Showing posts with label काव्य. Show all posts
Showing posts with label काव्य. Show all posts

Friday, November 30, 2018

मुक्तक


दर्द इतना बढ़ा कि पता ही न चला ।
अंगुली कटी मेरी कि गला भी कट चला । ।
दोस्तों की खोज में भटकते चले गए ।
न मिले दोस्त ख्वाब दोस्ती का लिए रहे । ।

तुम चरणों की रज से माँ, अब मुझको जीवन दे देना ।
ज्ञान ज्योति की उस तरंग से, आपूरित कर मन देना । ।

प्रेम की वीणा के प्रिय कर तार झंकृत गीत दे दो ।
गीत के संगीत को प्रिय, तान दे कर मोल दे दो । ।

कुछ नशा ऐसा चढ़ा कि दुनिया का नशा भूल गया ।
‘शिखा’ को दीपक ही याद रहा, बाकी सहारा छूट गया । ।

मैने जगना सीख लिया है, तोड़ दिया सोने का हार ।
जिस चुप को राज कहती हो, वही तो बोलता हरदम । ।

रात को ले कर सोए थे, प्यार भरे नयनों को तेरे ।
स्वप्न ने आ कर तोड़ दिया, अहसास दिलाया सत्य मुझे । ।
स्वप्न तो आया था मन में, बीत गया वह जीवन में ।
दूर हो गई सुखद अरुणिमा, दूर हो गए तुम मुझसे । ।
पड़े रहे हम निपट अकेले, घूम रहे मन को कलपाते ।
भटक रहे हैं राहों में अब, जीवन को कुछ–कुछ समझाते । ।

आँसू तुम अब हो क्यों बहते, दुनिया की सब बातें सहते ।
कोई न समझ पाया गरिमा, यूँ ही बहते हैं सब कहते । ।
ठोकर मार हृदय–मन में प्रिय, छोड़ दिया है एकाकी ।
टूटेगा जीवन कलपन से, है इसका एहसास नही ।
घृणा स्वयं आश्चर्ययुक्त हो, अविचल हो साकार हुई ।
श्रद्धा का प्रतिफल जीवन में, नफरत का अवलम्ब बनी । ।

अपमानित कर प्रेम अतुल, क्या पाओगे तुम मेरे जीवन ।
पाकर यह सौन्दर्य विमल, क्यों नहीं हुआ उल्लसित हृदय मन । ।

मैने जगना सीख लिया है, तोड़ दिया सोने का हार ।
जिस चुप को राज कहती हो, वही तो बोलता हरदम । ।

हमारी अंगूठी नगीने बिना है, सही ज्ञान की यह अभिज्ञान मेरी ।
मेरी याद को तुम भुला न सकोगे, संस्मृति सदा ही हमारी रहेगी । ।


यौन–वेदना


नैनों से नीर बहा जाता, यौवन है अंगड़ाई लेता ।
बस प्यार किया था यौवन में, क्या पाप किया था जीवन में ?
सब स्त्रोत प्यार का दे डाला, पर नदिया तो क्या सूखी थी ?
सब कुछ तो दे डाला तुमको, पर आशा तो क्यों टूटी थी ?
किस पौधे को अब सीचूँगी, किस आभा में मैं डूबूँगी ?
क्या दीप जलेंगे जीवन में, किसको अपना तन–मन दूँगी ?
यह प्रेम पथिक आशा करती, मैं आऊँगी तेरे मन में ।
सपनों में तो आते हो तुम! कब आओगे इस जीवन में ।
यदि आओ तो तब ही आना, जब प्रेम स्त्रोत में डूबे हो ।
जब पुष्प खिले होवें मन में, तन–मन–धन सब अर्पित होवें ।
अब और कहूँ मै क्या तुमसे, जीवन के तुम ही साथी हो । ।




व्यथित हृदय

टूट गया मेरा मन प्रियतम ।
व्यथित हृदय हो स्वयं मधुरतम । ।
अम्बर की छाया के संग–संग ।
महके प्रियतम तेरा अंग–अंग । ।
वृक्षों के पतझड़ सम झरता ।
नयन अश्रु का दरिया गिरता । ।
स्वयं प्रफुल्लित हृदय उल्लसित ।
पीड़ा से मन हो गया पल्लवित । ।
प्यार की आवाज आती मानसिक तल से ।
सोच कर राहत, अभी है प्रेम के बल से । ।



