रशिक्षण मिलता है ।
* कहानियाँ हमारी दुनिया को फैलाती हैं ।
*  कहानियाँ शब्दों को अर्थ देती हैं ।
* कहानी कहने का महत्त्व हम बच्चे के भाषाई साधनों के विस्तार से देख सकते हैं । शब्द निहायत निजी सम्पत्ति होते हैं । वे हमें एक बहुत निजी अर्थ में संसार की चीजों को अलग–अलग नाम देने की क्षमता देते हैं । लेकिन दूसरी तरफ शब्द एक ऐसी सामाजिक सम्पत्ति भी हैं जिनका इस्तेमाल हम दूसरों से अपने अनुभव बाँटने के लिए करते हैं । शब्दों की ये दो–तरफा प्रकृति ही उन्हें अर्थ देती है ।’
प्राथमिक शिक्षक जनवरी 2007
प्रो– कृष्ण कुमार – निदेशक
N.C.E.R.T. प्राथमिक शिक्षा के मुद्दे
(D.P.E.P.  जनवरी–अप्रैल 2007)
बच्चों के लिए खेल, खेल का अर्थ व आवश्यकता
बच्चों के लिए खेल सहज विकास का अच्छा माध्यम है । बच्चे के लिए खेल ही उसका कार्य है । बच्चा खेल–खेल में जितना अधिक सीख सकता है, बलपूर्वक सिखाने पर उसका दसवाँ भाग भी सीखना कठिन हो जाता है । खेल के द्वारा सीखने में बच्चे की रुचि होती है । अत: वह ज्ञान स्थायी होता है । खेल द्वारा सीखने से एक लाभ यह भी है कि बच्चे की पढ़ाई से अरुचि नहीं होती है । अत: विद्यालय शिक्षा में भी उसकी शिक्षा के प्रति रुचि बनी रहती है ।
बच्चा स्वतंत्रतापूर्वक कार्य कर सके तो उसकी ज्ञान–प्राप्ति की गति में तीव्र विकास होता है । यदि वातावरण नियमों से जकड़ा हुआ होगा तो बच्चे का सहज विकास रुक जाएगा । अत: बच्चे को अनुशासन सिखाने के लिए ऐसे खेलों की व्यवस्था की जानी चाहिए कि उसमें आत्मविश्वास, आत्मनियन्त्रण तथा सामाजिक भावना का विकास हो सके तथा उसे अनुशासन–पालन की शिक्षा भी मिल सके, किन्तु खेल खेल हो, आनन्दपूर्ण हो ।
रवीन्द्रनाथ टैगोर जी के शब्दों में—
‘जब मैं बच्चा था तब छोटी–छोटी चीजों से खिलौने बनाने और अपनी कल्पना में नए–नए खेल इजाद करने की मुझे पूरी आजादी थी । मेरी खुशी में मेरे साथियों का पूरा हिस्सा होता थाय बल्कि मेरे खेलों का पूरा मजा उनके साथ खेलने पर निर्भर करता था । एक दिन हमारे बचपन के इस स्वर्ग में वयस्कों की बाजार प्रधान दुनिया से एक प्रलोभन ने प्रवेश किया । एक अंग्रेज दुकान से खरीदा गया खिलौना हमारे एक साथी को दिया गयाय वह कमाल का खिलौना था– बड़ा और मानो सजीव । हमारे साथी को उस खिलौने पर घमंड हो गया और अब उसका ध्यान हमारे खेलों में इतना नहीं लगता थाय वह उस कीमती चीज को बहुत ध्यान से हमारी पहुँच से दूर रखता था ।
अपनी इस खास वस्तु पर इठलाता हुआ वह अन्य साथियों से खुद को श्रेष्ठ समझता था क्योंकि उनके खिलौने सस्ते थे । मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि अगर  इतिहास की आधुनिक भाषा प्रयोग कर सकता तो वह यही कहता कि वह उस हास्यास्पद रूप से श्रेष्ठ खिलौने का स्वामी होने की हद तक हमसे अधिक सभ्य था ।
अपनी उत्तेजना में वह एक चीज भूल गया– वह तथ्य जो उस वक्त उसे बहुत मामूली लगा था कि इस प्रलोभन में एक ऐसी चीज खो गई जो उसके खिलौने से कहीं अधिक श्रेष्ठ थी, एक श्रेष्ठ और पूर्ण बच्चा । उस खिलौने से महज उसका धन व्यक्त होता था, बच्चे की रचनात्मक ऊर्जा नहीं, न ही उसके खेल में बच्चे का आनन्द था और न ही उसकी खेल की दुनिया में साथियों को खुला निमंत्रण ।’
रवीन्द्रनाथ टैगोर के निबंध ‘सभ्यता और प्रगति’ से
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005)
‘बच्चा जन्म से ही स्वाभाविक क्षमताओं के साथ पैदा होता है । हमारी शिक्षा–व्यवस्था उन स्वाभाविक क्षमताओं का आदर कर सके और उन क्षमताओं को इस हद तक बढ़ा सके कि उस बच्चे में एक लोकतांत्रिक समाज में सामूहिक भागीदारी के साथ काम करने की क्षमता विकसित की जा सके ।’
—प्रो– कृष्ण कुमार
‘शिक्षा का उद्देश्य और आज की व्यवस्था’
भारतीय आधुनिक शिक्षा अप्रैल, 2005’

बचपन का सन्तुलित विकास, सम्पूर्ण विकास का आधार

यदि बच्चे को उसका बचपन जीने का पूर्ण अवसर दिया जाए तो बच्चा बड़ा होकर पूर्ण विकसित मानव होगा । उसमें कुंठाएँ नहीं होंगी, वह सदा प्रफुल्लित रहेगा व हर परिस्थिति में प्रसन्न रहेगा ।
बालक का सहज विकास हो, उसकी शिक्षा ऐसी हो कि उसको अभिव्यक्ति के पूरे अवसर मिलें । उल्लसित जीवन हो, चंचलता के अवसर मिलें, ऐसा बच्चा सहज रूप में विकसित होगा । हो सकता है वह बड़ा अधिकारी, नेता या व्यापारी न बन सके, लेकिन वह जैसा भी होगा, जहाँ भी होगा पूर्ण समायोजित व्यक्तित्व वाला होगा । देश का सुयोग्य नागरिक होगा ।
बचपन की अनुभूतियाँ जीवन–भर सुखद एहसास कराती हैं । अत: बच्चे को स्नेह से अभिसिंचित किया जाए । उसे उसका बचपन जीने का पूरा अवसर प्रदान किया जाए । पानी से खेलता हुआ या मिट्टी से सना हुआ अतिप्रसन्न शिशु किसका मन नहीं मोह लेता ।
शिशु के इन आनन्द के क्षणों को वर्णित तो किया ही नहीं जा सकता, उसे सर्वाधिक आनन्द शरारत करने में ही आता है । उसका प्रिय–से–प्रिय खिलौना या अतिप्रिय खाद्य वस्तु तो उसे सीमित सुख ही देती है किन्तु मनपसन्द शरारत करने को मिल जाए तो, क्या कहने ।
भारत के अधिकांश प्राइवेट विद्यालयों में शिशु–शिक्षा की जो व्यवस्था चल रही है, वह भारतीय स्थिति–परिस्थिति और परिवेश के अनुरूप नहीं है । उनमें अबोध शिशुओं पर कॉपी–किताबों का भारी–भरकम बोझ लाद दिया जाता है, जिनसे बच्चों की किलकारियाँ, उनकी हँसी–खुशी लुप्त हो जाती है और बच्चों के चेहरे मुरझा जाते हैं । इसी के साथ सबसे बड़ा नुकसान होता है कि उनके आगे के विकास की गति बाधित होती है ।
केन्द्रीय विद्यालय के बच्चों पर किया गया
प्रायोगिक अनुभव व निष्कर्ष
बच्चों का भविष्य तभी आनन्दपूर्ण हो सकता है जब उनका समुचित विकास अर्थात् स्वाभाविक ढंग से विकास हो । ज्ञानार्जन के साथ उनका बाल–सुलभ स्वभाव बना रहे और वह अपनी अन्तर्निहित प्रतिभाओं को उभार सकें । वह स्वयं अपनी रुचि रुझान के अनुसार औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने के योग्य बन सकें । तदर्थ मैंने पूरी तरह से इस ओर अपना ध्यान लगाकर बाल–विकास के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हुए शोधकार्य जारी रखा ।
केन्द्रीय विद्यालय में कार्यकाल के दौरान कक्षा एक के बच्चों पर किया गया प्रयोग व अनुभव प्रस्तुत है ।
मेरी सदा से इच्छा रही है कि मैं उचित ढंग से बाल–विकास के सभी पहलुओं को लेकर अनुसंधान करूँ । यह तभी सम्भव होता जब मैं कक्षा में बच्चों के साथ पूरे समय रहती । नियमानुसार मुझे प्रतिदिन आठ में छ: पीरियड मिलने थे, बाकी दो पीरियड किसी अन्य अध्यापक को दिए जाने थे । विशेष अनुमति के तहत सत्र 1999–2000 में मुझे कक्षा एक के सभी आठों पीरियड लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ, जिससे मैं बच्चों के साथ पूरे समय रह सकूँ ।
एन.सी.ई.आर.टी. के मानकों के अनुसार ही मैंने अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया ।
बच्चों के एडमीशन के बाद उनकी सामान्य क्षमता का ज्ञान Pre-Testing
बच्चों के एडमीशन के बाद उनकी सामान्य क्षमता Pre-Testingके ज्ञान हेतु कुछ बिन्दुओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया—
1– शारीरिक विकास एवं सफाई की आदत
(क) सफाई की आदत
(ख) पेंसिल ठीक से पकड़ पाता है
(ग) किताब सही ढंग से पकड़कर चित्र आदि देखता है
(घ) सही शारीरिक स्थिति Posture
(ङ) उच्चारण की शुद्धता
2– सामाजिक विकास
(क) विद्यालय के वातावरण से तादात्म्य
(ख) अन्य बच्चों से सहयोग
(ग) कक्षा में सहयोग
(घ) स्वावलम्बन
3– मानसिक विकास
(क) सीखने की इच्छा
(ख) ध्यान देने की प्रवृत्ति
(ग) विभेदीकरण की क्षमता
(घ) कहानी कथन क्षमता
(ङ) कल्पना शक्ति
इन सब बिन्दुओं के आधार पर बच्चे के शारीरिक, मानसिक व सामाजिक विकास के बारे में सामान्य जानकारी ली गई, जिससे पता चल सके कि बच्चों को कहाँ तथा किस बिन्दु पर मार्गदर्शन या सहयोग की आवश्यकता है ।
छह सप्ताह के रेडीनेस प्रोग्राम का कार्यान्वयन
मैंने रेडीनेस प्रोग्राम के अन्तर्गत अन्य क्रिया–कलापों के साथ ही क्रियात्मक रूप से बच्चों के क्रियाशील रहने हेतु उन्हें कविता, कहानी, चुटकुले, पहेली की ओर प्रेरित करना चाहा । साथ ही ड्रॉइंग की कॉपी मँगवाई तथा अभिभावकों की सुविधा के लिए कक्षा एक की पुस्तकों व कॉपियों की लिस्ट टाइप करवाकर दे दी ।
सुन्दर, सुडौल लिखावट के लिए हिन्दी व अंग्रेजी की सुलेख की पुस्तकें भी मँगवार्इं । मेरा उद्देश्य यह था कि अभिभावक पुस्तकें आदि खरीद लेंगे, जिन्हें भविष्य में समयानुसार पढ़ाया जाएगा । मैंने दिनांक 24–04–1999 (बच्चों के एडमीशन के पहले दिन) को बच्चों को किताबों की लिस्ट दी थी । कक्षा एक की पुस्तकें व कॉपियाँ तो सबने खरीद लीं, ड्रॉइंग व सुलेख की पुस्तकें नहीं खरीदीं । केवल एक बच्चा ही ड्रॉइंग व सुलेख की पुस्तकें लाया ।
आश्चर्य है कि अभिभावक ड्रॉइंग व सुलेख को बेकार की चीज समझते हैं ।
बच्चों को इनडोर व आउटडोर गेम्स (कमरे के अन्दर व मैदान में खेले जा सकने वाले खेल) भी करवाए । भावगीतों द्वारा उनकी भावाभिव्यक्ति का प्रयास किया, किन्तु चंचलता व कोमलता से बहुत दूर इन बच्चों को उदासी घेरे हुई थी । कविता, कहानी, आउटडोर व इनडोर गेम्स में बच्चों की रुचि नहीं थी ।
बड़ी विचित्र स्थिति थी । कक्षा से बाहर खेलने के लिए ले जाने पर भी बच्चे चुपचाप ही रहते थे या झगड़ने लगते थे । बच्चों में स्वयं खेलने, समूह बनाने या नेतृत्व की क्षमता नहीं थी । दो मिनट के लिए भी कक्षा से बाहर जाने पर बच्चों में मारपीट शुरू हो जाती थी । बच्चों में सहज चंचलता के स्थान पर आक्रामक प्रवृत्ति पर्याप्त मात्रा में थी ।
बच्चों से पूछने पर पता चला कि माता–पिता इन्हें खेलने के लिए मना करते हैं । कविता, कहानी की ओर प्रोत्साहित नहीं करते हैं । न तो स्वयं ही कहानियाँ, कथाएँ आदि सुनाते हैं, न ही दादी–नानी आदि बुजुर्ग लोगों के पास अधिक बैठने देते हैं । उन्हें लगता है कि केवल पुस्तकीय ज्ञान ही पर्याप्त है ।
