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Friday, November 23, 2018

वेदों में मानसिक स्वास्थ्य

मन की स्थिरता व सबलता
आत्मिक संकल्प
यदाकूतात् समसुस्त्रोद्धृदो  वा  मनसो वा  संभृतं चक्षुषो वा ।
तदनु प्रेत सुकृतामु लोकं यत्र ऋषयो जग्मु: प्रथमजा: पुराणा: । ।
यजुर्वेद 18/58
यह जो शक्तिबिन्दु आत्मिक ईक्षण से, आत्मिक संकल्प से, अच्छी  तरह चुआ हुआ है । हृदय से, बुद्धि से या मन से या आँखों से चुए हुए इसे तुमने सम्यक्तया धारण कर लिया है तो उसे ही लेकर चल पड़ो । इस तरह तुम उस श्रेष्ठ कर्मों वालों के लोक में पहुँच जाओगे जहाँ जिस लोक को तुमसे पहले उत्पन्न हुए ऋषि लोग पहुँचते रहे हैं ।
अर्थात् आत्मसंकल्प व सत्संकल्प से सत्कर्मी परमात्मा की प्राप्ति करें ।
सत्वचिंतन
यथा वातच्यावयति भूम्या रेणुमन्तरिक्षाच्चाभ्रम् ।
एवा  मत्  सर्वं  दुर्भूतं  ब्रह्मनुत्तमपायति । ।
अथर्ववेद10/1/13
जैसे वायु द्वारा भूमि से रेणु या धूल और आकाश से मेघ को सरका देता
 है । वैसे ही मुझसे ब्रह्मवेत्ताओं द्वारा हटाया गया पाप दूर चला जाए । अर्थात् सत्चिंतन करके हम पाप को दूर करें । सत्य ही है कि मन से अगर हम अच्छा चिंतन करेंगे तो जीवन सभी प्रकार से सुखी हो सकता है ।
संकल्पबल
अध्यक्षो वाजी मम काम उग्र: कृणोतु मह्यम सपत्नमेव ।
विश्वे देवा मम नाथं भवन्तु सर्वे देवा हवमायन्तु म इमम् । ।
अथर्ववेद 9/2/7
हे प्रभु! मेरा प्रबल संकल्प ज्ञानबल से युक्त है और ऊपर से ठीक–ठीक दिखने वाला है । यह संकल्प मेरे लिए संसार को सर्वथा प्रतिद्वन्द्वी रहित कर देवे । सब देव मुझसे सम्बद्ध हो जाएँ और ये सब देव मेरी इस पुकार पर आ जाएँ । अर्थात् हम अपने संकल्पबल से स्वयं अपने जीवन को समृद्ध करने की सामर्थ्य रखते हैं ।
संकल्पबल से सिद्धि की कामना
अवधीत कामो मम ये सपत्ना उरूं लोकमकरन्मह्यमेधतुम् ।
मह्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रो मह्यं षडुर्वीर्धृतमावहन्तु । ।
अथर्ववेद 9/2/11
हे परमेश्वर! मेरे संकल्पबल ने मेरे जो प्रतिद्वन्द्वी बाधक हैं उन्हें नष्ट कर दिया हैय मेरे लिए विस्तृत खुला हुआ द्युलोक कर दिया है । मेरे लिए वृद्धि व विस्तार कर दिया है । अब मेरे लिए चारों उपदिशाएँ झुक जाएँ और छहों विस्तृत दिशाएँ मेरे लिए क्षरित हुए इष्ट फल को ले आएँ ।
मन का ठहराव हो
कथं वातो नेलयति कथं न रमते मन: ।
किमाप: सत्यं प्रेप्सन्तीर्नेलयन्ति कदाचन । ।
अथर्ववेद 10/7/37
यह प्राण क्यों नहीं ठहरता है? मन क्यों कहीं नहीं रमता है? क्यों सत्यस्वरूप को प्राप्त करना चाहते हुए भी जीवों के कर्म प्रवाह कभी भी नहीं ठहरते हैं, सदा चल रहे हैं ?
नि:सन्देह जिस क्षण उस परम सत्य को पा लेंगे, उस क्षण हमारा प्राण चैन पाएगा, मन निरुद्ध हो जाएगा, हमारी  सब की सब चेष्टाएँ सर्वथा बन्द हो जाएँगी और हम उस परम आनन्द में स्थिर हो जाएँगे ।)
आत्मव्यवहार का सुधार
उलूकयातुं शुशुलूकयातुं जहि श्वयातुमुत कोकयातुम् ।
सुपर्णयातुमुत  गृध्रयातुं  दृषदेव  प्रमृण रक्ष इन्द्र । ।
अथर्ववेद 8/4/22
हे आत्मन्! हमारे उल्लू के समान आचरण को, भेड़िये के चलन को, कुत्ते जैसे व्यवहार को और कोक चिड़िया के आचरण को नष्ट कर दे । बाज की चाल (मद) को तथा गिद्ध जैसे बर्ताव (लोभ) को भी (इन छहों में से एक–एक राक्षस को) तू अपनी दारणशक्ति द्वारा इस तरह विनष्ट कर दे जैसे शिला से मिट्टी का ढेला या मिट्टी का बर्तन फूट जाता है । अर्थात् हमारा आचरण सदा अच्छा हो ।
हम माधुर्ययुक्त हों
मधुमन्मे निक्रमणं  मधुमन्मे  परायणम् ।
वाचा वदामि मधुमद् भूयासं मधुसन्दृश: । ।
अथर्ववेद 1/34/3
हे परमेश्वर! मेरा निकट जाना मार्धुयमय हो तथा मेरा दूर हटना भी माधुर्यपूर्ण हो । मैं वाणी से माधुर्ययुक्त ही बोलता हूँ । इसलिए हे माधुर्यस्वरूप परमात्मा! मैं सर्वत्र मधुरूप या माधुर्य को ही देखने वाला हो जाऊँ ।
सहनशक्ति
अहमस्मि  सहमान उत्तरो नाम भूम्याम् ।
अभीषाडस्मि विश्वाषाडाशामाशां विषासहि: । ।
अथर्ववेद 12/1/54
हे प्रभु! मैं सहन करने वाला हूँ । इस भूमि पर उत्कृष्टतर प्रसिद्ध हूँ । जीवों में मनुष्य की गणना उत्कृष्टतर मानी जाती है । मैं मुकाबले में आए हुए को सहने वाला हूँ, अन्य भी सब कुछ सहने वाला हूँ । प्रत्येक दिशा में प्रत्येक इच्छापूर्ति के लिए सब कुछ विशेषतया बार–बार सहने वाला ही होऊँ ।
सुन्दरवाणी
इयं या परमेष्ठिनी वागदेवी ब्रह्मसंशिता ।
ययैव ससृजे घोरं तयैव शान्तिरस्तु न: । ।
अथर्ववेद 19/9/3
यह जो परमेश्वर में ठहरने वाली और ज्ञान से तीक्ष्ण की गई वाणी रूपी देवी है, जिससे कि नि:सन्देह बड़े–बड़े घोर कृत्य किए जाते हैंय उस वाणी से हमारे लिए, पूरे संसार के लिए शान्ति फैले ।
मन से सबल हों
सं जानामहै मनसा सं चिकित्वा मा युष्महि मनसा दैव्येन ।
मा घोषा उत्स्थुर्बहुले विनिर्हते, मेषु: पप्तदिन्द्रस्याहन्यागते । ।
अथर्ववेद 7/52/2
हम मन द्वारा मिलकर के विचारें और सोचना–समझना मिलकर करें, मन से कभी वियुक्त न हों, बिछुड़ें नहीं । अन्धकार आ जाने पर या विशाल द्यावापृथिवी के टूटने पर भी हमारे अन्दर हाहाकार के शब्द न उठें । दिन आ जाने पर, अनुकूल स्थिति पा जाने पर हमारे ऊपर ईश्वरीय मार न पड़े ।
शिवसंकल्प
देखें यजुर्वेद के कुछ मंत्रों को
यज्जाग्रतो  दूरमुदैति  दैवं तदु  सुप्तस्य  तथैवैति ।
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–1
अर्थात् (यत्) जो (दैवम्) दिव्य शक्ति वाला (मे मन:) मेरा मन (जाग्रत:) जागते हुए (दूरम् उदैति) दूर–दूर जाता है । (तदु) वह (सुप्तस्य) सोते हुए भी (तथा एव) उसी प्रकार (एति) दूर चला जाता है । इन्द्रियों का (एक ज्योति:) एक मात्र प्रकाशक (ज्ञान में साधक) है । (तत) वह (मे मन;) मेरा मन (शिव संकल्पम्) शुभसंकल्प अर्थात् अच्छे विचार वाला (अस्तु) होवे ।
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीरा: ।
यदपूर्वं यक्षमन्त: प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–2
अर्थात् (येन) जिसके द्वारा (अपस) कर्मनिष्ठ लोग (मनीषिण:) मनस्वी लोग (यज्ञे) यज्ञों में, (विदथेषु) विशेष ज्ञानपूर्वक किये जाने वाले कार्यों में, (कर्माणि) करने योग्य कर्मों को (कृण्वन्ति) करते हैंय मेरा मन (यत्) जो (अपूर्वम्) अपूर्व है (प्रजानाम अन्त:) प्रजाओं के अन्दर (यक्षम) पूजनीय है (तत्) वह (मे मन:) मेरा मन (शिव संकल्प) शुभ विचार वाला (अस्तु) होवे ।
यत्प्रज्ञानमुत  चेतो  धृतिश्च  यज्ज्योतिरन्तरमृतं   प्रजासु ।
यस्मान्न ऋते किंच न कर्म क्रियते तन्मे मन> शिवसंकल्पमस्तु ।
यजुर्वेद 34–3
अर्थात् (यत्) जो (प्रज्ञानम) ज्ञान का साधन है (उत) और (चेत:) चेतना का आधार (धृति: च) और निश्चय करने की वृत्ति वाला है । (यत्) जो (प्रजासु अन्त:) प्रजाओं के अन्दर (अमृतम्) मरणधर्म से रहित (ज्योति:) ज्ञान का प्रकाश है, (यस्मात् ऋते) जिसके बिना (किञ्चन) कोई भी (कर्म) कार्य (न) नहीं (क्रियते) किया जा सकता (तत्) वह (मे) मेरा (मन:) मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचार वाला (अस्तु) हो ।
येनेदं  भूतं   भुवनं  भविष्यत्परिगृहीतममृतेन  सर्वम् ।
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–4
अर्थात् (येन) जिस (अमृतेन) मरण धर्म से रहित (इदं) इस (सर्वम्) समस्त (भूतम्) भूतकाल को (भुवनम्) वर्तमान काल को (भविष्यत्) भविष्यतकाल को (परिगृहीतम्) अपनी चेतना की शक्ति से अपने में पकड़ा हुआ है, (येन) जिसके द्वारा (सप्त होता) सप्त होताओं वाले (यज्ञ: तायते) यज्ञ का वितान किया गया जा रहा है । (तत् मे मन:) वह मेरा मन (शिवसंकल्प वाला) शुभ विचारों वाला (अस्तु) हो ।
यस्मिन्नृच: साम यजूंषि यस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभाविवारा: ।
यस्मिन्श्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–5
अर्थात् (रथनाभौ) रथ की नाभि में (आरा: इव) अरों की तरह (यस्मिन्) जिस (मन) में (ऋच:) ऋग्वेद (साम) सामवेद (यजूंषि) यजुर्वेद (प्रतिष्ठिता:) प्रतिष्ठित हैं अर्थात् ठहरे हुए हैं, (यस्मिन्) जिसमें (प्रजानाम्) प्रजाओं की (सर्वम्) समस्त (चित्तं) चिन्तनशक्ति (ओतम्) ओत–प्रोत है (तत्) वह (मे मन:) मेरा मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचार वाला (अस्तु) हो ।
सुषारथिरश्वानिव      यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव ।
हृत्प्रतिष्ठं  यदजिरं  जविष्ठं तन्मे  मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–6
(सुसारथि:) अच्छा सारथी (अश्वान्) घोड़ों को (इव) जैसे (ने नीयते) पुन: पुन: घुमाता है (तत् मे मन:) वह मेरा मन (अभीशुभि:) लगामों के द्वारा (वाजिन: अश्वान्) बलवान् घोड़ों को (सुसारथि: इव) उत्तम सारथि की तरह (यत्) जो मन (मनुष्यान्) मनुष्यों को (ने नीयते) सन्मार्ग से ले जाता है, (यत्) जो मेरा मन (हृत्प्रष्ठितम्) हृदय–चेतना स्थान में स्थित है (यत्) जो (अरिम्) गतिशील अर्थात् चंचल है, (जतिष्ठम्) शीघ्रगामी है, (तत् मे मन:) वह मेरा मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचारों वाला (अस्तु) हो ।
इन मन्त्रों में शिवसंकल्प अर्थात् सकारात्मक विचारों को ही महत्त्व दिया गया है । यदि हमारे विचार सकारात्मक होंगे तो सदा शुभ ही होगा ।
मन की स्थिरता
पुनरेहि  वाचस्पते  देवेन  मनसा  सह ।
वसोष्पते नि रमय मध्येवास्तु मयि श्रुतम् । ।
अथर्ववेद 1/1/2
हे वाणी व ज्ञान के पालक देव! तुम फिर मुझमें आओ । हे देव! मन की मननक्रिया के साथ आओ । हे वसु के पति! तुम मुझे रमण कराओ, रस दिलाओ, आनन्दित कराओ एवं मेरा सुना हुआ ज्ञान मुझमें ही ठहरे।
(हे प्रभु मैं जो कुछ सुनता हूँ या सत्चिन्तन करता हूँ, वह मुझमें ठहरता नहीं है । यह सद्ज्ञान मेरे मन में स्थिर करो ।)
ज्ञानरूपी जल दो
दिवो      नु     मां    वृहतो    अन्तरिक्षात्
अपां     स्तोको       अभ्यपप्तद्      रसेन ।
समिन्द्रयेण पयसाहमग्ने छन्दोभिर्यज्ञै: सुकृतां कृतेन । ।
अथर्ववेद 6/124/1
हे परमेश्वर! अपने ज्ञानप्रकाशमय द्युलोकरूपी महान अन्तरिक्ष से ही तेरे ज्ञान–कर्म–शक्तिरूप जलों का एक स्वल्पकण अपने तृप्तिदायक रस से युक्त मुझ पर गिरा । तेरे इस स्वल्प जल–कण द्वारा आत्मबल से पोषक ज्ञान से, शुभकर्मों से और पुण्यकर्मों के फल से संयुक्त हो गया हूँ अर्थात् आनन्द युक्त हो गया हूँ ।
मन:शक्ति
वयं सोम व्रते तव मनस्तनूषु निभ्रत: ।
प्रजावन्त:             सचेमहि । ।
ऋग्वेद 10/58/19
हे परमात्मा! अपने शरीरों में मन को अर्थात् मन:शक्ति को धारण किए हुए हम लोग तुम्हारे व्रत का पालन करते हैं । अर्थात् तुम्हारे बनाए हुए नियमों का अपनी मन:शक्ति द्वारा पालन करते हैं । अत: प्रार्थना है कि प्रजासहित हम लोग तुम्हारी सेवा करते रहें ।
दृढ़ निश्चय
अहमिद्धि पितुष्परि मेधामृतस्य जग्रभ ।
अहं                      सूर्यंइवाजनि । ।
ऋग्वेद 8/6/10
मैंने निश्चय ही पालक पिता सत्यस्वरूप परमेश्वर की धारणावती बुद्धि को सब तरफ से ग्रहण कर लिया है । अत: मैं सूर्य के समान तेजस्वी हो गया हूँ । अर्थात् हम सदा अपने मन में उत्तम चिंतन ही करें ।
आत्मबल
जुहुरे वि चितयन्तोऽनिमिषं नृम्णं पान्ति ।
आ   दृह्णम् ।     पुरं    विविशु: । ।
 ऋग्वेद 5/19/2
जो ज्ञानपूर्वक स्वार्थ त्याग करते हैं और लगातार जागते हुए अपने आत्मबल की रक्षा करते हैं, वे दृढ़ अभेद्य नगरी (अभयता व अमरता) में प्रविष्ट हो जाते हैं ।
मन का परिष्कार हो
सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत ।
अत्र सखाय: सख्यानि जानते भद्रैषां लक्षमीर्निहिताधि वाचि । ।
ऋग्वेद 10/71/2
जिस प्रकार चलनी द्वारा सत्तू को परिष्कृत किया जाता है, उसी प्रकार धैर्यशाली लोग मन द्वारा, मनन द्वारा वाणी को परिष्कृत करते हैं । वाणी के सखा हुए इन लोगों की वाणी में कल्याणी लक्ष्मी निवास करती है ।
मन में विक्षोभ न हो
यदाशसा    वदतो   मे    विचुक्षुभे    यद्     याचमानस्य
चरतो               जनाँ             अनु ।
यदात्मनि तन्वो मे विरिष्टं सरस्वती तद् आपृणद् घृतेन । ।
अथर्ववेद 7/57/1
हे प्रभु! मनुष्यों की सेवा करते हुए, उनके साथ आशा से बोलते हुए, भाषण करते हुए मेरा मन जो कभी–कभी विक्षोभ को प्राप्त होता है । इसी प्रकार लोगों के हित के लिए, उसे कुछ बताने पर, उनके दुर्व्यवहार से मेरा मन विक्षोभ को प्राप्त होता है । हे प्रभु! मेरे अन्त:करण पर जो चोट पहुँचती है, उन सबको हे सरस्वती! हे विद्यादेवी! अपने ज्ञानपूर्ण और स्नेहमय मरहम से भर दे ।
आतएतुमन: पुन: क्रत्वे दक्षाय जीवसे ।
ज्योक्   च   सूर्यं     दृशे । ।
ऋग्वेद 10/57/4
हे सुबन्धु! मन का तुझमें पुन: प्रवेश हो जाए । जिससे तू कर्म करने लगे, बल आ जाए, जीवन आ जाए और तू निरंतर सूर्य दर्शन करता रहे । अर्थात् हे प्रियजन! जो तू इतना हतोत्साहित हो गया है कि लगता है मानो तुझमें मन ही नहीं है तो तू अपने को सबल बना । 
पुनर्न: पितरो मनोददातु दैव्योजन: ।
जीवं      व्रातं   सचेमहि । ।
ऋग्वेद 10/57/5
हमारे पितर हमारे मन को फिरा दें और मन में देवों को स्थापित करें । हम परमात्मा का सब कुछ आनुषङ्गिक प्राप्त करें ।
यत् ते यमम् वैवस्वतम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/1
हे बन्धु! विवस्वान के पुत्र यम के पास या दूर पर जो तुम्हारा मन गया है, उसे हम लौटा लाते हैं । तुम इस संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते दिवम् यत् पृथिवीम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/2
मेरे मित्र! तुम्हारा जो मन अत्यन्त दूर स्वर्ग अथवा पृथिवी पर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते भूमिम् चतुर्भूष्टिम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/3
हे सखे! चारों तरफ लुढ़क पड़ने वाला जो तुम्हारा मन अतीव दूरदर्शनीय देश में गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत
दो ।
यत् ते चतस्त्र: प्रदिश: मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/4
हे प्रियजन! तुम्हारा मन जो चारों तरफ अतीव दूरस्थ प्रदेश में चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो । 
यत् ते समुद्रम् अर्णवम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/5
हे मानव! तुम्हारा जो मन अतीव दूरवर्ती और जल से परिपूर्ण समुद्र में गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर  भटकने मत दो ।
यत् ते मरीची: प्रवत: मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते  आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/6
हे प्रिय बन्धु! तुम्हारा जो मन चारों तरफ विकीर्ण किरण–मंडल में पैठा हुआ है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते अपः यत् ओषधीः मनः जगाम दूरकम्।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/7
तुम्हारा जो मन दूरस्थ जल के भीतर व वृक्ष लतादि के मध्य में गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर  भटकने मत दो ।
यत् ते सूर्यम् यत् उषसम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/8
हे मानव! तुम्हारा जो मन दूरवर्ती सूर्य व उषा के बीच गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते पर्वतान् बृहत: मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/9
हे बन्धु! तुम्हारा जो मन पर्वतमालाओं के ऊपर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते विश्वम् इदम् जगत् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/10
तुम्हारा जो मन समस्त विश्व में अतीव दूर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते परा: पराव्रतो मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/11
तुम्हारा जो मन दूर से भी दूर, उससे दूर, किसी दूर स्थान पर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते भूतं च भव्यं च मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/12
तुम्हारा जो मन भूत व भविष्यत् किसी दूर स्थान पर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।