उपहास



उपहास बनाने को मैं ही, बस निर्धन अबला शेष रही ।
हर घड़ी रुलाने को मैं ही, बस एक अभागन शेष रही ।
तुम पर मैंने विश्वास किया स्नेहयुक्त निर्मल मन से
इस अस्तव्यस्त जीवन–पथ पर विश्वास किया अन्तर्तम से
माँ वाणी का अधिकार दिया तुमको अपने मन उपवन में,
माँ शारदा समझ मैंने तुमको बैठाया था सिंहासन में ।
उपहास बनाने को मैं ही, बस निर्धन अबला शेष रही ।
हर घड़ी रुलाने को मैं ही, बस एक अकेली रुकी रही ।
कन्दुक–सम ठोकर खाने को, क्यों छोड़ दिया अब एकाकी ।
मेरी उस जीवन–ज्योति को, क्यों छीन लिया ए मन पापी ।
‘शिखा’ के करुण–क्रन्दन को, पहचान न पाया तव मानस
उपहास बनाने केा मैं ही, बस निर्धन–अबला शेष रही ।
हर घड़ी रुलाने को मैं ही, बस एक प्रेम की बेल रही । ।


अन्तर्बोध


मैं तुमको देखती हूँ, सोंचती हूँ, डूब जाती हूँ कहीं,
अव्यक्त प्राप्य स्नेह हृदय स्थित हो रहा यहीं ।
आँखों में है स्नेह का सागर, चेहरे से वात्सल्य टपकता है ।
जी चाहता है इस घन को, इस स्नेह हो अपने में ही समेट लूँ ।
कभी न हो अलग मेरे जीवन से सदा रहे यह स्नेहिल किरण,
जिसका आलम्बन ले कर ही मै जी सकूँ, कुछ कर सकूँ । ।
करुँगी भी क्या मेरा अस्तित्व ही कहाँ,
मिट जाए मेरा अस्तित्व यही कामना है,
नहीं यह भी कामना नही, केवल शान्ति पा सकूँ ।
इस विशाल वटवृक्ष की छाया में शान्ति पा सकूँ चिरशान्ति ।
जब छायाप्रद वृक्ष होगा तो पत्ते भी झड़ेंगें ही ।
जहाँ स्नेह का सागर होगा, वहाँ कठोरता भी होगी ही ।
क्यों विचलित होता है मन, इतनी सी कठोरता से,
समद्र में रत्न ढ़ूँढ़ोगे तो कष्ट तो होगा ही ।
ढ़ूँढ़ने भी कहाँ चले, जब मिल रहे हैं स्वयं ही,
बिखरे हुए हैं रत्न चुन सको तो चुन लो।
है विशाल समुद्र सामने फिर प्यास की तृष्णा क्यों?
जब हो विशाल जलाशय सामने, फिर उदपान में क्यों जाते हो?
होता है संस्पर्श मन का मन से,
मन का ही मन से क्यों, अन्तरतम से क्यों नहीं?
अन्तरतम ही क्यों, जब विभेदरेखा ही नही?
क्यों मैं चाहूँ मुझे कोई जाने, क्यों मैं चाहूँ मैं कुछ पाऊँ ?
पाना ही क्या है, जब सब कुछ मिला हुआ है,
मिला ही नहीं वह मेरा अपना है,
अपना भी क्या है, जब मैं ही कुछ नहीं ।
काश! अब प्यास न रहे, थकान न रहे,
इस विशाल छत्रछाया में जो सदा मेरे पास है
शान्ति पा सकूँ, केवल शान्ति, चिरशान्ति ।