अधिकांश अभिभावकों से वार्तालाप के दौरान यह निष्कर्ष निकला कि उन्हें ड्रॉइंग, सुलेख, कविता, कहानी, परम्परागत कथाएँ, खेल आदि समय बरबाद करने वाले क्रिया–कलाप लगते हैं । दु:ख होता है कि अभिभावक स्वयं अपनी ही सन्तान को मानसिक रूप से पंगु बना रहे हैं । अगर इन बच्चों में इस समय ही चंचलता नहीं रही तो यही बच्चे बड़े होने पर समस्या बच्चे (च्तवइसमउ ब्ीपसक) बन सकते हैं ।
कुछ बच्चों में चोरी की प्रवृत्ति भी थी । राहुल ने एक दिन थोड़ी मॉडलिंग क्ले Modeling Clay उठा कर रख ली । अंकुर ने कुछ ब्लॉक्स उठाकर जेब में रख लिए, पकड़े जाने पर छुपाने का प्रयास करने लगे, डरने लगे तथा रोने लगे । सलिल तो मारपीट में सबसे आगे रहता था । मैंने उनकी इस प्रवृत्ति को सहज रूप में लिया, उन्हें प्यार से समझाया और रचनात्मकता की ओर प्रेरित किया । तब धीरे–धीरे उनकी आक्रामक प्रवृत्ति तथा चोरी की आदत समाप्त हो गई ।
इन सब समस्याओं का मूल कारण यह है कि इन बच्चों को अधिक पढ़ाने के उद्देश्य से तीन वर्ष की आयु में ही तथाकथित नर्सरी विद्यालयों में भर्ती करवा दिया गया था, जहाँ पर नर्सरी व किंडरगार्टन के उद्देश्यों से बहुत दूर उन्हें पढ़ना–लिखना सिखाया जाने लगा था । उस समय ही  इन्हें जबरदस्ती विद्यालय जाने के लिए तैयार कर दिया जाता था ।
विद्यालय का उबाऊ वातावरण, घर में आकर होमवर्क का बोझ, टी–वी– देखना व सो जाना । जीवन्तता से दूर इन बच्चों के विकास की गति तो उस समय ही अवरुद्ध कर दी गई थी, जब इन्हें तीन वर्ष की आयु से ही पढ़ाई की ओर लगा दिया गया ।
मीठी–मीठी लोरियाँ सुनने का समय, कल्पनाओं में उड़ानें भरने का समय तो चला गया पुस्तकों में । जो भी हो मुझे तो इन्हीं बच्चों के साथ कार्य करना था, जिन्हें पूर्व प्राथमिक स्तर से ही पढ़ाई के प्रति भय व अरुचि का वातावरण मिला था ।
मुझे अभिभावकों का सहयोग बहुत कम मिला, कुछ अभिभावकों ने तो पूर्ण असहयोग किया । मेरे बार–बार कहने व तर्कपूर्ण ढंग से समझाने पर भी कुछ लोगों ने सुलेख की पुस्तकें व ड्रॉइंग की कॉपियाँ नहीं खरीदीं, जबकि यह अभिभावक पढ़े–लिखे व सम्पन्न थे । हारकर मैंने उनसे कहना छोड़ दिया और कुछ बच्चों को स्वयं सुलेख व ड्रॉइंग की कापियाँ व पुस्तकें खरीदकर दीं व उसका आशानुरूप फल भी प्राप्त हुआ ।
बच्चों के निष्पादन का विवेचन
कक्षा एक के बच्चों के साथ कार्य करने का जो सुअवसर प्राप्त हुआ उसमें सीमित संसाधनों व निर्धारित पाठ्यक्रम के मध्य भी मैंने यह अनुभव किया कि यदि कक्षा एक में प्रवेश के पूर्व बच्चों को बालगृह (ब्ीपसकतमद भ्वउम) में पूर्व प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हो सके तो कितना अच्छा हो ।
यदि ऐसा सम्भव न हो तो विद्यालय में ही कक्षा एक में एडमीशन के बाद कम–से–कम छ: सप्ताह रेडीनेस (पूर्व प्राथमिक शिक्षा) के हों । पूर्व प्राथमिक शिक्षा से मेरा तात्पर्य तथाकथित नर्सरी शिक्षा से नहीं है, जहाँ उन्हें भययुक्त वातावरण में पढ़ना–लिखना सिखाया जाने लगता है । मेरा उद्देश्य वास्तविक नर्सरी शिक्षा से है, जहाँ बच्चे रूपी पुष्प स्वस्थ रूप में, उन्मुक्त रूप से विकसित हों व अपने बचपन का पूरा आनन्द प्राप्त कर सकें ।
इनमें अमन और आदर्श दोनों ही बुद्धिमान थे, किन्तु विद्यालय में इनकी उपस्थिति बहुत कम रहती थी, अनुपस्थिति का कोई विशेष कारण न होकर अभिभावकों की लापरवाही थी, जबकि इनके अभिभावक काफी पढ़े–लिखे थे । अभिभावकों की लापरवाही यहाँ तक थी कि भयंकर जाड़े में भी आदर्श नेकर पहनकर आता था । उसके पिता से बार–बार कहने पर भी उन्होंने उसके लिए पैंट नहीं खरीदा । परिणामस्वरूप बच्चा बीमार हो गया, जबकि उसके पिता सम्पन्न हैं व उनके पास कार भी है ।
अभिषेक शुक्ला व सलिल को उनके अभिभावकों ने मेरे आखिरी प्रयास के बाद भी सभी कॉपी–किताबें खरीदकर नहीं दीं, जबकि वह अच्छे, साफ–सुथरे कपड़े पहनकर आता था व कई बार पन्द्रह रुपये वाली चॉकलेट भी लाता था । बातें करने पर पता चला कि उसे कई बार कोल्ड ड्रिंक भी पिलाई जाती थी ।
सलिल की माँ तो आकर मुझसे लड़ने लगीं कि आपको ड्रॉइंग व सुलेख की पुस्तकों पर कमीशन मिलता है क्या ? मैंने उनसे अधिक वाद–विवाद न करके इन दोनों बच्चों को स्वयं ड्रॉइंग व सुलेख की पुस्तकें खरीदकर दे दीं । इसके बाद मेरे एक साथी अध्यापक श्री हरिशंकर वर्मा जी के द्वारा समझाने–बुझाने से मेरे प्रति उनका पूर्वाग्रह खत्म हुआ ।
जहाँ एक ओर अभिभावकों की बच्चों के प्रति उदासीनता रहती है, वहीं कुछ अभिभावकों का अतिध्यान भी समस्या का कारण बन जाता है । इनमें एक समस्या ट्यूशन है । अपने घर के आस–पास हाईस्कूल या इण्टर में पढ़ने वाले लड़कों को ये लोग अपने बच्चों के ट्यूटर के रूप में नियुक्त कर देते हैं । जैसे – पृथ्वी प्रताप सिंह, दिनेश, विमल, अभिषेक शुक्ला, अंशुल, अंकुर व पवन तथा आरती व गरिमा । इन बच्चों को यही हाईस्कूल, इण्टर के छात्र ट्यूशन पढ़ाते
थे । आरती व गरिमा का काम ट्यूटर या तो बिना समझाए हाथ पकड़कर करवा देते थे या खुद कर देते थे । अन्य अधिकांश अभिभावक भी बच्चों को बिना समझाए काम पूरा करवाने की प्रवृत्ति रखते थे ।
बहुत समझाने के बाद कुछ लोगों ने तो यह प्रवृत्ति बन्द कर दी, किन्तु विमल व अशोक के ट्यूटर व अभिभावक कभी उसका हाथ पकड़कर बिना समझाए उसका काम पूरा करवाते, कभी स्वयं ही लिख देते थे । जबकि विमल व अशोक को अक्षर–ज्ञान भी नहीं था । उनके इस प्रकार काम पूरा करवाने का परिणाम यह हुआ कि बच्चे वांछित योग्यता नहीं ग्रहण कर सके, न ही उनकी पठन–पाठन में रुचि ही जाग सकी ।
जबकि मैंने कभी भी होमवर्क नहीं दिया । बच्चों की वैयक्तिक क्षमता के अनुसार कक्षा में ही काम करवाया । यह आवश्यक भी नहीं समझा कि हर बच्चा बिना समझे पुस्तक का हर काम पूरा करे । खेद है कि कुछ अभिभावक यही समझते रहे कि दूसरे बच्चों ने पुस्तक का जितना कार्य किया है, उन्हें भी बच्चे को उतना ही काम पूरा करवाकर विद्यालय में भेजना है ।
अभिभावकों से निवेदन किया कि बच्चों को विद्यालय में जो पढ़ाया जा रहा है, उसे पहले से ही घर पर न पढ़ाएँ क्योंकि फिर बच्चा कक्षा में ध्यान नहीं देता है । इसके अतिरिक्त यदि वह बाद में भी कुछ पूछता है तो उसे प्रोत्साहित करें कि वह कक्षा में ही अध्यापक से पूछे । इसका कारण भी स्पष्ट किया कि ऐसा करने से वह अध्यापक की बात पूर्ण मनोयोग से सुनेगा किन्तु परिणाम आशानुकूल नहीं रहा ।
कक्षा एक से ही ट्यूशन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाने से विद्यालय में बच्चा खेलता रहता है और खेलने से अधिक मार–पीट करता रहता है क्योंकि उसका खेल का समय तो ट्यूशन में चला जाता है । इसके अतिरिक्त उसे यह भी पता होता है कि वह विद्यालय में चाहे जितना पढ़ ले, उसे घर जाकर तो पढ़ना ही है । बच्चे हमसे अधिक दूरदर्शी व अपना कार्यक्रम नियोजित करने वाले होते हैं । वह अपना खेल का समय अवश्य ही निकालेंगे । अत्यधिक दबाव पड़ने से उनका विकास बाधित होता है ।
ट्यूशन या घर में पढ़ाने की प्रवृत्ति केवल कमजोर बच्चों में ही नहीं वरन् प्रतिभाशाली बच्चों के अभिभावकों में भी थी । शान्तनु और अंगिरा की ड्रॉइंग बहुत अच्छी होने के साथ–साथ वे लोग पढ़ाई और अनुशासन में भी बहुत अच्छे थे । शान्तनु व सचिन की अभिव्यक्ति भी स्पष्ट थी किन्तु अपना दुर्भाग्य कहूँ या देश का या उन बच्चों का, सचिन के अभिभावक के अतिरिक्त अन्य किसी बच्चे के अभिभावक ने घर में पढ़ाने की प्रवृत्ति बन्द नहीं की ।
सचिन के अभिभावक चूँकि स्वयं अध्यापक हैं । अत: वह इस बात की बारीकी को समझ गए व उन्होंने घर पर बच्चे के लिए खेल, ड्रॉइंग आदि की व्यवस्था की । परिणाम बहुत उत्साहजनक हुआ । बच्चे के ज्ञानार्जन के साथ–साथ उसकी मुखरता बढ़ी । प्रात:कालीन प्रार्थना सभा से लेकर विद्यालय की पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं में उसकी पूरी सहभागिता रही । वह एक कुशल वक्ता की तरह पूरे आत्मविश्वास के साथ माइक पर बोलता था । काश! यदि अन्य अभिभावकों का सहयोग मिला होता तो कुछ अन्य प्रतिभाएँ भी निखर सकती थीं ।
मैंने सचिन की प्रतिभा का पूरा उपयोग करते हुए कक्षा एक में ही दिसम्बर माह तक उसे अंग्रेजी की डिक्शनरी देखना भी सिखा दिया था । इसके बाद मैंने उसे एक डिक्शनरी पुरस्कार–स्वरूप दी व अभिभावक से कहा कि यदि बच्चा डिक्शनरी देखने में मदद मँागे तो घर पर उसका सहयोग करिएगा । डिक्शनरी देखना सीखने पर जोर नहीं देना है । उसे डिक्शनरी को खिलौने की तरह खेलने
 दें । खेलते–खेलते भी बहुत कुछ सीख जाएगा ।
इन सब समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या तो यह नजर आई कि लगभग सभी बच्चे नर्सरी के नाम पर खुले हुए विद्यालयों में पढ़ना–लिखना सीखकर आते हैं । राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के अनुसार वर्णमाला आदि हमें कक्षा एक में सिखानी थी किन्तु बच्चे तथाकथित नर्सरी स्कूलों के भयपूर्ण वातावरण में अपना शैशव, अपना बचपन खोते हुए पढ़ना–लिखना सीखते हैं, किन्तु सही रूप में नहीं सीख पाते हैं ।
उनके लेखन, पठन व वाचन सभी में अशुद्धियाँ होती रहती हैं । चूँकि उनकी आन्तरिक चंचलता शैशवावस्था में ही समाप्त हो जाती है । अत: विद्यालय–पूर्व आयु में जबरदस्ती ज्ञान भरा हुआ मन, प्रसन्नचित्त मन से सही ज्ञान सीखने के लिए तैयार भी नहीं होता । यही बच्चा क्रमश: कठिन होते हुए पाठ्यक्रम में कक्षा दो, तीन, चार या पाँच में पहुँच जाता है और उसकी कठिनाई बढ़ती ही जाती है, क्योंकि सही लिखना, पढ़ना, बोलना व समझना नहीं आ सका । साथ में अरुचि नर्सरी कक्षा में ही थी तो उपलब्धि तो बाधित होगी ही ।
इस प्रकार कमजोर नींव वाले बच्चों के पूरे जीवन के लिए एक कठिनाई तो बनी ही रहती है । प्राथमिक स्तर पर अधिगम में जो कमजोरी रह जाती है, उसका प्रभाव बाद की पढ़ाई पर पड़ना भी स्वाभाविक ही है क्योंकि प्रारम्भ में ही सही चीज नहीं आई, वर्तनी में अशुद्धियाँ रहीं, प्रत्यय ठीक से स्पष्ट नहीं हुआ तो आगे की पढ़ाई कैसे समझ में आवेगी ।
