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Friday, November 23, 2018

शास्त्रों के अनुसार मन और उसका कार्य

मन की अवस्थाएँ
जाग्रत अवस्था
जाग्रत अवस्था या जागते हुए ही सभी प्राणी सब कार्यों को करते हैं ।
स्वप्नावस्था – उपनिषदों के अनुसार
‘स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषां प्रस्वापीति ।
अत्रायं पुरुष: स्वयंज्योतिर्भवति ।’ (वृह– 4/3/9)
जब यह स्वप्न देखता है, उस अवस्था में यह सारी वस्तुओं से भरी हुई इस दुनिया की मात्राओं (सूक्ष्म अंशों अर्थात् वासनाओं) को लेकर आप ही नष्ट करके आप ही बना कर अपने प्रकाश से अपनी ज्योति से स्वप्न को देखता है, यहाँ (इस अवस्था में) यह पुरुष स्वयं ज्योति होता है ।
‘न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्ति, अथ रथान् रथयोगान् पथ: सृजते, न तत्रानन्दामुद: प्रमुदोभवन्ति, अथाऽऽनन्दान् मुद: प्रमुद: सृजते, न तत्र वेशान्ता: पुष्करिण्य: स्त्रवन्त्यो भवन्ति, अथ वेशान्तान् पुष्करिणी: स्त्रवन्ती: सृजते । स हि कर्ता’ (वृहदारण्यकोपनिषद् 4/3/10)
न वहाँ रथ, न घोड़े, न सड़कें होती हैं, पर वह रथ, घोड़े और सड़कें रच लेता है, न वहाँ आनन्द, मोह और प्रमोद होते हैं, पर वह आनन्द, मोद और प्रमोद रच लेता है, न वहाँ तालाब, झीलें और नदियाँ होती हैं, पर वह तालाब, झीलें और नदियाँ रच लेता है ।
‘अत्रैष देव: स्वप्ने महिमानमनु भवति ।’
(प्रश्नोपनिषद 4/5)
यहाँ यह देव (मन) स्वप्न में महिमा को अनुभव करता है ।
यद्दृष्टंदृष्ट मनुपश्यति, श्रुतंश्रुत मेवार्थ मनुश्रृणोति, देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुन: पुन: प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च, श्रुतंचाश्रुतंचानुभूतं चाननुभूतं च, सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्व: पश्यति ।
(प्रश्नोपनिषद 4/5)
(स्वप्न में यह मन) देखे हुए को फिर से देखता है, सुने हुए को फिर सुनता है, जो भिन्न–भिन्न देशों और भिन्न दिशाओं में अनुभव किया हुआ है, उसको फिर–फिर अनुभव करता है । देखा हुआ और न देखा हुआ, सुना और न सुना हुआ, अनुभव किया हुआ और अनुभव न किया हुआ, विद्यमान और अविद्यमान, सब कुछ देखता है और सब कुछ (राजा, नौकर, नेता, शिक्षक, सैनिक आदि–आदि) बन कर देखता है ।
स एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मा । तद्यद्यपीदंशरीरमन्धंभवत्यन्ध: सभवति, यदि स्त्राम मस्त्रामो, नैवैषोऽस्यदोषेणदुष्यति । न वधेनास्य हन्यते नास्यस्त्राम्येणस्त्राम:  ।
(छान्दोग्योपनिषद् 8/10/1–2)
यह जो स्वप्न में महिमा अनुभव करता हुआ विचरता है, यह आत्मा है । अत: यह स्थूल शरीर यदि अन्धा भी हो जाए तो वह (स्वप्नद्रष्टा) अन्धा नहीं होता है । यदि वह काना हो तो भी वह (स्वप्नद्रष्टा) काना नहीं होता है । न इसके दोष से वह दूषित होता है, न इसके वध से वह मरता है, न इसके कानापन से वह (स्वप्नद्रष्टा) काना होता है ।
सुषुप्ति अवस्था –उपनिषदों के अनुसार
तद्यथाऽस्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्यस श्रान्त: हत्य पक्षौ संलयायैव ध्रियते एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति, यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते, न कञ्चन स्वप्नं पश्यति ।
(वृहदारण्यकोपनिषद 4/3/19)
जिस प्रकार एक बाज या कोई और तेज पंछी इस आकाश में इधर–उधर उड़ करके थका हुआ दोनों पंखों को लपेट कर घोंसले की तरफ मुड़ता है, इस प्रकार यह (आत्मा) इस अवस्था की ओर दौड़ता है, जहाँ गहरा सोया हुआ न कोई कामना चाहता है, न कोई स्वप्न देखता है ।
‘स यथा शकुनि: सूत्रो प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयते, एवमेव खलु सोम्यैतन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायपन मा लब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते, प्राणबन्धन,हि सोम्य मन इति ।’
(छान्दोग्योपनिषद 6/8/2)
जैसे शिकारी के तागे से दृढ़ बँधा हुआ कोई पंछी दिशा दिशा में उड़ने का प्रयास करके कहीं आश्रय न पाकर उसी जगह का आश्रय लेता है, जहाँ वह बँधा हुआ है । ठीक इसी प्रकार हे सोम्य! यह मन (जागृत और स्वप्न में) विभिन्न दिशाओं में घूमकर और कहीं आश्रय न पाकर प्राण का ही सहारा लेता है, क्योंकि यह मन हे सोम्य! प्राण से बँधा हुआ है (प्राण के सहारे है) ।
तद् यत्रैतत् सुप्त: समस्त: सम्प्रसन्न: स्वप्नं न विजानात्येषआत्मेति
(छान्दोग्योपनिषद् 8/11/1)
जब यह सोया हुआ, आराम करता हुआ सम्प्रसन्न (हलचल से रहित पूरे आराम से) हुआ स्वप्न को नहीं देखता है, वह आत्मा है ।
अथ यदा सुषुप्तो भवति, यदा न कस्यचन वेद, हिता नाम नाड्योद्वासप्तति: सहस्त्राणि हृदयात् पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभि: प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते ।
(बृहदारण्यकोपनिषद 2/1/19)
जब यह (मन) गहरी नींद में सोया हुआ होता है, जब इसे किसी की खबर नहीं होती, उस समय वह उन हिता नामी नाड़ियाँ जो हृदय से सारे शरीर में पहुँचती हैं, उन (नाड़ियों) के द्वारा चल कर पुरीतत् नाड़ी में सोता है ।
यत्रैष एतत् सुप्तो ऽभूद् य एष विज्ञानमय: पुरुष: । तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते ।
(बृहदारण्यकोपनिषद 2/1/17)
जब यह (मन) जो यह विज्ञान स्वभाव है, गहरा सोया हुआ था, तब वह इन इन्द्रियों के विज्ञान के द्वारा विज्ञान को लेकर जो यह हृदय के अन्दर आकाश है, वहाँ आराम करता है ।
गीता के अनुसार स्थिरबुद्धि या निश्चयात्मिका बुद्धि
गीता कहती है—
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर: ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता । ।
गीता 2/61 । ।
अर्थात् साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण हो कर ध्यान में बैठे, क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर होती है ।
जब मनुष्य भगवान के प्रति समर्पित हो जाता है, तब उसका मन शान्त हो जाता है । शान्त मन सफलता का आधार है ।
ध्यायतो    विषयान्पुंस:    सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते । ।
गीता 2/62 । ।
अर्थात् विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है ।
क्रोधाद्भवति  सम्मोह:  सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम: ।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति । ।
गीता 2/63 । ।
अर्थात् क्रोध से अत्यन्त मूढ़भाव उत्पन्न होता है, मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है ।
प्रसादे   सर्वदु:खानां   हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो  ह्याशु  बुद्धि: पर्यवतिष्ठते । ।
गीता 2/65 । ।
अर्थात् अन्त:करण की प्रसन्नता होने पर साधक के सम्पूर्ण दु:खों का अभाव हो जाता है । उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हट कर एक परमात्मा में ही भली भाँति स्थिर हो जाती है ।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुकतस्य भावना ।
न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम । ।
गीता 2/66 । ।
अर्थात् न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्त:करण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है ।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु     विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा     प्रसादमधिगच्छति । ।
गीता 2/64 । ।
अर्थात् ‘अपने अधीन किए हुए अन्त:करण वाला साधक अपने वश में की हुई, रागद्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ । अन्त:करण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है ।
मन सबल कैसे हो ?
शिवसंकल्प
देखें यजुर्वेद के कुछ मंत्रों को—
यज्जाग्रतो  दूरमुदैति  दैवं तदु  सुप्तस्य  तथैवैति ।
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–1
अर्थात् (यत्) जो (दैवम्) दिव्य शक्ति वाला मेरा मन (मे मन:)(जाग्रत:) जागते हुए (दूरम् उदैति) दूर–दूर जाता है । (तदु) वह (सुप्तस्य) सोते हुए भी (तथा एव) उसी प्रकार (एति) दूर चला जाता है । इन्द्रियों का (एक ज्योति:) एक मात्र प्रकाशक (ज्ञान में साधक) है । (तत) वह (मे मन:) मेरा मन (शिव संकल्पम्) शुभसंकल्प अर्थात् अच्छे विचार वाला (अस्तु) होवे ।
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीरा: ।
यदपूर्वं यक्षमन्त: प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–2
अर्थात् (येन) जिसके द्वारा (अपस) कर्मनिष्ठ लोग (मनीषिण:) मनस्वी लोग (यज्ञे) यज्ञों में, (विदथेषु) विशेष ज्ञानपूर्वक किये जाने वाले कार्यों में, (कर्माणि) करने योग्य कर्मों को (कृण्वन्ति) करते हैं, मेरा मन (यत्) जो (अपूर्वम्) अपूर्व है (प्रजानाम अन्त:) प्रजाओं के अन्दर (यक्षम) पूजनीय है (तत्) वह (मे मन:) मेरा मन (शिव संकल्प) शुभ विचार वाला (अस्तु) होवे ।
यत्प्रज्ञानमुत  चेतो  धृतिश्च  यज्ज्योतिरन्तरमृतं   प्रजासु ।
यस्मान्न ऋते किंच न कर्म क्रियते तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु ।
यजुर्वेद 34–3
अर्थात् (यत्) जो (प्रज्ञानम) ज्ञान का साधन है (उत) और (चेत:) चेतना का आधार (धृति: च) और निश्चय करने की वृत्ति वाला है । (यत्) जो (प्रजासु अन्त:) प्रजाओं के अन्दर (अमृतम्) मरणधर्म से रहित (ज्योति:) ज्ञान का प्रकाश है, (यस्मात् ऋते) जिसके बिना (किञ्चन) कोई भी (कर्म) कार्य (न) नहीं (क्रियते) किया जा सकता (तत्) वह (मे) मेरा (मन:) मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचार वाला (अस्तु) हो ।
येनेदं  भूतं   भुवनं  भविष्यत्परिगृहीतममृतेन  सर्वम् ।
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–4
अर्थात् (येन) जिस (अमृतेन) मरण धर्म से रहित (इदं) इस (सर्वम्) समस्त (भूतम्) भूतकाल को (भुवनम्) वर्तमान काल को (भविष्यत्) भविष्यतकाल को (परिगृहीतम्) अपनी चेतना की शक्ति से अपने में पकड़ा हुआ है, (येन) जिसके द्वारा (सप्त होता) सप्त होताओं वाले (यज्ञ: तायते) यज्ञ का वितान किया गया जा रहा है । (तत् मे मन:) वह मेरा मन (शिवसंकल्प वाला) शुभ विचारों वाला (अस्तु) हो ।
यस्मिन्नृच: साम यजूंषि यस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभाविवारा: ।
यस्मिन् श्चित्तं  सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–5
अर्थात् (रथनाभौ) रथ की नाभि में (आरा: इव) अरों की तरह (यस्मिन्) जिस (मन) में (ऋच:) ऋग्वेद (साम) सामवेद (यजूंषि) यजुर्वेद (प्रतिष्ठिता:) प्रतिष्ठित हैं अर्थात् ठहरे हुए हैं, (यस्मिन्) जिसमें (प्रजानाम्) प्रजाओं की (सर्वम्) समस्त (चित्तं) चिन्तनशक्ति (ओतम्) ओत–प्रोत है (तत्) वह (मे मन:) मेरा मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचार वाला (अस्तु) हो ।
सुषारथिरश्वानिव      यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव ।
हृत्प्रतिष्ठं  यदजिरं  जविष्ठं तन्मे  मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–6
(सुसारथि:) अच्छा सारथी (अश्वान्) घोड़ों को (इव) जैसे (ने नीयते) पुन: पुन: घुमाता है (तत् मे मन:) वह मेरा मन (अभीशुभि:) लगामों के द्वारा (वाजिन: अश्वान्) बलवान् घोड़ों को (सुसारथि: इव) उत्तम सारथि की तरह (यत्) जो मन (मनुष्यान्) मनुष्यों को (ने नीयते) सन्मार्ग से ले जाता है, (यत्) जो मेरा मन (हृत्प्रष्ठितम्) हृदय–चेतना स्थान में स्थित है (यत्) जो (अरिम्) गतिशील अर्थात् चंचल है, (जतिष्ठम्) शीघ्रगामी है, (तत् मे मन:) वह मेरा मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचारों वाला (अस्तु) हो ।
इन मन्त्रों में शिवसंकल्प अर्थात् सकारात्मक विचारों को ही महत्त्व दिया गया है ।
श्रद्धा का महत्त्व
(ऋग्वेद मण्डल 10 सूक्त 151 मंत्र 1–5)
श्रद्धा सूक्त ऋग्वेद के दशवें मण्डल का 151 वाँ सूक्त है । इस सूक्त के अनुसार श्रद्धा से ही मनुष्य की उन्नति हो सकती है । इस श्रद्धा से ही मनुष्य सर्वविध पदार्थों को प्राप्त कर सकता है ।