बच्चों के मस्तिष्क की सहजता

जीवन की सफलता के लिए आवश्यक है कि मस्तिष्क सहज रहे । जब बच्चे का जन्म होता है, तब उसका जीवन व मस्तिष्क सहज होता है । सहजता ही जीवन का मूलाधार है ।
यदि मकान की नींव सही पड़ जाए तो मकान का निर्माण अच्छा होता है और वह मकान आँधी–पानी में भी नहीं गिरता है ।
इसी प्रकार बच्चों का अच्छा बचपन हो, उनकी पूर्व प्राथमिक व प्राथमिक शिक्षा ठीक हो तो बच्चे बड़े होने पर पूर्ण प्रफुल्लित, सुयोग्य, सच्चरित्र व समायोजित मानसिकता वाले बनेंगे । जरा विचार करें—
आज तक आपने कोई भी छोटा बच्चा अपराधी प्रवृत्ति का नहीं देखा
होगा ।
 जो बच्चे अपराधी हो जाते हैं, वे भी थोड़ा बड़े होने पर हीअपराधी होते हैं । शिशु अर्थात् छह वर्ष तक का बच्चा अपराधी मानसिकता का नहीं होता है ।
 शिशु चिड़चिड़ा हो सकता है, तोड़–फोड़ करने वाला व जिद्दी हो सकता है किन्तु अपराधी प्रवृत्ति का नहीं हो सकता है । शिशु की इन मानसिक समस्याओं के अनेक कारण हो सकते हैं ।
 ये सभी कारण भी अर्जित Acquired होते हैं, घर–परिवार व समाज की स्थिति–परिस्थिति के कारण होते हैं ।
 बच्चे का दिमाग क्लीन स्लेट की तरह है, हम उसमें जो चाहे लिख सकते हैं, अर्थात् बच्चे के दिमाग में जैसे चाहें, वैसे संस्कार डाले जा सकते हैं ।
 इसका प्रमाण यह है कि आज तक किसी भी बच्चे को मातृभाषा सिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ी । एक मंदबुद्धि बच्चा भी मातृभाषा या स्थानीय भाषा सहज ही ग्रहण कर लेता है ।
 एक लड़की जो घर में अपने बड़ों को या माता को खाना बनाते देखती है, वह सहज ही थोड़ा प्रयास करने पर खाना बनाना सीख जाती है । उसे किसी कूकरी क्लास की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।
 हिन्दू का बच्चा हिन्दू संस्कारों वाला होता है, वह उन्हीं बातों को सही समझता है, जो उसे सिखाई जाती हैं । वह वेद, पुराण, गीता, रामायण, यज्ञ, मन्दिर आदि में विश्वास रखने वाला होता है ।
 इसी प्रकार ईसाई के बच्चे की ईसाई धर्म के रीति–रिवाजों में रुचि भी होती है व विश्वास भी ।
 मुसलमान की सन्तान कुरान, शरीयत व मस्जिद में विश्वास रखती है । पक्का मुसलमान पाँच वक्त नमाज अदा करना अपना कर्तव्य समझता है ।
अब जरा खुले दिमाग से विश्लेषण करें तो कुदरत का सत्य तो केवल एक ही होगा । हर धर्म के धर्मग्रन्थों में अलग–अलग बातें लिखी हैं । उस धर्म–विशेष का समर्थक केवल उसी बात को सत्य मानता है, जो उसके धर्म की पुस्तकों में लिखी हैं । हिन्दू कहते हैं वेद परमात्मा की वाणी है, मुसलमान कहते हैं कि कुरान ऊपर से आई है या अल्लाह की आवाज है । इसी प्रकार ईसाई बाइबिल को ईश्वरकृत कहते हैं ।
इन सब चीजों के मूल में कहा जा सकता है कि बचपन से हम जिस वातावरण में रहते हैं या हमें जो कुछ सिखाया जाता है, हम तदनुकूल ही आचरण करने लगते हैं । हमारे घर–परिवार, पास–पड़ोस के संस्कारों के साथ ही हमारी शिक्षा–दीक्षा जैसी होती है, वैसी ही हमारी सोच होती है । वैसी ही हमारी मानसिकता बनती जाती है ।
महान विचारक जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार—
‘अज्ञानी वह व्यक्ति नहीं है जो विद्वान नहीं है, अज्ञानी वह है जो स्वयं अपने को नहीं जानता और ऐसा विद्वान मूढ़ है, जो समझ अथवा बोध के लिए किताबों पर, जानकारियों पर और प्रमाण पर निर्भर रहता है । बोध केवल आत्मज्ञान से आता है और आत्मज्ञान आता है अपनी समस्त मानसिक प्रक्रिया के प्रति सहजता से । इस प्रकार शिक्षा का वास्तविक अर्थ स्वयं अपने को समझना है, क्योंकि हममें से प्रत्येक में सम्पूर्ण अस्तित्व समाहित है ।
सारांश यह है कि बच्चा स्वयं का अध्ययन करना सीखे । स्वयं के बारे में सीखना ही वास्तविक सीखना है ।’
प्रश्न यह है कि यह कैसे हो ?
देखें राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा निर्मित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के अनुसार—‘स्कूली पाठ्यचर्या और परीक्षा व्यवस्था दोनों में, जो बच्चों को बहुत सी जानकारी रटने और उसे उगलने के लिए विवश करती है, मूलभूत परिवर्तन किए जाएँ । यांत्रिक तरीके से परखे जाने के लिए सीखने की प्रक्रिया बच्चे से बच्चा होने का सुख छीन लेती है तथा स्कूली जानकारी को प्रतिदिन के अनुभव से अलग कर देती है ।
माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952) द्वारा की गई परिकल्पना स्मरण योग्य है—‘लोकतंत्र में नागरिकता की परिभाषा में कई बौद्धिक, सामाजिक व नैतिक गुण शामिल होते हैं : एक लोकतांत्रिक नागरिक में सच को झूठ से अलग छाँटने, प्रचार से तथ्य अलग करने, धर्र्मान्धता और पूर्वाग्रहों के खतरनाक आकर्षण को अस्वीकार करने की समझ व बौद्धिक क्षमता होनी चाहिए । वह न तो पुराने को इसलिए नकारे क्योंकि वह पुराना है, न ही नए को इसलिए स्वीकारे क्योंकि वह नया है – बल्कि उसे निष्पक्ष रूप से दोनों को परखना चाहिए और साहस से उसको नकार देना चाहिए जो न्याय व प्रगति के बलों को अवरुद्ध करता
हो ।––––’
‘लोकतंत्र प्रत्येक व्यक्ति के मनुष्य के रूप में सम्मान व योग्यता में आस्था पर आधारित होता है ––––अत: लोकतांत्रिक शिक्षा का उद्देश्य है – व्यक्तित्व का पूर्ण व चहुँमुखी विकास – अर्थात् एक ऐसी शिक्षा जो विद्यार्थियों को एक समुदाय में जीने की बहुआयामी कला में दीक्षित करे । बहरहाल, यह स्पष्ट है कि एक व्यक्ति अकेेले न तो रह सकता है, न ही विकसित हो सकता है ––––उस शिक्षा का कोई लाभ नहीं है जो अपने साथी नागरिकों के साथ शालीनता, सामंजस्य, कार्य–कुशलता के साथ जीने की शैली के लिए आवश्यक गुणों को पोषित न करती हो ।’
(माध्यमिक शिक्षा आयोग 1952–53, पृ– 20)
‘बाल केन्द्रित शिक्षा–शास्त्र का अर्थ है, बच्चों के अनुभवों, उनके स्वरों और उनकी सक्रिय सहभागिता को प्राथमिकता देना । इस प्रकार के शिक्षाशास्त्र में बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास व अभिरुचियों के मद्देनजर शिक्षा को नियोजित करने की आवश्यकता होती है ।’
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005, पृ– सं– 15)
‘बच्चों की आवाज व अनुभवों को कक्षा में अभिव्यक्ति नहीं मिलती है । प्राय: केवल शिक्षक का स्वर ही सुनाई देता है । बच्चे केवल अध्यापक के सवालों का जवाब देने के लिए या अध्यापक के शब्दों को दोहराने के लिए ही बोलते हैं । कक्षा में वे शायद ही कभी स्वयं कुछ करके देख पाते हैं । उन्हें पहल करने के अवसर भी नहीं मिलते हैं । किताबी ज्ञान को दोहराने की क्षमता के विकास के बजाय पाठ्यचर्या बच्चों को इतना सक्षम बनाए कि वे अपनी आवाज ढूँढ़ सकें, अपनी उत्सुकता का पोषण कर सकें, स्वयं करें, सवाल पूछें, जाँचें, परखें और अपने अनुभवों को स्कूली ज्ञान के साथ जोड़ सकें ।’
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 पृ– 15)
‘बच्चे उसी वातावरण में सीख सकते हैं, जहाँ उन्हें लगे कि उन्हें महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है । हमारे स्कूल आज भी सभी बच्चों को ऐसा महसूस नहीं करवा पाते हैं । सीखने का आनंद व संतोष के साथ रिश्ता होने की बजाय भय, अनुशासन व तनाव से सम्बन्ध हो तो यह सीखने के लिए अहितकारी होता
है ।’
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 पृ– सं– 16)
अब देखें किशोरावस्था में हमारी वर्तमान शिक्षा–प्रणाली का किशोरों पर क्या असर पड़ सकता है—
‘किशोरावस्था अस्मिता के विकास के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण समय है । स्वयं के बारे में समझने की प्रक्रिया का सम्बन्ध शारीरिक बदलाव और वयस्क के रूप में सामाजिक और शारीरिक माँगों से संगति बिठाने से है । स्वतंत्रता, घनिष्ठता, मित्रमंडली पर निर्भरता आदि कुछ ऐसे सरोकार हैं, जिनको पहचानने और उनसे निपटने की दिशा में उचित सहयोग देने की जरूरत है ।
बाहर की दुनिया तथा व्यक्ति की उस तक पहुँच और वहाँ आने–जाने की स्वतंत्रता व्यक्तित्व निर्माण को प्रभावित करती है । लड़कियों के विषय में यह तथ्य विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि प्राय: सामाजिक परम्पराएँ उन्हें चारदीवारों के भीतर रहने को बाध्य कर देती हैं ।
यही परम्पराएँ लड़कों के लिए ठीक इसके विपरीत रूढ़ि को प्रोत्साहित करती हैं, जो लड़कों को बाहरी व शारीरिक क्रियाकलापों से जोड़ती हैं । इस तरह की रूढ़ियाँ किशोरावस्था में अधिक प्रबल हो जाती हैं, जो शरीर के बढ़ने का समय होता है । इन शारीरिक बदलावों का प्रभाव किशोर जीवन के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर पड़ता है ।
अधिकतर किशोर इन परिवर्तनों का सामना बिना पूर्व ज्ञान एवं समझ के करते हैं, जो उन्हें खतरनाक स्थितियाँ जैसे – यौन रोगों, यौन दुर्व्यवहार, एच.आई.वी.एड्स एवं नशीली दवाओं के सेवन का शिकार बना सकती हैं ।
यह समय होता है जब आत्मसात किए गए विचारों व मानदण्डों पर प्रश्न उठाया जाता है, साथ ही अपने दोस्तों का मत बहुत महत्त्वपूर्ण बन जाता है । किशोरों की इन आवश्यकताओं को पहचानकर उनको जीवन में संकट से निपटने के कौशल सीखने की दिशा में सामाजिक और भावनात्मक सहारा दिया जा सकता है । साथ ही, मित्रों के दबाव और लिंग सम्बन्धी प्रचलित मान्यताओं से निपटने की दशा में भी उन्हें तैयार किया जा सकता है । इस प्रकार के सहयोग के अभाव में इन बदलावों को लेकर भ्रम और नासमझी की स्थिति पैदा हो सकती है और इससे किशोरों की अकादमिक और अन्य गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती
हैं ।
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005, पृ– 18)
शैक्षिक कार्य की गुणवत्ता, उससे सीख पाने की योग्यता और विद्यार्थी के लिए उसकी महत्ता को प्रभावित करती है । वे अभ्यास जो बहुत सरल होते हैं, या बहुत कठिन, जो बार–बार एक ही बात यांत्रिक रूप से दोहराते हैं, जो पाठ्य–पुस्तक को याद करने पर आधारित होते हैं, जो बच्चे को आत्माभिव्यक्ति व प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं देते, शिक्षक के जाँच कार्य पर ही निर्भर रहते हैं, वे बच्चे को आज्ञा पालन करने वाली कठपुतली बना देते हैं । शिक्षार्थी अपने विचारों व विवेक को महत्त्व देना नहीं सीखते हैं ।
वह यह सीखते हैं कि ज्ञान दूसरों के द्वारा बनाया जाता है और उन्हें सिर्फ ज्ञान को ग्रहण करना चाहिए । इसीलिए अध्यापकों पर यह जिम्मेदारी आ जाती है कि जो बच्चे स्वाभाविक रूप से शिक्षा के प्रति उत्साहित नहीं लगते उन्हें वह प्रोत्साहित करें ।
शिक्षार्थी नियंत्रित होना स्वीकार कर लेते हैं और यह चाहने लगते हैं कि उन्हें नियंत्रण में रहना आए । यह अंतत: संज्ञानात्मक, आत्मचिन्तन और उस लचीलेपन के विकास के लिए हानिकारक हैं, जो दरअसल अधिगम से विद्यार्थी को सशक्त बनाने के लिए आवश्यक है ।
इस शैक्षिक वातावरण में बढ़ते हुए कई विद्यार्थी सातवीं कक्षा तक पहुँचते–पहुँचते आत्मविश्वास, स्वयं को अभिव्यक्त करने और स्कूली अनुभवों का अर्थ निकालने की क्षमता खो बैठते हैं । वे बार–बार परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए उसी यांत्रिक रटन्त विद्या का सहारा लेते हैं ।
जबकि स्वतंत्र विचार प्रक्रिया और हल करने के विविध तरीकों को प्रोत्साहित करने वाले चुनौतीपूर्ण कार्य शिक्षार्थियों में स्वतंत्रता, रचनात्मकता और आत्मानुशासन को प्रोत्साहित करते हैं । ‘क्विज’ संस्कृति को बढ़ावा देने के बदले जहाँ तत्काल सही जवाब देना जरूरी होता है, हमें विद्यार्थियों को गहन व सार्थक अधिगम पर समय व्यतीत करने देना चाहिए ।