मैंने अपने अध्यापन–जीवन में देखा है कि कला का सकारात्मक प्रभाव बच्चे के शारीरिक व मानसिक स्तर पर तो पड़ता ही है, उसका अधिगम भी प्रभावित होता है ।
प्राथमिक कक्षाओं में खेल का महत्त्व तो शिक्षाविदों ने किया ही है । इसीलिए हर कक्षा में दिन में एक चक्र खेल का भी अवश्य होता है । वस्तुत: खेल वह है जिसमें बच्चे को आनन्द मिले । वह खेल लूडो, कैरम भी हो सकता है, दौड़–भाग के खेल भी, चित्रकला भी, कहानी–कविता भी, यहाँ तक कि पढ़ाई भी । यह बच्चों की रुचि पर निर्भर करता है कि उन्हें किस कार्य में आनन्द आता है । जिस कार्य में बच्चा आनन्दित होता है, वही उसका खेल है । जो कार्य वह प्रयत्नसाध्य करता है, वह उसका कार्य है । स्वास्थ्य की दृष्टि से विद्यालय में खेल के चक्र में बच्चों के लिए दौड़ना–भागना भी आवश्यक है । अत: बच्चों को दौड़–भाग के खेल के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए क्योंकि हर बच्चे के घर के पास पार्क आदि की व्यवस्था नहीं होती है ।
अंगिरा, जो एक प्रतिभाशाली बालिका है, आवश्यकता से अधिक शान्त रहती थी । उसका शैक्षिक निष्पादन बहुत अच्छा था । उसे भी तथाकथित नर्सरी विद्यालय में तो पढ़ाया ही गया था, साथ ही घर पर उसकी माँ का कठोर अनुशासन रहता था । वह बच्चों का शोर–शराबा बिल्कुल पसन्द नहीं करती थीं । बच्चों को पार्क में व पड़ोस के बच्चों के साथ खेलने भी नहीं देती थीं ।
एक बार मैं उनके घर अपनी छ: वर्षीया पुत्री के साथ इसी उद्देश्य से गई कि अंगिरा के आवश्यकता से अधिक शाँत रहने का कारण जान सकूँ । शाम का समय था, घर के सामने पार्क भी था । मैंने अपनी पुत्री लक्ष्मी व अंगिरा दोनों से कहा कि सामने पार्क में अन्य बच्चों के साथ खेलें, किन्तु उसकी माँ ने कहा कि वह अपने बच्चों को घर से बाहर नहीं खेलने देती हैं । मैंने उन्हें समझाने का प्रयास किया तो उनका उत्तर था कि बच्ची पढ़ाई में तो अच्छी है और क्या चाहिए ।
पढ़ाई के साथ–साथ बच्चे के सामान्य विकास के लिए उन्मुक्तता भी तो आवश्यक है । परिणाम भी वही हुआ, अंगिरा एक प्रतिभाशाली बच्ची थी किन्तु कोर्स की पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य किसी क्षेत्र में उसकी प्रतिभा विशेष रूप से विकसित न हो सकी । कोर्स की पुस्तकें भी उसने रट ली थीं—किन्तु चिन्तन क्षमता विकसित नहीं हो पाई थी ।
प्रायोगिक अध्ययन का परिणाम
इस अध्ययन से कुछ तथ्य निकलकर सामने आए । बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक है कि इन बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाए–
1– खेल का महत्त्व—प्राथमिक कक्षाओं में खेल का महत्त्व तो शिक्षाविदों ने किया ही है । इसीलिए हर कक्षा में दिन में एक चक्र खेल का भी अवश्य होता है । वस्तुत: खेल वह है जिसमें बच्चे को आनन्द मिले । वह खेल लूडो, कैरम भी हो सकता है, दौड़–भाग के खेल भी, यहाँ तक कि पढ़ाई में भी यदि उसे आनन्द मिलता है तो वह बच्चे के लिए खेल का ही रूप ले लेता है ।
2– अभिभावक शिक्षा आवश्यक—वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जबकि लोगों के प्राय: एकाकी परिवार हैं, उसमें भी एक या दो बच्चे, तब अभिभावकों को बाल विकास के सामान्य नियमों की जानकारी की और भी अधिक आवश्यकता है क्योंकि संयुक्त परिवार में जहाँ एक ओर बच्चों को छोटा–सा समाज मिल जाता था, वहीं अनुभवी दादी–नानी, बुजुर्ग महिलाएँ बच्चों के स्वस्थ पालन–पोषण की भी अनेक जानकारियाँ देती थीं । इसके अतिरिक्त बदलते हुए सामाजिक वातावरण में बाल–मनोविज्ञान की शिक्षा भी अभिभावकों के लिए आवश्यक है ।
3– कला का महत्त्व—कला के द्वारा बच्चा स्वयं को अभिव्यक्त करता है । कला के भी कई आयाम हो सकते हैं । चित्रकला, पेपर कटिंग, फूलपत्ती से खेलना, आटे से चिड़िया आदि बनाना, मिट्टी से विभिन्न खिलौने बनाना आदि ।
विभिन्न प्रकार की चीजों द्वारा विभिन्न प्रकार की अभिव्यक्ति सम्भव
है । मुख्य चीज है अभिव्यक्ति, उसके लिए माध्यम कुछ भी हो । बच्चा इन क्रियाओं में संलग्न रहता है तो आनन्द–प्राप्ति के साथ–साथ उसकी अभिव्यक्ति–क्षमता भी बढ़ती है । हो सकता है कि हमें यह लगे कि बच्चे ने यों  ही टेढ़ी–मेढ़ी रेखाएँ खींच दी हैं या कुछ गोचापाची कर दी है किन्तु बच्चा अपनी दृष्टि से सार्थक चित्र ही बनाता है, जो उसकी अभिव्यक्ति क्षमता की वृद्धि के लिए महत्त्वपूर्ण है । अभिव्यक्ति से एक ओर तो उसे अपार आनन्द मिलता है, रचनात्मकता से आत्मविश्वास बढ़ता है व दूसरी ओर उसकी गतिक माँसपेशियों Motor Musclesका विकास भी होता है । सुन्दर लेखन के लिए आवश्यक है कि गतिक माँसपेशियाँ मजबूत हों ।
4– जिज्ञासाओं की परिपुष्टि—प्राथमिक शिक्षण का मूलाधार बच्चे को जीवन की समग्रता से परिचित कराना है । बच्चा वैसे भी समग्रता को ही लेकर चलता है । वह किसी भी चीज को टुकड़ों में नहीं देखता । उसके लिए हर उड़ता हुआ पक्षी ऊँचाई की असीम सम्भावनाएँ लिए रहता है । हर पेड़ सौन्दर्य का बोध लिए रहता है । हर पशु में विशेषताएँ लगती हैं । बच्चा अपनी अनन्त जिज्ञासाओं का समाधान करना चाहता है । एक ओर उसका मन विभिन्न कल्पना की उड़ानें भरता रहता है तो दूसरी ओर वह जीवन से जुड़ी हुई सत्यता को जानना चाहता है । अपनी अनन्त जिज्ञासाओं के माध्यम से वह अनायास ही ज्ञान की अभिवृद्धि करता है । आवश्यकता इस बात की है कि बच्चे के मन में जिस विषय में जितनी जिज्ञासा हो, उसे उतना तृप्त करते रहना चाहिए ।
जो बात बच्चे सहज रूप में नहीं सीख पाते हैं, उसी बात को वह कहानी, कविता, खेल, नाटक आदि के माध्यम से अतिसहज रूप से ग्रहण कर लेते हैं क्योंकि कहानी, कविता आदि रोचक होने के साथ–साथ जीवन के किसी पक्ष या घटना का समग्रता से उल्लेख करती हैं ।
5– मूल्यपरक शिक्षा—मूल्यपरक शिक्षा के विषय में मनीषियों ने बहुत कुछ लिखा है । इस सम्बन्ध में मैं केवल इतना ही लिख रही हूँ कि मूल्यों के समुचित विकास के लिए पहली आवश्यकता है कि बच्चे को सहज रहने दिया जाए । उसे उसका बचपन जीने का पूरा अवसर दिया जाए । बड़ों के व्यवहार व आचरण के द्वारा उसमें स्वयं ही मूल्यों का विकास होगा ।
यदि प्रत्यक्ष उदाहरणों द्वारा बालक को शिक्षा दी जाए तो उसका प्रत्यक्ष प्रभाव उसके चरित्र पर पड़ता है । जैसे – मितव्ययिता की शिक्षा, केवल किताबी ज्ञान से नहीं दी जा सकती है । यदि हम बत्ती–पंखा, नल आदि अनावश्यक रूप से खुला नहीं छोड़ते हैं, तो बच्चा भी ऐसा नहीं करेगा । यदि हम स्वयं जरा–सा भी खाना जूठा नहीं छोड़ते हैं, बरबाद नहीं करते हैं, तो बच्चा भी कभी भोजन या अन्य कोई चीज बरबाद नहीं करेगा ।
6– बच्चों में प्रेम की भावना का समावेश—प्रेम एक मनोभावना या मनोवृत्ति ही न होकर जीवन की जीवन्तता, समायोजन व आत्मविकास एवं सर्वांगीण विकास का आधार है । औद्योगीकरण के इस युग में भावुकता व प्रेम की आवश्यकता जीवन की सार्थकता एवं सफलता के लिए अत्यावश्यक है ।
मूल्यपरक शिक्षा का मूलाधार प्रेम की भावना का सहज विकास ही है । प्रेम की भावना के सहज विकास के लिए आवश्यक है—
स अध्यापकों व अभिभावकों में प्रेम की भावना समाहित हो ।
मानव–प्रेम, पशु–प्रेम से सम्बन्धित कहानियाँ सुनाई जाएँ ।
देशभक्ति व देश–प्रेम की भावना के विकास के लिए स्वतंत्रता संग्राम में आहुति देने वाले वीरों की संक्षिप्त कहानियाँ सुनाई जाएँ ।
समस्त शिक्षा का उद्देश्य है—बच्चे में स्व–प्रेम, मातृप्रेम, परिवार–प्रेम, समाज–प्रेम, देश–प्रेम व विश्व प्रेम तथा ईश–प्रेम की भावना का विकास हो
सके ।
बच्चों का हठीला बचपन न छीनें, उन्हें असहज न बनावें, उनकी सहजता, कोमलता व स्वाभाविकता को अक्षुण्ण रहने दें ।
7– संगीत—संगीत–शिक्षण न केवल बचपन वरन् पूरे जीवन के लिए बहुत सुखदायी है । कला व संगीत इन दोनों के माध्यम से मनुष्य की अभिव्यक्ति क्षमता विकसित होती है । साथ ही उसके मन में निहित भावनाएँ, कुंठाएँ, अपूर्ण इच्छाएँ, दमित भावनाएँ सकारात्मक रूप से अभिव्यक्त हो जाती हैं, जिससे उसे आनन्द प्राप्त होता है । बच्चों के लिए संगीत व कला–शिक्षण के कई लाभ हैं । एक ओर वह रचनात्मक कार्य में संलग्न रहता है, उसकी इच्छाओं की अभिव्यक्ति होती है, बच्चा प्रसन्नचित्त रहता है । दूसरी ओर भविष्य में वह इसे व्यावसायिक रूप में भी ले सकता है ।
8– स्वास्थ्य की शिक्षा—स्वास्थ्य जीवन में प्रधान है । अत: स्वास्थ्य के सामान्य नियमों की जानकारी बच्चों को अवश्य होनी चाहिए । यथा – सुबह जल्दी उठना, रात को जल्दी सोना, कड़ी भूख लगने पर ही खूब चबा–चबाकर खाना, पर्याप्त मात्रा में पानी पीना आदि ।
यदि आयु के अनुसार बच्चों को सुबह खाली पेट कुछ व्यायाम करवाए जावें तो बच्चा सदा स्वस्थ रहेगा । इसी प्रकार कुछ बड़े बच्चों को भोजन के तत्त्वों की जानकारी भी दी जा सकती है ।
9– शिक्षा के प्रति कौतूहल आवश्यक—यदि कक्षा एक में ही कुछ ऐसी व्यवस्था हो कि जिस बच्चे की पढ़ाई में रुचि नहीं है, उसके लिए खेल समूह की कक्षाएँ हों । उसमें बच्चों को अन्य खेलों के साथ शैक्षिक खिलौने भी दिए जाएँ । जब बच्चे की पढ़ाई के प्रति रुचि जागृत हो जाए तभी उसे पढ़ाई में लगाया जाए ।
यदि कोई बच्चा वर्ष पूरा होने पर भी कक्षा एक का पाठ्यक्रम पूरा नहीं कर पाता है, तो उसे पुन: एक वर्ष खेलने व पढ़ने का अवसर दिया जाए । उन विद्यार्थियों को अनुत्तीर्ण की संज्ञा न दी जाए वरन् कक्षा एक को भी खेल समूह के अन्तर्गत ही माना जाए । खेल की प्रवृत्ति की परिपूर्ति होने पर व पढ़ाई के प्रति रुचि जागृत होने पर जब बच्चा कक्षा एक का पाठ्यक्रम सफलतापूर्वक समझ लेगा, तब आगे की कक्षाओं की पढ़ाई में उसके लिए किसी प्रकार का व्यवधान नहीं होगा । वह सफलतापूर्वक आगे का पाठ्यक्रम पढ़ेगा व समझेगा ।