श्रद्धयाग्नि:  समिद्धयते  श्रद्धया  हूयते हवि: ।
श्रद्धां  भगस्य मूर्धनि  वचसा वेदयामसि ॥1॥
श्रद्धा से अग्नि जलाई जाती है । श्रद्धा से उसमें आहुति डाली जाती है । ऐश्वर्य के मूर्धा–शिर पर विराजमान उस श्रद्धा को हम अपनी वाणी से घोषित करते हैं, व्यक्ति–व्यक्ति को जनाते हैं ।
प्रियं श्रद्धे  ददत:  प्रियं श्रद्धे  दिदासत: ।
प्रियं भोजेषु यज्वस्विदं म उदितं कृधि ॥2॥
हे श्रद्धा! तू देने वाले का प्रिय कर, कल्याण कर भला कर । हे श्रद्धा! तू देने की इच्छा–विचार–संकल्प करने वाले का प्रियकर, भला कर । हे श्रद्धा! तू भोजों में, यज्ञों में मेरा प्रिय कर–कल्याण कर–भला कर, और यह उदयकर–अभ्युदय कर ।
यथा  देवा  असुरेषु  श्रद्धामुग्रेषु  चक्रिरे ।
एवं भोजेषु यज्वस्वस्माकमुदितं कृधि ॥3॥
देवजन शूर–वीर, प्राणरक्षक क्षत्रियों–सैनिकों पर जैसे श्रद्धा–विश्वास व भरोसा रखते हैं—करते हैं, ऐसे ही हे श्रद्धा! तू भोजों और यज्ञों में हमारा उदय कर ।
श्रद्धां  देवा  यजमाना  वायुगोपा उपासते ।
श्रद्धा हृदय्याकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु ॥4॥
देवजन, यजमान और प्राणायाम के अभ्यासी जन हार्दिक संकल्प से श्रद्धा की उपासना करते हैं ।
मन में कोई संकल्प होने पर भी लोग श्रद्धा की शरण में जाते हैं ।  है । श्रद्धा से धन प्राप्त होता है ।
श्रद्धां  प्रातर्हवामहे  श्रद्धां मध्यंदिनं परि ।
श्रद्धां सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह न: ॥5॥
अर्थात् हम प्रात: श्रद्धा का आह्वान करते हैं, हम मध्याह्न काल में श्रद्धा का सब ओर से आह्वान करते हैं, हम सूर्यास्त समय में श्रद्धा का आह्वान करते हैं । हे श्रद्धा! तू इस मानव जीवन में हमें श्रद्धामय बना ।
पुरुषार्थ
मा स्रेधत सोमिनों दक्षता महे,
कृणुध्वं   राय     आतुजे ।
तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति,
न    देवास:   कवत्नवे ॥
ऋग्वेद 7/32/9
अर्थात् हे सौम्य गुण वाले मनुष्यों! तुम पथभ्रष्ट न हो, महान् लक्ष्य के लिए पुरुषार्थ करो । धन प्राप्ति के लिए प्रयत्न करो, पुरुषार्थी ही विजयी होता है । सुखपूर्वक निवास करता है और धनादि से पुष्ट होता है । देवगण अकर्मण्य के सहायक नहीं होते, आलसी के लिए कहीं स्थान नहीं है ।
अयं में हस्तो भगवान्, अयं में भगवत्तर: ।
अयं में विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शन: ॥
ऋग्वेद 10/60/12
अर्थात् यह मेरा (दाहिना हाथ) ऐश्वर्यशाली है, यह मेरा (बायाँ हाथ) उससे भी अधिक सौभाग्यशाली है । यह मेरा हाथ सभी रोगों को दूर करने वाला है और यह हाथ स्पर्श से कल्याण करने वाला है ।
अध स्वप्नस्य निर्विदेऽभुञ्जतश्च रेवत: ।
उभा   ताबस्त्रि     नश्यत: ।
—ऋग्वेद 1/191/12
अर्थात् प्रात:काल का स्वप्न अच्छा नहीं होता यप्रात:काल सोना ठीक नहीं हैद्ध है, जो धन का उचित उपयोग नहीं करते हैं । वे दोनों शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ।
अन्तर्बोध
स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी कहते हैं—
एक बार पहले–पहल मैं प्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी के यहाँ गया ।  पहले–पहल तब मैं भी उन्हें नहीं पहचानता था, वे भी मुझे नहीं पहचानते थे । तब मैंने पूछा कि प्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी कौन हैं, उनकी कुटिया कहाँ है ? वे खुद ही थे—बोले—हे नाथ नारायण वासुदेव! आओ! चला गया ।
जब बैठ गया तब खिलाया–पिलाया और फिर लिखकर दिया कि आज रात को हमने स्वप्न देखा था, हमारी एक समस्या थी कि हमारे यहाँ तेरह महीने का अखण्ड कीर्तन होगा उसमें कथा कौन सुनाएगा ? मन में यह चिन्ता थी । रात में हमको स्वप्न आया और तुमको देखा । तुम आ गए । तो अब ? अब तो स्वप्न कारण हो गया और जाग्रत कार्य हो गया ।
ऐसी एक नहीं अनेक बातें हम जानते हैं और जिन पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है । मैं गोरखपुर गया, तो हनुमान प्रसादजी की पत्नी ने बुलाया मुझे, घर में भोजन करने के लिए । यह बात होगी—सन् 34–35 के लगभग की । 32 वर्ष हो गए ।  जब मैं गया तो वे बोलीं—‘आ गए’! हनुमान प्रसाद जी ने कहा कुछ नहीं । बाद में मालूम पड़ा कि उन्हें रात में स्वप्न आया था कि हमारे घर में भागवत की पुस्तक लेकर कोई ब्राह्मण आएँगे और मैं आ गया । बहुत प्रेम करते थे, अब भी बहुत प्रेम करते हैं और हनुमानप्रसाद जी तो मुझे अपना भाई ही मानते हैं ।
माण्डूक्य प्रवचन, अलातशान्ति प्रकरण
पूरी धरती ही एक परिवार है
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव
यद्    भद्रं    तन्न   आ     सुव ।
हे देव! हमारी सभी बुराइयों को दूर कर दो, जो कल्याणकारी हो, वह प्रदान करो ।
अन्यो अन्यस्तै वल्गु वदन्त एव ।
एक दूसरे के लिए हम अच्छा ही कहें । परस्पर प्रिय वचन बोलते हुए आगे बढ़ो ।
सम्राऽस्यसुराणां ककुन्मनुष्याणाम् ।
देवानांमर्धभागसि, त्वमेकवृषो भव ।
अर्थात् मनुष्य संसार में सर्वश्रेष्ठ होकर रहे, आसुरी वृत्तियों पर पूर्ण नियंत्रण रखें । कम से कम आधे दैवी गुण जीवन में अवश्य हों ।
सुरा मन्युर्विभीदको अचित्ति: ।
सुरा, क्रोध, द्यूत और अज्ञान पाप के कारण हैं ।
संज्ञानं  न   स्वोभि:    संज्ञानमरणोभि:
संज्ञानमश्विना युवम्, इहास्मासु नि:यच्छतम् ।

अयं  निज:   परोवैति  गणना लघुचेतसाम्
उदार  चरितानां  तु  वसुधैव   कुटुम्बकम् ।
यह अपना है, यह पराया है, ऐसा छोटे चित्त वाले ही सोचते हैं । उदार चरित्र वाले के लिए तो सारी धरती ही एक परिवार है ।
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग भवेत ।
सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, हम सबका कल्याण देखें, कोई भी दु:ख का भागी न हो ।
सह नाववतु, सह नो भुनक्तु । सहवीर्यं करवावहै तेजस्विनावधीतमस्तु,     मा  विद्विषावहै
शान्ति:       शान्ति:     शान्ति: ।
ईश्वर हम गुरु और शिष्य दोनों की रक्षा करें । हम साथ–साथ भोजन करें । हमारी शक्ति में वृद्धि हो, हमारा पठन–पाठन तेजस्वी हो, किसी से विद्वेष न
करें ।
समानी व  आकूति:  समाना  हृदयानि व: ।
समानमस्तु वोमनो,  यथा व  सुसहासति ॥

हमारे विचार समान हों, सबके  हृदय, मन व चित्त एक हों, जिससे हम सबका मन सुन्दर हो ।
समानी प्रपा सह वोऽन्नभाग: समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि ।
सम्यञ्चोऽग्निं    सपर्यत—अरा नाभिमिवाभित: ॥
हम अन्न और ज्ञान को मिल कर प्राप्त करे । गुरु कहते हैं कि मैं तुम्हें युक्त करता हूँ कि मिल कर काम करो ।
बाइबिल (नया विधान) के अनुसार विश्वास
सन्त मत्ती
विश्वास करने वाले के लिए सब कुछ सम्भव है—
तुम्हारे माँगने से पहले ही तुम्हारा पिता जानता है कि तुम्हें किन–किन चीजों की जरूरत है । (6–9)
यदि तुम दूसरों के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा परन्तु यदि तुम दूसरों को क्षमा नहीं करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा नहीं करेगा । (6–14–15)
यह कहते हुए चिन्ता मत करो—हम क्या खायें, क्या पियें, क्या पहनें । (6–31) ––––तुम्हारा स्वर्गिक पिता जानता है कि तुम्हें इन सभी चीजों की जरूरत है । (6–32) तुम सबसे पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीजें तुम्हें यों ही मिल जायेंगी । (6–33) कल की चिन्ता मत करो । कल अपनी चिन्ता स्वयं कर लेगा । आज की मुसीबत आज के लिए बहुत है । (6–34)
माँगो और तुम्हें दिया जायेगाय ढूँढ़ो और तुम्हें मिल जायेगाय खटखटाओ और तुम्हारे लिए खोला जाएगा । (7–7) क्योंकि जो माँगता है, उसे दिया जाता हैय जो ढूँढता है, उसे मिल जाता है और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाता है । (7–8) बुरे होने पर भी यदि तुम लोग अपने बच्चों को सहज ही अच्छी चीजें देते हो, तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता माँगने वालों को अच्छी चीजें क्यों नहीं देगा ? (7 । ।)
दूसरों के प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो । (7/12)
बेटी, ढारस रखो । तुम्हारे पाप क्षमा हो गए हैं । (9–2–)
सामूहिक प्रार्थना—मैं तुमसे यह भी कहता हूँ यदि पृथ्वी पर तुम लोगों में दो व्यक्ति एकमत होकर कुछ भी माँगोगे, तो वह उन्हें स्वर्गिक पिता की ओर से निश्चय ही मिलेगा । (18/19)
और जो कुछ तुम विश्वास के साथ प्रार्थना में माँगोगे, वह तुम्हें मिल जाएगा ।’ (21–22)
सन्त मारकुस
यदि आप कुछ कर सकें! ––––विश्वास करने वाले के लिए सब कुछ सम्भव है । (9–23) जब तुम प्रार्थना के लिए खड़े हो और तुम्हें किसी से कोई शिकायत हो, तो क्षमा करो, जिससे तुम्हारा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा कर दे । (11–25)
ईसा ने उनसे आगे कहा—जाओ, तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है । उसी क्षण उसकी दृष्टि लौट आयी और वह मार्ग में ईसा के पीछे हो लिया ।’ (10–52)
सन्त लूकस
किसी के विरुद्ध निर्णय न दो और तुम्हारे विरुद्ध भी निर्णय नहीं दिया जायेगा । क्षमा करो और तुम्हें भी क्षमा मिल जाएगी । (6/37) दो और तुम्हें भी दिया जायेगा । दबा–दबाकर, हिला–हिलाकर भरी हुई, ऊपर उठी हुई, पूरी की पूरी नाप तुम्हारी गोद में डाली जाएगीय क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा । (6/38)

वेदों में मानसिक स्वास्थ्य

मन की स्थिरता व सबलता
आत्मिक संकल्प
यदाकूतात् समसुस्त्रोद्धृदो  वा  मनसो वा  संभृतं चक्षुषो वा ।
तदनु प्रेत सुकृतामु लोकं यत्र ऋषयो जग्मु: प्रथमजा: पुराणा: । ।
यजुर्वेद 18/58
यह जो शक्तिबिन्दु आत्मिक ईक्षण से, आत्मिक संकल्प से, अच्छी  तरह चुआ हुआ है । हृदय से, बुद्धि से या मन से या आँखों से चुए हुए इसे तुमने सम्यक्तया धारण कर लिया है तो उसे ही लेकर चल पड़ो । इस तरह तुम उस श्रेष्ठ कर्मों वालों के लोक में पहुँच जाओगे जहाँ जिस लोक को तुमसे पहले उत्पन्न हुए ऋषि लोग पहुँचते रहे हैं ।
अर्थात् आत्मसंकल्प व सत्संकल्प से सत्कर्मी परमात्मा की प्राप्ति करें ।
सत्वचिंतन
यथा वातच्यावयति भूम्या रेणुमन्तरिक्षाच्चाभ्रम् ।
एवा  मत्  सर्वं  दुर्भूतं  ब्रह्मनुत्तमपायति । ।
अथर्ववेद10/1/13
जैसे वायु द्वारा भूमि से रेणु या धूल और आकाश से मेघ को सरका देता
 है । वैसे ही मुझसे ब्रह्मवेत्ताओं द्वारा हटाया गया पाप दूर चला जाए । अर्थात् सत्चिंतन करके हम पाप को दूर करें । सत्य ही है कि मन से अगर हम अच्छा चिंतन करेंगे तो जीवन सभी प्रकार से सुखी हो सकता है ।
संकल्पबल
अध्यक्षो वाजी मम काम उग्र: कृणोतु मह्यम सपत्नमेव ।
विश्वे देवा मम नाथं भवन्तु सर्वे देवा हवमायन्तु म इमम् । ।
अथर्ववेद 9/2/7
हे प्रभु! मेरा प्रबल संकल्प ज्ञानबल से युक्त है और ऊपर से ठीक–ठीक दिखने वाला है । यह संकल्प मेरे लिए संसार को सर्वथा प्रतिद्वन्द्वी रहित कर देवे । सब देव मुझसे सम्बद्ध हो जाएँ और ये सब देव मेरी इस पुकार पर आ जाएँ । अर्थात् हम अपने संकल्पबल से स्वयं अपने जीवन को समृद्ध करने की सामर्थ्य रखते हैं ।
संकल्पबल से सिद्धि की कामना
अवधीत कामो मम ये सपत्ना उरूं लोकमकरन्मह्यमेधतुम् ।
मह्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रो मह्यं षडुर्वीर्धृतमावहन्तु । ।
अथर्ववेद 9/2/11
हे परमेश्वर! मेरे संकल्पबल ने मेरे जो प्रतिद्वन्द्वी बाधक हैं उन्हें नष्ट कर दिया हैय मेरे लिए विस्तृत खुला हुआ द्युलोक कर दिया है । मेरे लिए वृद्धि व विस्तार कर दिया है । अब मेरे लिए चारों उपदिशाएँ झुक जाएँ और छहों विस्तृत दिशाएँ मेरे लिए क्षरित हुए इष्ट फल को ले आएँ ।
मन का ठहराव हो
कथं वातो नेलयति कथं न रमते मन: ।
किमाप: सत्यं प्रेप्सन्तीर्नेलयन्ति कदाचन । ।
अथर्ववेद 10/7/37
यह प्राण क्यों नहीं ठहरता है? मन क्यों कहीं नहीं रमता है? क्यों सत्यस्वरूप को प्राप्त करना चाहते हुए भी जीवों के कर्म प्रवाह कभी भी नहीं ठहरते हैं, सदा चल रहे हैं ?