सीखने के वे कार्य जो यह सुनिश्चित करने के लिए रचे गए हैं कि बच्चे पाठ्य–पुस्तकों के अलावा अन्य स्रोतों से भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित होंगे, इस दर्शन को संप्रेषित करते हैं कि बच्चे खुद ही खोज करके एवं प्रमाण जुटा कर सीखते हैं एवं ज्ञान का सृजन करते हैं और अध्यापक या पाठ्य–पुस्तक का ज्ञान पर प्रभुत्व नहीं होता है ।
बच्चे अपने खुद के अनुभवों से, पुस्तकालयों से और स्कूल के बाहर अन्य स्रोतों से ज्ञान तलाश सकते हैं । इस संदर्भ में अधिगम की दृष्टि से सांस्कृतिक विरासत स्थल बेहद महत्त्वपूर्ण बन जाते हैं । न केवल इतिहास बल्कि सभी विषयों के शिक्षकों को पुरातत्त्व महत्त्व के स्थलों के प्रति बच्चों में एक आदरभाव और उनकी महत्ता समझने व उनका अन्वेषण करने की इच्छा को पोषित करना चाहिए ।
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, पृष्ठ 23 –24)
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है – ‘स्कूल के दिनों में मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात से हुई कि स्कूल विश्व की सम्पूर्णता से रहित था ।’
सत्य है विद्यालय तो वह स्थान होना चाहिए जहाँ बच्चे को पूरा विश्व नजर आए, उसमें जो भी जिज्ञासाएँ हैं वे शान्त हो सकें । वह स्वयं को अभिव्यक्त कर सके, चाहे उसकी अभिव्यक्ति खेल द्वारा हो, जिज्ञासाएँ हों, प्रश्न हों या कला के द्वारा अपने को अभिव्यक्त करे । उसे अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता हो ।
यदि उसे अभिव्यक्ति के स्वस्थ व आनन्दमय अवसर नहीं मिलेंगे तो वह रोने, चीखने, जिद्द करने या मारने–पीटने द्वारा अपने को अभिव्यक्त करेगा । विद्यालय ही नहीं अभिभावक भी यह भूल जाते हैं कि नन्हे–मुन्ने बच्चों की शरारतें सहज, स्वाभाविक हैं ।
जिस आँगन में बच्चे की किलकारी नहीं गूँजती, शरारतें नहीं होतीं,  चीजों की फरमाइश नहीं होती, रोना–धोना, चीख–पुकार, शोर–शराबा नहीं होता, उस आँगन में खामोशी और मायूसी छायी रहती है । हम भूल जाते हैं कि बच्चे तो वे कोमल और रंग–बिरंगे फूल हैं, जिन्हें देखकर मन खुशी से झूम उठता है ।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली द्वारा निर्मित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या कार्यक्रम 2005 (National Curriculum Framework 2005) इस बात पर बल देता है कि बच्चा बाहरी जीवन के अनुभवों से विद्यालय में प्रदत्त ज्ञान को जोड़ सके ।
हम सोचते हैं कि बच्चा क्या, कैसे और कितना सीख ले, कितनी जल्दी हमारे समाज के नियम के अनुरूप ढल जाए, कितनी जल्दी उसे अधिक–से–अधिक सिखा दें । यही गलती उसके विकास को बाधित करती है, जिसका दंड उसकी पढ़ाई की गति को ही नहीं, उसके सम्पूर्ण विकास को बाधित करने के रूप में उसको भोगना पड़ता है ।
‘बच्चे का भविष्य अब इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है कि बच्चे के ‘वर्तमान’ को अनदेखा किया जा रहा है, जो बच्चे, समाज व राष्ट्र के लिए अहितकर है ।’
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005, पृ– 2  (ङ))
और शिक्षा बिना बोझ के (Learning Without Burden) समिति की रिपोर्ट ने सिफारिश की कि स्कूली पाठ्यचर्या और परीक्षा व्यवस्था दोनों में, जो बच्चों को बहुत–सी जानकारी रटने और उसे उगलने के लिए विवश करती है, मूलभूत परिवर्तन किए जाएँ । यांत्रिक तरीके से परखे जाने के लिए सीखने की प्रक्रिया बच्चे से बच्चा होने का सुख छीन लेती है तथा स्कूली जानकारी को प्रतिदिन के अनुभव से अलग कर देती है ।
छोटे बच्चों की याददाश्त फोटोग्राफिक होती है । पाँच वर्ष के बच्चे पूरी–की–पूरी किताब रटकर सुना सकते हैं, लेकिन वास्तव में वह कुछ नहीं समझते हैं । बिना समझे इस रटन्त विद्या का उनके मस्तिष्क पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि बिना समझे रटने से उन्हें आनन्द नहीं आता है ।
कुछ चीजें बच्चों को रटवाना आवश्यक है, जैसे – गिनती व पहाड़ा, लेकिन गिनती व पहाड़ा रट जाने के साथ ही यदि इसके मूलभाव को समझा दिया जाए तो बच्चे को रटने के साथ ही आनन्द की प्राप्ति होती है व उसका पढ़ने में भी मन लगेगा और प्राप्त ज्ञान भी स्थायी होगा । जैसे 1 और 1 त्2य इसके साथ ही दो पेंसिलें या दो रबड़ या दो अन्य कोई चीजें सामने रखकर उसे गिनती और इसी प्रकार पहाड़ा सिखाया जा सकता है । इस प्रकार बच्चों के मन में गिनती या पहाड़े का प्रत्यय यब्वदबमचजद्ध स्पष्ट हो जाएगा ।
सरकारी विद्यालयों में पहली कक्षा में कम–से–कम पाँच वर्ष के बच्चे का दाखिला होता है, तभी उसे पढ़ना–लिखना सिखाया जाता है अर्थात् राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के अनुसार कम–से–कम इतने बड़े बच्चों के लिए ही पढ़ना उपयुक्त
है । जबकि प्राइवेट स्कूल बच्चे से यही अपेक्षा तीन–साढ़े तीन वर्ष की आयु में करते हैं । शिशु की शैशवावस्था की कोमल भावनाओं को कठोर नियंत्रण में बद्ध कर दिया जाता है ।
यही नहीं उसके विद्यालय से आने के बाद उसके माता–पिता भी उससे होमवर्क करवाते हैं । घर व विद्यालय में बच्चे को पढ़ाई के लिए मार भी पड़ती है ताकि बच्चे अच्छे नम्बर लाएँ ।
इन विद्यालयों में खेल या कविता, कहानी का उपयोग भी इस तरह किया जाता है कि वह अध्यापक के वर्चस्व व दमन का माध्यम बन जाता है । जैसे–बच्चे से कहा गया – ‘ट्विंकल–ट्विंकल लिटिल–स्टार’याद करो तो उसे इसका अर्थ समझे बिना रटना पड़ता है । इस कविता के सौन्दर्य–बोध से वह अवगत नहीं हो पाता है । हमारा उद्देश्य बच्चे को कविता रटवाना नहीं है वरन् उसे विद्यालय शिक्षा के लिए तैयार करना है ।
माता–पिता भी चाहते हैं कि तीन वर्ष की आयु से ही बच्चे को अधिक–से–अधिक पढ़ाया जाए । वह ऐसे विद्यालय ढूँढते हैं जहाँ बच्चे को अधिक पढ़ाया जाए । घर के लिए भी होमवर्क मिले । माता–पिता का तर्क यह होता है कि आजकल इतना कम्पटीशन है, इतना कोर्स है कि शुरू से ही बच्चों की पढ़ाई पर अधिक ध्यान देना होगा ।
ज्ञातव्य है कि अत्यन्त विकसित देशों में बच्चों को छ: वर्ष तक औपचारिक शिक्षा से मुक्त रखा गया है । शिशु को खेल, कहानी, गीत, संगीत आदि का आनन्द उठाने का पर्याप्त अवसर दिया जाता है । यही उसकी असली शिक्षा है, किन्तु हम तो आज अपनी ही संतान को मानसिक रूप से पंगु बना रहे
 हैं ।
हमारे समाज में पहले संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी । दादी माँ बच्चों को कहानियों के माध्यम से बहुत कुछ सिखा देती थीं । बच्चा परिवार के बीच में रहकर सामाजिक ज्ञान प्राप्त करता था । साथ ही समायोजन व स्वाभाविक स्नेह, अनुराग आदि भी पा लेता था । अब संयुक्त परिवार बहुत कम रह गए हैं । अत: अब ऐसे नर्सरी स्कूलों में बच्चों को भेजा जाए, जहाँ पर वास्तविक रूप से नर्सरी शिक्षा के उद्देश्य की पूर्ति हो ।
अभिभावकों को चाहिए कि छोटी उम्र में बच्चों पर पढ़ाई का दबाव न डालें । न ही टीचर से कहें कि यह चार वर्ष का हो गया तथा आपकी नर्सरी में एक वर्ष से पढ़ रहा है, अभी तक इसे पूरी गिनती लिखनी नहीं आती ।
इस आयु में सबसे बड़ी शिक्षा यही है कि बच्चों के उत्सुकता भरे प्रश्नों का जवाब दें या ज्यादा–से–ज्यादा स्नेह दें । स्नेह बच्चे की प्राथमिक आवश्यकता
 है । अनेक अनुसंधानों से जो बात उभरकर सामने आई है, वह यह कि शिशु को डंडे की मार से नहीं पढ़ाना चाहिए । मनोवैज्ञानिक तनाव का शिशु पर बुरा असर पड़ता है । शिशु के दिमाग पर चिंता सबसे बुरा असर डालती है ।
शिशु हर समय व्यस्त रहना चाहता है, उसे कुछ करने के लिए चाहिए किन्तु वह चाहता है कि उस क्रिया में उसे आनन्द मिले । खेल में भी उसे आनन्द मिलता है । आनन्दयुक्त क्रिया ही उसे प्रिय होती है, चाहे हमारी परिभाषा में वह खेल हो या कोई कार्य या पढ़ना–लिखना । यूँ तो आनन्दयुक्त क्रिया हर एक को प्रिय होती है किन्तु बड़े होने पर तो बच्चा कुछ सीखने की इच्छा रखता है और वह यह सोचकर भी सीख लेता है कि कुछ सीखना उसके काम आएगा । दूसरी ओर शिशु केवल आनन्दयुक्त क्रिया ही करना चाहता है, इसी से वह प्रसन्न रहता है । प्रसन्नता उसके लिए आवश्यक भी है और अनिवार्य भी ।
शिशु के लिए उसके माता–पिता व अध्यापक सर्वसमर्थ होते हैं । चिन्ता उसके मन पर इतना बुरा प्रभाव डालती है, जितना भूख भी नहीं । भूख तो उसे थोड़ी देर के लिए व्यथित करती है किन्तु चिन्ता तो मन में स्थायी स्थान बना लेती है । हमें ऐसे विद्यालयों का विरोध करना होगा, जहाँ पर तीन वर्ष की आयु से बच्चों को पढ़ाने लगते हैं ।
शिशु के लिए कैसा वातावरण प्रदान करना है, इसके लिए आज के परिवेश में और भी सुनियोजित रूपरेखा की आवश्यकता है क्योंकि अब संयुक्त परिवार बहुत कम हैं । अत: एकाकी बच्चा क्या करे ? शिशु व्यस्त भी हो, प्रसन्न भी, अपनी क्षमता का अधिकतम सीमा तक विकास भी कर सके । अपने वातावरण से अधिकतम ग्रहण भी कर सके । इसके लिए हमें सोचना है कि हम अपने शिशुओं को क्या दें ?
शिशु की क्रियाशीलता को कैसे गति दें, यह भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है । उसकी जिज्ञासा को हम शान्त करें, यह उसका अधिकार है, उसको प्रसन्न रहने का अवसर दें, यह उसकी आवश्यकता है और चिन्तामुक्त रहना सम्यक विकास हेतु अनिवार्यता है ।
सहजता ही तो जीवन का मूल सिद्धान्त है । जब मनुष्य सहज होता है तभी तो उसकी चिन्तन क्षमता में अभिवृद्धि होती है । जब मस्तिष्क में सब कुछ ठूँस –ठूँस कर भरा हुआ है, तब बच्चे के मन में स्वतंत्र चिन्तन का स्थान कहाँ रहेगा । स्वचिन्तन ही तो प्रगति का आधार है । अत: शिशु का मस्तिष्क सहज रहे । ढाई–तीन वर्ष के बच्चे के मस्तिष्क में विचारों को ठूँस–ठूँस कर भरना, न जाने कितने विषयों में हम उसे दक्ष बनाने का प्रयास करते हैं ।
नर्सरी शिक्षा के नाम पर ढेर सारी सूचनाएँ उसके मस्तिष्क में भर दी जाती हैं । जैसे—पढ़ना–लिखना, गणित की शिक्षा आदि तथा भावविहीन कविताएँ
आदि । साथ में होती है विद्यालय के प्रति भयपूर्ण छवि और सूखा, कुम्हलाया हुआ चेहरा, जिसमें आनन्द का लक्षण नजर नहीं आता है । बच्चा एक सुकोमल, प्यारा, अबोध प्राणी है । वह हर समय उमंग में भरा रहना चाहता है । हर समय क्रियाशील रहना चाहता है । उसकी एक अनोखी दुनिया होती है । उसकी कल्पना की दुनिया बड़ी रंग–बिरंगी होती है । वह वास्तविकता में भी उसी प्रकार जीना चाहता है । बच्चा परमात्मा की पवित्रतम कृति है ।
बच्चा सहजतम सब कुछ सीखना चाहता है, लेकिन जब हम बोझ के रूप में, कठोर अनुशासन के साथ उसे कुछ सिखाना चाहते हैं तो उसकी आशाओं पर तुषारापात हो जाता है । उसकी इन्द्रधनुषी कल्पना और सीखने की इच्छा भंग हो जाती है । बच्चे के मन में बहुत से प्रश्न होते हैं, सीखने की उसकी इच्छा, योग्यता व क्षमता हमसे कहीं अधिक होती है । आवश्यकता है कि कैसे उसे स्वतंत्र रूप से उभारा जाए । बच्चे घर और बाहर के समयबद्ध सीखने के कार्यक्रम से ऊब जाते
 हैं । पढ़ाई से उन्हें नफरत हो जाती है, माता–पिता और शिक्षक उसे प्रतिद्वन्द्वी के रूप में दिखाई देने लगते हैं ।
बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए उसके जीवन के प्रथम छ: वर्ष बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं । मनुष्य का अधिकांश मानसिक विकास शैशवावस्था में ही हो जाता है । इस समय बच्चे को जैसा चाहे वैसा ढाला जा सकता है । उसके शरीर को स्वस्थ बनाया जा सकता है, मानसिक प्रक्रियाओं का विकास करवाया जा सकता है । अच्छी भावनाओं का बीजारोपण करके अच्छे चरित्र की नींव डाली जा सकती है । शैशवकाल पूरे जीवन की नींव है । इस प्रकार शैशवकाल में बच्चे को प्रफुल्लित, आनन्दित किन्तु सहज, स्वाभाविक जीवन देकर स्वस्थ व्यक्तित्त्व का निर्माण किया जा सकता है ।