बच्चे के शिक्षण को प्रारंभ करने से पूर्व आवश्यक है कि उसके मन में शिक्षण के प्रति कौतुक उत्पन्न कर दिया जाए । जब उसकी पढ़ाई या विषय के प्रति रुचि उत्पन्न हो जाए या सीखने के प्रति जिज्ञासा की उत्पत्ति हो तभी उसका विद्यारम्भ होना चाहिए । किसी बच्चे की रुचि चार वर्ष की आयु में जागृत हो सकती है, किसी की सात वर्ष की आयु में, जब तक पात्र (बच्चा) तैयार न हो उसे जबरदस्ती पढ़ाना अनुपयुक्त है ।
10– न्यूनतम अधिगम स्तर की अपेक्षा अधिकतम अधिगम स्तर—प्राथमिक कक्षाओं में न्यूनतम अधिगम स्तर M.L.L.Minimum Level of  Learning की अपेक्षा अधिकतम अधिगम स्तर M.L.L.Maximum Level of Learning की बात करनी चाहिए ।
प्राथमिक कक्षाओं में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा बनाया गया पाठ्यक्रम पूर्णतया मनोवैज्ञानिक है । यदि बच्चा कक्षा एक की पाठ्य–पुस्तकें अधिगृहीत कर लेता है, तब वह अगली कक्षाओं में सामान्य रूप से पढ़ता चला जाएगा, रुचि भी बनी रहेगी व योग्यता व क्षमता का विकास भी होगा ।
इसी के साथ मैं यह भी सोचती हूँ कि बच्चे के शिक्षण प्रारम्भ की कोई आयु निर्धारित कर देना उचित नहीं है । बच्चे के शिक्षण प्रारम्भ से पूर्व आवश्यक है कि उसके मन में शिक्षण के प्रति कौतुक उत्पन्न कर दिया जाए । जब उसकी पढ़ाई या विषय के प्रति रुचि उत्पन्न हो जाए या सीखने के प्रति जिज्ञासा की उत्पत्ति हो तभी उसका विद्यारम्भ होना चाहिए । किसी बच्चे की रुचि चार वर्ष की आयु में हो सकती है, किसी की सात वर्ष की आयु में । जब तक पात्र (बच्चा) तैयार न हो, तब तक उसे जबरदस्ती पढ़ाना अनुपयुक्त है ।
11– पूर्व प्राथमिक शिक्षा आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी—वस्तुत: तीन से छ: वर्ष के बच्चों की पूर्व प्राथमिक शिक्षा बाल–विकास के लिए अति महत्त्वपूर्ण है । बच्चे के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए प्रथम छ: वर्ष बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, ऐसा मनोवैज्ञानिकों का मानना है । प्राय: हम इसी आयु को उपेक्षित कर देते हैं या फिर तथाकथित नर्सरी और के–जी– स्कूलों के नाम पर खुली दुकानों में बच्चों को भेज देते हैं । वहाँ के लम्बे–चौड़े पाठ्यक्रम से वह कोमल पुष्प पढ़ाई, भय एवं अति निर्देशों के वातावरण में अपनी सहजता को भूलकर कुम्हला जाते हैं व विद्यालय उन्हें यातनागृह दिखाई देने लगते हैं तथा परिवारजन इस यातनागृह में भेजने वाले यातनादाता । बच्चे को पढ़ाने के पहले आवश्यक है कि उसकी मानसिक पृष्ठभूमि तैयार की जाए ।
जिस प्रकार खेत के तैयार हो जाने पर उसमें बीज डालने पर बहुत अच्छी फसल तैयार होती है, उसी प्रकार बच्चे की पढ़ाई प्रारम्भ होने से पूर्व आवश्यक है कि उसकी पढ़ाई के प्रति रुचि जागृत की जाए । विद्यालय उसकी सुखद कल्पनाओं की परिपूर्ति का स्थान हो ।
वस्तुत: यह जानने की आवश्यकता है कि बालक के भीतर कुछ जन्मजात प्रतिभाएँ होती हैं और कुछ परिवार, सम्बन्धी, पड़ोस, समाज, विद्यालय आदि के द्वारा उभारी जा सकती हैं । इसी हेतु पूर्व प्रारम्भिक शिक्षा का स्वरूप होना चाहिए, जिसका केन्द्र–बिन्दु बालक होता है । एक बालक और दूसरे बालक के बीच अन्तर हो सकता है । अत: प्रत्येक बालक को एक इकाई समझकर कार्य करने की आवश्यकता है ।
यह आवश्यक है कि पूर्व प्रारम्भिक शिक्षा जो कि औपचारिक शिक्षा की तैयारी है, उसमें सुधार किया जाए । यदि पूर्व प्रारम्भिक शिक्षा ठीक–ठीक होगी तो प्राथमिक शिक्षा एवं आगे की शिक्षा भी ठीक हो सकेगी क्योंकि पूर्व प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य ही है बच्चों को विद्यालय शिक्षा के लिए भली प्रकार तैयार करना । उचित शिक्षा के परिणामस्वरूप बच्चे सफल नागरिक बन सकेंगे ।
ध्यान देने योग्य बातें
1– जब बच्चा पढ़ाई–लिखाई के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाए तभी उसे कक्षा एक में प्रवेश दिया जाए ।
2– कविता, कहानी, खेल, आर्ट, क्राफ्ट, मिट्टी के खिलौने आदि के माध्यम से उनकी क्षमता का अधिकतम सीमा तक विकास किया जाए किन्तु सहजता हो । खेल, कविता, कहानी आदि का प्रयोग बच्चों को आनन्दमय अनुभूति देने हेतु प्रयोग करें ।
3– खेल आदि साधन हों, साध्य नहीं ।
4– किसी भी पाठ्यक्रम की अनिवार्यता न हो ।
5– बच्चे की व्यक्तिगत क्षमताओं को प्रश्रय दिया जाए ।
6– हर बच्चे को एक यूनिट (स्वतंत्र इकाई) मानकर उसे उसकी रुचि–रुझान के अनुसार कार्य करने दिया जाए ।
7– बच्चे की सहजता, चंचलता व कोमलता को ध्यान में रखकर उसे समवयस्क बच्चों के साथ उसका बचपन जीने का पूरा अवसर प्रदान किया
जाए ।
8– अभिभावक शिक्षा अनिवार्य हो ।
9– विशेष शिक्षण प्रविधि ।
10– यथासम्भव बच्चों के लिए समर्पित, बाल मनोविज्ञान के ज्ञाता शिक्षकों का चयन हो । शिक्षकों के सेवा में आने के तुरन्त बाद मनोविज्ञानशाला में बालमनोविज्ञान का कम–से–कम एक माह का सेवा–पूर्व प्रशिक्षण Pre Service Trainingहो । प्रतिवर्ष सत्रान्त पर कम–से–कम एक सप्ताह का सेवाकालीन प्रशिक्षण In Service Course भी मनोवैज्ञानिकों द्वारा अवश्य होना चाहिए ।
11– बच्चे को स्वस्थ वातावरण प्रदान करना नितान्त जरूरी है, प्रदत्त वातावरण से तथा कठिनाई के बिन्दु पर सहयोग करने पर वह स्वयं ही सीख जाएगा ।
12– बच्चे का मस्तिष्क सहज रहे । अत्यधिक सूचनाएँ न भरी
जाएँ ।


जीवन–प्रबन्धन

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो : ।
बन्धाय विषयासक्तं मोक्षे निर्विषयंस्मृतम् । ।
मैत्रेयोपनिषद् 6/34
अर्थात् मन ही मनुष्यों के बन्धन का कारण है, मन में विषयों की आसक्ति होने पर ही बन्धन होता है । मन के निर्विषय होने पर मोक्ष की प्राप्ति भी हो सकती है ।
कहा भी गया है,
‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।’
स्वस्थ मन कैसे रहे ?,हमें यह समझना होगा कि हमारा मन क्या चाहता
 है ? मन आनन्द चाहता है । जरा विचार करें, बच्चे खुश रहते हैं । उनका पेट भरा है तो ठीक है । गरीबी–अमीरी, संसार की विषमताओं का उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ता है । वह माँ पर आश्रित रहते हैं, उन्हें लगता है कि हर समस्या माँ को बता दो और निश्चिन्त हो जाओ । एक तरह से कहा जाए तो उनका सर्वभावेन समर्पण माता के प्रति होता है और यही उनकी प्रसन्नता का रहस्य है ।
जैसे–जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है, आत्मकेन्द्रित होता जाता है, उसकी आशाएँ, अपेक्षाएँ बढ़ती जाती हैं । सफलता में वह खुश होता है, विफलता से दु:खी । मन स्वस्थ रहे, इसके लिए आवश्यक है समुचित जीवन–प्रबन्धन ।
हमें यह जानना आवश्यक है कि हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है ? हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं ? हम कोई कार्य क्यों कर रहे हैं ? हमें क्या चाहिए ? क्यों चाहिए ? वांछित वस्तु प्राप्त करने पर क्या होगा ? आदि–आदि । तनिक विचार करें स्थिर मन से, शाँत मन से । कॉपी–पेन लेकर बैठ जाएँ और लिख लें ।
हमारे कई लक्ष्य हो सकते हैं—
चरमलक्ष्य—हर मनुष्य के जीवन का चरमलक्ष्य एक और केवल एक है और होना भी चाहिए, वह है भगवान की प्राप्ति । इसे चाहे खुदा कहें या गॉड, परमात्मा या आत्मा की प्राप्ति, आत्मदर्शन या आत्मसाक्षात्कार ।
सांसारिक लक्ष्य—सांसारिक लक्ष्य आनन्द की प्राप्ति तो सभी के लिए समान है । कोई भी संसार में दु:खी नहीं रहना चाहता । सभी सुख की, आनन्द की प्राप्ति चाहते हैं । यह बात अलग है कि हर व्यक्ति की आनन्द की परिभाषा अलग है ।
सांसारिक लक्ष्य भी समयानुसार अलग–अलग हो सकते हैं । इनका वर्गीकरण इस प्रकार कर सकते हैं—
क– समयगत लक्ष्य
ख– तात्कालिक लक्ष्य
ग– आज का लक्ष्य
घ– अभी का लक्ष्य
इस प्रकार योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने से मन भी स्वस्थ रहेगा और लक्ष्य की प्राप्ति भी होगी । विशेष बात यह है कि हमें अपना लक्ष्य अपनी सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत परिस्थिति और अपनी क्षमता के अनुसार ही निर्धारित करना चाहिए ।
सबसे बड़ी आवश्यकता है कि यदि बच्चों का बचपन आनन्दित हो, सुखद हो, सुनियोजित हो तो विषम परिस्थितियोंमें भी वह शान्त रहेगा, सफल होगा, जीवनप्रबन्धन कर लेगा ।

चिन्ताएँ, महत्त्वाकांक्षाएँ एवं समय–प्रबन्धन

अभिभावकों की बच्चों के प्रति चिन्ताएँ एवं महत्त्वाकांक्षाएँ
अभिभावकों की अपने बच्चों के प्रति विभिन्न प्रकार की चिन्ताएँ व महत्त्वाकांक्षाएँ हो सकती हैं, जिसका प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष प्रभाव बच्चे पर पड़ता
है ।
आज के महँगाई के युग में बच्चों के पालन–पोषण व पढ़ाई में खर्च भी कठिन है । यदि धन की समस्या न भी हो तब भी सरकारी विद्यालयों की शिक्षा सस्ती, मनोवैज्ञानिक व अच्छी है, किताबें भी सस्ती व उत्तम कोटि की होती हैं । इसलिए विद्यालय–स्तर पर तो हम बच्चों को सरकारी विद्यालयों में पढ़ा ही सकते हैं । इसके बाद भी डिग्री स्तर पर व रोजगारपरक पाठ्यक्रम Professional Coursesजैसे—इंजीनियरिंग, मेडिकल आदि में भी सरकारी महाविद्यालयों में अपेक्षाकृत कम खर्च है, हालांकि अब डिग्री स्तर (बी.ए., बी.काम., बी.एस.सी. आदि) में भी सरकारी संस्थानों में एडमीशन के लिए उच्च मेरिट होना आवश्यक होता है । ऐसी स्थिति में भी कई विकल्प हो सकते हैं—बच्चे की रुचि, योग्यता व क्षमता के अनुसार उसे आई.टी.आई., टाइप–शार्टहैण्ड कोर्सेज या अन्य कोर्सेज करवाएँ ।
मैं अपनी बेटी के कक्षा दस पास करने के बाद लखनऊ स्थित राजकीय काउंसलिंग सेन्टर में उसको लेकर गई । (उस समय मैं लखनऊ में रहती थी) मुझे अति प्रसन्नता हुई कि मेरा एक रुपया भी खर्च नहीं हुआ । अतियोग्य दक्षता प्राप्त काउंसलर डॉ. डी.के. वर्मा जी ने लगातार तीन दिन मेरी बेटी की काउंसलिंग की । इसी के साथ संस्थान के पुस्तकालय में कॅरियर से सम्बन्धित अनेक पुस्तकों को देखने व समझने का अवसर प्राप्त हुआ । संस्थान की ही एक पुस्तक जो कक्षा बारह के बाद (After 10 + 2)  विभिन्न कॅरियर से संबंधित थी, हमें पढ़ने के लिए दी ।