नि:सन्देह जिस क्षण उस परम सत्य को पा लेंगे, उस क्षण हमारा प्राण चैन पाएगा, मन निरुद्ध हो जाएगा, हमारी  सब की सब चेष्टाएँ सर्वथा बन्द हो जाएँगी और हम उस परम आनन्द में स्थिर हो जाएँगे ।)
आत्मव्यवहार का सुधार
उलूकयातुं शुशुलूकयातुं जहि श्वयातुमुत कोकयातुम् ।
सुपर्णयातुमुत  गृध्रयातुं  दृषदेव  प्रमृण रक्ष इन्द्र । ।
अथर्ववेद 8/4/22
हे आत्मन्! हमारे उल्लू के समान आचरण को, भेड़िये के चलन को, कुत्ते जैसे व्यवहार को और कोक चिड़िया के आचरण को नष्ट कर दे । बाज की चाल (मद) को तथा गिद्ध जैसे बर्ताव (लोभ) को भी (इन छहों में से एक–एक राक्षस को) तू अपनी दारणशक्ति द्वारा इस तरह विनष्ट कर दे जैसे शिला से मिट्टी का ढेला या मिट्टी का बर्तन फूट जाता है । अर्थात् हमारा आचरण सदा अच्छा हो ।
हम माधुर्ययुक्त हों
मधुमन्मे निक्रमणं  मधुमन्मे  परायणम् ।
वाचा वदामि मधुमद् भूयासं मधुसन्दृश: । ।
अथर्ववेद 1/34/3
हे परमेश्वर! मेरा निकट जाना मार्धुयमय हो तथा मेरा दूर हटना भी माधुर्यपूर्ण हो । मैं वाणी से माधुर्ययुक्त ही बोलता हूँ । इसलिए हे माधुर्यस्वरूप परमात्मा! मैं सर्वत्र मधुरूप या माधुर्य को ही देखने वाला हो जाऊँ ।
सहनशक्ति
अहमस्मि  सहमान उत्तरो नाम भूम्याम् ।
अभीषाडस्मि विश्वाषाडाशामाशां विषासहि: । ।
अथर्ववेद 12/1/54
हे प्रभु! मैं सहन करने वाला हूँ । इस भूमि पर उत्कृष्टतर प्रसिद्ध हूँ । जीवों में मनुष्य की गणना उत्कृष्टतर मानी जाती है । मैं मुकाबले में आए हुए को सहने वाला हूँ, अन्य भी सब कुछ सहने वाला हूँ । प्रत्येक दिशा में प्रत्येक इच्छापूर्ति के लिए सब कुछ विशेषतया बार–बार सहने वाला ही होऊँ ।
सुन्दरवाणी
इयं या परमेष्ठिनी वागदेवी ब्रह्मसंशिता ।
ययैव ससृजे घोरं तयैव शान्तिरस्तु न: । ।
अथर्ववेद 19/9/3
यह जो परमेश्वर में ठहरने वाली और ज्ञान से तीक्ष्ण की गई वाणी रूपी देवी है, जिससे कि नि:सन्देह बड़े–बड़े घोर कृत्य किए जाते हैंय उस वाणी से हमारे लिए, पूरे संसार के लिए शान्ति फैले ।
मन से सबल हों
सं जानामहै मनसा सं चिकित्वा मा युष्महि मनसा दैव्येन ।
मा घोषा उत्स्थुर्बहुले विनिर्हते, मेषु: पप्तदिन्द्रस्याहन्यागते । ।
अथर्ववेद 7/52/2
हम मन द्वारा मिलकर के विचारें और सोचना–समझना मिलकर करें, मन से कभी वियुक्त न हों, बिछुड़ें नहीं । अन्धकार आ जाने पर या विशाल द्यावापृथिवी के टूटने पर भी हमारे अन्दर हाहाकार के शब्द न उठें । दिन आ जाने पर, अनुकूल स्थिति पा जाने पर हमारे ऊपर ईश्वरीय मार न पड़े ।
शिवसंकल्प
देखें यजुर्वेद के कुछ मंत्रों को
यज्जाग्रतो  दूरमुदैति  दैवं तदु  सुप्तस्य  तथैवैति ।
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–1
अर्थात् (यत्) जो (दैवम्) दिव्य शक्ति वाला (मे मन:) मेरा मन (जाग्रत:) जागते हुए (दूरम् उदैति) दूर–दूर जाता है । (तदु) वह (सुप्तस्य) सोते हुए भी (तथा एव) उसी प्रकार (एति) दूर चला जाता है । इन्द्रियों का (एक ज्योति:) एक मात्र प्रकाशक (ज्ञान में साधक) है । (तत) वह (मे मन;) मेरा मन (शिव संकल्पम्) शुभसंकल्प अर्थात् अच्छे विचार वाला (अस्तु) होवे ।
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीरा: ।
यदपूर्वं यक्षमन्त: प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–2
अर्थात् (येन) जिसके द्वारा (अपस) कर्मनिष्ठ लोग (मनीषिण:) मनस्वी लोग (यज्ञे) यज्ञों में, (विदथेषु) विशेष ज्ञानपूर्वक किये जाने वाले कार्यों में, (कर्माणि) करने योग्य कर्मों को (कृण्वन्ति) करते हैंय मेरा मन (यत्) जो (अपूर्वम्) अपूर्व है (प्रजानाम अन्त:) प्रजाओं के अन्दर (यक्षम) पूजनीय है (तत्) वह (मे मन:) मेरा मन (शिव संकल्प) शुभ विचार वाला (अस्तु) होवे ।
यत्प्रज्ञानमुत  चेतो  धृतिश्च  यज्ज्योतिरन्तरमृतं   प्रजासु ।
यस्मान्न ऋते किंच न कर्म क्रियते तन्मे मन> शिवसंकल्पमस्तु ।
यजुर्वेद 34–3
अर्थात् (यत्) जो (प्रज्ञानम) ज्ञान का साधन है (उत) और (चेत:) चेतना का आधार (धृति: च) और निश्चय करने की वृत्ति वाला है । (यत्) जो (प्रजासु अन्त:) प्रजाओं के अन्दर (अमृतम्) मरणधर्म से रहित (ज्योति:) ज्ञान का प्रकाश है, (यस्मात् ऋते) जिसके बिना (किञ्चन) कोई भी (कर्म) कार्य (न) नहीं (क्रियते) किया जा सकता (तत्) वह (मे) मेरा (मन:) मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचार वाला (अस्तु) हो ।
येनेदं  भूतं   भुवनं  भविष्यत्परिगृहीतममृतेन  सर्वम् ।
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–4
अर्थात् (येन) जिस (अमृतेन) मरण धर्म से रहित (इदं) इस (सर्वम्) समस्त (भूतम्) भूतकाल को (भुवनम्) वर्तमान काल को (भविष्यत्) भविष्यतकाल को (परिगृहीतम्) अपनी चेतना की शक्ति से अपने में पकड़ा हुआ है, (येन) जिसके द्वारा (सप्त होता) सप्त होताओं वाले (यज्ञ: तायते) यज्ञ का वितान किया गया जा रहा है । (तत् मे मन:) वह मेरा मन (शिवसंकल्प वाला) शुभ विचारों वाला (अस्तु) हो ।
यस्मिन्नृच: साम यजूंषि यस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभाविवारा: ।
यस्मिन्श्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–5
अर्थात् (रथनाभौ) रथ की नाभि में (आरा: इव) अरों की तरह (यस्मिन्) जिस (मन) में (ऋच:) ऋग्वेद (साम) सामवेद (यजूंषि) यजुर्वेद (प्रतिष्ठिता:) प्रतिष्ठित हैं अर्थात् ठहरे हुए हैं, (यस्मिन्) जिसमें (प्रजानाम्) प्रजाओं की (सर्वम्) समस्त (चित्तं) चिन्तनशक्ति (ओतम्) ओत–प्रोत है (तत्) वह (मे मन:) मेरा मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचार वाला (अस्तु) हो ।
सुषारथिरश्वानिव      यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव ।
हृत्प्रतिष्ठं  यदजिरं  जविष्ठं तन्मे  मन: शिवसंकल्पमस्तु । ।
यजुर्वेद 34–6
(सुसारथि:) अच्छा सारथी (अश्वान्) घोड़ों को (इव) जैसे (ने नीयते) पुन: पुन: घुमाता है (तत् मे मन:) वह मेरा मन (अभीशुभि:) लगामों के द्वारा (वाजिन: अश्वान्) बलवान् घोड़ों को (सुसारथि: इव) उत्तम सारथि की तरह (यत्) जो मन (मनुष्यान्) मनुष्यों को (ने नीयते) सन्मार्ग से ले जाता है, (यत्) जो मेरा मन (हृत्प्रष्ठितम्) हृदय–चेतना स्थान में स्थित है (यत्) जो (अरिम्) गतिशील अर्थात् चंचल है, (जतिष्ठम्) शीघ्रगामी है, (तत् मे मन:) वह मेरा मन (शिवसंकल्पम्) शुभ विचारों वाला (अस्तु) हो ।
इन मन्त्रों में शिवसंकल्प अर्थात् सकारात्मक विचारों को ही महत्त्व दिया गया है । यदि हमारे विचार सकारात्मक होंगे तो सदा शुभ ही होगा ।
मन की स्थिरता
पुनरेहि  वाचस्पते  देवेन  मनसा  सह ।
वसोष्पते नि रमय मध्येवास्तु मयि श्रुतम् । ।
अथर्ववेद 1/1/2
हे वाणी व ज्ञान के पालक देव! तुम फिर मुझमें आओ । हे देव! मन की मननक्रिया के साथ आओ । हे वसु के पति! तुम मुझे रमण कराओ, रस दिलाओ, आनन्दित कराओ एवं मेरा सुना हुआ ज्ञान मुझमें ही ठहरे।
(हे प्रभु मैं जो कुछ सुनता हूँ या सत्चिन्तन करता हूँ, वह मुझमें ठहरता नहीं है । यह सद्ज्ञान मेरे मन में स्थिर करो ।)
ज्ञानरूपी जल दो
दिवो      नु     मां    वृहतो    अन्तरिक्षात्
अपां     स्तोको       अभ्यपप्तद्      रसेन ।
समिन्द्रयेण पयसाहमग्ने छन्दोभिर्यज्ञै: सुकृतां कृतेन । ।
अथर्ववेद 6/124/1
हे परमेश्वर! अपने ज्ञानप्रकाशमय द्युलोकरूपी महान अन्तरिक्ष से ही तेरे ज्ञान–कर्म–शक्तिरूप जलों का एक स्वल्पकण अपने तृप्तिदायक रस से युक्त मुझ पर गिरा । तेरे इस स्वल्प जल–कण द्वारा आत्मबल से पोषक ज्ञान से, शुभकर्मों से और पुण्यकर्मों के फल से संयुक्त हो गया हूँ अर्थात् आनन्द युक्त हो गया हूँ ।
मन:शक्ति
वयं सोम व्रते तव मनस्तनूषु निभ्रत: ।
प्रजावन्त:             सचेमहि । ।
ऋग्वेद 10/58/19
हे परमात्मा! अपने शरीरों में मन को अर्थात् मन:शक्ति को धारण किए हुए हम लोग तुम्हारे व्रत का पालन करते हैं । अर्थात् तुम्हारे बनाए हुए नियमों का अपनी मन:शक्ति द्वारा पालन करते हैं । अत: प्रार्थना है कि प्रजासहित हम लोग तुम्हारी सेवा करते रहें ।
दृढ़ निश्चय
अहमिद्धि पितुष्परि मेधामृतस्य जग्रभ ।
अहं                      सूर्यंइवाजनि । ।
ऋग्वेद 8/6/10
मैंने निश्चय ही पालक पिता सत्यस्वरूप परमेश्वर की धारणावती बुद्धि को सब तरफ से ग्रहण कर लिया है । अत: मैं सूर्य के समान तेजस्वी हो गया हूँ । अर्थात् हम सदा अपने मन में उत्तम चिंतन ही करें ।
आत्मबल
जुहुरे वि चितयन्तोऽनिमिषं नृम्णं पान्ति ।
आ   दृह्णम् ।     पुरं    विविशु: । ।
 ऋग्वेद 5/19/2
जो ज्ञानपूर्वक स्वार्थ त्याग करते हैं और लगातार जागते हुए अपने आत्मबल की रक्षा करते हैं, वे दृढ़ अभेद्य नगरी (अभयता व अमरता) में प्रविष्ट हो जाते हैं ।
मन का परिष्कार हो
सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत ।
अत्र सखाय: सख्यानि जानते भद्रैषां लक्षमीर्निहिताधि वाचि । ।
ऋग्वेद 10/71/2
जिस प्रकार चलनी द्वारा सत्तू को परिष्कृत किया जाता है, उसी प्रकार धैर्यशाली लोग मन द्वारा, मनन द्वारा वाणी को परिष्कृत करते हैं । वाणी के सखा हुए इन लोगों की वाणी में कल्याणी लक्ष्मी निवास करती है ।
मन में विक्षोभ न हो
यदाशसा    वदतो   मे    विचुक्षुभे    यद्     याचमानस्य
चरतो               जनाँ             अनु ।
यदात्मनि तन्वो मे विरिष्टं सरस्वती तद् आपृणद् घृतेन । ।
अथर्ववेद 7/57/1
हे प्रभु! मनुष्यों की सेवा करते हुए, उनके साथ आशा से बोलते हुए, भाषण करते हुए मेरा मन जो कभी–कभी विक्षोभ को प्राप्त होता है । इसी प्रकार लोगों के हित के लिए, उसे कुछ बताने पर, उनके दुर्व्यवहार से मेरा मन विक्षोभ को प्राप्त होता है । हे प्रभु! मेरे अन्त:करण पर जो चोट पहुँचती है, उन सबको हे सरस्वती! हे विद्यादेवी! अपने ज्ञानपूर्ण और स्नेहमय मरहम से भर दे ।
आतएतुमन: पुन: क्रत्वे दक्षाय जीवसे ।
ज्योक्   च   सूर्यं     दृशे । ।
ऋग्वेद 10/57/4