बच्चों के स्वस्थ विकास में परिवार की भूमिका

गर्भावस्था से ही शिशु के मानसिक व बौद्धिक विकास पर उसकी माता के विचारों का प्रभाव पड़ने लगता है । माँ की जैसी भावनाएँ होंगी, उसका पूरा–पूरा प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है । अत: गर्भवती माता को चाहिए कि आन्तरिक ध्यान द्वारा आत्मशुद्धि करे । इस प्रकार वह अपने भावी शिशु के जीवन को सार्थक बनाने की दिशा में प्रयत्नशील हो सकती है ।
माँ ध्यानावस्था में बैठकर अपने गर्भ में पल रहे परमपिता परमात्मा के उस अंश को प्रभुभक्त होने के लिए प्रार्थना करे ताकि जन्म लेने के पूर्व ही वह प्रभुभक्त हो सके । शिशु के जन्म के बाद भी माँ के द्वारा किए गए भजन, पूजन व ध्यान का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव शिशु पर निश्चित रूप से पड़ता है । ध्यान करना निर्विचार होने की अवस्था है जो गर्भस्थ शिशु के बौद्धिक, मानसिक, चारित्रिक व आत्मिक विकास में सहायक होगा । भविष्य में यही बच्चे राष्ट्र के कर्णधार होंगे ।
मनुष्य जाने या अनजाने हर समय कुछ–न–कुछ विचार करता रहता है । उसका मस्तिष्क इन विचारों से कभी खाली नहीं रहता है । इससे उसकी शान्ति हर क्षण क्षीण होती रहती है ।
परमात्मा आनन्दस्वरूप है, ज्योतिर्मय है । अत: ध्यान करने वाला भी आनन्दमय व ज्योतियुक्त हो जाएगा । जहाँ ज्योति व आनन्द है, वहाँ विकार व अन्य सांसारिक कुवासनाएँ नहीं रह सकेंगी । कहा गया है – जिसके हृदय में उस प्रभु का स्मरण होगा, उसे सद्बुद्धि होगी । व्यक्ति की सद्बुद्धि ही उसकी सद्गति, परिवार, समाज व राष्ट्र की उन्नति, सुख–शान्ति व समृद्धि का आधार है ।
सद्बुद्धि होने पर बालक विश्वप्रेम करेगा अर्थात् सारे जगत को सर्वशक्तिमान प्रभु की रचना, उसकी ही सृष्टि मानकर चलेगा । यह वृत्ति बाल्यकाल में तभी उदित हो सकती है, जबकि उसी कोमल अवस्था में उसे सृष्टि–नियंता की शक्ति अथवा उसके अस्तित्व से परिचित करवाया जाए । 
इसका एक माध्यम प्रकृति–प्रेम अथवा सभी जीव–जन्तुओं, वनस्पति आदि से प्रेम करना सिखाना अथवा सीखने के अवसर प्रस्तुत करना हो सकता 
है । बच्चे स्वभाव से ही फूलों, तितलियों, पशु–पक्षियों आदि को पसन्द करते हैं, उनसे खेलना चाहते हैं, उन्हें प्यार करना चाहते हैं । यदि उसी अवस्था में उन्हें प्रकृति का साथ उपलब्ध करवाया जाए तो वह सहज–स्वाभाविक ढंग से ही प्रकृति के साथ स्नेह–सम्बन्ध स्थापित कर सकेंगे ।
साथ–ही–साथ प्राकृतिक चीजों को भगवान की संरचना बताकर बच्चे को प्रकृति–प्रेम, मानव–प्रेम, जगत–प्रेम, ईश–प्रेम की ओर ले जाया जा सकता है । यह बच्चे के निजी जीवन में सुख और सार्वजनिक सामाजिक जीवन में शान्ति का समावेश कराने में सहायक हो सकता है ।
अभिभावकों का सहयोग
बच्चे के मनोविज्ञान को समझकर अभिभावक उसके समुचित विकास में बहुत अधिक सहयोग दे सकते हैं ।
अभिभावकों को सफाई एवं स्वास्थ्य के नियमों की जानकारी होना भी आवश्यक है । घर की बनावट ठीक हो, उसमें रोशनी और हवा आने–जाने का समुचित प्रबंध हो । शिशु को सारे दिन कमरे में ही बन्द न रखा जाए बल्कि उसे खुली ताजी हवा व धूप भी मिलनी चाहिए ।
बच्चे को नियत समय पर सन्तुलित एवं पौष्टिक भोजन भी मिलना चाहिए । भोजन पौष्टिक होने के साथ–साथ हल्का व सुपाच्य हो । पौष्टिक भोजन देने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उन्हें महँगे फल, मेवा आदि ही दिए जाएँ । हरे पत्ते वाली सब्जी, मौसम के फल जैसे – अमरूद, केला, खीरा आदि जो भी उपलब्ध हों दिए जा सकते हैं । मौसमी फल तथा मौसमी सब्जियाँ सस्ते भी होते हैं तथा स्वास्थ्यवर्धक भी । भोजन उतना ही दिया जाए जिसका पाचन समुचित रूप से हो सके । बिना भूख के या आवश्यकता से अधिक भोजन शरीर में पोषण उत्पन्न न करके विकार उत्पन्न करता है ।
बच्चे की निम्नलिखित प्रमुख मनोसामाजिक आवश्यकताएँ होती
हैं—
1– प्यार की आवश्यकता
2– प्रशंसा एवं आत्म–पहचान की आवश्यकता ।
3– सुरक्षा की आवश्यकता ।
बच्चा स्नेह, सुरक्षा, प्रशंसा व सौहार्द्र के वातावरण में पलकर ही व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर पाता है । बच्चा अपनी प्रशंसा द्वारा अपनी एक विशेष पहचान बनाना चाहता है, किन्तु बच्चे की आवश्यकताओं को समझने के साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे में जितनी भी गलत आदतें पड़ जाती हैं जैसे—जिद्द करना, चोरी करना, घर से भागना, झगड़ालू होना आदि वह सब एक प्रकार के मनोरोग हैं । इन समस्याओं के उत्पन्न होने के तीन प्रमुख कारण हैं—
1– बहुत अधिक लाड़ प्यार
2– बहुत अधिक तिरस्कार
3– परिवार के सदस्यों का बच्चों  बच्चों के प्रति परस्पर विरोधी व्यवहार ।
इसलिए बच्चों के साथ सन्तुलित व्यवहार करना चाहिए, न तो उन्हें आवश्यकता से अधिक लाड़–प्यार देना चाहिए, न ही उनकी एकदम उपेक्षा ही कर देनी चाहिए ।
प्राय: देखा जाता है कि जिन बच्चों  को घर में अधिक मारा–पीटा जाता है, उनमें आक्रामक प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है । उनको घर में जो मारता है, उसे तो वह मार नहीं पाते हैं, अत: वह अपने से छोटे या कमजोर बच्चों को मारकर बदला लेते देखे जाते हैं ।
इसके अतिरिक्त माता–पिता के बीच का तनाव या परस्पर विरोधी व्यवहार भी बच्चे को प्रभावित करता है । उदाहरणत: माँ ने किसी बात के लिए बच्चे को मना किया, पिता ने उसी काम को करने के लिए कहा तो बच्चा यह निर्णय नहीं कर पाता है कि वह क्या करे ।
बच्चे के अन्दर प्रौढ़ व्यक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक क्रियाशीलता होती है, वह हर समय व्यस्त रहना चाहता है । घर में मनोरंजन के साधन अवश्य होने चाहिए, जैसे–सस्ते खिलौने आदि । बच्चों को रुचिकर व शिक्षाप्रद कहानियाँ आदि भी घर में सुनानी चाहिए ।
बच्चों में उत्सुकता, कौतूहल उसी प्रकार कूट–कूट कर भरा होता है, जिस प्रकार शरारत और भोलापन । नई–नई बातंे जानने का उन्हें बहुत शौक होता
 है । कुछ बच्चे तो नए खिलौनों को तोड़कर यह देखना चाहते हैं कि उनके अन्दर क्या छिपा है ।
वस्तुत: बच्चे का व्यक्तित्व बनाना माता–पिता की परीक्षा होती है, इस व्यक्तित्व–निर्माण की प्रक्रिया में उनकी जिज्ञासाओं की पूर्ति करना भी माता–पिता का कर्तव्य है । नई बातें जानने की प्रवृत्ति प्राकृतिक है । बच्चे के जितने उत्सुकता भरे प्रश्नों का जवाब हम देंगे, बच्चे की जिज्ञासा उतनी ही बढ़ेगी व उसकी बुद्धि उतनी ही कुशाग्र होगी ।
माँ या अध्यापक को बच्चों के प्रश्नों को सुनकर झल्लाना नहीं चाहिए । बड़ी शान्ति व धैर्य से बच्चे के प्रश्नों को सुनकर उनका समाधान करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए । अच्छा तरीका यह है कि जब बच्चा कोई प्रश्न पूछे तब बच्चे से ही सम्बन्धित प्रश्न पूछकर उत्तर निकलवाने का प्रयत्न करना चाहिए । इससे हमको यह पता लग जाएगा कि बच्चा इस सम्बन्ध में क्या और कहाँ तक सोच सकता है ।
ऐसा करने से बच्चे को अपने दिमाग पर जोर देना पड़ेगा, जिससे उसकी बुद्धि कुशाग्र होगी व चिन्तन क्षमता बढ़ेगी । उसमें आत्मविश्वास भी बढ़ेगा कि बड़े लोग उसे उत्तर देने के योग्य समझते हैं ।
बच्चे को अधिक लम्बे–चौड़े उत्तर न दें, वरना वह ऊब जाएगा । संक्षिप्त उत्तर से ही उसकी जिज्ञासा शाँत करने का प्रयास करें । कई बार दृष्टिकोण में भी भिन्नता होती है । अध्यापक कहते हैं कि सवेरे नहाकर स्कूल आना चाहिए, माँ कहती हैं कि दोपहर को नहा लो । जब बच्चा देखता है कि कोई कुछ कहता है, कोई कुछ, तो वह चकरा जाता है । वह समझ नहीं पाता है कि सत्य क्या है ।
इस अवस्था में बच्चे को समझाएँ कि कुछ बातों में सबका दृष्टिकोण अलग–अलग हो सकता है । यह विचारों की भिन्नता उसे खुले दिमाग का बनाएगी, वह यह समझ लेगा कि लोगों के खान–पान, खाने के तरीके, वेशभूषा आदि में भिन्नता हो सकती है । अत: वह हर परिस्थिति में समायोजित कर 
लेगा ।
बच्चे को साथियों के साथ खेलने का अवसर प्रदान करना चाहिए, जिससे उसकी माँसपेशियों का सन्तुलित विकास हो सके, वह प्रसन्नचित्त रहे तथा अपनी भावनाओं को खेल द्वारा अभिव्यक्त कर सके ।
जैसे–जैसे बच्चा बड़ा होने लगता है उसके मन के भाव स्थायी होने लगते हैं । ये ही चरित्र का निर्धारण करते हैं । अत: अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को अच्छी रुचिकर एवं शिक्षाप्रद कहानियाँ सुनाएँ । अच्छे कार्य करने पर उन्हें पुरस्कृत करें ताकि उनके मन में अच्छी बातों के प्रति भाव स्थायी हो जाएँ । इस प्रकार बच्चों में सत्य, प्रेम, दया, सहानुभूति तथा सदाचार आदि के प्रति स्थायी भावों का निर्माण किया जा सकता है ।
बच्चे के मन में अपनी संस्कृति के प्रति आदर और सम्मान के बीज बोने चाहिए । बच्चे को सुसंस्कृत बनाने के लिए उसके सामने अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए, क्योंकि बच्चा जैसा घरवालों को करते देखता है, वैसा ही वह स्वयं करता है ।
इसके अतिरिक्त निम्नलिखित बातों का भी ध्यान रखना चाहिए—
1– बच्चों की भावनाओं का आदर करें ।
2– बच्चों की आपस में तुलना न करें, क्योंकि प्रत्येक बच्चे में व्यक्तिगत विशेषताएँ होती हैं ।
3– बच्चे में जो छुपी हुई क्षमता है, उसको विकसित करने का प्रयत्न करें ।
4– बच्चे में आत्मानुशासन की भावना विकसित करें ।
5– भाई–बहनों का एक–दूसरे के प्रति प्यार हो, घर का वातावरण भी प्रेमपूर्ण हो ।
समय–समय पर बच्चों को नागरिक के अधिकार और कर्तव्यों का व्यावहारिक ज्ञान करवाते रहना चाहिए । जैसे – सड़क पर बाएँ चलना, रास्ते में जगह–जगह छिलके व कूड़ा न फेंककर नियत स्थान पर ही कूड़ा फेंकना, देशभक्ति की भावना आदि । इससे बड़े होने पर उनमें नागरिकता की भावना का उचित विकास हो सकेगा और वह देश के आदर्श नागरिक बन सकेंगे ।