अन्तर्साथी


अकेलेपन की व्यथा ने खोजा, साथी का साथ ।
व्यथित मन की खोज ने,
एकाकीपन की व्यथा को और भी बढ़ाया था ।
घर की चारदीवारी में बंद, रात्रि की नीरवता ने–
मनुज के साथ की आकांक्षा को, और भी बढ़ाया था ।
पड़ोसियों के व्यंग्यबाणों ने, समाज की रीतिरिवाजों ने–––
दूसरे के साथ की इच्छा को, और भी बढ़ाया था ।
काम से लौट कर ढोते हुए, सब्जी के थैले ने–––
जीवन साथी की खोज को, और भी बढ़ाया था ।
किन्तु–––––
अन्तर की  शान्ति ने मुझे चेताया–––
अकेलेपन की व्यथा को दूर भगाया–––
और कहा–
आत्म को पहचान कर यदि, पा सके अब शान्ति मन तो,
ज्ञान की गति क्या, स्वयं ही ज्ञान मय हो मन–सरोवर ।
प्राणगति, प्राण कराण, जीवनी है शक्ति अनुपम ।
वात्सल्ययुक्ता प्रेममय वह, स्नेहशीला है अव्यक्ता ।
व्यथितमन की वेदना को, है वही अवलम्ब देती ।
है सदा सहयोगिनी वह, मातृवत् औषधि लगाती ।
मनुज का तो साथ दुर्लभ, चेतना सबको सुलभ है ।
मनुज का जीवन क्षणिक है, एक केवल नित्य वह है ।
नाश हो यदि स्वयंवपु का, चेतना फिर भी सदा है । ।







विकल सौन्दर्य

मधुमय हो मधुमास बनी तुम मधु का ही तो पान करातीं ।
मधु की मधुर मधुरता क्या हो, जो तुम अमृतपान कराती । ।
मधुमय हो–––––
विकल हुआ मन जभी तुम्हारा दिया जगत को तभी सहारा,
निज दु:ख दु:खी मनोगति हो जब, सुख सरिता को तभी लुटाती ।
मधुमय हो––––––
अन्तर का सौन्दर्य तुम्हारा, है बिखेरता रत्न अनोखे,
रत्नों के तो मोल कहो तब, क्या प्रकाश का मोल भला है ?
मधुमय हो–––––
हो प्रकाश की मूर्तिमान तुम, अंधकार को खुद पी जातीं ।
क्यों दु:ख में तुम दु:खित हृदय हो, अपने को ही दु:ख पहुँचाती । ।
मधुमय हो––––––
क्या समाज इस ‘मधु’ को पाकर, निज विष को देने से चूका ।
यह तो दयामूर्ति तुम ही हो, शीतलता से सबको सींचा । ।
मधुमय हो––––––
व्यथित हृदय, मन स्वयं प्रकाशित, आत्मज्ञान की हो अभिलाषी ।
मातुपिता की आज्ञाकारी, ‘शोभा’ ही हो जग की सारी । ।
मधुमय हो–––––––










चेतना


इस अहंबुद्धि में डूब कर क्या होगा ?
जब अहं पर मन का प्रभाव है,
मन पर इन्द्रियों का,
इन्द्रिय में ही कामना है,
कामना ही बन्धन का कारण है ।
फिर अहं के पीछे क्यों भागो ?
जब तक अहं को माना कुछ न मिला
अहंवान गहरी खाई में गिर पड़ता है
और आत्मवान ?
वह बढ़ता है सदा ऊँचाई की ओर ।
इस जगत में प्राणी–
अहं को प्रधानता दे कर, आत्मवान बनना चाहता है ।
और फिर ?
संतुलन खो बैठता है ।
वास्तव और अवास्तव मिल कर–
अवास्तव ही बनता है ।
फिर भी–
वास्तव की ओर मुड़ो अवास्तव को छोड़ो ।
वह वास्तव है, सत् है, उस सत् में आनन्द है ।
अवास्तव असत् है ।
पुन: अहं को छोड़ कर आत्म ही सब कुछ है ।
फिर असफलता में आत्मदोष क्यों ?
आत्म में रहो सफलता स्वयं सिद्ध है ।
असफलता का कारण अहं है आत्म नही ।
मैं आत्मदोषी नहीं अहं दोषी हूँ ।