हे सुबन्धु! मन का तुझमें पुन: प्रवेश हो जाए । जिससे तू कर्म करने लगे, बल आ जाए, जीवन आ जाए और तू निरंतर सूर्य दर्शन करता रहे । अर्थात् हे प्रियजन! जो तू इतना हतोत्साहित हो गया है कि लगता है मानो तुझमें मन ही नहीं है तो तू अपने को सबल बना । 
पुनर्न: पितरो मनोददातु दैव्योजन: ।
जीवं      व्रातं   सचेमहि । ।
ऋग्वेद 10/57/5
हमारे पितर हमारे मन को फिरा दें और मन में देवों को स्थापित करें । हम परमात्मा का सब कुछ आनुषङ्गिक प्राप्त करें ।
यत् ते यमम् वैवस्वतम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/1
हे बन्धु! विवस्वान के पुत्र यम के पास या दूर पर जो तुम्हारा मन गया है, उसे हम लौटा लाते हैं । तुम इस संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते दिवम् यत् पृथिवीम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/2
मेरे मित्र! तुम्हारा जो मन अत्यन्त दूर स्वर्ग अथवा पृथिवी पर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते भूमिम् चतुर्भूष्टिम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/3
हे सखे! चारों तरफ लुढ़क पड़ने वाला जो तुम्हारा मन अतीव दूरदर्शनीय देश में गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत
दो ।
यत् ते चतस्त्र: प्रदिश: मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/4
हे प्रियजन! तुम्हारा मन जो चारों तरफ अतीव दूरस्थ प्रदेश में चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो । 
यत् ते समुद्रम् अर्णवम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/5
हे मानव! तुम्हारा जो मन अतीव दूरवर्ती और जल से परिपूर्ण समुद्र में गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर  भटकने मत दो ।
यत् ते मरीची: प्रवत: मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते  आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/6
हे प्रिय बन्धु! तुम्हारा जो मन चारों तरफ विकीर्ण किरण–मंडल में पैठा हुआ है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते अपः यत् ओषधीः मनः जगाम दूरकम्।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/7
तुम्हारा जो मन दूरस्थ जल के भीतर व वृक्ष लतादि के मध्य में गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर  भटकने मत दो ।
यत् ते सूर्यम् यत् उषसम् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/8
हे मानव! तुम्हारा जो मन दूरवर्ती सूर्य व उषा के बीच गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते पर्वतान् बृहत: मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/9
हे बन्धु! तुम्हारा जो मन पर्वतमालाओं के ऊपर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते विश्वम् इदम् जगत् मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/10
तुम्हारा जो मन समस्त विश्व में अतीव दूर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते परा: पराव्रतो मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/11
तुम्हारा जो मन दूर से भी दूर, उससे दूर, किसी दूर स्थान पर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन इधर–उधर भटकने मत दो ।
यत् ते भूतं च भव्यं च मन: जगाम दूरकम् ।
तत् ते आ वर्तयामसि इह क्षयाय जीवसे । ।
ऋग्वेद 10/58/12
तुम्हारा जो मन भूत व भविष्यत् किसी दूर स्थान पर चला गया है, उसे लौटा लाओ । तुम संसार में रहने के लिए जी रहे हो । अर्थात् संसार में सुकार्यों को करते हुए सानन्द रहो । मन को इधर–उधर भटकने मत दो ।

बच्चों के मानसिक रोग (निदान, कारण और समाधान)

शैशवावस्था तथा बाल्यकाल में बच्चे की कई मानसिक समस्याएँ हो सकती हैं । बड़ों की छोटी–सी भूल बच्चे की किसी समस्या को जन्म दे सकती
है । जैसे – नवजात शिशु की स्तन चूसने की इच्छा अतृप्त रह जाने के कारण अँगूठा चूसने की आदत, कैल्शियम की कमी से मिट्टी खाने की आदत, बच्चे में मानसिक असुरक्षा के कारण रात में चैंकना, हीनता की भावना से हकलाना व मानसिक तनाव के कारण बिस्तर पर पेशाब करना आदि ।
यदि बचपन में इन समस्याओं को हल्के में लिया जाता है तो बड़े होने पर यही मानसिक समस्याओं को जन्म देती हैं । जैसे – चूसने की इच्छा अतृप्त रह जाने पर बड़े होने पर असामान्य सेक्स–सम्बन्ध की इच्छा प्रबल हो सकती है ।
1– स्कूल फोबिया
कई बच्चे स्कूल जाना पसन्द नहीं करते । जिस व्यवहार से उन्हें स्कूल न जाना पड़े, उसे अपना लेते हैं, जैसे – पेट–दर्द, सिर–दर्द आदि का बहाना करना । इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि बच्चा स्कूल क्यों नहीं जाना चाहता । इसके कई कारण हैं – अध्यापक की मार–डाँट व भय, शारीरिक कमजोरी या विद्यालय में थक जाना, किसी कारण सहपाठियों द्वारा मजाक उड़ाया जाना, क्लास टेस्ट में दूसरों की अपेक्षा कम अंक मिलना । देखने में लगता है कि समस्या अचानक प्रारम्भ हुई, किन्तु बच्चा भीतर–ही–भीतर काफी समय से घबराहट का अनुभव करता है । बच्चा माँ–बाप से विद्यालय जाने के विषय में सीधे–सीधे न कहकर बहाना बनाता है, क्योंकि उसे मालूम है कि स्कूल तो उसे जाना ही पड़ेगा ।
कुछ बच्चे अपनी माँ पर इतने अधिक आश्रित होते हैं कि उन्हें विद्यालय में भी अपनी माँ के बिना अच्छा नहीं लगता । ऐसे बच्चों को हमउम्र बच्चों के साथ खेलने–कूदने तथा अपना कार्य स्वयं करने की आदत डालनी चाहिए ।
यदि विद्यालय–पूर्व क्रियाएँ सही तरीके से करवाई जाएँ तो बच्चे पूरी तरह से विद्यालय शिक्षा के लिए शारीरिक–मानसिक रूप से परिपक्व हो जाते हैं ।
अब समस्या यह है कि यदि बच्चे की विद्यालय–पूर्व शिक्षा सही रूप से नहीं हुई है और प्राथमिक स्तर पर आने पर उसके मन में विद्यालय के प्रति भय बैठ गया है, उसे विद्यालय जाना अच्छा नहीं लगता है, विद्यालय के नाम पर वह घबराने लगता है तब अभिभावकों को क्या करना चाहिए ?
सबसे पहले समस्या के मूल कारण को जानना चाहिए । इस समस्या के मूल कारण निम्न हो सकते हैं—
(क) शारीरिक कारण—सम्भव है कि बच्चा शारीरिक रूप से कमजोर हो, विद्यालय में थक जाता हो । यदि ऐसा है तो उसकी शारीरिक स्थिति को समझना चाहिए । हो सकता है बच्चा रात को देर से सोता हो, इस कारण सुबह जल्दी उठने में परेशानी होती हो, फलस्वरूप वह विद्यालय में थका–थका रहता हो । रात्रि में देर से सोने के कारण सुबह उठने पर बच्चों को शौच नहीं हो पाता है, पेट खराब होता है, बीमारी आती है, थकान रहती है, शिक्षा में अरुचि होती है । इसलिए घर में देर रात तक टी.वी. नहीं चलना चाहिए । बच्चों को रात में आठ बजे तक अवश्य सुला देना चाहिए, जिससे वह आठ–नौ घण्टे की नींद पूरी करके सुबह चार–पाँच बजे तक उठ जावें ।
(ख) कुपोषण—बच्चों को ताजा पौष्टिक भोजन दें, साथ में फल–सब्जी व दूध की मात्रा भी पर्याप्त हो । कुपोषण के कारण भी स्वास्थ्य खराब हो सकता है । शरीर थका–थका सा रहता है, फलत: बच्चे का विद्यालय में मन नहीं लगता है । बिस्किट, ब्रेड, नूडल्स, बोतलबन्द पेय, दालमोठ, बाजार की चाट आदि से स्वास्थ्य खराब होता है ।
(ग) खेलकूद व व्यायाम की कमी—बच्चों के लिए खेल बहुत आवश्यक है । खेलकूद में शारीरिक रूप से दौड़–भाग वाले खेल होने आवश्यक हैं । इनसे बच्चों के शरीर व मन दोनों का ही व्यायाम हो जाता है । उनका स्वास्थ्य ठीक रहता है व मन प्रसन्न रहता है ।
(घ) बच्चे का पढ़ाई में कमजोर होना—यदि बच्चा किसी कारण पढ़ाई में कमजोर है, उसे विद्यालय में अच्छा नहीं लगता है । वह विद्यालय न जाने के लिए तरह–तरह के बहाने बनाता है । ऐसी अवस्था में सबसे पहले उसकी विषयगत कमजोरियों को दूर करना चाहिए ।
(ङ) अध्यापक का भय—कुछ अध्यापक बात–बात पर बच्चों को डाँटते–मारते हैं या भयभीत करते हैं या मनोवैज्ञानिक तनाव प्रदान करते हैं । ऐसी अवस्था में बच्चे विद्यालय जाने से घबराते हैं । अभिभावक को अध्यापक से मिलकर वार्तालाप करना चाहिए । यदि प्रेमपूर्ण वार्तालाप के बाद भी अध्यापक अपना व्यवहार बदलने के लिए तैयार नहीं होते हैं तब विद्यालय प्राचार्य की मदद लेनी चाहिए ।
(च) सहपाठियों द्वारा मजाक उड़ाया जाना—कई बार किसी विशेष कारण से सहपाठी किसी बच्चे का मजाक उड़ाते हैं, जैसे बच्चे की विकलांगता, बदसूरत होना, हकलाकर बोलना, गरीब होना आदि ।
यदि ऐसा है तब पहले तो बच्चे को ही प्रेरणा देनी चाहिए कि वह चिढ़ाने वाले बच्चों का सामना करे । उन्हें मुँहतोड़ जवाब दे, किन्तु यदि समस्या ने अधिक गंभीर रूप ले लिया हो तो अभिभावक को चाहिए कि अध्यापक से मिलकर इस  समस्या का समाधान करें ।
(छ) टेस्ट में दूसरे बच्चों से कम अंक मिलना—महत्त्वाकांक्षा या प्रतिस्पर्द्धा की भावना अच्छी होते हुए भी बच्चे में बहुत अधिक प्रतिस्पर्द्धा की भावना होना या सदा कक्षा में पहले स्थान पर ही होने की भावना बहुत अधिक घातक हो जाती
है ।
सदा कक्षा में प्रथम आने वाला विद्यार्थी कभी चैथे, पाँचवें या दसवें स्थान पर आ जाता है तो बहुत अधिक महत्त्वाकांक्षी होने पर वह विचलित हो जाता है । फलस्वरूप विद्यालय उसे अच्छा नहीं लगता है और वह विद्यालय जाना पसन्द नहीं करता है ।
पहली बात तो प्रारम्भ से ही बच्चे के मन में यह भावना डालनी चाहिए कि जीवन में सफलता और असफलता दोनों के लिए ही तैयार रहना चाहिए । सदा आवश्यक नहीं है कि बच्चा प्रथम स्थान पर ही आए । दूसरी बात, यदि बच्चा बहुत महत्त्वाकांक्षी हो ही गया हो तो धीरे–धीरे उसके मन से इस भावना को निकालने का प्रयास करना चाहिए ।
महत्त्वाकांक्षी होना अच्छा होता है किन्तु लक्ष्य की प्राप्ति न होने पर नैराश्य यथ्तनेजतंजपवदद्ध से घिर जाना बहुत बुरा होता है । जितने भी लोग जीवन में सफल हुए हैं, उन्होंने जीवन में कभी–न–कभी असफलता का सामना अवश्य किया है ।
2– हकलाना