बचपन का सन्तुलित विकास, सम्पूर्ण विकास का आधार

यदि बच्चे को उसका बचपन जीने का पूर्ण अवसर दिया जाए तो बच्चा बड़ा होकर पूर्ण विकसित मानव होगा । उसमें कुंठाएँ नहीं होंगी, वह सदा प्रफुल्लित रहेगा व हर परिस्थिति में प्रसन्न रहेगा ।
बालक का सहज विकास हो, उसकी शिक्षा ऐसी हो कि उसको अभिव्यक्ति के पूरे अवसर मिलें । उल्लसित जीवन हो, चंचलता के अवसर मिलें, ऐसा बच्चा सहज रूप में विकसित होगा । हो सकता है वह बड़ा अधिकारी, नेता या व्यापारी न बन सके, लेकिन वह जैसा भी होगा, जहाँ भी होगा पूर्ण समायोजित व्यक्तित्व वाला होगा । देश का सुयोग्य नागरिक होगा ।
बचपन की अनुभूतियाँ जीवन–भर सुखद एहसास कराती हैं । अत: बच्चे को स्नेह से अभिसिंचित किया जाए । उसे उसका बचपन जीने का पूरा अवसर प्रदान किया जाए । पानी से खेलता हुआ या मिट्टी से सना हुआ अतिप्रसन्न शिशु किसका मन नहीं मोह लेता ।
शिशु के इन आनन्द के क्षणों को वर्णित तो किया ही नहीं जा सकता, उसे सर्वाधिक आनन्द शरारत करने में ही आता है । उसका प्रिय–से–प्रिय खिलौना या अतिप्रिय खाद्य वस्तु तो उसे सीमित सुख ही देती है किन्तु मनपसन्द शरारत करने को मिल जाए तो, क्या कहने ।
भारत के अधिकांश प्राइवेट विद्यालयों में शिशु–शिक्षा की जो व्यवस्था चल रही है, वह भारतीय स्थिति–परिस्थिति और परिवेश के अनुरूप नहीं है । उनमें अबोध शिशुओं पर कॉपी–किताबों का भारी–भरकम बोझ लाद दिया जाता है, जिनसे बच्चों की किलकारियाँ, उनकी हँसी–खुशी लुप्त हो जाती है और बच्चों के चेहरे मुरझा जाते हैं । इसी के साथ सबसे बड़ा नुकसान होता है कि उनके आगे के विकास की गति बाधित होती है ।
केन्द्रीय विद्यालय के बच्चों पर किया गया
प्रायोगिक अनुभव व निष्कर्ष
बच्चों का भविष्य तभी आनन्दपूर्ण हो सकता है जब उनका समुचित विकास अर्थात् स्वाभाविक ढंग से विकास हो । ज्ञानार्जन के साथ उनका बाल–सुलभ स्वभाव बना रहे और वह अपनी अन्तर्निहित प्रतिभाओं को उभार सकें । वह स्वयं अपनी रुचि रुझान के अनुसार औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने के योग्य बन सकें । तदर्थ मैंने पूरी तरह से इस ओर अपना ध्यान लगाकर बाल–विकास के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हुए शोधकार्य जारी रखा ।
केन्द्रीय विद्यालय में कार्यकाल के दौरान कक्षा एक के बच्चों पर किया गया प्रयोग व अनुभव प्रस्तुत है ।
मेरी सदा से इच्छा रही है कि मैं उचित ढंग से बाल–विकास के सभी पहलुओं को लेकर अनुसंधान करूँ । यह तभी सम्भव होता जब मैं कक्षा में बच्चों के साथ पूरे समय रहती । नियमानुसार मुझे प्रतिदिन आठ में छ: पीरियड मिलने थे, बाकी दो पीरियड किसी अन्य अध्यापक को दिए जाने थे । विशेष अनुमति के तहत सत्र 1999–2000 में मुझे कक्षा एक के सभी आठों पीरियड लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ, जिससे मैं बच्चों के साथ पूरे समय रह सकूँ ।
एन.सी.ई.आर.टी. के मानकों के अनुसार ही मैंने अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया ।
बच्चों के एडमीशन के बाद उनकी सामान्य क्षमता का ज्ञान Pre-Testing
बच्चों के एडमीशन के बाद उनकी सामान्य क्षमता Pre-Testingके ज्ञान हेतु कुछ बिन्दुओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया—
1– शारीरिक विकास एवं सफाई की आदत
(क) सफाई की आदत
(ख) पेंसिल ठीक से पकड़ पाता है
(ग) किताब सही ढंग से पकड़कर चित्र आदि देखता है
(घ) सही शारीरिक स्थिति Posture
(ङ) उच्चारण की शुद्धता
2– सामाजिक विकास
(क) विद्यालय के वातावरण से तादात्म्य
(ख) अन्य बच्चों से सहयोग
(ग) कक्षा में सहयोग
(घ) स्वावलम्बन
3– मानसिक विकास
(क) सीखने की इच्छा
(ख) ध्यान देने की प्रवृत्ति
(ग) विभेदीकरण की क्षमता
(घ) कहानी कथन क्षमता
(ङ) कल्पना शक्ति
इन सब बिन्दुओं के आधार पर बच्चे के शारीरिक, मानसिक व सामाजिक विकास के बारे में सामान्य जानकारी ली गई, जिससे पता चल सके कि बच्चों को कहाँ तथा किस बिन्दु पर मार्गदर्शन या सहयोग की आवश्यकता है ।
छह सप्ताह के रेडीनेस प्रोग्राम का कार्यान्वयन
मैंने रेडीनेस प्रोग्राम के अन्तर्गत अन्य क्रिया–कलापों के साथ ही क्रियात्मक रूप से बच्चों के क्रियाशील रहने हेतु उन्हें कविता, कहानी, चुटकुले, पहेली की ओर प्रेरित करना चाहा । साथ ही ड्रॉइंग की कॉपी मँगवाई तथा अभिभावकों की सुविधा के लिए कक्षा एक की पुस्तकों व कॉपियों की लिस्ट टाइप करवाकर दे दी ।
सुन्दर, सुडौल लिखावट के लिए हिन्दी व अंग्रेजी की सुलेख की पुस्तकें भी मँगवार्इं । मेरा उद्देश्य यह था कि अभिभावक पुस्तकें आदि खरीद लेंगे, जिन्हें भविष्य में समयानुसार पढ़ाया जाएगा । मैंने दिनांक 24–04–1999 (बच्चों के एडमीशन के पहले दिन) को बच्चों को किताबों की लिस्ट दी थी । कक्षा एक की पुस्तकें व कॉपियाँ तो सबने खरीद लीं, ड्रॉइंग व सुलेख की पुस्तकें नहीं खरीदीं । केवल एक बच्चा ही ड्रॉइंग व सुलेख की पुस्तकें लाया ।
आश्चर्य है कि अभिभावक ड्रॉइंग व सुलेख को बेकार की चीज समझते हैं ।
बच्चों को इनडोर व आउटडोर गेम्स (कमरे के अन्दर व मैदान में खेले जा सकने वाले खेल) भी करवाए । भावगीतों द्वारा उनकी भावाभिव्यक्ति का प्रयास किया, किन्तु चंचलता व कोमलता से बहुत दूर इन बच्चों को उदासी घेरे हुई थी । कविता, कहानी, आउटडोर व इनडोर गेम्स में बच्चों की रुचि नहीं थी ।
बड़ी विचित्र स्थिति थी । कक्षा से बाहर खेलने के लिए ले जाने पर भी बच्चे चुपचाप ही रहते थे या झगड़ने लगते थे । बच्चों में स्वयं खेलने, समूह बनाने या नेतृत्व की क्षमता नहीं थी । दो मिनट के लिए भी कक्षा से बाहर जाने पर बच्चों में मारपीट शुरू हो जाती थी । बच्चों में सहज चंचलता के स्थान पर आक्रामक प्रवृत्ति पर्याप्त मात्रा में थी ।
बच्चों से पूछने पर पता चला कि माता–पिता इन्हें खेलने के लिए मना करते हैं । कविता, कहानी की ओर प्रोत्साहित नहीं करते हैं । न तो स्वयं ही कहानियाँ, कथाएँ आदि सुनाते हैं, न ही दादी–नानी आदि बुजुर्ग लोगों के पास अधिक बैठने देते हैं । उन्हें लगता है कि केवल पुस्तकीय ज्ञान ही पर्याप्त है ।
अधिकांश अभिभावकों से वार्तालाप के दौरान यह निष्कर्ष निकला कि उन्हें ड्रॉइंग, सुलेख, कविता, कहानी, परम्परागत कथाएँ, खेल आदि समय बरबाद करने वाले क्रिया–कलाप लगते हैं । दु:ख होता है कि अभिभावक स्वयं अपनी ही सन्तान को मानसिक रूप से पंगु बना रहे हैं । अगर इन बच्चों में इस समय ही चंचलता नहीं रही तो यही बच्चे बड़े होने पर समस्या बच्चे (च्तवइसमउ ब्ीपसक) बन सकते हैं ।
कुछ बच्चों में चोरी की प्रवृत्ति भी थी । राहुल ने एक दिन थोड़ी मॉडलिंग क्ले Modeling Clay उठा कर रख ली । अंकुर ने कुछ ब्लॉक्स उठाकर जेब में रख लिए, पकड़े जाने पर छुपाने का प्रयास करने लगे, डरने लगे तथा रोने लगे । सलिल तो मारपीट में सबसे आगे रहता था । मैंने उनकी इस प्रवृत्ति को सहज रूप में लिया, उन्हें प्यार से समझाया और रचनात्मकता की ओर प्रेरित किया । तब धीरे–धीरे उनकी आक्रामक प्रवृत्ति तथा चोरी की आदत समाप्त हो गई ।
इन सब समस्याओं का मूल कारण यह है कि इन बच्चों को अधिक पढ़ाने के उद्देश्य से तीन वर्ष की आयु में ही तथाकथित नर्सरी विद्यालयों में भर्ती करवा दिया गया था, जहाँ पर नर्सरी व किंडरगार्टन के उद्देश्यों से बहुत दूर उन्हें पढ़ना–लिखना सिखाया जाने लगा था । उस समय ही  इन्हें जबरदस्ती विद्यालय जाने के लिए तैयार कर दिया जाता था ।
विद्यालय का उबाऊ वातावरण, घर में आकर होमवर्क का बोझ, टी–वी– देखना व सो जाना । जीवन्तता से दूर इन बच्चों के विकास की गति तो उस समय ही अवरुद्ध कर दी गई थी, जब इन्हें तीन वर्ष की आयु से ही पढ़ाई की ओर लगा दिया गया ।
मीठी–मीठी लोरियाँ सुनने का समय, कल्पनाओं में उड़ानें भरने का समय तो चला गया पुस्तकों में । जो भी हो मुझे तो इन्हीं बच्चों के साथ कार्य करना था, जिन्हें पूर्व प्राथमिक स्तर से ही पढ़ाई के प्रति भय व अरुचि का वातावरण मिला था ।
मुझे अभिभावकों का सहयोग बहुत कम मिला, कुछ अभिभावकों ने तो पूर्ण असहयोग किया । मेरे बार–बार कहने व तर्कपूर्ण ढंग से समझाने पर भी कुछ लोगों ने सुलेख की पुस्तकें व ड्रॉइंग की कॉपियाँ नहीं खरीदीं, जबकि यह अभिभावक पढ़े–लिखे व सम्पन्न थे । हारकर मैंने उनसे कहना छोड़ दिया और कुछ बच्चों को स्वयं सुलेख व ड्रॉइंग की कापियाँ व पुस्तकें खरीदकर दीं व उसका आशानुरूप फल भी प्राप्त हुआ ।
बच्चों के निष्पादन का विवेचन
कक्षा एक के बच्चों के साथ कार्य करने का जो सुअवसर प्राप्त हुआ उसमें सीमित संसाधनों व निर्धारित पाठ्यक्रम के मध्य भी मैंने यह अनुभव किया कि यदि कक्षा एक में प्रवेश के पूर्व बच्चों को बालगृह (ब्ीपसकतमद भ्वउम) में पूर्व प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हो सके तो कितना अच्छा हो ।
यदि ऐसा सम्भव न हो तो विद्यालय में ही कक्षा एक में एडमीशन के बाद कम–से–कम छ: सप्ताह रेडीनेस (पूर्व प्राथमिक शिक्षा) के हों । पूर्व प्राथमिक शिक्षा से मेरा तात्पर्य तथाकथित नर्सरी शिक्षा से नहीं है, जहाँ उन्हें भययुक्त वातावरण में पढ़ना–लिखना सिखाया जाने लगता है । मेरा उद्देश्य वास्तविक नर्सरी शिक्षा से है, जहाँ बच्चे रूपी पुष्प स्वस्थ रूप में, उन्मुक्त रूप से विकसित हों व अपने बचपन का पूरा आनन्द प्राप्त कर सकें ।
इनमें अमन और आदर्श दोनों ही बुद्धिमान थे, किन्तु विद्यालय में इनकी उपस्थिति बहुत कम रहती थी, अनुपस्थिति का कोई विशेष कारण न होकर अभिभावकों की लापरवाही थी, जबकि इनके अभिभावक काफी पढ़े–लिखे थे । अभिभावकों की लापरवाही यहाँ तक थी कि भयंकर जाड़े में भी आदर्श नेकर पहनकर आता था । उसके पिता से बार–बार कहने पर भी उन्होंने उसके लिए पैंट नहीं खरीदा । परिणामस्वरूप बच्चा बीमार हो गया, जबकि उसके पिता सम्पन्न हैं व उनके पास कार भी है ।
अभिषेक शुक्ला व सलिल को उनके अभिभावकों ने मेरे आखिरी प्रयास के बाद भी सभी कॉपी–किताबें खरीदकर नहीं दीं, जबकि वह अच्छे, साफ–सुथरे कपड़े पहनकर आता था व कई बार पन्द्रह रुपये वाली चॉकलेट भी लाता था । बातें करने पर पता चला कि उसे कई बार कोल्ड ड्रिंक भी पिलाई जाती थी ।
सलिल की माँ तो आकर मुझसे लड़ने लगीं कि आपको ड्रॉइंग व सुलेख की पुस्तकों पर कमीशन मिलता है क्या ? मैंने उनसे अधिक वाद–विवाद न करके इन दोनों बच्चों को स्वयं ड्रॉइंग व सुलेख की पुस्तकें खरीदकर दे दीं । इसके बाद मेरे एक साथी अध्यापक श्री हरिशंकर वर्मा जी के द्वारा समझाने–बुझाने से मेरे प्रति उनका पूर्वाग्रह खत्म हुआ ।
जहाँ एक ओर अभिभावकों की बच्चों के प्रति उदासीनता रहती है, वहीं कुछ अभिभावकों का अतिध्यान भी समस्या का कारण बन जाता है । इनमें एक समस्या ट्यूशन है । अपने घर के आस–पास हाईस्कूल या इण्टर में पढ़ने वाले लड़कों को ये लोग अपने बच्चों के ट्यूटर के रूप में नियुक्त कर देते हैं । जैसे – पृथ्वी प्रताप सिंह, दिनेश, विमल, अभिषेक शुक्ला, अंशुल, अंकुर व पवन तथा आरती व गरिमा । इन बच्चों को यही हाईस्कूल, इण्टर के छात्र ट्यूशन पढ़ाते
थे । आरती व गरिमा का काम ट्यूटर या तो बिना समझाए हाथ पकड़कर करवा देते थे या खुद कर देते थे । अन्य अधिकांश अभिभावक भी बच्चों को बिना समझाए काम पूरा करवाने की प्रवृत्ति रखते थे ।
बहुत समझाने के बाद कुछ लोगों ने तो यह प्रवृत्ति बन्द कर दी, किन्तु विमल व अशोक के ट्यूटर व अभिभावक कभी उसका हाथ पकड़कर बिना समझाए उसका काम पूरा करवाते, कभी स्वयं ही लिख देते थे । जबकि विमल व अशोक को अक्षर–ज्ञान भी नहीं था । उनके इस प्रकार काम पूरा करवाने का परिणाम यह हुआ कि बच्चे वांछित योग्यता नहीं ग्रहण कर सके, न ही उनकी पठन–पाठन में रुचि ही जाग सकी ।
जबकि मैंने कभी भी होमवर्क नहीं दिया । बच्चों की वैयक्तिक क्षमता के अनुसार कक्षा में ही काम करवाया । यह आवश्यक भी नहीं समझा कि हर बच्चा बिना समझे पुस्तक का हर काम पूरा करे । खेद है कि कुछ अभिभावक यही समझते रहे कि दूसरे बच्चों ने पुस्तक का जितना कार्य किया है, उन्हें भी बच्चे को उतना ही काम पूरा करवाकर विद्यालय में भेजना है ।
अभिभावकों से निवेदन किया कि बच्चों को विद्यालय में जो पढ़ाया जा रहा है, उसे पहले से ही घर पर न पढ़ाएँ क्योंकि फिर बच्चा कक्षा में ध्यान नहीं देता है । इसके अतिरिक्त यदि वह बाद में भी कुछ पूछता है तो उसे प्रोत्साहित करें कि वह कक्षा में ही अध्यापक से पूछे । इसका कारण भी स्पष्ट किया कि ऐसा करने से वह अध्यापक की बात पूर्ण मनोयोग से सुनेगा किन्तु परिणाम आशानुकूल नहीं रहा ।
कक्षा एक से ही ट्यूशन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाने से विद्यालय में बच्चा खेलता रहता है और खेलने से अधिक मार–पीट करता रहता है क्योंकि उसका खेल का समय तो ट्यूशन में चला जाता है । इसके अतिरिक्त उसे यह भी पता होता है कि वह विद्यालय में चाहे जितना पढ़ ले, उसे घर जाकर तो पढ़ना ही है । बच्चे हमसे अधिक दूरदर्शी व अपना कार्यक्रम नियोजित करने वाले होते हैं । वह अपना खेल का समय अवश्य ही निकालेंगे । अत्यधिक दबाव पड़ने से उनका विकास बाधित होता है ।
ट्यूशन या घर में पढ़ाने की प्रवृत्ति केवल कमजोर बच्चों में ही नहीं वरन् प्रतिभाशाली बच्चों के अभिभावकों में भी थी । शान्तनु और अंगिरा की ड्रॉइंग बहुत अच्छी होने के साथ–साथ वे लोग पढ़ाई और अनुशासन में भी बहुत अच्छे थे । शान्तनु व सचिन की अभिव्यक्ति भी स्पष्ट थी किन्तु अपना दुर्भाग्य कहूँ या देश का या उन बच्चों का, सचिन के अभिभावक के अतिरिक्त अन्य किसी बच्चे के अभिभावक ने घर में पढ़ाने की प्रवृत्ति बन्द नहीं की ।
सचिन के अभिभावक चूँकि स्वयं अध्यापक हैं । अत: वह इस बात की बारीकी को समझ गए व उन्होंने घर पर बच्चे के लिए खेल, ड्रॉइंग आदि की व्यवस्था की । परिणाम बहुत उत्साहजनक हुआ । बच्चे के ज्ञानार्जन के साथ–साथ उसकी मुखरता बढ़ी । प्रात:कालीन प्रार्थना सभा से लेकर विद्यालय की पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं में उसकी पूरी सहभागिता रही । वह एक कुशल वक्ता की तरह पूरे आत्मविश्वास के साथ माइक पर बोलता था । काश! यदि अन्य अभिभावकों का सहयोग मिला होता तो कुछ अन्य प्रतिभाएँ भी निखर सकती थीं ।
मैंने सचिन की प्रतिभा का पूरा उपयोग करते हुए कक्षा एक में ही दिसम्बर माह तक उसे अंग्रेजी की डिक्शनरी देखना भी सिखा दिया था । इसके बाद मैंने उसे एक डिक्शनरी पुरस्कार–स्वरूप दी व अभिभावक से कहा कि यदि बच्चा डिक्शनरी देखने में मदद मँागे तो घर पर उसका सहयोग करिएगा । डिक्शनरी देखना सीखने पर जोर नहीं देना है । उसे डिक्शनरी को खिलौने की तरह खेलने
 दें । खेलते–खेलते भी बहुत कुछ सीख जाएगा ।
इन सब समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या तो यह नजर आई कि लगभग सभी बच्चे नर्सरी के नाम पर खुले हुए विद्यालयों में पढ़ना–लिखना सीखकर आते हैं । राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के अनुसार वर्णमाला आदि हमें कक्षा एक में सिखानी थी किन्तु बच्चे तथाकथित नर्सरी स्कूलों के भयपूर्ण वातावरण में अपना शैशव, अपना बचपन खोते हुए पढ़ना–लिखना सीखते हैं, किन्तु सही रूप में नहीं सीख पाते हैं ।
उनके लेखन, पठन व वाचन सभी में अशुद्धियाँ होती रहती हैं । चूँकि उनकी आन्तरिक चंचलता शैशवावस्था में ही समाप्त हो जाती है । अत: विद्यालय–पूर्व आयु में जबरदस्ती ज्ञान भरा हुआ मन, प्रसन्नचित्त मन से सही ज्ञान सीखने के लिए तैयार भी नहीं होता । यही बच्चा क्रमश: कठिन होते हुए पाठ्यक्रम में कक्षा दो, तीन, चार या पाँच में पहुँच जाता है और उसकी कठिनाई बढ़ती ही जाती है, क्योंकि सही लिखना, पढ़ना, बोलना व समझना नहीं आ सका । साथ में अरुचि नर्सरी कक्षा में ही थी तो उपलब्धि तो बाधित होगी ही ।