बच्चों की सस्ती शिक्षा के अभी भी बहुत से अच्छे विकल्प हैं । आवश्यक नहीं है कि बच्चों को वही कोर्स करवाए जाएँ जो सब कर रहे हों ।
मुझे याद है कि जब मैंने कक्षा दस पास की, तब मेरे साथ ही एक लड़की पढ़ती थी, वह थर्ड डिवीजन पास हुई । उसके बाद उसने इण्टरमीडिएट करने के साथ–साथ टाइप–शार्टहैण्ड सीखना शुरू कर दिया । उसकी पूरी लगन व अभिभावकों के सहयोग का परिणाम हुआ कि इण्टरमीडिएट करने के बाद उसका चयन सचिवालय में क्लर्क के पद पर हो गया । हालांकि उस समय कम्पटीशन इतना कठिन नहीं था, फिर भी अपेक्षाकृत उस समय संसाधन व अवसर भी कम थे । अत: यदि बच्चे की क्षमताओं को पहचानकर उन्हें सही दिशा में प्रवृत्त किया जाए तो आज भी बच्चों के लिए बहुत से अवसर मिल जाते हैं ।
आज कम्पटीशन के इस युग में अभिभावक बच्चों की शिक्षा व भविष्य को लेकर बहुत चिन्तित रहते हैं । बच्चा भविष्य में क्या करेगा, इसकी चिन्ता माता–पिता को परेशान किए रहती है । यह चिन्ता एक ओर तो सहज स्वाभाविक है, दूसरी ओर भविष्य की अतिचिन्ता वर्तमान को भी प्रभावित करती है । अब प्रश्न है कि क्या अभिभावकों की बच्चों के भविष्य की चिन्ता करना ठीक नहीं है । उत्तर है – बच्चों के भविष्य की चिन्ता अभिभावक नहीं करेंगे तो कौन करेगा, चिन्ता हो लेकिन अतिचिन्ता न हो । बच्चों के प्रति यही अतिचिन्ता बच्चों का भविष्य बना नहीं रही अपितु भविष्य बिगाड़ रही है ।
बच्चों के भविष्य की अतिचिन्ता का परिणाम यह होता है कि बहुत छोटी आयु से ही हम बच्चों पर पढ़ाई का बोझ डालने लगते हैं, उन्हें अधिक से अधिक पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि बच्चे की सहज, स्वाभाविक समझने की क्षमता कम हो जाती है और बड़ा होने पर भी वह तथ्यों को केवल रट लेता है, समझ नहीं पाता है, जो बच्चे के भविष्य के लिए, उसके सीखने के लिए हानिकारक है ।
बच्चे के अधिगम (सीखने) का जब उसके द्वारा प्राप्त अंकों से आंकलन किया जाता है तब वह हानिकारक होता है । यद्यपि यह सत्य है कि यदि बच्चे की अपने विषय पर अच्छी पकड़ है, तब उसके अच्छे अंक आएँगे ही । इसी का दूसरा पक्ष यह भी है कि यदि बच्चे की विषय पर अच्छी पकड़ नहीं है तब भी उसके अच्छे अंक आ सकते हैं । कैसे ? ––––– बच्चे की विषय पर अच्छी समझ न होने पर भी या तो वह तथ्यांे को केवल रट लेता है या परीक्षा के अनुसार ही शार्टकट तैयार करता है । इस प्रकार उसके परीक्षा में अच्छे अंक तो आ सकते हैं किन्तु विषय की समझ ठीक प्रकार से नहीं होगी जो उसके भविष्य के लिए अहितकर है ।
इस प्रकार की अंकों की मानसिकता (Marks Mentality) बच्चों के लिए बहुत अहितकर है । उद्देश्य होना चाहिए कि बच्चों को पाठ की समझ, विषय की समझ ठीक प्रकार से हो सके । अभिभावकों की महत्त्वाकांक्षा भी इस परिप्रेक्ष्य में प्रभावी भूमिका अदा करती है । जब अभिभावक दूसरे अभिभावकों से मिलते हैं, तब प्राय: आपस में अपने बच्चों के बारे में चर्चा करते रहते हैं । कुछ लोगों के बच्चे तथाकथित अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं या कुछ अभिभावकों के बच्चे परीक्षा में अच्छे अंक लाते हैं । अब बच्चों में तो प्रतिस्पर्धा भले ही न हो किन्तु कुछ अभिभावकों में बच्चों को लेकर जबरदस्त प्रतिस्पर्द्धा की भावना रहती है । जब अभिभावकगण आपस में बातें करते हैं व जिन बच्चों के अच्छे अंक व ग्रेड नहीं आते हैं, वह अपना अपमान महसूस करते हैं व बच्चों पर अपनी झुंझलाहट उतारते हैं व बच्चों को अधिकाधिक अंक लाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं ।
स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा (Healthy Competition) की भावना जहाँ एक ओर अच्छी है, वहीं अस्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा (Unhealthy Competition) बच्चे के अधिगम (Learning) पर ही नहीं, उसकी मानसिकता पर भी कुप्रभाव डालती है ।
सभी अभिभावक चाहते हैं कि बच्चा हर क्रियाकलाप में आगे रहे, उच्चाधिकारी बने, उसकी समाज में प्रतिष्ठा हो । किसी–किसी अभिभावक की यही भावना जब बच्चों पर अतिदबाव डालती है, तब बच्चों के लिए हानिकारक होती है । बच्चे भयभीत रहने लगते हैं, परीक्षाएँ आते ही उनके मन में डर बैठ जाता है कि कहीं परिणाम आशानुरूप न हुआ तब क्या होगा । अत: बच्चों को सहज रूप से बढ़ने दें ।
बच्चों की चिन्ताएँ व महत्त्वाकांक्षाएँ
चिन्तन मस्तिष्क की खुराक होता है तो चिन्ता मस्तिष्क के लिए दाहकारक । बच्चा चिन्तक बने, चिन्तनशील बने, सुविचारक हो अच्छी बात है । जहाँ चिन्तन उसके मस्तिष्क की क्षमता को प्रज्ज्वलित करता है, वहीं चिन्ता की एक छोटी सी चिंगारी बच्चे के व्यक्तित्व को छिन्न–भिन्न करने के लिए काफी है ।
पढ़ाई के प्रति जागरूकता या महत्त्वाकांक्षा होना अच्छी है किन्तु अति नहीं होनी चाहिए । परीक्षाएँ ज्यों–ज्यों नजदीक आती जाती हैं, बच्चे को आभास होता है कि अब क्या होगा ? यदि उसकी आशा के अनुरूप परिणाम नहीं मिला, तब क्या होगा ? वह पहले ही इतना भयभीत हो जाता है कि जो तैयारी वह कर सकता है, वह भी नहीं हो पाती है । अत: परीक्षा को भी सामान्य रूप में लेना चाहिए । यदि शरीर, मन व मस्तिष्क स्वस्थ रहेगा तब जीवन में सुनियोजन के बहुत से अवसर मिलेंगे ।
समय–प्रबन्धन
अभिभावकों का समय प्रबन्धन—आज के दौर में जब कई माताएँ नौकरीपेशा हैं या एकाकी परिवार हैं, तब उनके पास बच्चों के लिए प्राय: समय की कमी रहती है । नौकरीपेशा माताएँ घर–बाहर की चक्की में पिसती रहती हैं, प्रश्न है वह बच्चों के लिए समय कहाँ से निकालें । घरेलू महिलाओं के पास भी घर–बाहर के काम रहते हैं, यद्यपि उनके पास समय अधिक है, फिर भी समय–प्रबन्धन ठीक से नहीं हो पाता है ।
आवश्यकता इस बात की है कि उपलब्ध समय का ही प्रबन्धन इस प्रकार किया जाए कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण समय (Quality time) मिल
सके । चाहे वह पिता हों, कार्यशील माता हों या घरेलू माता अथवा अन्य अभिभावक । यह आवश्यक नहीं है कि हम सारे दिन बच्चों को अपने से चिपकाए ही रहें, वरन् – जो भी समय उनके साथ बिताएँ, वह गुणवत्तापूर्ण हो, अर्थात् उस समय बच्चे पर पूरा ध्यान (Attention) दें । उस समय बच्चे को लगे कि वह अपनी हर–छोटी बड़ी बात अपने माता–पिता व अभिभावक से कह सकता है व उसे उसकी प्रतिक्रिया मिलेगी । उसे लगे कि उसके अभिभावक उसकी बातों में रुचि लेते हैं व उसकी हर समस्या के समाधान के लिए जागरूक रहते हैं ।
जैसे—शाम के समय कुछ ऐसा समय हो, जो सिर्फ बच्चे के लिए हो, उस समय अन्य कोई कार्य न करें । जिस तरह सब कार्य आवश्यक हैं, उसी प्रकार बच्चे को समय देना भी अन्य कार्यों से अधिक आवश्यक है । अवकाश के दिनों को यथासम्भव बच्चों के साथ ही बितायें । उनकी घर–बाहर की समस्याओं को समझें । पढ़ाई में आने वाली कठिनाइयों को समझें । इस हेतु कई कारक हैं जो अभिभावकों के घर में रहते हुए भी बच्चों के लिए हानिकारक हो सकते हैं, जैसे—
दिन भर टेलीविजन चलते रहना—कई घरों में दिन–भर टी–वी– चलता रहता है । चाहे कोई आवश्यक कार्यक्रम आ रहा हो या नहीं । बराबर टी.वी. चलते रहने का बच्चों पर तो बुरा प्रभाव पड़ता ही है, अभिभावकों की आँखों व स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है । एक ओर तो बच्चे भी दिन भर टी–वी– देखने के अभ्यस्त हो जाते हैं, दूसरी ओर अलग कमरे में पढ़ते समय भी उनके ध्यान की एकाग्रता नहीं हो पाती है । घर के पूरे माहौल का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव बच्चे पर अवश्य ही पड़ता है । घर का वातावरण अच्छा होना चाहिए, अगर घर के बड़े लोग अखबार, पत्रिकाएँ व अन्य पुस्तकें पढ़ते हैं, तब बच्चा भी तदनुरूप ही अध्ययन के लिए प्रेरित होता है ।
राष्ट्रीय समाचार सुनने के लिए टी–वी– अच्छा है । राष्ट्रीय समाचारों से पूरे दिन की सही खबर टी.वी. (दृश्य–श्रव्य साधन) द्वारा हमें अल्प समय में मिल जाती है । अच्छा तो है कि पूरा परिवार एक साथ बैठकर राष्ट्रीय समाचार सुने । इससे एक ओर तो बच्चों की जानकारी बढ़ेगी, दूसरी ओर कुछ स्पष्ट न होने पर बच्चे पूछ सकते हैं या बड़े लोग स्वयं ही बता सकते हैं । राजनीति, खेल या अन्य किसी मुद्दे पर आपस में चर्चा भी हो सकती है ।
मेहमानों की खातिर—हमारे देश की परम्परा रही है कि अतिथियों का स्वागत किया जाए । अच्छी बात है किन्तु इसका प्रभाव बच्चों पर नहीं पड़ना चाहिए । चाहे कितना भी छोटा घर क्यों न हो, एक अलग स्थान ऐसा अवश्य ही होना चाहिए, जहाँ पर बच्चा बैठकर पढ़ सके । वहाँ उसे कोई डिस्टर्ब न करे ।
मेहमान दो तरीके के हो सकते हैं—एक जो घर पर आकर कुछ दिन रहते हैं, दूसरे कुछ देर के लिए आते हैं । बच्चों में सामाजिकता की भावना भी आवश्यक
है । अत: बच्चे किसी के आने पर उनका अभिवादन अवश्य करें, यदि उनके पास समय हो तो थोड़ा–बहुत वार्तालाप भी करें, लेकिन पूरा समय उनकी खातिर में या बातों में ही न लगे रहें । यदि बच्चा बैठा हुआ पढ़ रहा है, तब अत्यावश्यक कार्य होने पर ही उसे उठायें, अन्यथा उसे पढ़ने दें ।
बच्चों को घरेलू कामों में में लगाये रखना—बच्चों को घरेलू काम अवश्य ही सिखाने चाहिए, किन्तु वह सीखना उनके लिए आनन्दप्रद होना चाहिए । बच्चों को प्रेरित करना चाहिए कि जब समय हो तब वह घर का कार्य सीखें । जैसे – छुट्टी वाले दिन आधा घंटा घर का कोई कार्य – जैसे झाड़ू लगाना, कपड़े धोना, सब्जी काटना, भोजन बनाना आदि सीखें । यह अच्छी बात है किन्तु रोज बच्चे घर के काम में लगे रहें तो उनकी पढ़ाई बाधित होती है ।
यदि माँ की तबियत खराब हो जाए या अन्य कोई आवश्यक कार्य पड़ जाए, तब बच्चों को घर के कार्य में अवश्य मदद करनी चाहिए । तात्पर्य है कि बच्चे को घर का काम सिखाने की भावना बड़ों में होनी चाहिए, उन पर बोझ डालने की