जब बच्चे बोलना सीख रहे हों, तब यह आदत पड़ सकती है । यदि समय पर देखभाल न की जाए तो विद्यालय जाने के समय तक यह रोग पूर्णत: विकसित हो जाता है ।
हकलाने के कई कारण हो सकते हैं – शारीरिक कमी, हीनता की भावना या दूसरों को अपनी तरफ आकर्षित करना । हकलाने वाले बच्चे को सर्वप्रथम बाल रोग विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए । यदि हकलाने का कारण शारीरिक है, तब तो इलाज हो ही जायेगा ।
कुछ बच्चे सामान्य स्थिति में ठीक बोलते हैं किन्तु तनावपूर्ण स्थिति में या किसी नए व्यक्ति के सामने हकलाने लगते हैं । इसका प्रमुख कारण है कि वे अपने को दूसरे से हीन महसूस करते हैं । दूसरे के सामने बच्चा घबरा जाता है और वह हकलाने लगता है ।
इस समस्या का प्रारम्भ बहुत छोटेपन से होता है । कई बार हम अपनी इच्छाओं व आकांक्षाओं का केन्द्रबिन्दु बच्चे को बना लेते हैं । सोचते हैं कि बच्चा दूसरे के सामने एक आदर्श बच्चे का रूप प्रस्तुत करे या हमारी कल्पनाओं को साकार करे । सब लोग उसे अच्छा कहें । इस कारण हम उसे ऐसा व्यवहार सिखाने का प्रयास करते हैं, जिससे समाज में उसकी प्रशंसा हो । बच्चे की प्रशंसा होने पर हम स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं ।
एक सीमा तक तो लोक–व्यवहार सिखाना बच्चे के हित में होता है, किन्तु जब यही चीज अधिकता में हो जाती है, तब बच्चे के लिए हानिकारक हो जाता
है । कई बार वह अपने को अच्छा प्रदर्शित करने के चक्कर में दूसरे के सामने घबरा जाता है व घबराहट के कारण हकलाने लगता है ।
पहली बात तो हम बच्चे को बच्चा समझें, उसको सहज रूप में विकसित होने दें तब यह समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी । यदि बच्चे में हकलाने की समस्या उत्पन्न हो गई हो तो इस समस्या को दूर करने के लिए बड़े धैर्य की आवश्यकता है । यदि हकलाने का कारण शारीरिक विकृति न होकर मानसिक है तब समस्या के मूल में बच्चे की घबराहट छुपी होती है । अत: इसके निवारणार्थ—
बच्चे को अधिक से अधिक वार्तालाप का मौका दें । बच्चा यदि धीरे–धीरे बोल रहा है या हकलाकर भी बोल रहा है तो उसे बोलने दें । अधिक टोकाटाकी न करें, लेकिन जब बच्चा बिना हकलाए बोले तब उसकी प्रशंसा किसी–न–किसी तरह अवश्य करें ।
उससे स्वयं भी अधिक–से–अधिक बातें करें । जैसे—कहानियाँ सुनाना, विद्यालय की बातें करना, परी कथा सुनाना आदि । उसे भी स्वयं कहानी रचना व वाचन के लिए प्रेरित करें ।
जब वह बिना झिझक बोलना सीख लेगा तब उसकी हकलाहट धीरे–धीरे स्वयं समाप्त हो जाएगी ।
यदि हकलाने वाला बच्चा विद्यालय जाता है तो यदि उसकी हकलाहट के कारण विद्यालय में मजाक बनाया जाता है तो अध्यापकों से मिलकर इस समस्या को दूर करने का प्रयास करें । अध्यापकों से कहें कि उसे भी बोलने के लिए प्रेरित करें । जो बच्चे उसका मजाक बनाते हैं, उन्हें ऐसा न करने के लिए समझाएँ ।
3– रात में चौंकना या बोलना
कुछ बच्चों में प्राय: रात में चौंकना, चिल्लाकर सोते से जाग जाना, अचानक भय से जगकर बैठ जाना आदि लक्षण मिलते हैं । इस दशा में बच्चा कई मिनट तक अशान्त रहता है । कई बार बच्चे दिन में सुनी हुई बात को नींद में बड़बड़ाने लगते हैं ।
इस समस्या का मुख्य कारण बच्चे में असुरक्षा की भावना होती है । साथ ही यदि घर में कलह–क्लेश होता रहता है या बच्चा किसी कारण से डर गया होता है या उसको कोई भयभीत करता है, तब वह नींद में बड़बड़ाता है या चौंकता है ।
कई बार बच्चे को स्कूल में या घर में पढ़ाई के लिए अधिक डाँटा जाता है, तब भी वह तनावग्रस्त हो जाता है और रात में चैंकने या बड़बड़ाने लगता है ।
इस समस्या का निवारण बहुत आवश्यक है अन्यथा भावी–जीवन के लिए कष्टकारक हो सकता है । बच्चे को भरपूर प्यार दें, उसके मस्तिष्क में किसी प्रकार का भय, तनाव व चिन्ता न पनपने दें । अभिभावक अपने प्यार से बच्चे के मन से असुरक्षा की भावना को दूर कर दें ।
4– चोरी करना
कुछ बच्चों में चोरी करने की आदत पड़ जाती है । इसके कई कारण हो सकते हैं । बहुत छोटे बच्चे अपने–पराए का भेद नहीं समझते हैं । बच्चे को जो चीज अच्छी लगती है वह उसे उठा लेता है । चार–पाँच वर्ष तक के बच्चे के लिए ऐसा करना खेल है । वह यह समझता भी नहीं है कि ऐसा करना चोरी है । बड़े लोगों के डर के कारण उसे छुपाने या छुपाकर रखने का प्रयास करता है । ऐसा होने पर अभिभावक दो तरह का व्यवहार कर सकते हैं—
बच्चे को समझाएँ कि ऐसा करना ठीक नहीं है क्योंकि यह चीज अपनी नहीं है, दूसरे की है । बच्चे से ही कहें कि उठाई हुई चीज वह स्वयं वापस करे । ऐसा करने से बच्चा वस्तुस्थिति समझ जाएगा व आगे से चोरी नहीं करेगा ।
कुछ अभिभावक बच्चे को डाँटना, मारना प्रारम्भ कर देते हैं । उसे झूठा, चोर आदि कहते हैं व यह भी कहते हैं कि तुमने हमारी बेइज्जती करवा दी । ऐसा करना ठीक नहीं है । बच्चा वस्तुस्थिति तो समझेगा नहीं, उल्टे अपमान महसूस करेगा व जिद्दी हो जाएगा ।
इसके अतिरिक्त बड़े बच्चों में चोरी की प्रवृत्ति के निम्न कारण व निवारण हो सकते हैं—
(क) बड़े बच्चे की उपेक्षा—अक्सर घर में छोटे बच्चे के आ जाने पर बड़े की उपेक्षा होने लगती है । अत: वह सबका ध्यानाकर्षित करने के लिए चोरी करना शुरू कर देता है । जैसे – घर की कोई आवश्यक वस्तु छुपा देना, जब घर के लोग उस वस्तु के लिए परेशान हों  तो ढूँढ़ने का नाटक करते हुए उस वस्तु को ढूँढ़कर दे देना, जिससे घर के सदस्य उसकी प्रशंसा करें व प्यार करें ।
धीरे–धीरे यही आदत चोरी में बदल जाती है । यदि इस प्रकार की स्थिति बार–बार आती है तब बड़े लोगों को ध्यान देना चाहिए कि कहीं बच्चा जान–बूझकर तो चीजें नहीं छुपा रहा है । साथ ही छोटे बच्चे के साथ ही बड़े बच्चे को भी समय व प्यार देना चाहिए ।
(ख) दोस्तों में हीरो बनने की लालसा—कई बार कुछ बड़े बच्चों में शर्त लगती है कि फलां चीज चुराकर दिखाओ या फलां काम करके दिखाओ तो हम तुम्हारा लोहा मानेंगे । इस अस्वास्थ्यकर प्रतिस्पर्द्धा में बच्चे कभी किसी अध्यापक की नजर बचाकर उनकी कोई चीज उठा लेते हैं या किसी सहपाठी का कोई सामान उठा लेते हैं और अपने उन साथियों के मध्य हीरो बन जाते हैं, जिनसे शर्त लगी थी ।
यह प्रवृत्ति जब अधिक विकसित होने लगती है तब बच्चे घर का सामान व रुपए भी चुराने लगते हैं व अपने साथियों के मध्य प्रशंसा के पात्र बनते हैं ।
यदि बच्चे को उसके अभिभावक पर्याप्त समय दें तब ऐसी प्रवृत्ति विकसित होगी ही नहीं, क्योंकि यदि बच्चे को मार–डाँट का भय न हो  तब वह अपनी सब बातें घर में बताता है । यदि फिर भी बच्चे ने कभी ऐसी हरकत की तो माता–पिता को शुरुआती दौर में ही आभास हो जाएगा । उसे समझाने–बुझाने से इसका समाधान भी हो जाएगा ।
(ग) कठोर अनुशासन—बच्चों के लिए दण्ड और पुरस्कार दोनों ही आवश्यक हैं । अनुशासन भी अच्छा है, किन्तु आवश्यकता से अधिक कुछ भी अच्छा नहीं होता है । घर में बच्चों की मनपसन्द कोई चीज बनी है या कोई फल, मिठाई या खाद्य वस्तु जो बच्चे को पसन्द है वह आई है । वह वस्तु उसे दण्डस्वरूप खाने के लिए न दी जाए व कहा जाए कि तुमने अमुक शरारत की थी या तुम्हारे परीक्षा में कम अंक आए हैं, इसलिए तुम्हें यह चीजें नहीं दी जा रही हैं ।
बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार करना ठीक नहीं है । बच्चे की गलती के लिए उसे डाँट दिया जाए यह तो ठीक है किन्तु दण्डस्वरूप खाने की चीज न देने से या तो वह अपने घर में चोरी करके खाएगा या दु:खी रहेगा या वह किसी मित्र या रिश्तेदार के यहाँ माँगकर या चुराकर खाएगा ।
5– ईर्ष्या की प्रवृत्ति
कोई बच्चा पढ़ने में बहुत तेज होता है तो स्वाभाविक रूप से घर व विद्यालय में उसकी प्रशंसा की जाती है । कभी–कभी किसी बच्चे से उसकी प्रशंसा सहन नहीं होती है व उस पढ़ाई में तेज बच्चे की कॉपी–किताबें चुरा लेता है ताकि वह परेशान हो और पढ़ न पाए । यही प्रवृत्ति धीरे–धीरे चोरी में बदल जाती है, तब बच्चा किसी के घर में कोई कीमती चीज देखकर भी उठा लेता है । ईर्ष्या और चोरी दोनों ही प्रवृत्तियाँ गलत हैं ।
जब बच्चे के मन में ईर्ष्या की भावना आती है, तब दूसरे के नुकसान के पहले तो उसका मन खराब हो जाता है । चाहे बात पढ़ाई की हो या धन की या किसी अन्य चीज की, ईर्ष्या की भावना ही गलत है । अभिभावकों को चाहिए कि बच्चे के मन में भरें कि तुम्हारे पास जितना है, उतना बहुत है । बहुत से लोग दुनिया में ऐसे भी हैं, जिनके पास हमसे बहुत कम है ।
उसे समझाएँ – ‘पढ़ाई में भी जिस विषय में तुम कमजोर हो उस कमजोरी को दूर करने का प्रयास करो । पढ़ाई में तेज बच्चे से ईर्ष्या करने से तुम पढ़ाई में तेज नहीं हो जाओगे ।’वैसे भी दुनिया में सभी बच्चे एक समान स्तर पर नहीं हो सकते । बच्चों को समझाएँ – ‘अपना पूरा प्रयास करो, जितनी सफलता मिलती है उसमें संतुष्ट रहो ।’अभिभावकों को यह देखना चाहिए कि बच्चे की किस बिन्दु पर कमजोरी है ।
6– बिस्तर पर पेशाब करना
कई बार बड़े बच्चे भी रात को या दिन में भी सोते समय बिस्तर पर पेशाब कर देते हैं । बच्चों के बिस्तर गीला करने के कुछ शारीरिक कारण भी हो सकते हैं, यदि शारीरिक कारण नहीं हैं तो मनोवैज्ञानिक कारण भी हो सकते हैं ।
(क) शारीरिक कारण
यदि बच्चे को कब्ज की शिकायत हो या पेट में कीड़े हों तब उसका मूत्राशय पर नियंत्रण नहीं रह पाता है और उसका बिस्तर पर पेशाब निकल जाता है । बच्चे को रात में सोते समय यदि कोई तरल पदार्थ (जैसे–दूध, जूस, पानी आदि) पिलाया जाता है तो गहरी नींद में होने के कारण पेशाब लगने पर वह जाग नहीं पाता है और उसका पेशाब निकल जाता है ।
कई बार जाड़े के दिनों में पेशाब लगने पर आलस्य के कारण बच्चे उठते नहीं हैं । यदि उठाया भी जाए तो भुनभुनाते हुए सो जाते हैं । ऐसी स्थिति में उनका पेशाब निकल जाता है ।
बच्चा बहुत कमजोर हो तब भी उसका अपने शरीर पर नियंत्रण नहीं रह जाता है, फलस्वरूप वह सोते में बिस्तर गीला कर सकता है ।