इस प्रकार कमजोर नींव वाले बच्चों के पूरे जीवन के लिए एक कठिनाई तो बनी ही रहती है । प्राथमिक स्तर पर अधिगम में जो कमजोरी रह जाती है, उसका प्रभाव बाद की पढ़ाई पर पड़ना भी स्वाभाविक ही है क्योंकि प्रारम्भ में ही सही चीज नहीं आई, वर्तनी में अशुद्धियाँ रहीं, प्रत्यय ठीक से स्पष्ट नहीं हुआ तो आगे की पढ़ाई कैसे समझ में आवेगी ।
मैंने अपने अध्यापन–जीवन में देखा है कि कला का सकारात्मक प्रभाव बच्चे के शारीरिक व मानसिक स्तर पर तो पड़ता ही है, उसका अधिगम भी प्रभावित होता है ।
प्राथमिक कक्षाओं में खेल का महत्त्व तो शिक्षाविदों ने किया ही है । इसीलिए हर कक्षा में दिन में एक चक्र खेल का भी अवश्य होता है । वस्तुत: खेल वह है जिसमें बच्चे को आनन्द मिले । वह खेल लूडो, कैरम भी हो सकता है, दौड़–भाग के खेल भी, चित्रकला भी, कहानी–कविता भी, यहाँ तक कि पढ़ाई भी । यह बच्चों की रुचि पर निर्भर करता है कि उन्हें किस कार्य में आनन्द आता है । जिस कार्य में बच्चा आनन्दित होता है, वही उसका खेल है । जो कार्य वह प्रयत्नसाध्य करता है, वह उसका कार्य है । स्वास्थ्य की दृष्टि से विद्यालय में खेल के चक्र में बच्चों के लिए दौड़ना–भागना भी आवश्यक है । अत: बच्चों को दौड़–भाग के खेल के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए क्योंकि हर बच्चे के घर के पास पार्क आदि की व्यवस्था नहीं होती है ।
अंगिरा, जो एक प्रतिभाशाली बालिका है, आवश्यकता से अधिक शान्त रहती थी । उसका शैक्षिक निष्पादन बहुत अच्छा था । उसे भी तथाकथित नर्सरी विद्यालय में तो पढ़ाया ही गया था, साथ ही घर पर उसकी माँ का कठोर अनुशासन रहता था । वह बच्चों का शोर–शराबा बिल्कुल पसन्द नहीं करती थीं । बच्चों को पार्क में व पड़ोस के बच्चों के साथ खेलने भी नहीं देती थीं ।
एक बार मैं उनके घर अपनी छ: वर्षीया पुत्री के साथ इसी उद्देश्य से गई कि अंगिरा के आवश्यकता से अधिक शाँत रहने का कारण जान सकूँ । शाम का समय था, घर के सामने पार्क भी था । मैंने अपनी पुत्री लक्ष्मी व अंगिरा दोनों से कहा कि सामने पार्क में अन्य बच्चों के साथ खेलें, किन्तु उसकी माँ ने कहा कि वह अपने बच्चों को घर से बाहर नहीं खेलने देती हैं । मैंने उन्हें समझाने का प्रयास किया तो उनका उत्तर था कि बच्ची पढ़ाई में तो अच्छी है और क्या चाहिए ।
पढ़ाई के साथ–साथ बच्चे के सामान्य विकास के लिए उन्मुक्तता भी तो आवश्यक है । परिणाम भी वही हुआ, अंगिरा एक प्रतिभाशाली बच्ची थी किन्तु कोर्स की पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य किसी क्षेत्र में उसकी प्रतिभा विशेष रूप से विकसित न हो सकी । कोर्स की पुस्तकें भी उसने रट ली थीं—किन्तु चिन्तन क्षमता विकसित नहीं हो पाई थी ।
प्रायोगिक अध्ययन का परिणाम
इस अध्ययन से कुछ तथ्य निकलकर सामने आए । बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक है कि इन बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाए–
1– खेल का महत्त्व—प्राथमिक कक्षाओं में खेल का महत्त्व तो शिक्षाविदों ने किया ही है । इसीलिए हर कक्षा में दिन में एक चक्र खेल का भी अवश्य होता है । वस्तुत: खेल वह है जिसमें बच्चे को आनन्द मिले । वह खेल लूडो, कैरम भी हो सकता है, दौड़–भाग के खेल भी, यहाँ तक कि पढ़ाई में भी यदि उसे आनन्द मिलता है तो वह बच्चे के लिए खेल का ही रूप ले लेता है ।
2– अभिभावक शिक्षा आवश्यक—वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जबकि लोगों के प्राय: एकाकी परिवार हैं, उसमें भी एक या दो बच्चे, तब अभिभावकों को बाल विकास के सामान्य नियमों की जानकारी की और भी अधिक आवश्यकता है क्योंकि संयुक्त परिवार में जहाँ एक ओर बच्चों को छोटा–सा समाज मिल जाता था, वहीं अनुभवी दादी–नानी, बुजुर्ग महिलाएँ बच्चों के स्वस्थ पालन–पोषण की भी अनेक जानकारियाँ देती थीं । इसके अतिरिक्त बदलते हुए सामाजिक वातावरण में बाल–मनोविज्ञान की शिक्षा भी अभिभावकों के लिए आवश्यक है ।
3– कला का महत्त्व—कला के द्वारा बच्चा स्वयं को अभिव्यक्त करता है । कला के भी कई आयाम हो सकते हैं । चित्रकला, पेपर कटिंग, फूलपत्ती से खेलना, आटे से चिड़िया आदि बनाना, मिट्टी से विभिन्न खिलौने बनाना आदि ।
विभिन्न प्रकार की चीजों द्वारा विभिन्न प्रकार की अभिव्यक्ति सम्भव
है । मुख्य चीज है अभिव्यक्ति, उसके लिए माध्यम कुछ भी हो । बच्चा इन क्रियाओं में संलग्न रहता है तो आनन्द–प्राप्ति के साथ–साथ उसकी अभिव्यक्ति–क्षमता भी बढ़ती है । हो सकता है कि हमें यह लगे कि बच्चे ने यों  ही टेढ़ी–मेढ़ी रेखाएँ खींच दी हैं या कुछ गोचापाची कर दी है किन्तु बच्चा अपनी दृष्टि से सार्थक चित्र ही बनाता है, जो उसकी अभिव्यक्ति क्षमता की वृद्धि के लिए महत्त्वपूर्ण है । अभिव्यक्ति से एक ओर तो उसे अपार आनन्द मिलता है, रचनात्मकता से आत्मविश्वास बढ़ता है व दूसरी ओर उसकी गतिक माँसपेशियों Motor Musclesका विकास भी होता है । सुन्दर लेखन के लिए आवश्यक है कि गतिक माँसपेशियाँ मजबूत हों ।
4– जिज्ञासाओं की परिपुष्टि—प्राथमिक शिक्षण का मूलाधार बच्चे को जीवन की समग्रता से परिचित कराना है । बच्चा वैसे भी समग्रता को ही लेकर चलता है । वह किसी भी चीज को टुकड़ों में नहीं देखता । उसके लिए हर उड़ता हुआ पक्षी ऊँचाई की असीम सम्भावनाएँ लिए रहता है । हर पेड़ सौन्दर्य का बोध लिए रहता है । हर पशु में विशेषताएँ लगती हैं । बच्चा अपनी अनन्त जिज्ञासाओं का समाधान करना चाहता है । एक ओर उसका मन विभिन्न कल्पना की उड़ानें भरता रहता है तो दूसरी ओर वह जीवन से जुड़ी हुई सत्यता को जानना चाहता है । अपनी अनन्त जिज्ञासाओं के माध्यम से वह अनायास ही ज्ञान की अभिवृद्धि करता है । आवश्यकता इस बात की है कि बच्चे के मन में जिस विषय में जितनी जिज्ञासा हो, उसे उतना तृप्त करते रहना चाहिए ।
जो बात बच्चे सहज रूप में नहीं सीख पाते हैं, उसी बात को वह कहानी, कविता, खेल, नाटक आदि के माध्यम से अतिसहज रूप से ग्रहण कर लेते हैं क्योंकि कहानी, कविता आदि रोचक होने के साथ–साथ जीवन के किसी पक्ष या घटना का समग्रता से उल्लेख करती हैं ।
5– मूल्यपरक शिक्षा—मूल्यपरक शिक्षा के विषय में मनीषियों ने बहुत कुछ लिखा है । इस सम्बन्ध में मैं केवल इतना ही लिख रही हूँ कि मूल्यों के समुचित विकास के लिए पहली आवश्यकता है कि बच्चे को सहज रहने दिया जाए । उसे उसका बचपन जीने का पूरा अवसर दिया जाए । बड़ों के व्यवहार व आचरण के द्वारा उसमें स्वयं ही मूल्यों का विकास होगा ।
यदि प्रत्यक्ष उदाहरणों द्वारा बालक को शिक्षा दी जाए तो उसका प्रत्यक्ष प्रभाव उसके चरित्र पर पड़ता है । जैसे – मितव्ययिता की शिक्षा, केवल किताबी ज्ञान से नहीं दी जा सकती है । यदि हम बत्ती–पंखा, नल आदि अनावश्यक रूप से खुला नहीं छोड़ते हैं, तो बच्चा भी ऐसा नहीं करेगा । यदि हम स्वयं जरा–सा भी खाना जूठा नहीं छोड़ते हैं, बरबाद नहीं करते हैं, तो बच्चा भी कभी भोजन या अन्य कोई चीज बरबाद नहीं करेगा ।
6– बच्चों में प्रेम की भावना का समावेश—प्रेम एक मनोभावना या मनोवृत्ति ही न होकर जीवन की जीवन्तता, समायोजन व आत्मविकास एवं सर्वांगीण विकास का आधार है । औद्योगीकरण के इस युग में भावुकता व प्रेम की आवश्यकता जीवन की सार्थकता एवं सफलता के लिए अत्यावश्यक है ।
मूल्यपरक शिक्षा का मूलाधार प्रेम की भावना का सहज विकास ही है । प्रेम की भावना के सहज विकास के लिए आवश्यक है—
• स अध्यापकों व अभिभावकों में प्रेम की भावना समाहित हो ।
• मानव–प्रेम, पशु–प्रेम से सम्बन्धित कहानियाँ सुनाई जाएँ ।
• देशभक्ति व देश–प्रेम की भावना के विकास के लिए स्वतंत्रता संग्राम में आहुति देने वाले वीरों की संक्षिप्त कहानियाँ सुनाई जाएँ ।
समस्त शिक्षा का उद्देश्य है—बच्चे में स्व–प्रेम, मातृप्रेम, परिवार–प्रेम, समाज–प्रेम, देश–प्रेम व विश्व प्रेम तथा ईश–प्रेम की भावना का विकास हो
सके ।
बच्चों का हठीला बचपन न छीनें, उन्हें असहज न बनावें, उनकी सहजता, कोमलता व स्वाभाविकता को अक्षुण्ण रहने दें ।
7– संगीत—संगीत–शिक्षण न केवल बचपन वरन् पूरे जीवन के लिए बहुत सुखदायी है । कला व संगीत इन दोनों के माध्यम से मनुष्य की अभिव्यक्ति क्षमता विकसित होती है । साथ ही उसके मन में निहित भावनाएँ, कुंठाएँ, अपूर्ण इच्छाएँ, दमित भावनाएँ सकारात्मक रूप से अभिव्यक्त हो जाती हैं, जिससे उसे आनन्द प्राप्त होता है । बच्चों के लिए संगीत व कला–शिक्षण के कई लाभ हैं । एक ओर वह रचनात्मक कार्य में संलग्न रहता है, उसकी इच्छाओं की अभिव्यक्ति होती है, बच्चा प्रसन्नचित्त रहता है । दूसरी ओर भविष्य में वह इसे व्यावसायिक रूप में भी ले सकता है ।
8– स्वास्थ्य की शिक्षा—स्वास्थ्य जीवन में प्रधान है । अत: स्वास्थ्य के सामान्य नियमों की जानकारी बच्चों को अवश्य होनी चाहिए । यथा – सुबह जल्दी उठना, रात को जल्दी सोना, कड़ी भूख लगने पर ही खूब चबा–चबाकर खाना, पर्याप्त मात्रा में पानी पीना आदि ।
यदि आयु के अनुसार बच्चों को सुबह खाली पेट कुछ व्यायाम करवाए जावें तो बच्चा सदा स्वस्थ रहेगा । इसी प्रकार कुछ बड़े बच्चों को भोजन के तत्त्वों की जानकारी भी दी जा सकती है ।
9– शिक्षा के प्रति कौतूहल आवश्यक—यदि कक्षा एक में ही कुछ ऐसी व्यवस्था हो कि जिस बच्चे की पढ़ाई में रुचि नहीं है, उसके लिए खेल समूह की कक्षाएँ हों । उसमें बच्चों को अन्य खेलों के साथ शैक्षिक खिलौने भी दिए जाएँ । जब बच्चे की पढ़ाई के प्रति रुचि जागृत हो जाए तभी उसे पढ़ाई में लगाया जाए ।
यदि कोई बच्चा वर्ष पूरा होने पर भी कक्षा एक का पाठ्यक्रम पूरा नहीं कर पाता है, तो उसे पुन: एक वर्ष खेलने व पढ़ने का अवसर दिया जाए । उन विद्यार्थियों को अनुत्तीर्ण की संज्ञा न दी जाए वरन् कक्षा एक को भी खेल समूह के अन्तर्गत ही माना जाए । खेल की प्रवृत्ति की परिपूर्ति होने पर व पढ़ाई के प्रति रुचि जागृत होने पर जब बच्चा कक्षा एक का पाठ्यक्रम सफलतापूर्वक समझ लेगा, तब आगे की कक्षाओं की पढ़ाई में उसके लिए किसी प्रकार का व्यवधान नहीं होगा । वह सफलतापूर्वक आगे का पाठ्यक्रम पढ़ेगा व समझेगा ।
बच्चे के शिक्षण को प्रारंभ करने से पूर्व आवश्यक है कि उसके मन में शिक्षण के प्रति कौतुक उत्पन्न कर दिया जाए । जब उसकी पढ़ाई या विषय के प्रति रुचि उत्पन्न हो जाए या सीखने के प्रति जिज्ञासा की उत्पत्ति हो तभी उसका विद्यारम्भ होना चाहिए । किसी बच्चे की रुचि चार वर्ष की आयु में जागृत हो सकती है, किसी की सात वर्ष की आयु में, जब तक पात्र (बच्चा) तैयार न हो उसे जबरदस्ती पढ़ाना अनुपयुक्त है ।
10– न्यूनतम अधिगम स्तर की अपेक्षा अधिकतम अधिगम स्तर—प्राथमिक कक्षाओं में न्यूनतम अधिगम स्तर M.L.L.Minimum Level of  Learning की अपेक्षा अधिकतम अधिगम स्तर M.L.L.Maximum Level of Learning की बात करनी चाहिए ।
प्राथमिक कक्षाओं में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा बनाया गया पाठ्यक्रम पूर्णतया मनोवैज्ञानिक है । यदि बच्चा कक्षा एक की पाठ्य–पुस्तकें अधिगृहीत कर लेता है, तब वह अगली कक्षाओं में सामान्य रूप से पढ़ता चला जाएगा, रुचि भी बनी रहेगी व योग्यता व क्षमता का विकास भी होगा ।
इसी के साथ मैं यह भी सोचती हूँ कि बच्चे के शिक्षण प्रारम्भ की कोई आयु निर्धारित कर देना उचित नहीं है । बच्चे के शिक्षण प्रारम्भ से पूर्व आवश्यक है कि उसके मन में शिक्षण के प्रति कौतुक उत्पन्न कर दिया जाए । जब उसकी पढ़ाई या विषय के प्रति रुचि उत्पन्न हो जाए या सीखने के प्रति जिज्ञासा की उत्पत्ति हो तभी उसका विद्यारम्भ होना चाहिए । किसी बच्चे की रुचि चार वर्ष की आयु में हो सकती है, किसी की सात वर्ष की आयु में । जब तक पात्र (बच्चा) तैयार न हो, तब तक उसे जबरदस्ती पढ़ाना अनुपयुक्त है ।
11– पूर्व प्राथमिक शिक्षा आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी—वस्तुत: तीन से छ: वर्ष के बच्चों की पूर्व प्राथमिक शिक्षा बाल–विकास के लिए अति महत्त्वपूर्ण है । बच्चे के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए प्रथम छ: वर्ष बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, ऐसा मनोवैज्ञानिकों का मानना है । प्राय: हम इसी आयु को उपेक्षित कर देते हैं या फिर तथाकथित नर्सरी और के–जी– स्कूलों के नाम पर खुली दुकानों में बच्चों को भेज देते हैं । वहाँ के लम्बे–चौड़े पाठ्यक्रम से वह कोमल पुष्प पढ़ाई, भय एवं अति निर्देशों के वातावरण में अपनी सहजता को भूलकर कुम्हला जाते हैं व विद्यालय उन्हें यातनागृह दिखाई देने लगते हैं तथा परिवारजन इस यातनागृह में भेजने वाले यातनादाता । बच्चे को पढ़ाने के पहले आवश्यक है कि उसकी मानसिक पृष्ठभूमि तैयार की जाए ।
जिस प्रकार खेत के तैयार हो जाने पर उसमें बीज डालने पर बहुत अच्छी फसल तैयार होती है, उसी प्रकार बच्चे की पढ़ाई प्रारम्भ होने से पूर्व आवश्यक है कि उसकी पढ़ाई के प्रति रुचि जागृत की जाए । विद्यालय उसकी सुखद कल्पनाओं की परिपूर्ति का स्थान हो ।
वस्तुत: यह जानने की आवश्यकता है कि बालक के भीतर कुछ जन्मजात प्रतिभाएँ होती हैं और कुछ परिवार, सम्बन्धी, पड़ोस, समाज, विद्यालय आदि के द्वारा उभारी जा सकती हैं । इसी हेतु पूर्व प्रारम्भिक शिक्षा का स्वरूप होना चाहिए, जिसका केन्द्र–बिन्दु बालक होता है । एक बालक और दूसरे बालक के बीच अन्तर हो सकता है । अत: प्रत्येक बालक को एक इकाई समझकर कार्य करने की आवश्यकता है ।
यह आवश्यक है कि पूर्व प्रारम्भिक शिक्षा जो कि औपचारिक शिक्षा की तैयारी है, उसमें सुधार किया जाए । यदि पूर्व प्रारम्भिक शिक्षा ठीक–ठीक होगी तो प्राथमिक शिक्षा एवं आगे की शिक्षा भी ठीक हो सकेगी क्योंकि पूर्व प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य ही है बच्चों को विद्यालय शिक्षा के लिए भली प्रकार तैयार करना । उचित शिक्षा के परिणामस्वरूप बच्चे सफल नागरिक बन सकेंगे ।
ध्यान देने योग्य बातें
1– जब बच्चा पढ़ाई–लिखाई के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाए तभी उसे कक्षा एक में प्रवेश दिया जाए ।
2– कविता, कहानी, खेल, आर्ट, क्राफ्ट, मिट्टी के खिलौने आदि के माध्यम से उनकी क्षमता का अधिकतम सीमा तक विकास किया जाए किन्तु सहजता हो । खेल, कविता, कहानी आदि का प्रयोग बच्चों को आनन्दमय अनुभूति देने हेतु प्रयोग करें ।
3– खेल आदि साधन हों, साध्य नहीं ।
4– किसी भी पाठ्यक्रम की अनिवार्यता न हो ।
5– बच्चे की व्यक्तिगत क्षमताओं को प्रश्रय दिया जाए ।
6– हर बच्चे को एक यूनिट (स्वतंत्र इकाई) मानकर उसे उसकी रुचि–रुझान के अनुसार कार्य करने दिया जाए ।
7– बच्चे की सहजता, चंचलता व कोमलता को ध्यान में रखकर उसे समवयस्क बच्चों के साथ उसका बचपन जीने का पूरा अवसर प्रदान किया
जाए ।
8– अभिभावक शिक्षा अनिवार्य हो ।
9– विशेष शिक्षण प्रविधि ।
10– यथासम्भव बच्चों के लिए समर्पित, बाल मनोविज्ञान के ज्ञाता शिक्षकों का चयन हो । शिक्षकों के सेवा में आने के तुरन्त बाद मनोविज्ञानशाला में बालमनोविज्ञान का कम–से–कम एक माह का सेवा–पूर्व प्रशिक्षण Pre Service Trainingहो । प्रतिवर्ष सत्रान्त पर कम–से–कम एक सप्ताह का सेवाकालीन प्रशिक्षण In Service Course भी मनोवैज्ञानिकों द्वारा अवश्य होना चाहिए ।
11– बच्चे को स्वस्थ वातावरण प्रदान करना नितान्त जरूरी है, प्रदत्त वातावरण से तथा कठिनाई के बिन्दु पर सहयोग करने पर वह स्वयं ही सीख जाएगा ।
12– बच्चे का मस्तिष्क सहज रहे । अत्यधिक सूचनाएँ न भरी
जाएँ ।