नहीं । बच्चों से नियमित रूप से घर के कार्य तब तक नहीं करवाना चाहिए, जब तक अपरिहार्य स्थिति न हो । दूसरी ओर बच्चों में भी यह भावना होनी चाहिए कि वह आवश्यकता पड़ने पर अवश्य मदद करें ।
पढ़ते समय बीच–बीच में बच्चों से बोलते जाना—कुछ अभिभावकों की आदत होती है कि जब बच्चा पढ़ रहा हो, उस समय भी जो बात याद आएगी, बच्चों से बोलते जाएँगे या किसी छोटे से काम के लिए जो वह खुद भी कर सकते हैं, बच्चों को उठाएँगे । जैसे – पंखा चला दो, दरवाजा बन्द कर आओ, एक गिलास पानी दे दो आदि–आदि ।
यद्यपि इस तरह के कार्यों में बच्चे का अधिक समय नहीं लगता है, किन्तु पढ़ने की गति बाधित होती है । साथ ही एकाग्रता में बाधा होती है तथा बच्चा पूरे मन व लगन से पढ़ नहीं पाता है ।
इस प्रकार सुनियोजित समय प्रबन्धन से कम समय में ही बच्चों को एक ओर तो गुणवत्तापूर्ण समय दे सकेंगे, दूसरी ओर छोटी–छोटी बातों को ध्यान में रखकर बच्चों का बहुत सा समय बरबाद होने से बचा सकते हैं, व उनके व अपने समय का उचित उपयोग कर सकते हैं ।
विद्यार्थियों का समय प्रबन्धन
पढ़ने का समय निश्चित हो – पढ़ने का कुछ ऐसा समय निश्चित करें, जब पढ़ना ही पढ़ना है, चाहे विद्यालय खुला हो अथवा न खुला हो, कहीं आना–जाना हो, घर में त्योहार हो या शादी हो ।
सबसे अच्छा समय हो सकता है प्रात: का, प्रात:काल 4 बजे से विद्यालय जाने के समय तक (दैनिक कृत्य का समय छोड़कर) । मान लो विद्यालय नौ बजे पहुँचना है, घर से साढ़े आठ बजे निकलना है । अत: प्रात: चार बजे से साढ़े आठ बजे तक पढ़ सकते हैं, बीच में अपनी सुविधानुसार दैनिक कृत्य व नाश्ता कर सकते हैं । इस प्रकार लगभग चार घण्टे की पढ़ाई निर्विघ्न हो जाएगी ।
विद्यालय में अवकाश का दिन हो, कहीं आना–जाना हो या घर में भी कोई आने वाला हो, सुबह के समय निर्विघ्न पढ़ाई हो सकती है । चाहे त्योहार हो या घर में या घर के आसपास शादी–ब्याह भी हो तो सुबह शान्ति रहती है । अत: इस निश्चित समय की पढ़ाई का लाभ हम उठा सकते हैं । कहीं जाना हो या घर में कोई आनेवाला हो तो भी दिन में या शाम को ही आना–जाना होता है, सुबह–सुबह नहीं ।
सुबह का यह समय तो प्रतिदिन के लिए निश्चित है ही, शाम का या दिन का समय भी अपनी सुविधानुसार निश्चित कर सकते हैं । इसके अतिरिक्त अवकाश के दिनों में अतिरिक्त समय मिलने पर जो भी पढ़ लें, वह तो अच्छा है ही किन्तु जो समय प्रतिदिन के लिए निर्धारित है उसमें तो पढ़ना ही है । सुबह जल्दी उठने के लिए आवश्यक है कि रात को जल्दी सो जाएँ ।
आज का कार्य आज ही करें—आज के लिए निर्धारित कार्य आज ही करें, चाहे वह पढ़ाई का कार्य हो या अन्य कार्य । विद्यालय में पढ़ाया हुआ पाठ यदि रोज का रोज दोहरा लिया जाए तो कठिनाई के बिन्दु इंगित हो जाएँगे । उन कठिनाई के बिन्दुओं का निराकरण भी यथासमय हो जाएगा । इस प्रकार आगे के पाठ समझने में कठिनाई नहीं होगी । इसके अतिरिक्त रोज का पाठ रोज पढ़ने से पढ़ाया हुआ पाठ जल्दी समझ में आ जाएगा ।
मस्तिष्क को थकान की स्थिति में न पहुँचने दें—यदि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हों, तब भी जितना पाठ पढ़ने के लिए निर्धारित किया है, उतना उस ही दिन पूरा कर लें किन्तु मस्तिष्क को थकान की स्थिति में न पहुँचने दें । पहली बात तो जितनी अपनी क्षमता हो, उसी के अनुसार ही प्रतिदिन तैयार किए जाने वाले पाठ को निर्धारित करें, अधिक नहीं । जिस प्रकार वही भोजन शरीर का निर्माण करता है जो पच जाता है, उसी प्रकार वही पाठ अधिग्रहीत होता है या सीखा जाता है जो पूर्ण मनोयोग से, थकानरहित मस्तिष्क से पढ़ा जाता है ।
दूसरी बात अपरिहार्य स्थिति को छोड़कर यथासम्भव रोज के लिए निर्धारित पाठ रोज पूरा करें ।
सप्ताह में एक दिन छूटे हुए कार्यों का अतिरिक्त अध्ययन करें—विद्यार्थी चाहे विद्यालय स्तर का हो या प्रतियोगी परीक्षा का, उसे प्रतिदिन के लिए प्रदत्त कार्य या स्वयं निर्धारित किया हुआ पाठ पूरा करना चाहिए । रविवार या अन्य अवकाश के दिन के लिए कोई कार्य नहीं छोड़ना चाहिए । रविवार का या अवकाश का दिन खाली रखना चाहिए । यदि कोई पाठ समझने में कठिनाई होती है या किसी कारण वह पाठ छूट जाता है या कुछ अतिरिक्त अध्ययन करना है, वह उस दिन करें ।
इस प्रकार विद्यार्थी को शिथिल (Relax) होने का भी समय मिल जाएगा और प्रसन्नतापूर्वक उसके द्वारा सभी काम भी पूरे हो जाएँगे ।
पढ़ने व विश्राम में संतुलन हो—पढ़ने का समयबद्ध कार्यक्रम हो, दिन भर किताब लिए हुए बैठे रहना या रात भर जागकर पढ़ना, दोनों ही गलत हैं । पढ़ने और विश्राम दोनों में ही संतुलन आवश्यक है । लगातार पढ़ते रहने से सीखने की गति बाधित होती है । पढ़ाई के साथ बीच–बीच में मस्तिष्क को आराम देना भी आवश्यक है ।
दूसरी ओर आवश्यकता से अधिक आराम करने से भी पढ़ाई कम होगी । इसलिए संतुलित तरीके से पढ़ना आवश्यक है, जिससे पढ़ाई में एक प्रवाह बना रहे और सीखा हुआ या पढ़ा हुआ पाठ अन्तर में उतर जावे और सीखने का वास्तविक उद्देश्य सफल हो सके ।

Friday, August 17, 2018

अनाथ बच्चे समाज का दायित्व


अनाथ बच्चे समाज का दायित्व
    अनाथ बच्चे पूरी तरह से समाज सरकार का दायित्व हैं हम जहाँ अपने बच्चों के लिए तन, मन, धन से समार्पित रहते हैं, वहाँ भगवान की इन पवित्रतम कृतियों के लिए भी हमारा कुछ दायित्व है इन बालगोपालों की सेवा एक यज्ञ है, धर्म है, पूजा है
    बालगृहों के संचालन के लिए भूमि, धन आदि की व्यवस्था के लिए समाज सरकार का मिलाजुला सहयोग हो सरकारी सहयोग में भी सीधे मुख्य सचिव स्तर का दखल हो, जिससे समाजसेवी संस्थाएँ भी सही तरीके से एवं प्रभावी तरीके से कार्य कर सकें धन प्राप्ति के लिए मीडिया द्वारा नि:शुल्क जनचेतना जागृत की जाए एवं इसे सबसे बड़ा धार्मिक कृत्य बताया जाए
बालगृहों का राष्ट्रीय संगठन
    बालगृहों के संचालन के लिए केन्द्रीय स्तर पर एक संगठन हो, जिसके क्षेत्रीय कार्यालय पूरे देश में हों इन क्षेत्रीय कार्यालयों के द्वारा ही बालगृह संचालित हों नियमावली पूरे देश में एक समान हो, अर्थात् केन्द्रीय संगठन की नियमावली ही पूरे देश में लागू हो क्षेत्रीय कार्यालय भी उसी नियमावली के अनुसार बालगृहों को संचालित करें
    जहाँ तक संभव हो बालगृह में कार्य करने वाले कार्यकर्ता बालगृह में ही पूरे समय रहें उनके आवास, भोजन आदि की व्यवस्था बच्चों के साथ ही हो रहने के लिए उनका एक पृथक कमरा हो सकता है किन्तु भोजन आदि की व्यवस्था बच्चों के साथ ही हो जिससे बच्चों को घरेलू वातावरण मिल सके
    जिले के वरिष्ठ अधिकारी जिलाधीश, आई. जी. पुलिस, समाज सेवी संस्थाओं के प्रमुख, समाज के वरिष्ठ नागरिक आदि प्रबंध समिति के सक्रिय सदस्य अवश्य हों, जिससे बालगृह के संचालन में आने वाली कठिनाइयों को तत्काल हल किया जा सके
    समाज के सेवानिवृत्त लोगों को इसमें शामिल किया जाये तथा ऐसी घरेलू महिलाओं को भी यहाँ आने के लिए प्रोत्साहित किया जाए जिनके पास काफी खाली समय रहता है और वह अपने खाली समय का उपयोग समाज सेवा हेतु करना चाहती हैं
    बालगृह में बच्चों के सहयोग से सुन्दर बगीचे का निर्माण किया जाए बच्चों में सफाई की आदत डाली जाय, जिससे बालगृह सुव्यवस्थित एवं साफ
रहे रंगोली, चित्रों फुलवारी से सजा बालगृह एवं विभिन्न क्रियाकलापों में संलग्न बच्चे समाज के आकर्षण का केन्द्र बनें ऐसा होने पर समाज में वरिष्ठ नागरिक, अधिकारीगण समाजसेवी लोग स्वयं वहाँ पर बच्चों के साथ मनोरंजन हेतु आयेंगे इससे बालगृह में आने वाली बहुत सी समस्याओं का हल स्वयं ही हो जायेगा क्योंकि सरकार समाज के पूर्ण सहयोग से ही इनका कुशल संचालन संभव है किन्तु ऐसा हो कि बालगृहों के संचालक आदि, आगन्तुकों की आवभगत में लगे रहें और बालगृह उपेक्षित रहें
    प्रारंभ से ही अधिकारियों में यह भावना भरी जाए कि आगन्तुक चाहे मुख्य सचिव ही क्यों हो, वहाँ की कमियाँ निकालने नहीं वरन् उस बड़े परिवार का सदस्य बनकर आया है, उसे हर संभव सहयोग करना है कमियाँ देखी जाएँ तो हर जगह होती हैं किन्तु आवश्यकता है सहयोग द्वारा उन्हें दूर करने की यह भावना हो कि बालगृह सबसे बड़ा मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा है यहाँ भगवान की बालमूर्तियाँ (अनाथ बच्चे) रहती हैं
    बालगृहों के संचालक कार्यकर्ताओं पर नियमों को थोपा जाए उन्हें कार्य करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए
    यूँ तो किसी भी संस्था को चलाने के लिए नियमावली की आवश्यकता होती है इसलिए केन्द्रीय स्तर से ही सभी बालगृहों के लिए समान नियमावली हो किन्तु उन नियमों को थोपा जाए नियम मनुष्य के लिए होते हैं, मनुष्य नियम के लिए नहीं होते हैं समय और परिस्थिति के अनुसार नियमों को लचीला बनाया जाए बालगृहों में दानस्वरूप धन के अतिरिक्त जो भी वस्तुएँ मिलती हैं, उनकी रसीद तो दानदाताओं को दी ही जाए, उनका रिकार्ड भी एकाउन्ट के साथ रखा जाए, जिससे आयव्यय का सही ब्योरा मिल सके इसके अतिरिक्त जिन बालगृहों में पर्याप्त भूमि हो वहाँ पर गोपालन किया जा सकता है, फलदार वृक्ष, सब्जियाँ आदि लगायी जा सकती हैं इसमें बालगृह के बच्चों समाज के लोगों का सहयोग प्राप्त किया जा सकता है
    इस प्रकार एक ओर तो बालगृह की आय का कुछ साधन हो जाएगा, बच्चे श्रम का महत्त्व समझेंगे, समाज के लोगों में सेवा की भावना आयेगी दूसरी ओर बच्चों को जीवनयापन के लिए एक क्षेत्र भी मिलेगा वह बड़े होने पर अपने घर में गाय आदि पाल सकते हैं
    केन्द्रीय स्तर पर बालगृहों का गठन, आवास, धन, संचालन व्यवस्था आदि के बाद चर्चा का विषय है बच्चों की औपचारिक अनौपचारिक पूर्व प्राथमिक शिक्षा अनौपचारिक पूर्व प्राथमिक शिक्षा बहुत विस्तृत विषय है और औपचारिक शिक्षा से कहीं अधिक व्यापक, व्यावहारिक एवं सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक भी
बालगृह के बच्चों की पूर्व प्राथमिक शिक्षा