यदि बच्चे के पेशाब में अम्लता Acidity अधिक है तो उसके मूत्राशय के चारों ओर खुजली होती है, जिसके कारण उसके सोते समय उसका पेशाब निकल सकता है ।

(ख) मनोवैज्ञानिक तथा अन्य कारण
अपना ध्यानाकर्षित करना—कई बार छोटे बच्चे के घर में आ जाने के कारण बड़े बच्चे पर ध्यान नहीं दिया जाता है । फलस्वरूप वह ऐसी हरकतें करने लगता है जिससे उसकी तरफ भी घर के लोग आकर्षित हों । इस मनोवृत्ति के कारण वह जाने या अनजाने बिस्तर गीला कर देता है ।
बहुत अधिक लाड़–प्यार—बहुत अधिक लाड़–प्यार के कारण भी बच्चा सही आदतें नहीं सीख पाता है । कुछ लोगों में यह भावना होती है कि बच्चा जो कर रहा है, करने दो, बड़ा होने पर स्वयं सीख जाएगा । ऐसा ठीक नहीं है । बच्चे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी आवश्यक है, उसे कठोर अनुशासन में बद्ध न किया जाए, उसे नियमों में न बाँधा जाए यह सत्य है किन्तु सामाजीकरण की आदतों की नींव बचपन से डालनी आवश्यक है ।
अत्यधिक कठोरता—अत्यधिक कठोर अनुशासन भी बच्चे के लिए ठीक नहीं होता है । भयंकर जाड़े की रात है । बच्चे को रात में पेशाब लगी है, वह बिस्तर से नहीं निकलना चाहता है । वह बिस्तर से निकलता भी है तो शाल आदि ओढ़कर बाथरूम जाना चाहता है । यदि उसे ऐसा नहीं करने दिया जाता है तो वह डर के कारण बिस्तर से निकलता ही नहीं है व फिर सो जाता है और सोते में ही बिस्तर पर पेशाब निकल जाता है ।
भूत–प्रेत आदि का भय—बच्चों को डराने के लिए कई बार घर के बड़े लोग स्वयं ही भूत–प्रेत का डर मन में बैठा देते हैं या भूत–प्रेत की कथाएँ सुनकर उसके मन में भय बैठ जाता है । ऐसी स्थिति में रात में वह कमरे से बाहर निकलने में डरता है और सोते में ही उसका पेशाब निकल जाता है ।
यही भय धीरे–धीरे बच्चे के मन में स्थायी स्थान बना लेता है ।
7– झूठ बोलना
बहुत छोटे बच्चे को झूठ–सच में अन्तर पता ही नहीं होता है । वह खेल–खेल में ही अनायास झूठ बोलने लगता है, जैसे–बड़े लोगों ने उसका कोई खिलौना छुपाकर कहा—‘कौआ ले गया’फिर थोड़ी देर बाद कहा—‘देखो जादू से आ गया ।’ उसी प्रकार बच्चा भी खेल करता है—कोई चीज छुपाकर कहता है—‘देखो बिल्ली ले गई ।’ बड़े लोग हँसने लगते हैं, फिर वह उस चीज को दिखाकर कहता है—‘देखो मैं भी जादू जानता हूँ ।’
यह बात खेल तक तो ठीक है किन्तु बच्चे के और बड़ा होने पर यही आदत बढ़ती जाती है तो वह झूठ बोलने में परिवर्तित हो जाती है । इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि बच्चे के साथ इस प्रकार के खेल खेले ही न जाएँ या उसे सदा कठोर अनुशासन में ही रखा जाए या गम्भीर ही रहा जाए, किन्तु थोड़ा बड़ा होने पर यदि खेल झूठ बोलने की प्रवृत्ति में परिवर्तित होने लगे तो उसे झूठ और सच में अन्तर प्यार से समझा देना चाहिए ।
झूठ बोलने के और भी अनेक कारण व उनके निवारण प्रस्तुत हैं—
डाँट व मार के भय के कारण झूठ बोलना—अक्सर बच्चे घर व विद्यालय में मार व डाँट के भय के कारण झूठ बोलने लगते हैं । झूठ बोलने की शुरुआत घर से ही होती है । बच्चों से कोई चीज गिर गई या टूट गई, ऐसी स्थिति में उसे डाँट पड़ी या मार पड़ी । दुबारा ऐसी गलती होने पर उसने अनायास ही झूठ बोल दिया कि उसने तो ऐसा नहीं किया है । इस प्रकार झूठ बोलने से वह मार या डाँट से बच गया ।
धीरे–धीरे उसकी झूठ बोलने की आदत बढ़ती चली जाती है । बच्चा बड़ा होने पर विद्यालय गया । उसने होमवर्क नहीं किया या अन्य कोई गलती हो
गई । बच्चे ने झूठ बोल दिया – ‘हम लोग कहीं चले गए थे । इसलिए होमवर्क नहीं कर पाए ।’ शिक्षक ने उसे सजा नहीं दी । बच्च को ऐसा न करने के लिए प्यार से समझाएँ ।
सुधार के लिए बच्चे से गलती हो जाने पर उसे तुरन्त डाँटना या मारना शुरू न कर दें । उसकी पूरी बात धैर्य से सुननी चाहिए । यदि बच्चे से अनजाने में गलती हो गई है, जैसे कोई चीज गिर गई या टूट गई या खो गई तो उसे प्यार से समझाएँ व चीजें सम्भालकर रखना सिखाएँ । यदि बच्चा जान–बूझकर लापरवाही के कारण अपनी चीजें या घर का सामान इधर–उधर फेंकता रहता है तो उसे मीठी घुड़की दें ।
इसी प्रकार अध्यापक को भी धैर्य से काम लेना चाहिए–होमवर्क न करने पर वस्तुस्थिति को समझ लेना चाहिए । बच्चे के पास अधिक काम था, इस कारण वह होमवर्क नहीं कर पाया था, वह कुछ अस्वस्थ है या लापरवाही के कारण होमवर्क नहीं किया है या उसे पाठ समझ में नहीं आया है ।
पहली बात तो प्राथमिक कक्षाओं में (कक्षा एक से पाँच तक) होमवर्क देना ही गलत है । उसे जितना कार्य विद्यालय में करवा दिया जाए, उतना ही काफी
है । घर में उसे खेलने–कूदने, व्यवहार सीखने तथा अन्य क्रिया–कलापों जैसे – ड्रॉइंग, पेंटिंग, आर्ट, क्राफ्ट का काम या छोटी–छोटी कहानी, कविता आदि की पुस्तकें पढ़ने का समय मिलना चाहिए ।
बड़ी कक्षाओं में यदि होमवर्क दिया भी जाता है तो उसे पूरा न करने पर उसे सजा देना गलत है । बच्चे को सहज रहने दें । यदि बच्चा जान–बूझकर लापरवाही कर रहा है, तब उसे समझा दें किन्तु सजा न दें, क्योंकि चिन्ता व भय का बच्चे के मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है । इससे झूठ बोलना, जिद्दी होना, क्रोध करना आदि दुर्गुण पनपने लगते हैं ।
घर में बड़ों द्वारा झूठ बोलना – घर में बड़े अक्सर झूठ बोलते हैं, जैसे माँ को पिता से अपनी कोई गलती छुपानी है तब वह बच्चे से कहती हैं—‘पापा को मत बताना ।’
अवसर आने पर बच्चे से भी कोई गलती हो जाने पर वह गलती को छुपा लेता है और माँ से नहीं बताता है । इस प्रकार झूठ की नींव पड़ जाने पर बड़े हो जाने पर बच्चे का झूठ भी बड़ा होता जाता है ।
बड़ों को यदि किसी अपरिहार्य स्थिति में झूठ का सहारा लेना ही पड़ जाए तो कम–से–कम बच्चों को उस झूठ में शामिल न करें । जैसे – बच्चे से यह कहना – ‘पापा को मत बताना ।’ या किसी के आने पर बच्चे से यह कहलवा देना – ‘कह दो पापा घर पर नहीं हैं ।’ या किसी अनिच्छित व्यक्ति का फोन आ जाने पर बच्चे से कहलवा देना – ‘कह दो पापा मोबाइल घर पर भूल गए हैं, अभी घर पर नहीं हैं ।’
बड़ों को इस तरह की अपनी समस्याओं को स्वयं हल करना चाहिए, बच्चों को बीच में नहीं डालना चाहिए ।
यदि बच्चे की झूठ बोलने की आदत पड़ ही गई है तब उसे झूठ की बुराई और सच का महत्त्व छोटी–छोटी कहानियों के माध्यम से समझाया जा सकता
 है । साथ ही उसे यह भी बताना चाहिए कि एक सच को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ जाते हैं ।
झूठ खुल जाने पर समाज में बड़ी बेइज्जती होती है और उस बच्चे की सच बात को भी लोग झूठ मानने लगते हैं । इसलिए सदा सच ही बोलना चाहिए, चाहे इसके लिए थोड़ी देर के लिए हमें अपमान भी सहना पड़े किन्तु अन्तत: परिणाम अच्छा ही होता है ।
8– अँगूठा चूसना
प्रथम छह माह तक शिशु में चूसने की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है । इस आयु में शिशु का अँगूठा चूसना उसकी सामान्य अवस्था को दर्शाता है । कुछ बच्चे एक वर्ष की आयु तक अँगूठा चूसते देखे जाते हैं किन्तु इस आयु के बाद भी शिशु का अँगूठा चूसना एक समस्या बन जाती है ।
यह समस्या जन्म ही न ले, इसके लिए आवश्यक है कि माता बच्चे को प्यार से स्तनपान कराए । माँ स्तनपान कराते समय बच्चे को प्यार से देखती रहे तथा दूध पिलाने के साथ–ही–साथ धीरे–धीरे प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरती रहे । इससे बच्चे का पेट भरने के साथ–ही–साथ उसकी चूसने की प्रवृत्ति की संतुष्टि भी होगी और वह प्रसन्न भी रहेगा ।
प्रथम छह माह तक बच्चे की चूसने की प्रवृत्ति धीरे–धीरे शान्त हो जाती
 है । अत: बच्चे को तब तक स्तनपान कराते रहना चाहिए, जब तक वह स्तन से स्वयं मुँह न हटा ले ।
कई बार बच्चा दूध पीते समय बीच–बीच में हँसता है व माँ को आकर्षित करता है, वह बीच–बीच में खुश होकर माँ के साथ खेलना चाहता है । यदि उस समय माता झुंझलाहट में उसे डाँटती है व जल्दी दूधपीने के लिए प्रेरित करती है तब बच्चे पर इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत बुरा पड़ता है ।
माता को व्यस्तता के बावजूद शिशु को दूध पिलाने के लिए पूरा समय निकालना ही चाहिए । इससे शिशु स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है व उसे संतुष्टि का आभास होता हैय जो उसके पूरे जीवन के आनन्द का स्रोत है ।
जो बच्चे बोतल से दूध पीते हैं, उनकी भी चूसने की प्रवृत्ति की संतुष्टि नहीं हो पाती है । अत: माता का पहला प्रयास तो यह होना चाहिए कि वह बच्चे को स्तनपान ही कराए क्योंकि स्तनपान कराने से बच्चे का ही नहीं माता का भी स्वास्थ्य ठीक रहता है । स्तनपान से बच्चे के शरीर के लिए आवश्यक सभी तत्त्व तो उसे मिल ही जाते हैं, साथ ही उसे भावनात्मक सुरक्षा भी मिलती है, जो उसके सहज विकास के लिए आवश्यक है ।
यदि माता कार्यशील महिला है और वह हर समय अपना दूध नहीं पिला सकती है तब जितनी बार सम्भव हो अपना दूध पिलाए, जब माता घर पर न हो उस समय ही बच्चे को दूसरा दूध दिया जाए । माता जब भी बच्चे को दूधपिलाए, बच्चे को पूरा समय देना चाहिए ताकि बच्चे की भावनात्मक संतुष्टि हो सके ।
यदि माता के पर्याप्त दूध नहीं होता है तब दूसरा दूध पिलाते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए –
* बोतल के निपल के छेद को छोटा रखना चाहिए, ताकि बच्चों की चूसने की प्रवृत्ति की संतुष्टि हो सके ।
* बोतल का निपल भी जल्दी–जल्दी बदलते रहना चाहिए क्योंकि निपल का छेद बड़ा हो जाने पर दूध तेजी से निकलने लगता है और शिशु की चूसने की इच्छा अतृप्त रह जाती है ।
* बोतल का निपल मुलायम यैवजिद्ध होना चाहिए ।
* बोतल से दूध पिलाते समय भी माँ शिशु को अपनी गोद में लिटाकर सिर पर हाथ फेरती रहे, वह उसकी ओर प्यार से देखती रहे, जिससे शिशु स्तनपान के समान ही सुख प्राप्त कर सके ।
अँगूठा चूसने की आदत पड़ जाने पर क्या करें ?