Monday, August 13, 2018

सूर्योदय के पूर्व जागरण तथा रात्रि भोजन का परित्याग


Related imageप्रकृति के बनाए हुए नियमों का पालन न करने से ही हम लोग बीमार पड़ते हैं । जल्दी सोना और जल्दी उठना स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है । सूरज निकलने के पहले ही उठ जावें और सूरज छिपने के बाद रात को भजन–पूजन करके जल्दी सो जावें, क्योंकि सूरज उगने का अर्थ है कि अब काम में लग जाओ । सूरज चढ़े देर तक सोना प्रकृति के नियमों को न मानना है । सुबह शरीर पर सूरज की किरणें  पड़ना स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक है । इसलिए सुबह सूरज निकलने से पहले ही उठ जाना चाहिए । सुबह की वायु प्रदूषण रहित रहती है । गर्मियों में भी सूरज की सुबह की किरणें मन को अच्छी लगती हैं । जल से स्नान करने की भाँति सूर्य–स्नान करना भी आवश्यक है । प्रात:काल सूर्य–स्नान महीन कपड़ा पहन कर करना चाहिए ।


आरोग्य की कुंजी नामक पुस्तक में गाँधीजी द्वारा वर्णित है,‘इस (सूर्य के) प्रकाश का हम पूरा उपयोग नही करते, इसलिए पूर्ण आरोग्य का भी अनुभव नहीं करते । जैसे हम पानी का स्नान करके साफ स्वच्छ होते हैं, वैसे ही सूर्य–स्नान करके भी साफ और तन्दुरुस्त हो सकते हैं । दुर्बल मनुष्य यदि प्रात:काल के सूर्य की किरणें नंगे शरीर पर ले, तो उसके चेहरे का फीकापन और दुर्बलता दूर हो जाएगी और यदि पाचन क्रिया मंद हो गई हो तो वह जाग्रत हो जाएगी । सबेरे जब धूप ज्यादा न चढ़ी हो उस समय यह स्नान करना चाहिए ।––––कई बार फोड़े का घाव भरता ही नहीं है । उसे सूर्य–स्नान दिया जाय तो वह भर जाता है ।”
आरोग्य की कुंजी पृष्ठ 49–50
यह तो स्वत: सिद्ध है कि केवल पचा हुआ भोजन ही शरीर निर्माता है । अपचा भोजन पौष्टिक होने पर भी शरीर में विकार के रूप में जमा होकर सभी रोगों का एकमात्र कारण है ।
इसके लिए आवश्यक है कि हम या तो समय–समय पर पूर्ण उपवास या अर्द्ध–उपवास करके शरीर से विकारों को निकालकर शरीर को रोगमुक्त करें या कोई ऐसी पद्धति हो कि शरीर में कोई नया विकार न बने तथा पुराने विकार (बीमारी) धीरे–धीरे शान्त हो जाएँ ।
यदि हम प्राकृतिक संरचना की ओर ध्यान दें तो रात्रि भोजन का कोई अर्थ नहीं है । सूर्योदय का अर्थ गति अर्थात् कार्य शुरू करना और सूर्यास्त का अर्थ है विश्राम अर्थात् कार्य की समाप्ति । सूर्यास्त के बाद मानवनिर्मित प्रकाश (बिजली) में हमें यूँ तो दैनिक जीवन के बहुत से काम करने ही पड़ते हैं किन्तु सूर्यास्त के बाद भोजन करना तो पूर्णतया अप्राकृतिक, अस्वाभाविक है । हम लोगों ने अपनी आदत डाल ली है अप्राकृतिक तरीके से रहने की, उसी तरह अप्राकृतिक भोजन की । सूर्यास्त के बाद भोजन करके शायद हम अपनी बुद्धिमत्ता दर्शाते हैं कि भगवान आपने सूर्यास्त कर दिया है, अब हम मानवनिर्मित रोशनी (बिजली जला कर) में भोजन बनाएँगे व देर रात में खाएँगे । लगता है महावीर स्वामी पूर्णतया प्रकृति के भक्त थे । शायद इसीलिए उन्होंने कपड़ों तक का परित्याग किया, सूर्यास्त के बाद भोजन का विरोध किया ।
गाँधी जी सन् उन्नीस सौ पन्द्रह में हरिद्वार गए । वहाँ पर उन्होंने दो व्रत लिए । उन्होंने कहा है,‘मैंने आहार की वस्तुओं की मर्यादा बाँधने और अंधेरे से पहले भोजन कर लेने का व्रत लेना निश्चय किया । चैबीस घंटों में पाँच चीज़ों से अधिक कुछ न खाने का और रात्रि भोजन त्याग का व्रत तो मैंने ले ही लिया ।

इन दो व्रतों ने मेरी काफी परीक्षा की है किन्तु जिस प्रकार परीक्षा की है, उसी प्रकार मेरे लिए ढाल भी सिद्ध हुए हैं । इनके कारण मेरा जीवन बढ़ा है और इनकी वजह से मैं अनेक बार बीमारियों से बच निकला हूँ ।’
आत्मकथा पृष्ठ 356–357
सूर्यास्त के पहले भोजन कर लेने से ग्रहण किए हुए भोजन को पाचन का अधिक समय मिल जाता है, हम जानते ही हैं कि वही भोजन हमारे शरीर का निर्माण करता है जो पच जाता है । इसलिए अधिक भोजन करना हमारे लिए लाभप्रद नहीं होगा वरन् वह भोजन लाभप्रद होगा जो पच कर रक्त में मिल 
जावे । सूर्यास्त के पूर्व भोजन कर लेने से रात्रि भर हमारी पाचन प्रणाली भोजन को पचा सकेगी और सुबह आराम से पेट साफ हो जाएगा ।

वैसे भी सभी पशु स्वभावत: ही दिन में ही आहार लेते हैं । रात्रि में आहार नहीं लेते हैं । रात्रि में आहार वही पशु लेते हैं जिन्हें हम पाल कर उनकी आदत अपने जैसी डाल देते हैं ।
मनुष्य के बच्चे भी जब माँ का दूध पीना बन्द कर देते हैं, उसके बाद वह दिन में ही खाना पसन्द करते हैं । शाम को जल्दी सो जाते हैं व सुबह जल्दी उठते हैं ।

सूर्योदय के पूर्व उठना और रात्रि को जल्दी सोना स्वस्थ रहने की पहली शर्त है ।
प्रकृति के नियमों का जितना अधिक पालन करेंगे उतना ही अधिक अच्छा रहेगा ।

Monday, August 6, 2018

सब रोगों का मूल कारण कब्ज - कारण व निवारण


स्वामी रामतीर्थ ने एक स्थान पर कहा है,‘मेरे अनुभव मेंआया है कि यदि हमारा मेदा (उदर) ठीक निरोगावस्था में हो तो हमें अत्यन्त शान्ति, एकाग्रता, ईश्वर–स्मरण और अन्त:करण की शुद्धि प्राप्त होती है । बुद्धि और स्मरणशक्ति का बल अतितीव्र हो जाता है । प्रथम तो मैं खाता ही बहुत कम हूँ, द्वितीय जो खाता हूँ, पचा लेता हूँ ।’

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रोगों का आदिरोग कब्ज
एक अन्य स्थान पर वह लिखते हैं,‘बराबर चिकना–चुपड़ा, माल–मसालेदार भोजन पेट में ठूँसते रहने से तीक्ष्ण बुद्धि छात्र भी अयोग्य और प्रमादशील हो जाता है । उसके विपरीत हल्के और सुपाच्य भोजन से मस्तिष्क सदैव स्वतन्त्र और खुला रहता है और यही सफल विद्यार्थी जीवन का गुप्त रहस्य है ।’
कब्ज क्या है ? हमारी आँतों से मल का निष्कासन समुचित रूप से व नियमित रूप से न होना ही कब्ज है । नियमितरूप से प्रात: बिस्तर से उठते ही शौच की हाजत होनी चाहिए । मल बँधा हुआ, रंग पीला या भूरा रस्सी की तरह गोल, लम्बा, लचीला, दुर्गन्धरहित हो, एक बार में बिना जोर लगाए, गुदाद्वार को जरा भी गन्दा किए हुए बिना निकल जावे तो समझना चाहिए कि हम कब्ज से पूर्णतया मुक्त हैं ।
यदि नियमित शौच होता है किन्तु मल कड़ा, बदबूदार, रुक–रुक कर या जोर की आवाज के साथ होता है तब भी समझना चाहिए कि पाचन में कहीं–न–कहीं कोई खराबी है ।
स्वस्थ रहने के लिए पहली आवश्यकता है कि हम कब्ज से पूर्णतया मुक्त रहें क्योंकि भोजन से हमारा शरीर बनता है । उसी भोजन से स्वस्थ शरीर का निर्माण होता है जो भोजन भली प्रकार पच जाता है । भोजन ठीक प्रकार से पच गया है, इसका प्रमाण है कि हमारा मल निष्कासन उपरिलिखित विधि से हो । हमारे कब्ज न हो इसके लिए आवश्यक है कि कब्ज होने के कारणों को समझा जावे क्योंकि कब्ज के कारणों को समझे बिना कब्ज को नहीं मिटाया जा सकता है ।
कब्ज के कारण व निवारण
कब्ज होने के बहुत से कारण हो सकते हैं । मुख्य कारण व निवारण निम्नवत् हैं,
* शौचालय की गन्दगी,कुछ लोगों के घरों में शौचालय बहुत गन्दा रहता है । अत: वहाँ जाकर आदमी जल्दी–से–जल्दी भागने की कोशिश करता है । गाँधी जी कहते थे,‘शौचालय इतना साफ होना चाहिए जहाँ पर बैठकर मैं गीता का पाठ भी कर सकूँ ।’
* शौच का वेग रोकना,स्वाभाविक शौच का वेग सदा हल्का ही होता है । अत: शौच की हाजत होते ही तुरन्त जाना चाहिए । कहावत है,
खाई कि न खाई, न खाइबो उचित ।
जाई कि न जाई, जाइबो उचित । ।
अर्थात् जब कम भूख लगी होती है तो मन में संशय होता है कि खावें कि न खावें तब न खाना ही उचित होता है । कड़ी भूख लगने पर ही खाना चाहिए । जब मल या मूत्र का वेग हो और संशय हो कि ‘जाएँ कि न जाएँ’तब तुरन्त जाना चाहिए अर्थात् मल–मूत्र के वेग को रोकना बीमारियों को निमन्त्रण देना है ।
*  शरीर को भोजन पचने का समय न मिलना,शरीर को भोजन पचने के लिए पर्याप्त समय मिलना आवश्यक है । आजकल हम सुबह उठते ही चाय पीते हैं फिर देर रात तक खाते रहते हैं । परिणाम यह होता है कि पाचन की स्वाभाविक गति प्रभावित होती है और पाचन ठीक प्रकार से नहीं हो पाता है ।
* मानसिक चिन्ता,मानसिक चिन्ता हर रोगों का प्रधान कारण है । मन के तनावमुक्त रहने से कब्ज तो होता ही है । अन्य कोई भी रोग हो सकता है ।
* अत्यधिक श्रम,श्रम करना अच्छा है किन्तु शरीर की कार्यक्षमता से अधिक परिश्रम करना उचित नहीं है ।
* बहुत अधिक आराम,जिस प्रकार शरीर की कार्यक्षमता से अधिक परिश्रम करना उचित नहीं है, उसी प्रकार शरीर का कार्यक्षमता से कम कार्य करना भी ठीक नहीं है । दिन भर आराम करना या दिन–भर बैठे–बैठे काम करना ठीक नहीं है । शारीरिक श्रम का कार्य या योगाभ्यास करना या प्रात:भ्रमण आवश्यक है ।
* नींद पूरी न होना,पूरी नींद न लेना कब्ज का एक बहुत बड़ा कारण है ।
* बहुत कम खाना,बहुत कम खाने से भी कब्ज रहने लगता है । अपनी स्वाभाविक भूख के अनुसार पेट–भर भोजन करना चाहिए ।
* बहुत अधिक खाना,अधिकांश लोग यह सोचते हैं कि जितना ज्यादा खाएँगे उतनी शक्ति मिलेगी । यह सोचना गलत है । शरीर निर्माण उसी भोजन से होता है जो पच जाता है । अत: भूख से अधिक खाने से बदहजमी व कब्ज ही होता है ।
*  दस्तावर दवाओं का प्रयोग,दस्तावर दवाओं के प्रयोग से आँतों की स्वाभाविक शक्ति अवरुद्ध होने लगती है । अप्राकृतिक एवं अतिरिक्त दबाव के कारण पाचन संस्थान कमजोर होने लगता है ।
कुछ लोग नियमित रूप से दस्तावर दवाओं का प्रयोग करते हैं । इससे धीरे–धीरे उनका पाचन संस्थान कमजोर होते–होते उतना कमजोर हो जाता है कि एक समय ऐसा आता है कि दस्तावर दवाएँ भी असर करना बन्द कर देती हैं ।
इस प्रकार दस्तावर दवाओं का प्रयोग करते–करते वे लोग अपने पाचन संस्थान का सत्यानाश कर देते हैं और कब्ज के स्थायी रोगी बन जाते हैं तथा अनेकानेक बीमारियों को निमन्त्रण दे देते हैं ।
*  नशा,कुछ लोग अपनी दु:ख, चिन्ता आदि को भुलाने के लिए मादक पदार्थों का प्रयोग करते हैं या नशा करने लगते हैं । इससे उनकी दु:ख चिन्ता तो कम होती नहीं है वरन्  नशा करने से उनके धन का नाश होता है व मनोबल कम होता है । शरीर के हर अंग में शिथिलता आती है । यकृत पर बुरा प्रभाव पड़ता है, पाचन संस्थान सहित शरीर के हर अंग कमजोर हो जाते हैं, कब्ज रहने लगता है ।
*  नाभि का हट जाना,यदि नाभि अपने स्थान से हट जाती है तो भी कब्ज रहने लगता है ।
*  बिना चबाए खाना,भगवान ने दाँत चबाने के लिए दिए हैं, हम दाँतों का काम आँतों से लें तो यह हमारी भूल ही तो होगी । साधारण–सा नियम है, दाँतों से भोजन के हर कौर को इतना चबाएँ कि पानी बन जाए । इस प्रकार खाया गया भोजन ठीक से पचेगा, आँतों पर अतिरिक्त भार नहीं पड़ेगा, फलस्वरूप कब्ज का कोई प्रश्न ही नहीं रहेगा ।
* भोजन में फल व सब्जी की कमी,सब्जियाँ क्षार प्रधान होती हैं । हमारे भोजन में अनाज कम तथा फल–सब्जियाँ अधिक मात्रा में होनी चाहिए । सब्जियाँ व फल पाचक, पोषक, निष्कासक होते हैं ।
पाचक: सब्जी–फल शीघ्र पच जाते हैं ।
पोषक: सब्जी–फल अनाज की अपेक्षा अधिक पोषण देते हैं ।
निष्कासक: सब्जी–फल आँतों की अच्छी तरह सफाई करते हैं फलस्वरूप कब्ज नहीं होने पाता है ।

* बिना फुजले वाली खुराक खाना,गेहूँ से चोकर निकालकर खाना, चावल का माड़ निकालना व पॉलिश वाला चावल अर्थात् चावल के ऊपर का लाल कण या पीली पर्त निकाल देना, चने का छिलका उतारकर बेसन बनाना, मैदा आदि का प्रयोग करना कब्ज को दावत देना है । हमारी आँतें सीधी न होकर वर्तुलाकार होती हैं । इनमें से भोजन घूमकर जाता है । अत: फुजले वाली खुराक खाने से भोजन का पाचन अच्छी प्रकार हो जाता है ।
शहरों में जो लोग पैकेट का आटा प्रयोग करते हैं वह यदि एक किलोग्राम आटे में 100 से 200 ग्राम चोकर डालकर खावें व सब्जियों व फलों का भरपूर प्रयोग करें तो कब्ज नहीं रहेगा ।
* बिना कड़ी भूख लगे खाना,कब्ज या शरीर में किसी भी बीमारी का प्रधान कारण है बिना भूख लगे खाना । बिना भूख लगे कुछ भी नहीं खाना चाहिए, न ही सादे पानी के अतिरिक्त कोई पेय पदार्थ लेना चाहिए, न ही फल आदि लेना चाहिए । तात्पर्य यह है कि बिना कड़ी भूख लगे कुछ भी खाद्य–पदार्थ खाना कब्ज को निमन्त्रण देना है ।
कड़ी भूख लगने पर जो कुछ भी खाया जाता है वह पच जाता है । यदि उपरिलिखित बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाए तो कब्ज नहीं होगा, पाचन–क्रिया भलीभाँति चलेगी तो किसी बीमारी का प्रश्न ही नहीं होगा और शरीर स्वस्थ रहेगा । शरीर को भोजन पचाने के लिए समय दें ।
* कब्ज का सबसे बड़ा कारण चाय, कॉफी,चाय, कॉफी भी एक प्रकार का नशा ही है । यदि समय पर चाय न मिले तो बेचैनी होने लगती है । चाय से आँतें कड़ी हो जाती हैं । परिणामस्वरूप कब्ज रहने लगता है ।