Thursday, November 29, 2018

आत्मबोध


तेरा प्रकाश सर्वत्र होने पर भी–––
मैं बार–बार क्यों विचलित हो जाती हूँ ?
जब तूने इतना दिया तो अब, मैं अलग कैसे ?
सर्वत्र प्रकाश, शान्ति व आनन्द है, फिर दु:ख, चिन्ता क्यों ?
जो तू दे रहा है, कर रहा है, वह उचित ही है ।
फिर मैं क्यों अहंरूप में सोंचती हूँ ?
आत्म ही नित्य है, आत्म में ही क्यों न स्थित हो ।
आत्मदोष असम्भव है, अहंदोष हो सकता है ।
फिर–––––
अहं को विलग कर मैं––––
बार–बार विनती करती हूँ
अहंभाव न आने पावे,
कर्म समर्पित होवें तुझमें । ।


भारतमाता


यह देश, क्या बना है यह देश?
लाखों बलिदानें, मौते हुर्इं।
माँ–बहनें हुयीं सुहाग–विहीन,
पायी आजादी, छूटे बन्धन,
पर क्या हम छुटा सके बन्धन।
परायों से जकड़ी थी माँ पहले,
अब अपने ही बेटों ने,
बाँधा है जंजीरों से ।

नया राष्ट्र निर्माण करो

याद करो अपनी गरिमा को,
नया राष्ट्र निर्माण करो ।
आस लगाता देश तुम्ही से,
निज दायित्व निर्वाह करो । ।
जीवन की आशा में बालक,
खड़े हुए अपलक, अविचल से,
दूर निराशा, अन्धकार कर, आशा का विश्वास भरो ।
अन्तर्मन को जागृत कर तुम,
नैतिकता का भाव भरो ।
याद करो–––––




मानव सम्बन्ध

मानव सम्बन्धों में अटकी,
मैं घूम रही भटकी–भटकी।
आनन्दित मन–अन्तरतम हो,
प्रभु प्रेम लगन ही जीवन हो । ।

विरह–वाणी

द्वार की ओर प्रिय की राह क्यों देखते?
क्या कोई आस अब भी बची है सखे?
क्यों न तू भी अकेले चले हे––मने ।
क्यों कली सोंचती है कि अलि ही आए?
पुष्प क्यों सोंचता है कि माली आए?
क्यों नहीं जी सके वे अकेले सखे?
क्यों न आता है भौंरा चुराने को मधु?
क्या सूख जाएगा सब रूप यों ही प्रभु?






दीपशिखा


शिखे! तुम अविरल मौन जलो ।
तम का गले हिमालय निशि भर,
भले स्वयं पिघलो । ।
शिखे!––––
अँधियारों के टूटे बन्धन,
नवप्रकाश का हो अभिनन्दन
अंधकार वाली बगिया का
करो उर्मियों से नित सिंचन
झंझाओं में भी न रुकें पग
सतत सदैव चलो । ।
शिखे!––––
बीज किरण के तुम नित बोना,
जगमग हो जग का हर कोना
अपने अन्तर की माला में–––
नई ज्योति के सुमन पिरोना
सुधा बाँटना सदा जगत को
गरल भले निगलो––– ।
शिखे!––––
जब भी कभी उदासी छाए
अंधकार से मन घबराए
तब आवाज मुझे देना मैं–––
आऊँगा दिनमान उठाए
मधु ऋतु की बन नयी भोर तुम–
यह मौसम बदलो । ।
शिखे!––––




पीड़ा



अपनी पीड़ा में मुझको, आँसू बनकर घुलने दो ।
मेरी पीड़ा बस मेरी है, एकाकी ही सहने दो ।
क्या समझेगा कोई मेरे मन की पीड़ा को,
न समझ पाई मैं ही, अपनी जीवन क्रीड़ा को ।
इस वेदनाभयी हृदय को, अब दीपक बन जलने दो ।
मेरी पीड़ा बस मेरी है, एकाकी ही सहने दो ।
बाँध रहा मन आशाएँ अब और किसी जन से है क्यों ?
इस जीवन पथ मुझको अवलम्ब बिना चलने दो । ।
मेरी पीड़ा बस––




सूखे घन

कुछ उमड़–उमड़, कुछ घुमड़–घुमड़,
आते हैं सावन के घन ।
मेरा मन, प्यासा मन,
चातक सा मन, देखे जीवन–घन । ।
क्यों कास–कास सा होता है गगन,
जाने कब बरसेगा ये मेरे आँगन ?
खेतों में सूख गयी डारी–डारी,
धान की तो सूख गई क्यारी–क्यारी ।
अन्नदेवता रुष्ट हुए क्यों,
जल की हुई कमी भारी ।
तन भी सूख गया मेरा,
मन भी तो है भारी–भारी । ।