    तीन से : वर्ष तक के बच्चों की  पूर्व प्राथमिक शिक्षा बाल विकास के लिए अति महत्त्वपूर्ण है बच्चे का अधिकतम मानसिक विकास : वर्ष की आयु तक हो जाता है ऐसा मनोवैज्ञानिकों का मानना है प्राय: हम इसी आयु को उपेक्षित कर देते हैं
    : वर्ष तक के बच्चों की पूर्व प्राथमिक शिक्षा का मूल उद्देश्य है, स्कूल छोड़कर जाने वाले बच्चों की संख्या में कमी करना तथा बच्चों की क्षमता की अधिकतम सीमा तक विकास करना बच्चों मेंमें कुछ कुछ अन्तर्निहित क्षमताएँ होती हैं। यही वह आयु होती है जब उनकी अन्तर्निहित क्षमताओं को उभरने का अवसर मिल सकता है आवश्यकता होती है उचित वातावरण की
    जहाँ बालगृह के बच्चों के जीवन में मातापिता परिवार का अभाव होता है वहीं बालगृह के रूप में उन्हें एक बड़ा परिवार मिल जाता है कई भाईबहन भी मिल जाते हैं अत: इनकी अनौपचारिक शिक्षा तो उस बड़े परिवार में ही हो जाती है इन्हें एक छोटा समाज तो वहीं मिल जाता है
    पूर्व प्राथमिक शिक्षा के एक उद्देश्य,समाज से समायोजन की पूर्ति तो स्वत: ही हो सकती है आवश्यकता है सहर्ष, सुन्दर, प्रेमपूर्ण वातावरण की सभी  की एक दूसरे के प्रति सहानुभूति हो, परस्पर प्रेम की भावना हो पूर्व प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य अक्षरज्ञान, पढ़नालिखना कदापि नहीं है क्योंकि इनके लिए तो प्राथमिक विद्यालय हैं ही हाँ! यदि सहज वातावरण के बीच खेलखेल में आनन्द का अनुभव करते हुए बच्चा कुछ सीख जाए तो ठीक ही है
    पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए किसी विशेष व्यवस्था की आवश्यकता नहीं
है यदि बालगृह का वातावरण स्वस्थ हो, सहानुभूति, प्रेम दया तथा त्याग के गुणों का संचार हो तो बालगृह के बड़े परिवार रूपी छोटे समाज में बच्चों को सब कुछ मिल सकता है बच्चों को सहज वातावरण में पनपने का अवसर दिया
 जाए प्रयत्नसाध्य व्यवहार शिशु के लिए अच्छा नहीं होता है कोई शिशु खेल में अधिक रुचि रखता है तो कोई पढ़ाई में, किसी की जानवरों में अधिक रुचि होती है तो किसी ड्रॉइंग में कोई भूगोल के तथ्य के बारे में जानना चाहता है तो किसी की ऐतिहासिक कहानियों में बहुत रुचि होती है पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए हमारा कार्य केवल इतना ही है कि हम शिशु को उचित वातावरण दें और उसकी जिज्ञासा को शान्त करते जाएँ उसके द्वारा कुछ पूछने पर झिड़कियों से उसे हतोत्साहित करें
    बालगृह में पेड़ पौधे कुछ दुधारु पशु तो होंगे ही, शिशु के खेलने के लिए परिसर भी पर्याप्त होगा शिशु को अपनी कल्पना के अनुसार चित्र बनाने के लिए अधिक नहीं तो भी एक स्लेट रंगीन खड़िया तो दी ही जा सकती है बालगृह के ही बच्चों द्वारा स्थानीय उपलब्ध बेकार पड़ी वस्तुओं (कागज, कपड़ों की कतरन, खाली डिब्बों, फूल, पत्तियाँ आदि) सस्ती वस्तुओं से शिशुओं के लिए कुछ खिलौने, अक्षरों के ब्लॉक्स, फ्लैश कार्ड्स आदि बनवाये जा सकते हैं इससे एक ओर शिशुओं के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध हो जाएगी, दूसरी ओर बड़े बच्चे हस्तकला में प्रवीण हो जायेंगे जो जीवनपर्यन्त उनके लिए उपयोगी होगा
    अक्षरों के ब्लॉक्स से खेलतेखेलते बच्चे अक्षरों को पहचानना कब सीख गये पता भी नहीं चलेगा खड़िया से अपनी इच्छानुसार आड़ीतिरछी रेखाएँ खींचतेखींचते वह चित्र भी बनाने लगेंगे ब्लॉक्स में देखे गये अक्षरों को भी स्वत: ही बनाएँगे इससे उनके हाथ की माँसपेशियों का विकास होगा जो बच्चा जिस गति से जो भी सीखता है उसे सीखने दें, उसमें बाधक बनें, ही सहयोगी
    बड़े लोगों का कार्य केवल उन्हें सामग्री उपलब्ध करवाना उनके द्वारा पूछने पर उनकी जिज्ञासा शान्त करना मात्र है बच्चा जितना पूछता है, उसे उतना ही बताया जाए, अधिक नहीं अधिक बताना शिशु के कोमल मस्तिष्क से प्रसन्नता समाप्त कर असमय ही उसको सोचने पर मजबूर कर देता है उन बातों को अपने मस्तिष्क में भरने का भय उसके अन्दर समा जाता है उसकी अपनी सहजता समाप्त हो जाती है शिशु जिनके मातापिता को प्रकृति ने उनकी शैशवावस्था से ही छीन लिया,उनको तथाकथित नर्सरी विद्यालयों में भेजकर उनकी सहजता, स्वाभाविकता को और भी समाप्त कर देना उचित नहीं है
    अत: उन्हें स्वतंत्र रूप से विकसित होने दिया जाय तभी वह बड़े होकर समाज के अच्छे नागरिक बनेंगे जन्म से : वर्ष तक अनौपचारिक शिक्षा का विशेष महत्त्व मनोवैज्ञानिकों ने प्रतिपादित किया है कुछ मनोवैज्ञानिक तो यहाँ तक कहते है कि : वर्ष की आयु तक बच्चे के मस्तिष्क का अधिकांश (75 प्रतिशत) विकास हो चुकता है बाद में तो उसका मस्तिष्क केवल सूचनाएँ ग्रहण करता है
बालगृह के बच्चों की औपचारिक शिक्षा
    बच्चों की प्राथमिक शिक्षा भी मात्र विद्यालय भेज देने से पूरी नहीं हो जाती है इसके लिए उन्हें बालगृह में भी समुचित वातावरण देना होगा प्राथमिक स्तर पर तो बच्चों का उचित मार्गदर्शन बहुत ही आवश्यक है आजकल विद्यालय में बच्चों की संख्या इतनी अधिक होती है कि हर बच्चे को व्यक्तिगत समय देना संभव नहीं है वैसे भी हर बच्चे की हर विषय में समान रुचि नहीं होती है वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक सभी बच्चों को सभी विषय समान गति से पढ़ाने के लिए बाध्य हैं।
    बच्चों की विषय विशेष में रुचि होने पर उस विषय में कोई कठिनाई आने पर उसका हल हो जाने से आगे के लिए समस्या का समाधान हो जाता है और बच्चे की उस विषय में अच्छी पकड़ हो जाती है
    इसी प्रकार कक्षा आठ के पश्चात् विषय चुनाव के लिए व्यापक मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ सकती है व्यावसायिक शिक्षा के लिए भी व्यापक मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ सकती है इन समस्याओं का समाधान बालगृह में कैसे हो ? यह स्वयं में एक जटिल समस्या लगती है किन्तु पूर्व में वर्णित समाज के सेवानिवृत्त लोगों कुछ महिलाओं का सहयोग लिया जाए तो यह समस्या तो रहेगी ही नहीं इससे उन लोगों का समय भी अच्छा व्यतीत होगा और बच्चों को भी अच्छी शिक्षा मिल जाएगी
    इसके लिए जनचेतना की आवश्यकता है, सेवानिवृत्त लोगों के लिए एकदो घंटे समय निकालना कठिन नहीं है प्रत्येक विषय के लिए अलगअलग विशेषज्ञ भी मिल सकते हैं बच्चों की औपचारिक शिक्षा के साथसाथ भी अनौपचारिक शिक्षा का अपना महत्त्व  है, आवश्यक भी है हस्तकला, भोजन बनाना, गोपालन, बागवानी, सिलाई, कढ़ाई आदि की सहज शिक्षा भी साथसाथ चलती रहनी चाहिये बच्चों से थोड़ा बहुत यह सब कार्य करवाते रहने से उन्हें सामान्य जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ेगा
शिक्षा एवं आवासीय विद्यालय
    औपचारिक शिक्षा कक्षा एक से प्रारंभ हो जाती है विद्यालय शिक्षा, विश्वविद्यालय शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा तथा हस्तशिल्प आदि सब कुछ इसमें आता है बालगृहों में रहने वाले बच्चों की औपचारिक शिक्षा के लिए किसी पृथक व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है समाज में अनेकानेक विश्वविद्यालय, विद्यालय, व्यावसायिक विद्यालय आदि हैं सरकारी आदेश हो कि बालगृह के बच्चों का प्रवेश उनकी योग्यतानुसार शत प्रतिशत किया जाए फार्म से लेकर प्रवेश तक पूरी प्रक्रिया पूर्णतया नि:शुल्क हो, उनसे किसी भी सरकारी या गैरसरकारी विद्यालय में किसी भी प्रकार का कोई शुल्क, फार्म का पैसा आदि लिया जाए
    यह तभी संभव है जब ऐसा करने का सरकारी आदेश हो पूरे शहर में बालगृहों के बच्चों की संख्या पूरी जनसंख्या का 01 प्रतिशित भी नहीं होगा अत: किसी भी शिक्षण संस्था की (भले ही प्राइवेट हो), कोई आर्थिक हानि भी नहीं होगी नि:शुल्क प्रवेश की ही भाँति प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तर तक पढ़ाई के लिए किसी प्रकार का कोई शुल्क लिया जाए यदि शिक्षण संस्थाएँ इनकी कॉपी, किताब, ड्रेस आदि भी अपने किसी फंड से दे सकें तो और भी अच्छा है यदि ऐसा हो सके तो भी कम से कम कोई फीस आदि तो हो इन बच्चों का उनकी योग्यतानुसार प्रवेश हो जाने से इनकी पढ़ाई का एक क्रम तो बन ही जाएगा फीस होने से बालगृहों पर आर्थिक बोझ भी कम पड़ेगा
    आवासीय विद्यालयों की संख्या भी हमारे देश में धीरेधीरे बढ़ती जा रही है इन आवासीय विद्यालयों में इन बच्चों को स्थान दिया जाए तो बहुत अच्छा है वहाँ पर भी इनके रहने, खाने की व्यवस्था पूर्णतया नि:शुल्क हो
    कुछ आवासीय विद्यालय चार वर्ष के बच्चों के लिए भी होते हैं। जैसे लखनऊ में बाल विद्या मन्दिर ऐसे विद्यालयों में इन बच्चों के लिए स्थान आरक्षित हो चार वर्ष के बच्चे के लिए किसी प्रकार के योग्यता परीक्षण की आवश्यकता नहीं है अत: इस प्रकार के आवासीय विद्यालयों में अनाथ बच्चों के लिए कुछ स्थान आरक्षित करने का शासनादेश दिया जा सकता है इनका समस्त खर्च विद्यालय ही वहन करे इस प्रकार कुछ बच्चों के खर्च की समस्या भी दूर हो जायेगी यदि पूरे देश में आवासीय विद्यालयों, विश्वविद्यालयों आदि में बालगृह के बच्चों को नि:शुल्क स्थान दिया जाए तो सभी बच्चों के आवास, भोजन, वस्त्र आदि की व्यवस्था भी हल हो जायेगी और आवासीय विद्यालयों पर भी अधिक बोझ नहीं पड़ेगा
बालगृह के युवा हो चुके बच्चों की व्यवस्था
    अठारह वर्ष के बाद बच्चे वयस्क हो जाते हैं और वह स्वयं अपना जीवनयापन कर सकते हैं
    प्रश्न यह है कि उनके जीवनयापन के लिए हमने क्या सुविधा मुहैया करवाई है उनके लिए सरकारी, अर्द्धसरकारी, प्राइवेट या किसी संस्था की नौकरियों में किसी प्रकार का कोई आरक्षण नहीं है किसी भी प्रकार की नौकरी हो, उसके फार्म आदि भरने की प्रक्रिया से लेकर परीक्षा देने तक में अच्छा खासा खर्च आता है, जो एक बेरोजगार निराश्रित व्यक्ति के लिए संभव नहीं है
    बालगृह से निकलने के बाद आवास की भी बड़ी समस्या रहती है आवास भी कहीं मुफ्त में नहीं मिल जाता है विशेष रूप से यदि लड़की है तो–––– ?