मेरुदंड और शक्तिचक्र


योगशास्त्र के अनुसार सात प्रमुख चक्र हैं जो मेरुदण्ड के मूल से सिर के शीर्ष स्थान तक सुषुम्ना नाड़ी में अवस्थित हैं । प्रत्येक चक्र की आकृति खिले हुए कमल के पुष्प की भाँति है और इन कमल के दलों की संख्या एवं रंग अलग–अलग हैं । भौतिक रूप से इन चक्रों का सम्बन्ध प्रमुख नाड़ी जालों तथा अन्त:स्रावी ग्रन्थियों से है ।

Image result for मेरुदंड और शक्ति चक्रमेरुदंड में सप्तचक्रों की स्थिति
सीधे इन चक्रों का ध्यान करते हुए योगसाधक साधना करें तो नाड़ी जालों एवं अन्त:स्रावी ग्रंथियों पर शीघ्र एवं शक्तिशाली प्रभाव होते हैं ।
शक्ति चक्रों की स्थिति और कार्य
मूलाधार चक्र
इस चक्र का स्थान गुदामूल माना जाता है । यह स्थूल तत्त्व पृथ्वी का स्थान है । यह चक्र पूरे भौतिक शरीर को नियंत्रित करता है तथा उसे शक्ति देता है । यह मेरुदंड का आधारस्थल होने के कारण उसे बल प्रदान करता है । रक्त उत्पादन और उसकी गुणवत्ता, एड्रीनल ग्लैंड्स, प्रजनन अंग आदि को प्रभावित करता है । यह चक्र शरीर के ताप पर असर डालता है । बच्चों के विकास तथा उनकी शक्ति पर भी प्रभाव डालता है ।
इस चक्र में असंतुलन या विकार आने पर पाचन सम्बन्धी रोग, शरीर की हड्डियों के जोड़ों में दर्द, रीढ़ की हड्डी संबंधी रोग, रक्त संबंधी विकार, एलर्जी, घावों का देर से भरना आदि शिकायतों में से कोई भी हो सकती है ।
जिन व्यक्तियों का मूलाधार चक्र पूर्ण रूप से सक्रिय रहता है, उनका स्वास्थ्य ठीक रहता है । वास्तव में यह हमारे शरीररूपी वृक्ष का मूल या जड़ है । अत: इसका महत्त्व स्पष्ट है ।
स्वाधिष्ठान चक्र 
यह चक्र उपस्थमूल के पीछे, पेडू के पास, मेरुदंड में स्थित माना जाता है । इसका संबंध एड्रीनल ग्लैंड्स (Adreanal glands) से भी होता है । यह विशेष रूप से काम–अंगों तथा मूत्राशय से संबंध रखता है । इस चक्र की शक्ति पर आज्ञारव्य चक्र, विशुद्धारव्य चक्र और मूलाधार चक्र की क्रियाओं का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है । इसके अतिरिक्त यह अन्य समस्त चक्रों पर भी थोड़ा प्रभाव डालता है । इसका तत्त्व जल है अर्थात् पंचमहाभूतों में से जल का प्राणतत्त्व इसका आधार है ।
मणिपूरक चक्र
यह चक्र नाभि के पीछे मेरुदंड में स्थित माना जाता है । यह भौतिक और सूक्ष्म शरीर का केंद्र है । यहाँ से ऊर्जा का संतुलन होता है । यह पाचन संस्थान य  ( Digestive System) से संबंध रखता है और उसे नियंत्रित करता है । इसका तत्त्व अग्नि या सूर्य है ।
अनाहत चक्र
यह हृदय के पीछे उससे थोड़ा ऊपर मेरुदंड में स्थित माना जाता है । यह विशेष रूप से हृदय को नियंत्रित करता है । यह व्यक्ति की कोमल और उदार भावनाओं तथा प्रेम का केंद्र है । यह फेफड़ों, श्वास–प्रश्वास तथा रक्तप्रवाह को प्रभावित करता है । इसका मुख्य तत्त्व वायु है ।
अनाहत चक्र में विकार आने पर फेफड़े तथा हृदय के रोग हो जाते हैं । मनोमस्तिष्क के भावना–प्रधान रोग जैसे अवसाद होना, मन में भय बैठ जाना, अत्यधिक भावुक होना, चिंतित तथा तनावग्रस्त रहना आदि भी अनाहत चक्र में दोष आ जाने के कारण होते हैं क्योंकि अनाहत चक्र का सीधा संबंध आज्ञारव्य, विशुद्धारव्य तथा सहस्रार चक्रों से रहता है ।
विशुद्धारव्य चक्र
यह चक्र कंठ के पीछे मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी में स्थित माना जाता है । यह थायराइड और पैराथायराइड ग्लैंड्स से संबंध रखता है । विशुद्धारव्य चक्र में विकार आने पर थायराइड संबंधी रोग हो जाते हैं ।
यह चक्र गले, फेफड़ों, हृदय तथा रक्तप्रवाह पर भी प्रभाव डालता है । इस चक्र में विकार आने पर गले में सूजन, दमा, जुकाम, खाँसी तथा गले संबंधी अन्य रोग हो सकते हैं ।
यह चक्र शरीर पर रोगों के कीटाणुओं या विषाणुओं के द्वारा होने वाले आक्रमणों का सामना करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।
आज्ञारव्य चक्र
यह चक्र भ्रूमध्य में स्थित माना जाता है । भ्रूमध्य से सिर के पीछे की ओर सीधी रेखा मेरुदंड तक खींची जाए तो यह रेखा मेरुदंड में जहाँ मिलेगी, इसकी वास्तविक स्थिति उस स्थान पर होगी । यह पिट्यूटरी ग्रन्थि को नियंत्रित करता है । यह अन्य सभी चक्रों का स्वामी माना जाता है और उन्हें आवश्यक निर्देश देता है । यह नेत्रों तथा नासिका को भी प्रभावित करता है ।
सहस्त्रार चक्र
यह चक्र सिर के मध्य में स्थित माना जाता है । यह पीनियल ग्रंथि, मस्तिष्क और पूरे शरीर पर अपना अधिकार रखता है । इसका सीधा संबंध आज्ञारव्य चक्र से होता है । आकाश तत्त्व (प्राणशक्ति) के प्रवेश करने का यह मुख्य द्वार है ।
सहस्त्रार चक्र के विकारग्रस्त होने पर पीनियल ग्लैंड्स और मस्तिष्क संबंधी रोग हो सकते हैं । यह शरीर की वृद्धावस्था, रोगों से लड़ने की शक्ति, शरीर तथा मनोमस्तिष्क को परिस्थितियों के अनुकूल बनाने की क्षमता को नियंत्रित करता है ।
साधक प्राणायाम तथा ध्यान द्वारा इन चक्रों पर मन एकाग्र करके उनकी शक्ति एवं संतुलन में वृद्धि कर लेते हैं । इसके फलस्वरूप उन्हें कोई रोग–शोक नहीं होता और वे सदैव स्वस्थ तथा प्रसन्न रहते हैं ।

भोजन भगवान का प्रसाद


श्रीरामचरितमानस में भोजन को भगवान के प्रसाद के रूप में ही ग्रहण करने की बात कही गयी है,

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा । सादर जासु लहइ नित नासा । ।
तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं । प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं । ।
Related imageरामचरित./अयोध्या./128–1                                अर्थात् जिसकी नासिका प्रभु के पवित्र और सुगन्धित सुंदर प्रसाद को नित्य आदर के साथ ग्रहण करती है और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसाद रूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं ।     भोजन चतुर्विध है । अत: भोजन से चतुर्थांश निकाल कर प्रेम से किसी प्राणी को भगवान के भाव से दें । ऐसा करने से शेष भोजन भगवान का प्रसाद बन जाता है ।
श्रीगीता में भी भगवान को अर्पित करने के बाद अवशिष्ट भोजन को ही ग्रहण करना कल्याणकारी बताया गया है,
यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै: ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् । ।
श्री गीता 3/13
अर्थात् इस प्रकार यज्ञ–शेष प्रसाद पाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सभी पापों से छूट जाते हैं । इसके विपरीत जो केवल अपने (शरीर–पोषण) लिए ही पकाते हैं, वे तो मानो पाप का ही भक्षण करते हैं ।
यज्ञशेष अन्न खाने वाले सभी पापों से छूट जाते हैं । इस भावना के पीछे एक मनोवैज्ञानिक कारण भी है । जब भगवान को अर्पित करने की भावना से भोजन बनाया जाएगा तो शुद्ध भाव से, प्रसन्न मन से तथा सफाई से भोजन  बनाया जाएगा, भोजन बनाने वाले की भावना का भी बहुत प्रभाव पड़ता है । भगवान के प्रसाद रूप में ग्रहण करने से भोजन करने वाले के मन में शांतभाव रहेगा, जिससे पाचन भी उचित ढंग से होगा ।
चित्रकूट के जंगलों में रहने वाले कोल–भील अयोध्यावासियों को फल, पत्तियाँ और अंकुरित अन्न समर्पित करते हुए कहते हैं कि वे बड़े ही आभारी होंगे, यदि उनकी भेंट स्वीकार कर ली जाए । वे किसी प्रकार का उपकार करने की भावना से अनुप्राणित नहीं हैं, यथा,
हमहिं कृतारथ करन लगि, फल तृन अंकुर लेहु ।
रामचरित–/अयोध्या–/दोहा–250
देते समय बाएँ हाथ को भी पता नहीं होना चाहिए कि दाहिने हाथ से किसी को कुछ दिया जा रहा है । अर्थात् दाता को दान देने की भावना का कुछ भी अभिमान नहीं होना चाहिए ।
सर्वत्र ‘त्वदीयं वस्तु गोविन्दं तुभ्यमेव समर्पयामि’की भावना ही प्रमुख होनी चाहिए ।
एक वैदिक सूक्ति है,
मोघमन्नं विन्दते अप्रचेता: सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य ।
नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी । ।
ऋ मं10/सू0117/मन्त्र6
अर्थात् असावधान मूर्ख मनुष्य व्यर्थ ही अन्न का प्रयोग करता है । मैं सत्य कहता हूँ वह अन्न उसके लिए मृत्यु के तुल्य है, क्योंकि न तो वह परपोषक द्वारा सूर्य की उपासना करता है और न बाँटने के कारण अकेले ही खाने वाला, वह व्यक्ति पापी है ।
छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार,
अन्नमशितं त्रेधा विधीयते ।
तस्य य: स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति,
यो मध्यमस्तन्मान्सं योऽणिष्ठस्तन्मन: । ।
छान्दोग्य उपनिषद
अर्थात् जो आहार हम ग्रहण करते हैं, वह तीन रूपों में रूपान्तरित होता 
है । उसका सबसे भारी और स्थूल भाग विष्ठा या मल बन जाता है । मध्यम भाग मांस में रूपान्तरित हो जाता है और सूक्ष्म रक्त तथा उसका सूक्ष्मतम अंश हमारे मन का निर्माण करता है । हम जो भोजन करते हैं, उसके सूक्ष्मतम अंश से हमारा मन कैसे बनता है, इसका उल्लेख करते हुए कहा है,
दध्न: सोम्य मथ्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्व: ।
समुदीषति, तत्सर्पिर्भवति एवमेव खलु अन्नश्यास्यमानस्य,
योऽणिमा स ऊर्ध्व: समुदीयति तन्मन्नो भवति । ।
छान्दोग्य उपनिषद
अर्थात् जब दही बिलोया जाता है, तब जो सूक्ष्मतम अंश होता है, वह ऊपर आ जाता है और मक्खन का रूप ग्रहण कर लेता है । उसी प्रकार जो भोजन किया जाता है, उसका सूक्ष्मतम भाग ऊपर उठ कर मन का रूप ग्रहण कर लेता है ।
अत: शरीर–पोषण के बाद जो  मल बनता है, उसका नित्यप्रति निष्कासन होते रहना चाहिए । हमें अपने शरीर को बनाए रखना है तो भोजन तो करना ही है किन्तु सफाई का क्रम भी नहीं टूटना चाहिए ।
शरीर का वजन कम होना शरीर शुद्धि का प्रमाण है, किसी रोग का नहीं । भरतजी जब नन्दीग्राम में तपस्यारत थे, भोजन का त्याग कर दिया था तो उनकी देह दिन पर दिन दुबली होती जा रही थी । उनकी शक्ति ऐसी बढ़ी कि बिना फर के बाण से हनुमान जी को पहाड़ सहित गिरा दिया,
देह दिनहु दिन दूबरि होई ।
घट न तेजु बलु मुख छबि सोई । ।
राम–/अयो–/324/1
स्वास्थ्य का अर्थ ही है स्व (अपने) में स्थित होनाय अर्थात् स्वास्थ्य बाहर से मिलने वाली वस्तु नहीं है बल्कि अपने भीतर बैठी शक्ति को ही जगाना है ।
भोजन का केवल वही अंश पोषक तत्त्व कहला सकता है, जो आसानी से पच कर शरीर का अंग बन जाता है । संसार के सभी धर्मों में उपवास का महत्त्व स्वीकार किया गया है । उप का अर्थ है समीप और वास का रहना । उपवास  समीप रहना (परमात्मा के) देखें,
• इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब ने तीस दिनों तक उपवास किया, तब उन्हें दैवी ज्ञान प्राप्त हुआ था । इसी ज्ञान के फलस्वरूप कुरआन–शरीफ की अवतारणा हुई । रमजान के महीने में तीस दिनों तक रोजा (उपवास) रखने का नियम बनाया । इस व्रत के दौरान लगातार दान (सदका) देने का भी नियम बनाया ।
• ईसाई धर्म में चालीस दिनों के उपवास (लेण्ट) के बाद ही यीशु मसीह को दिव्यज्ञान प्राप्त हुआ था ।
• श्री रामचरित मानस में वर्णित है कि माता पार्वती ने पहले सबसे भारी भोजन अन्न का त्याग किया, फिर कन्दमूल त्याग कर फलों पर रहीं, फिर फलों को भी त्याग कर वह हवा पानी पर रहीं ।
• यही भोजनक्रम मनु–शतरूपा का भी रहा । सबसे अन्त में वे भी जल और हवा के आहार पर रहे । मनु शतरूपा कन्दमूल फलों का भोजन त्याग कर ‘बारिअधार, जल के आधार पर रहने लगे । उसके बाद जल भी त्यागा और केवल वायु के भोजन पर रहे,
एहि बिधि बीते बरष षट, सहस बारि आहार ।
संबत सप्त सहस्त्र पुनि, रहे समीर अधार । ।
राम–/बाल–/144/दोहा
ऐसा युक्तियुक्त उपवास स्थूल से सूक्ष्म भोजन अपनाने के क्रम से मनु–शतरूपा का वजन घट कर वह अस्थिपंजर मात्र रह गए,
अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा ।
तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा । ।
राम–/बाल–/144/2
विचार परिवर्तन के कारण उनके मन में पीड़ा नहीं हुई । देखें इसकी परिणति,
हृष्ट–पुष्ट तन भए सुहाए ।
मानहुँ अबहिं भवन ते आए । ।
राम–/बाल–/144/4
इसके साथ ही यह भी जान लेना आवश्यक है कि उपवास को बिना सोचे–समझे अथवा भावावेश में करना उचित नहीं है । उपवास का एक पूर्ण विज्ञान है । वैज्ञानिक आधार पर किया गया उपवास सुफल देता है । इसकी पूर्ण प्रक्रिया को समझना आवश्यक है ।
सबसे पहले प्रात:काल के नाश्ते का परित्याग कर, उसके बदले रसदार फल, कच्चे नारियल का पानी, रात में भिगोए गए मुनक्के अथवा किशमिश को मसलकर निकाला गया रस, अथवा जल में शहद और नीबू का रस, इनमें से कोई एक चीज पिएँ ।
इस प्रकार धीरे–धीरे प्रात:काल व दोपहर को फल एवं शाम को अन्नमय भोजन के क्रम पर आने से मनुष्य पूर्ण निरोगता की ओर अग्रसर हो सकता है ।
इसी के साथ यह भी समझ लें कि स्वास्थ्य का अर्थ ही है, जो स्व में स्थित हो, स्वास्थ्य कहीं बाहर से नहीं आता है । स्वास्थ्य तो सबमें रहता ही है । स्वस्थ होना स्वाभाविक स्थिति है । उसके लिए हमको कुछ करना नहीं है । स्वाभाविक रूप से जीवन व्यतीत करना है । शरीर अपनी आवश्यकतानुसार स्वयं माँग कर लेता है । शरीर को जब जिस भोजन की जरूरत होती है, वह एहसास करा देता है । जैसे कभी–कभी किसी की इच्छा होती है कि दाल खूब खावें, कभी इच्छा होती है कि दाल बिल्कुल न खावें, इसी प्रकार अन्य वस्तुओं की भी कभी इच्छा होती है, कभी नहीं । उस वस्तु–विशेष में निहित पोषक तत्त्वों की आवश्यकता उस समय शरीर–विशेष की होती है । उसी के अनुसार उस शरीरधारी की इच्छा होती है कि वह अमुक वस्तु खावे ।
इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि जब तक कड़ी भूख न लगे, कुछ न खावें । कहावत है कि कड़ी भूख लगने पर किवाड़ें भी पापड़ लगते हैं । वास्तविक भूख लगने पर शरीर में पाचन क्रिया सुचारु ढंग से होती है व मन को तृप्ति भी मिलती है, देखें,
भोजन करिअ तृपिति हित लागी ।
जिमि सो असन पचवै जठरागी । ।
राम–/उत्तर–/118/5