Tuesday, November 27, 2018

मौन–प्रतीक्षा

तुम्हारे मौन में कैसा आनन्द है ?
मेरा मन जब तुमसे मिलता है–
मैं नहीं चाहती कि तुम मुझसे बोलो ।
तुम्हारा शब्द मुझे अच्छा नहीं लगता ।
अन्तरतम का हो संस्पर्श निरन्तर । ।
तुम्हारे मौन में–––
तुम मेरी ओर एक बार देख लेते हो
मेरे मन में आनन्द की हिलोरें उठने लगती हैं ।
पर––––
कभी–कभी लगता है, मैं टूट गई हूँ ।
मेरा कुछ खा गया है ।
तुम्हारी आँखों की वात्सल्य की किरण,
मेरा सब कुछ बेंध जाती है ।
मैं करती हूँ गल्तियाँ, तुम सुधार देते हो ।
पर कभी–कभी इतने कठोर क्यों ?
तुम्हारे मौन में––––
मैं प्रतीक्षा करती हूँ, उस मौन की, उस आनन्द की ।
एक बार जब तुम छूटे थे, मैं दु:ख में डूब गयी थी ।
तुम सामने थे, पर वह शान्ति नहीं थी ।
मैं प्यासी थी, मैने उस जल को पाना चाहा ।
तुमने उसे समेट लिया, मेरी प्यास बढ़ गई––––
फिर जब जल मिला तो मैं नहीं छोड़ना चाहती ।






मित्र

मित्र! मैंने तो तुम्हें चाहा बहुत था ।
पर कभी चाहा तुमने मुझे?
मित्र! मैंने तो तुम्हें समझा बहुत था ।
पर कभी समझा तुमने मुझे?
सोचती थी, झर रहा, अमृत मनोरम ।
आ गया मधुमास सुन्दर–
अमिय, शीतल, मधुर, मोहक ।
बह रहा था पवन सुरभित ।
पी मधुर आनन्द के क्षण ।
झूमती सी आ रही थी ।
ले तभी तुम आ गए क्यों ?
कंकड़ी डाली हृदय में,
तोड़कर तुम मधुर बन्धन–
छोड़ते से विगत जीवन ।

अनन्तानन्द

मैं बैठी रहती हूँ–
तुम आते हो, मौन सन्देश ले कर ।
मैं सोती हूँ,
निद्रा में मिलती है, अविचल शान्ति ।
तुम होते हो सामने, मैं अपने को भूल जाती हूँ ।
तुम्हारी झलक से शान्ति मिलती है ।
मैं कहीं अलग चली जाती हूँ ।
जब क्षणमात्र के लिए भी तुम चले जाते हो,
तो जीवन अधूरा रह जाता है ।
कैसी कल्पना है मेरी–
तुम कहाँ जाते हो,
तुम तो सदा–सर्वदा साथ हो ।
बस इसी सागर में डूब कर हिलोरें लेती रहूँ ।
बस डूब सकूँ तुम्हारे में ही–
पूरी तरह-
मैं मैं न रहूँ-
बस तुम ही तुम हो सर्वत्र सर्वदा ।











ममाभीप्सित

मैं त्याग करूँ या प्यार करूँ,
विरह में डूबूँ या भोग करूँ,
सदा अन्धड़ चलता रहता,
आँधी आती, तूफान आता ।
न थमता समीर का क्रोध कभी,
न आती बसन्त की हरियाली ।
चाहा आदर सत्कार करूँ,
नित प्यार करूँ, सम्मान करूँ ।
सब ओर व्याप्त हो शांति सदा,
यज्ञाग्नि धूम्र प्रसरित होवे ।
न प्यार मिला, न शांति मिली ।
पीड़ित विचलित जीवन है यह।
इस तुच्छ समर्पित तन–मन से–
क्या चरमलक्ष्य उपलब्धित है ?
उदासीन मन क्षोभित है।
सम्पूर्ण समर्पित जीवन हो,
यही ममाभीप्सित है।