यदि बच्चा एक वर्ष का हो जाता है और उसकी अँगूठा चूसने की आदत पड़ ही गई है तो उसे डाँटने–फटकारने की बजाय प्यार से समझाना चाहिए । निम्नलिखित कुछ उपाय भी किए जा सकते हैं –
* यदि बच्चा नींद में अँगूठा चूसता है तब सोते समय बच्चे के मुँह से अँगूठा निकाल देना चाहिए ।
* अँगूठा चूसने की समस्या आत्मकेन्द्रित है । अत: इसके बारे में अधिक टोका–टाकी न करें ।
* अँगूठे पर नीम की पत्ती पीसकर उसका लेप लगाया जा सकता है ।
* कई बार माताएँ बच्चे को चुसनी इसलिए चूसने को दे देती हैं ताकि बच्चा चुप रहे और वह अपना काम निपटा सकें, ऐसा करना गलत है । बच्चे को खिलौनों आदि की तरफ आकर्षित करें, चुसनी चूसने को न दें ।
* यदि माता के दूध नहीं होता है, तब बच्चे को बोतल या कटोरी–चम्मच से दूध पिलाएँ, किन्तु बच्चे को माता का स्तन चूसने दें । इससे बच्चे को भी भावनात्मक सहारा मिलता है और माता को भी आत्मसंतुष्टि मिलती है ।
चूसने की इच्छा अतृप्त रह जाने पर बड़े होने पर असामान्य सेक्स की इच्छा प्रबल हो सकती है ।

बच्चों के मस्तिष्क की सहजता

जीवन की सफलता के लिए आवश्यक है कि मस्तिष्क सहज रहे । जब बच्चे का जन्म होता है, तब उसका जीवन व मस्तिष्क सहज होता है । सहजता ही जीवन का मूलाधार है ।
यदि मकान की नींव सही पड़ जाए तो मकान का निर्माण अच्छा होता है और वह मकान आँधी–पानी में भी नहीं गिरता है ।
इसी प्रकार बच्चों का अच्छा बचपन हो, उनकी पूर्व प्राथमिक व प्राथमिक शिक्षा ठीक हो तो बच्चे बड़े होने पर पूर्ण प्रफुल्लित, सुयोग्य, सच्चरित्र व समायोजित मानसिकता वाले बनेंगे । जरा विचार करें—
आज तक आपने कोई भी छोटा बच्चा अपराधी प्रवृत्ति का नहीं देखा
होगा ।
 जो बच्चे अपराधी हो जाते हैं, वे भी थोड़ा बड़े होने पर हीअपराधी होते हैं । शिशु अर्थात् छह वर्ष तक का बच्चा अपराधी मानसिकता का नहीं होता है ।
 शिशु चिड़चिड़ा हो सकता है, तोड़–फोड़ करने वाला व जिद्दी हो सकता है किन्तु अपराधी प्रवृत्ति का नहीं हो सकता है । शिशु की इन मानसिक समस्याओं के अनेक कारण हो सकते हैं ।
 ये सभी कारण भी अर्जित Acquired होते हैं, घर–परिवार व समाज की स्थिति–परिस्थिति के कारण होते हैं ।
 बच्चे का दिमाग क्लीन स्लेट की तरह है, हम उसमें जो चाहे लिख सकते हैं, अर्थात् बच्चे के दिमाग में जैसे चाहें, वैसे संस्कार डाले जा सकते हैं ।
 इसका प्रमाण यह है कि आज तक किसी भी बच्चे को मातृभाषा सिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ी । एक मंदबुद्धि बच्चा भी मातृभाषा या स्थानीय भाषा सहज ही ग्रहण कर लेता है ।
 एक लड़की जो घर में अपने बड़ों को या माता को खाना बनाते देखती है, वह सहज ही थोड़ा प्रयास करने पर खाना बनाना सीख जाती है । उसे किसी कूकरी क्लास की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।
 हिन्दू का बच्चा हिन्दू संस्कारों वाला होता है, वह उन्हीं बातों को सही समझता है, जो उसे सिखाई जाती हैं । वह वेद, पुराण, गीता, रामायण, यज्ञ, मन्दिर आदि में विश्वास रखने वाला होता है ।
 इसी प्रकार ईसाई के बच्चे की ईसाई धर्म के रीति–रिवाजों में रुचि भी होती है व विश्वास भी ।
 मुसलमान की सन्तान कुरान, शरीयत व मस्जिद में विश्वास रखती है । पक्का मुसलमान पाँच वक्त नमाज अदा करना अपना कर्तव्य समझता है ।
अब जरा खुले दिमाग से विश्लेषण करें तो कुदरत का सत्य तो केवल एक ही होगा । हर धर्म के धर्मग्रन्थों में अलग–अलग बातें लिखी हैं । उस धर्म–विशेष का समर्थक केवल उसी बात को सत्य मानता है, जो उसके धर्म की पुस्तकों में लिखी हैं । हिन्दू कहते हैं वेद परमात्मा की वाणी है, मुसलमान कहते हैं कि कुरान ऊपर से आई है या अल्लाह की आवाज है । इसी प्रकार ईसाई बाइबिल को ईश्वरकृत कहते हैं ।
इन सब चीजों के मूल में कहा जा सकता है कि बचपन से हम जिस वातावरण में रहते हैं या हमें जो कुछ सिखाया जाता है, हम तदनुकूल ही आचरण करने लगते हैं । हमारे घर–परिवार, पास–पड़ोस के संस्कारों के साथ ही हमारी शिक्षा–दीक्षा जैसी होती है, वैसी ही हमारी सोच होती है । वैसी ही हमारी मानसिकता बनती जाती है ।
महान विचारक जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार—
‘अज्ञानी वह व्यक्ति नहीं है जो विद्वान नहीं है, अज्ञानी वह है जो स्वयं अपने को नहीं जानता और ऐसा विद्वान मूढ़ है, जो समझ अथवा बोध के लिए किताबों पर, जानकारियों पर और प्रमाण पर निर्भर रहता है । बोध केवल आत्मज्ञान से आता है और आत्मज्ञान आता है अपनी समस्त मानसिक प्रक्रिया के प्रति सहजता से । इस प्रकार शिक्षा का वास्तविक अर्थ स्वयं अपने को समझना है, क्योंकि हममें से प्रत्येक में सम्पूर्ण अस्तित्व समाहित है ।
सारांश यह है कि बच्चा स्वयं का अध्ययन करना सीखे । स्वयं के बारे में सीखना ही वास्तविक सीखना है ।’
प्रश्न यह है कि यह कैसे हो ?
देखें राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा निर्मित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के अनुसार—‘स्कूली पाठ्यचर्या और परीक्षा व्यवस्था दोनों में, जो बच्चों को बहुत सी जानकारी रटने और उसे उगलने के लिए विवश करती है, मूलभूत परिवर्तन किए जाएँ । यांत्रिक तरीके से परखे जाने के लिए सीखने की प्रक्रिया बच्चे से बच्चा होने का सुख छीन लेती है तथा स्कूली जानकारी को प्रतिदिन के अनुभव से अलग कर देती है ।
माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952) द्वारा की गई परिकल्पना स्मरण योग्य है—‘लोकतंत्र में नागरिकता की परिभाषा में कई बौद्धिक, सामाजिक व नैतिक गुण शामिल होते हैं : एक लोकतांत्रिक नागरिक में सच को झूठ से अलग छाँटने, प्रचार से तथ्य अलग करने, धर्र्मान्धता और पूर्वाग्रहों के खतरनाक आकर्षण को अस्वीकार करने की समझ व बौद्धिक क्षमता होनी चाहिए । वह न तो पुराने को इसलिए नकारे क्योंकि वह पुराना है, न ही नए को इसलिए स्वीकारे क्योंकि वह नया है – बल्कि उसे निष्पक्ष रूप से दोनों को परखना चाहिए और साहस से उसको नकार देना चाहिए जो न्याय व प्रगति के बलों को अवरुद्ध करता
हो ।––––’
‘लोकतंत्र प्रत्येक व्यक्ति के मनुष्य के रूप में सम्मान व योग्यता में आस्था पर आधारित होता है ––––अत: लोकतांत्रिक शिक्षा का उद्देश्य है – व्यक्तित्व का पूर्ण व चहुँमुखी विकास – अर्थात् एक ऐसी शिक्षा जो विद्यार्थियों को एक समुदाय में जीने की बहुआयामी कला में दीक्षित करे । बहरहाल, यह स्पष्ट है कि एक व्यक्ति अकेेले न तो रह सकता है, न ही विकसित हो सकता है ––––उस शिक्षा का कोई लाभ नहीं है जो अपने साथी नागरिकों के साथ शालीनता, सामंजस्य, कार्य–कुशलता के साथ जीने की शैली के लिए आवश्यक गुणों को पोषित न करती हो ।’
(माध्यमिक शिक्षा आयोग 1952–53, पृ– 20)
‘बाल केन्द्रित शिक्षा–शास्त्र का अर्थ है, बच्चों के अनुभवों, उनके स्वरों और उनकी सक्रिय सहभागिता को प्राथमिकता देना । इस प्रकार के शिक्षाशास्त्र में बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास व अभिरुचियों के मद्देनजर शिक्षा को नियोजित करने की आवश्यकता होती है ।’
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005, पृ– सं– 15)
‘बच्चों की आवाज व अनुभवों को कक्षा में अभिव्यक्ति नहीं मिलती है । प्राय: केवल शिक्षक का स्वर ही सुनाई देता है । बच्चे केवल अध्यापक के सवालों का जवाब देने के लिए या अध्यापक के शब्दों को दोहराने के लिए ही बोलते हैं । कक्षा में वे शायद ही कभी स्वयं कुछ करके देख पाते हैं । उन्हें पहल करने के अवसर भी नहीं मिलते हैं । किताबी ज्ञान को दोहराने की क्षमता के विकास के बजाय पाठ्यचर्या बच्चों को इतना सक्षम बनाए कि वे अपनी आवाज ढूँढ़ सकें, अपनी उत्सुकता का पोषण कर सकें, स्वयं करें, सवाल पूछें, जाँचें, परखें और अपने अनुभवों को स्कूली ज्ञान के साथ जोड़ सकें ।’
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 पृ– 15)
‘बच्चे उसी वातावरण में सीख सकते हैं, जहाँ उन्हें लगे कि उन्हें महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है । हमारे स्कूल आज भी सभी बच्चों को ऐसा महसूस नहीं करवा पाते हैं । सीखने का आनंद व संतोष के साथ रिश्ता होने की बजाय भय, अनुशासन व तनाव से सम्बन्ध हो तो यह सीखने के लिए अहितकारी होता
है ।’
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 पृ– सं– 16)
अब देखें किशोरावस्था में हमारी वर्तमान शिक्षा–प्रणाली का किशोरों पर क्या असर पड़ सकता है—
‘किशोरावस्था अस्मिता के विकास के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण समय है । स्वयं के बारे में समझने की प्रक्रिया का सम्बन्ध शारीरिक बदलाव और वयस्क के रूप में सामाजिक और शारीरिक माँगों से संगति बिठाने से है । स्वतंत्रता, घनिष्ठता, मित्रमंडली पर निर्भरता आदि कुछ ऐसे सरोकार हैं, जिनको पहचानने और उनसे निपटने की दिशा में उचित सहयोग देने की जरूरत है ।
बाहर की दुनिया तथा व्यक्ति की उस तक पहुँच और वहाँ आने–जाने की स्वतंत्रता व्यक्तित्व निर्माण को प्रभावित करती है । लड़कियों के विषय में यह तथ्य विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि प्राय: सामाजिक परम्पराएँ उन्हें चारदीवारों के भीतर रहने को बाध्य कर देती हैं ।
यही परम्पराएँ लड़कों के लिए ठीक इसके विपरीत रूढ़ि को प्रोत्साहित करती हैं, जो लड़कों को बाहरी व शारीरिक क्रियाकलापों से जोड़ती हैं । इस तरह की रूढ़ियाँ किशोरावस्था में अधिक प्रबल हो जाती हैं, जो शरीर के बढ़ने का समय होता है । इन शारीरिक बदलावों का प्रभाव किशोर जीवन के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर पड़ता है ।
अधिकतर किशोर इन परिवर्तनों का सामना बिना पूर्व ज्ञान एवं समझ के करते हैं, जो उन्हें खतरनाक स्थितियाँ जैसे – यौन रोगों, यौन दुर्व्यवहार, एच.आई.वी.एड्स एवं नशीली दवाओं के सेवन का शिकार बना सकती हैं ।
यह समय होता है जब आत्मसात किए गए विचारों व मानदण्डों पर प्रश्न उठाया जाता है, साथ ही अपने दोस्तों का मत बहुत महत्त्वपूर्ण बन जाता है । किशोरों की इन आवश्यकताओं को पहचानकर उनको जीवन में संकट से निपटने के कौशल सीखने की दिशा में सामाजिक और भावनात्मक सहारा दिया जा सकता है । साथ ही, मित्रों के दबाव और लिंग सम्बन्धी प्रचलित मान्यताओं से निपटने की दशा में भी उन्हें तैयार किया जा सकता है । इस प्रकार के सहयोग के अभाव में इन बदलावों को लेकर भ्रम और नासमझी की स्थिति पैदा हो सकती है और इससे किशोरों की अकादमिक और अन्य गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती
हैं ।
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005, पृ– 18)