    अत: अठारह वर्ष की आयु के बाद दायित्व समाप्त नहीं हो जाता, बालगृह, समाज या सरकार का यह ठीक है कि बच्चे वयस्क होने के बाद बालगृह पर आर्थिक रूप से किसी प्रकार निर्भर रहें किन्तु संरक्षण की दृष्टि से उन्हें बालगृह का पूरा सहयोग मिलना चाहिए––––वह उनका अपना घर हो, अपना मूल निवास स्थान जहाँ पर वह रह सकें, कभी भी बेरोकटोक जा सकें अपनी समस्याओं का समाधान कर सकें तथा अपना वांछित सहयोग भी प्रदान कर सकें
    यहाँ पर मूल समस्या है कि अठारह वर्ष की आयु के बाद उन्हेंकौन काम देगा? यह दायित्व मुख्य रूप से सरकार का है अब इस सम्बन्ध में हमारे मस्तिष्क में कई प्रश्न उभर सकते हैं––––क्या इनके लिए कोई आरक्षण की व्यवस्था हो या इनकी आर्थिक सहायता सरकार करे या इन्हें स्वरोजगार के अवसर दिये जाएँ
    जहाँ समाज में विभिन्न वर्गों का आरक्षण है वहीं यह बच्चे पूर्णतया उपेक्षित हैं इनके पास तो फार्म तक भरने के लिए धन नहीं होता है अत: सबसे पहली आवश्यकता यह है कि अठारह वर्ष का होते ही इन्हें इनकी योग्यतानुसार कोई काम दे दिया जाए
    अब प्रश्न है कि यह काम कैसे दिया जाए ? नौकरी हेतु आवेदन करने के लिए उनके पास धन नहीं है यदि स्वरोजगार के लिए कुछ धन देने की व्यवस्था सरकार द्वारा कर दी जाए तो पहली बात तो सरकारी पैसा निकलवाने में हजार समस्यायें और दौड़धूप है, फिर यदि पैसा उसे मिल भी जाए तो उस धन का उपयोग करके वह अपना काम  कहाँ खोलेगा ? यदि इनका नौकरियों में कुछ प्रतिशत आरक्षण कर दिया जाए तो फिर वही प्रश्न आएगा कि फार्म आदि भरने, किताबें खरीदने, परीक्षा देने जाने के लिए यह लोग धन कहाँ से लायेंगे ?
    समाज की जनसंख्या का 01 प्रतिशत भी यह अनाथ बच्चे नहीं होंगे अत: सभी बालगृहों में सत्रह वर्ष की आयु पूरी कर चुके बच्चों की सूची बनाकर सीधे राज्य सरकार केन्द्र सरकार को भेज दी जाए इसमें सचिव स्तर का दखल पूरी तरह से होना चाहिए, बल्कि मुख्य सचिव के निर्देशानुसार ही कार्य हो तो अधिक अच्छा है
    अब सरकार इन बच्चों को स्वयं ही साक्षात्कार के लिए पूरा खर्च देकर बुलाए एक साथ इनका साक्षात्कार करके इनकी योग्यतानुसार सूची बना ली जाए अठारह वर्ष की आयु का होते ही इन्हें विभिन्न विभागों में इनकी योग्यतानुसार नौकरी दे दी जाए बालगृहों के बच्चों को नौकरी के लिए बारबार चक्कर काटने पड़ें इसलिए आवश्यक यह है कि सरकार द्वारा निर्देशित विभागों द्वारा इनके नियुक्ति पत्र बालगृहों उसकी सूची मुख्य सचिव के पास भेजी जाए हाँ! नौकरी इन्हें इनकी योग्यतानुसार ही दी जाए, भले ही वह चतुर्थ श्रेणी की हो कम से कम इनके पास अपनी आय का एक सुनिश्चित साधन  तो होगा बाद में यह अपने आवास, भोजन आदि की व्यवस्था के साथ ही अपने विभाग से अनुमति ले कर प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में अपनी आगे की शिक्षा भी जारी रख सकते हैं किसी अन्य नौकरी के लिए आवेदन करके या प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठकर अपने योग्य स्थान पा सकते हैं
    अब इनके लिए किसी प्रकार के आरक्षण या सहायता की आवश्यकता नहीं है क्योंकि एक बार सरकारी मदद से इन्हें अपने पैरों पर खड़े होने का मार्ग तो मिल ही गया उसके बाद जीवन भर आरक्षित करते रहना परजीवी बनाना सिद्ध होगा हाँ! चूँकि इनके जन्म के बाद से ही इन्हें अपना पूर्ण विकास करने के सामान्य अवसर नहीं मिले होते हैं अत: इनकी आयु सीमा में दस वर्षों की छूट हो तो यह समय पाकर अपनी योग्यतानुसार काम पा सकते हैं आईएस, पीसीएस भी बन सकते हैं
    इन युवाओं को नौकरी मिल जाने के बाद भी इनके आवास की समस्या बनी रहेगी लड़के तो फिर भी कहीं पर भी कमरा लेकर रह सकते हैं किन्तु अठारह वर्ष की युवा महिला अकेली कहाँ रहेगी ? यह एक प्रश्न है, इसी दृष्टिकोण को सामने रखकर विभिन्न शहरों में श्रमजीवी महिला आवास गृह बने हैं जहाँ पर कार्यशील महिलाएँ रहती हैं
    केवल बालगृह से निकली हुई ही नहीं वरन् सभी वर्गों की महिलाओं के लिए इस प्रकार के आवास गृहों की संख्या बढ़नी भी चाहिए छोटे से छोटे शहरों में कार्यशील महिलाओं के लिए आवास हों क्योंकि कार्यशील महिलाओं की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है वैसे भी सुविधायुक्त महिला आवास गृह बनाये जाएँ तो इन्हें खोलने वाली समाजसेवी संस्थाओं, सरकार या अन्य किसी पर कोई आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ेगा, क्योंकि इन आवासगृहों में रहने वाली हर महिला की निश्चित मासिक आय है वह बिना किसी असुविधा के प्रसन्नतापूर्वक वहाँ रहने का शुल्क दे सकती है महिला बाहर किराये पर मकान लेकर रहने की अपेक्षा सुरक्षित महिलाआवास में रहना अधिक पसन्द करेगी उसे वहाँ पर एक छोटा समाज भी मिल जायेगा जो एकाकीपन की अवस्था में उसके सुखदुख का साथी होगा
    बालगृह से आयी हुई हर कार्यशील महिला का श्रमजीवी महिला आवास में सौ प्रतिशत आरक्षण हो उसे अनिवार्य रूप से इसमें स्थान दिया जाए क्योंकि परिवार से आयी हुई महिला की कुछ कुछ व्यवस्था (किसी रिश्तेदार, मित्र के यहाँ) तो परिवार वाले कर भी देते हैं किन्तु इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी तो समाज की ही है हाँ! इनके लिए किसी प्रकार की आर्थिक छूट अब नहीं होनी चाहिए अन्य महिलाओं के समान ही इनसे भी आवासगृह का पूरा शुल्क लिया जाना उचित है क्योंकि अब ये लोग आर्थिक रूप से अक्षम नहीं है महिलाओं के समान ही यदि अकेले रहने वाले पुरुषों के लिए भी आवासगृह हों तो क्या ही अच्छा हो, क्योंकि बिना किसी परिचय के एकाकी पुरुषों को भी कोई किराये पर मकान देने के लिए तैयार नहीं होता है
    इतना होने के बाद भी बालगृहों समाज की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती है समाज को सुव्यवस्थित रखने के लिए विवाह एक आवश्यक संस्था
 है भारतीय समाज में तो आज भी इसे मातापिता अभिभावकों की जिम्मेदारी माना जाता है
    बालगृहों से निकले हुए युवाओं के लिए तो उनके अभिभावक, सम्बन्धित बालगृह के संचालक समाज ही हैं अत: इस दायित्व को भी पूरा करना होगा यदि ये युवकयुवतियाँ अपनी इच्छा से किसी को पसन्द कर लेते हैं तब भी बालगृह का यह दायित्व है कि वह सम्बन्धित व्यक्ति की पूरी जाँच पड़ताल कर लं कि कोई उन्हें बहका तो नहीं रहा है
    विशेषकर लड़कियों के मामले में तो ऐसा अक्सर देखा जाता है कि निराश्रित समझ कर विवाह का लालच देकर कुछ मनचले युवक या अपराधी प्रवृत्ति के लोग उनसे विवाह कर लेते हैं बाद में उन्हें गलत धन्धों में प्रवृत्त कर देते हैं तब ये लड़कियाँ आजीवन उस दलदल में फँसे रहने के लिए मजबूर हो जाती हैं अत: इनका विवाह इनकी पसन्द से हो समाज या बालगृह द्वारा लड़की लड़के की पूरी जाँचपड़ताल हो, रजिस्ट्रेशन हो समयसमय पर मायके की भाँति लड़की को बालगृह में आने की अनुमति प्रदान की जाए बालगृह के लोग उसके दु:सुख की जानकारी लें किसी प्रकार की अति होने पर मध्यस्थता करें
    बालगृह पूरे देश में फैले होंगे केन्द्रीय स्तर से संचालन होने के कारण प्रत्येक बालगृह से निकले हुए युवकयुवती की सूची भी होगी अत: एक बालगृह के युवाओं का विवाह दूसरे बालगृह के युवाओं से हो जाए तो क्या ही अच्छा हो ? दोनों एक प्रकार के वातावरण में पले होने के कारण एकदूसरे की स्थिति को अच्छी तरह से समझेंगे दहेज आदि का कोई प्रश्न ही नहीं रहेगा पारिवारिक पृष्ठभूमि के ताने भी कोई किसी को नहीं देगा दोनों सहज स्वाभाविक स्थिति में अपने जीवन को सुखमय व्यतीत कर बालगृहों समाज को धन्यवाद देंगे, जिन्होंने उन्हें इस प्रकार का अवसर प्रदान किया जो बच्चे उचित आश्रय के अभाव में समाज के लिए कोढ़ का काम करते वही उसके स्वस्थ विकास में सहायक होंगे कौन समाज ऐसा है जो सुख, शान्ति से जीवनयापन करना नहीं चाहता है
    यदि सरकार समाज इस विषय को गम्भीरता से लें तो गम्भीर लगने वाली यह समस्या सहज ही हल हो सकती है और अनाथ कहलाने वाले ये बच्चे बड़े हो कर कुछ लोगों के नाथ भी हो सकते हैं
बालगृह के युवाओं का समाज के प्रति दायित्व
    आदानप्रदान प्रकृति का नियम है मातापिता बच्चों का पालनपोषण करते हैं तो बच्चों के बडे़ होने पर मातापिता की सेवा करना बच्चों का कर्तव्य समझा जाता है बच्चे समाज से लेते हैं तो समाज के प्रति  भी उनके कर्तव्यों को बताया जाता है इसी प्रकार अनाथ बच्चे एक ओर समाज का दायित्व हैं तो बड़े हो जाने पर समाज के प्रति भी उनके कुछ दायित्व हैं
    यदि बालगृह से नि:सृत प्रत्येक युवा जो एक सरकारी नौकरी भी पा चुका हो, वह अपनी आय का दस प्रतिशत भी नियमित रूप से बालगृह को देता रहे तो आगे आने वाले उनके छोटेभाईबहनों के पालन की आर्थिक समस्या का बहुत कुछ समाधान स्वयमेव हो सकेगा इसी के साथ ये लोग अपना समय देकर बालगृह का सहयोग कर सकते हैं इसके अतिरिक्त यदि बालगृह से नि:सृत एक युवादम्पति एक बच्चे को गोद ले लें तो बहुत से बच्चों को मातापिता का स्नेह भी मिल जायेगा चूँकि ये दम्पति स्वयं अपनी पीड़ा जानते हैं अत: इन्हें उस बच्चे के प्रति स्वाभाविक सहज प्रेम होगा
बालगृह के अतिरिक्त इन्हें समाज सरकार ने भी बहुत कुछ दिया है अत: इनका समाज सरकार के प्रति भी पूरा दायित्व है
    यदि इस चर्चित प्रक्रिया को बुद्धिजीवियों के सहयोग से संशोधित करके सरकार लागू करे समाज इसमें अपना सहयोग दे तो कोई कारण नहीं है कि ये बच्चे अपराध की दिशा में प्रवृत्त होने के स्थान पर समाज को कुछ दे सकें बच्चों को एक ओर जहाँ सरकार समाज का सहयोग मिले वहीं पर प्रारम्भ से ही इनके मन में यह भावना भरनी आवश्यक है कि वे भी समाज के अंग हैं, भारत के भावी नागरिक हैं, भारत की सन्तान हैं अत: उनका भी कर्तव्य अपने समाज देश के लिए बनता है विशेष रूप से सम्बन्धित बालगृह के प्रति तो उनका विशेष दायित्व है ही
    आशा है समाज, सरकार बुद्धिजीवी लोग इस चर्चा का मन्थन कर नवनीत ग्रहण करेंगे सुझाव सहयोग देकर मेरे मस्तिष्क से नि:सृत विचारों को कार्य रूप में परिणत करने में अपना योगदान देंगे