शैक्षिक कार्य की गुणवत्ता, उससे सीख पाने की योग्यता और विद्यार्थी के लिए उसकी महत्ता को प्रभावित करती है । वे अभ्यास जो बहुत सरल होते हैं, या बहुत कठिन, जो बार–बार एक ही बात यांत्रिक रूप से दोहराते हैं, जो पाठ्य–पुस्तक को याद करने पर आधारित होते हैं, जो बच्चे को आत्माभिव्यक्ति व प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं देते, शिक्षक के जाँच कार्य पर ही निर्भर रहते हैं, वे बच्चे को आज्ञा पालन करने वाली कठपुतली बना देते हैं । शिक्षार्थी अपने विचारों व विवेक को महत्त्व देना नहीं सीखते हैं ।
वह यह सीखते हैं कि ज्ञान दूसरों के द्वारा बनाया जाता है और उन्हें सिर्फ ज्ञान को ग्रहण करना चाहिए । इसीलिए अध्यापकों पर यह जिम्मेदारी आ जाती है कि जो बच्चे स्वाभाविक रूप से शिक्षा के प्रति उत्साहित नहीं लगते उन्हें वह प्रोत्साहित करें ।
शिक्षार्थी नियंत्रित होना स्वीकार कर लेते हैं और यह चाहने लगते हैं कि उन्हें नियंत्रण में रहना आए । यह अंतत: संज्ञानात्मक, आत्मचिन्तन और उस लचीलेपन के विकास के लिए हानिकारक हैं, जो दरअसल अधिगम से विद्यार्थी को सशक्त बनाने के लिए आवश्यक है ।
इस शैक्षिक वातावरण में बढ़ते हुए कई विद्यार्थी सातवीं कक्षा तक पहुँचते–पहुँचते आत्मविश्वास, स्वयं को अभिव्यक्त करने और स्कूली अनुभवों का अर्थ निकालने की क्षमता खो बैठते हैं । वे बार–बार परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए उसी यांत्रिक रटन्त विद्या का सहारा लेते हैं ।
जबकि स्वतंत्र विचार प्रक्रिया और हल करने के विविध तरीकों को प्रोत्साहित करने वाले चुनौतीपूर्ण कार्य शिक्षार्थियों में स्वतंत्रता, रचनात्मकता और आत्मानुशासन को प्रोत्साहित करते हैं । ‘क्विज’ संस्कृति को बढ़ावा देने के बदले जहाँ तत्काल सही जवाब देना जरूरी होता है, हमें विद्यार्थियों को गहन व सार्थक अधिगम पर समय व्यतीत करने देना चाहिए ।
सीखने के वे कार्य जो यह सुनिश्चित करने के लिए रचे गए हैं कि बच्चे पाठ्य–पुस्तकों के अलावा अन्य स्रोतों से भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित होंगे, इस दर्शन को संप्रेषित करते हैं कि बच्चे खुद ही खोज करके एवं प्रमाण जुटा कर सीखते हैं एवं ज्ञान का सृजन करते हैं और अध्यापक या पाठ्य–पुस्तक का ज्ञान पर प्रभुत्व नहीं होता है ।
बच्चे अपने खुद के अनुभवों से, पुस्तकालयों से और स्कूल के बाहर अन्य स्रोतों से ज्ञान तलाश सकते हैं । इस संदर्भ में अधिगम की दृष्टि से सांस्कृतिक विरासत स्थल बेहद महत्त्वपूर्ण बन जाते हैं । न केवल इतिहास बल्कि सभी विषयों के शिक्षकों को पुरातत्त्व महत्त्व के स्थलों के प्रति बच्चों में एक आदरभाव और उनकी महत्ता समझने व उनका अन्वेषण करने की इच्छा को पोषित करना चाहिए ।
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, पृष्ठ 23 –24)
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है – ‘स्कूल के दिनों में मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात से हुई कि स्कूल विश्व की सम्पूर्णता से रहित था ।’
सत्य है विद्यालय तो वह स्थान होना चाहिए जहाँ बच्चे को पूरा विश्व नजर आए, उसमें जो भी जिज्ञासाएँ हैं वे शान्त हो सकें । वह स्वयं को अभिव्यक्त कर सके, चाहे उसकी अभिव्यक्ति खेल द्वारा हो, जिज्ञासाएँ हों, प्रश्न हों या कला के द्वारा अपने को अभिव्यक्त करे । उसे अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता हो ।
यदि उसे अभिव्यक्ति के स्वस्थ व आनन्दमय अवसर नहीं मिलेंगे तो वह रोने, चीखने, जिद्द करने या मारने–पीटने द्वारा अपने को अभिव्यक्त करेगा । विद्यालय ही नहीं अभिभावक भी यह भूल जाते हैं कि नन्हे–मुन्ने बच्चों की शरारतें सहज, स्वाभाविक हैं ।
जिस आँगन में बच्चे की किलकारी नहीं गूँजती, शरारतें नहीं होतीं,  चीजों की फरमाइश नहीं होती, रोना–धोना, चीख–पुकार, शोर–शराबा नहीं होता, उस आँगन में खामोशी और मायूसी छायी रहती है । हम भूल जाते हैं कि बच्चे तो वे कोमल और रंग–बिरंगे फूल हैं, जिन्हें देखकर मन खुशी से झूम उठता है ।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली द्वारा निर्मित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या कार्यक्रम 2005 (National Curriculum Framework 2005) इस बात पर बल देता है कि बच्चा बाहरी जीवन के अनुभवों से विद्यालय में प्रदत्त ज्ञान को जोड़ सके ।
हम सोचते हैं कि बच्चा क्या, कैसे और कितना सीख ले, कितनी जल्दी हमारे समाज के नियम के अनुरूप ढल जाए, कितनी जल्दी उसे अधिक–से–अधिक सिखा दें । यही गलती उसके विकास को बाधित करती है, जिसका दंड उसकी पढ़ाई की गति को ही नहीं, उसके सम्पूर्ण विकास को बाधित करने के रूप में उसको भोगना पड़ता है ।
‘बच्चे का भविष्य अब इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है कि बच्चे के ‘वर्तमान’ को अनदेखा किया जा रहा है, जो बच्चे, समाज व राष्ट्र के लिए अहितकर है ।’
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005, पृ– 2  (ङ))
और शिक्षा बिना बोझ के (Learning Without Burden) समिति की रिपोर्ट ने सिफारिश की कि स्कूली पाठ्यचर्या और परीक्षा व्यवस्था दोनों में, जो बच्चों को बहुत–सी जानकारी रटने और उसे उगलने के लिए विवश करती है, मूलभूत परिवर्तन किए जाएँ । यांत्रिक तरीके से परखे जाने के लिए सीखने की प्रक्रिया बच्चे से बच्चा होने का सुख छीन लेती है तथा स्कूली जानकारी को प्रतिदिन के अनुभव से अलग कर देती है ।
छोटे बच्चों की याददाश्त फोटोग्राफिक होती है । पाँच वर्ष के बच्चे पूरी–की–पूरी किताब रटकर सुना सकते हैं, लेकिन वास्तव में वह कुछ नहीं समझते हैं । बिना समझे इस रटन्त विद्या का उनके मस्तिष्क पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि बिना समझे रटने से उन्हें आनन्द नहीं आता है ।
कुछ चीजें बच्चों को रटवाना आवश्यक है, जैसे – गिनती व पहाड़ा, लेकिन गिनती व पहाड़ा रट जाने के साथ ही यदि इसके मूलभाव को समझा दिया जाए तो बच्चे को रटने के साथ ही आनन्द की प्राप्ति होती है व उसका पढ़ने में भी मन लगेगा और प्राप्त ज्ञान भी स्थायी होगा । जैसे 1 और 1 त्2य इसके साथ ही दो पेंसिलें या दो रबड़ या दो अन्य कोई चीजें सामने रखकर उसे गिनती और इसी प्रकार पहाड़ा सिखाया जा सकता है । इस प्रकार बच्चों के मन में गिनती या पहाड़े का प्रत्यय यब्वदबमचजद्ध स्पष्ट हो जाएगा ।
सरकारी विद्यालयों में पहली कक्षा में कम–से–कम पाँच वर्ष के बच्चे का दाखिला होता है, तभी उसे पढ़ना–लिखना सिखाया जाता है अर्थात् राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के अनुसार कम–से–कम इतने बड़े बच्चों के लिए ही पढ़ना उपयुक्त
है । जबकि प्राइवेट स्कूल बच्चे से यही अपेक्षा तीन–साढ़े तीन वर्ष की आयु में करते हैं । शिशु की शैशवावस्था की कोमल भावनाओं को कठोर नियंत्रण में बद्ध कर दिया जाता है ।
यही नहीं उसके विद्यालय से आने के बाद उसके माता–पिता भी उससे होमवर्क करवाते हैं । घर व विद्यालय में बच्चे को पढ़ाई के लिए मार भी पड़ती है ताकि बच्चे अच्छे नम्बर लाएँ ।
इन विद्यालयों में खेल या कविता, कहानी का उपयोग भी इस तरह किया जाता है कि वह अध्यापक के वर्चस्व व दमन का माध्यम बन जाता है । जैसे–बच्चे से कहा गया – ‘ट्विंकल–ट्विंकल लिटिल–स्टार’याद करो तो उसे इसका अर्थ समझे बिना रटना पड़ता है । इस कविता के सौन्दर्य–बोध से वह अवगत नहीं हो पाता है । हमारा उद्देश्य बच्चे को कविता रटवाना नहीं है वरन् उसे विद्यालय शिक्षा के लिए तैयार करना है ।
माता–पिता भी चाहते हैं कि तीन वर्ष की आयु से ही बच्चे को अधिक–से–अधिक पढ़ाया जाए । वह ऐसे विद्यालय ढूँढते हैं जहाँ बच्चे को अधिक पढ़ाया जाए । घर के लिए भी होमवर्क मिले । माता–पिता का तर्क यह होता है कि आजकल इतना कम्पटीशन है, इतना कोर्स है कि शुरू से ही बच्चों की पढ़ाई पर अधिक ध्यान देना होगा ।
ज्ञातव्य है कि अत्यन्त विकसित देशों में बच्चों को छ: वर्ष तक औपचारिक शिक्षा से मुक्त रखा गया है । शिशु को खेल, कहानी, गीत, संगीत आदि का आनन्द उठाने का पर्याप्त अवसर दिया जाता है । यही उसकी असली शिक्षा है, किन्तु हम तो आज अपनी ही संतान को मानसिक रूप से पंगु बना रहे
 हैं ।
हमारे समाज में पहले संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी । दादी माँ बच्चों को कहानियों के माध्यम से बहुत कुछ सिखा देती थीं । बच्चा परिवार के बीच में रहकर सामाजिक ज्ञान प्राप्त करता था । साथ ही समायोजन व स्वाभाविक स्नेह, अनुराग आदि भी पा लेता था । अब संयुक्त परिवार बहुत कम रह गए हैं । अत: अब ऐसे नर्सरी स्कूलों में बच्चों को भेजा जाए, जहाँ पर वास्तविक रूप से नर्सरी शिक्षा के उद्देश्य की पूर्ति हो ।
अभिभावकों को चाहिए कि छोटी उम्र में बच्चों पर पढ़ाई का दबाव न डालें । न ही टीचर से कहें कि यह चार वर्ष का हो गया तथा आपकी नर्सरी में एक वर्ष से पढ़ रहा है, अभी तक इसे पूरी गिनती लिखनी नहीं आती ।
इस आयु में सबसे बड़ी शिक्षा यही है कि बच्चों के उत्सुकता भरे प्रश्नों का जवाब दें या ज्यादा–से–ज्यादा स्नेह दें । स्नेह बच्चे की प्राथमिक आवश्यकता
 है । अनेक अनुसंधानों से जो बात उभरकर सामने आई है, वह यह कि शिशु को डंडे की मार से नहीं पढ़ाना चाहिए । मनोवैज्ञानिक तनाव का शिशु पर बुरा असर पड़ता है । शिशु के दिमाग पर चिंता सबसे बुरा असर डालती है ।
शिशु हर समय व्यस्त रहना चाहता है, उसे कुछ करने के लिए चाहिए किन्तु वह चाहता है कि उस क्रिया में उसे आनन्द मिले । खेल में भी उसे आनन्द मिलता है । आनन्दयुक्त क्रिया ही उसे प्रिय होती है, चाहे हमारी परिभाषा में वह खेल हो या कोई कार्य या पढ़ना–लिखना । यूँ तो आनन्दयुक्त क्रिया हर एक को प्रिय होती है किन्तु बड़े होने पर तो बच्चा कुछ सीखने की इच्छा रखता है और वह यह सोचकर भी सीख लेता है कि कुछ सीखना उसके काम आएगा । दूसरी ओर शिशु केवल आनन्दयुक्त क्रिया ही करना चाहता है, इसी से वह प्रसन्न रहता है । प्रसन्नता उसके लिए आवश्यक भी है और अनिवार्य भी ।
शिशु के लिए उसके माता–पिता व अध्यापक सर्वसमर्थ होते हैं । चिन्ता उसके मन पर इतना बुरा प्रभाव डालती है, जितना भूख भी नहीं । भूख तो उसे थोड़ी देर के लिए व्यथित करती है किन्तु चिन्ता तो मन में स्थायी स्थान बना लेती है । हमें ऐसे विद्यालयों का विरोध करना होगा, जहाँ पर तीन वर्ष की आयु से बच्चों को पढ़ाने लगते हैं ।
शिशु के लिए कैसा वातावरण प्रदान करना है, इसके लिए आज के परिवेश में और भी सुनियोजित रूपरेखा की आवश्यकता है क्योंकि अब संयुक्त परिवार बहुत कम हैं । अत: एकाकी बच्चा क्या करे ? शिशु व्यस्त भी हो, प्रसन्न भी, अपनी क्षमता का अधिकतम सीमा तक विकास भी कर सके । अपने वातावरण से अधिकतम ग्रहण भी कर सके । इसके लिए हमें सोचना है कि हम अपने शिशुओं को क्या दें ?
शिशु की क्रियाशीलता को कैसे गति दें, यह भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है । उसकी जिज्ञासा को हम शान्त करें, यह उसका अधिकार है, उसको प्रसन्न रहने का अवसर दें, यह उसकी आवश्यकता है और चिन्तामुक्त रहना सम्यक विकास हेतु अनिवार्यता है ।
सहजता ही तो जीवन का मूल सिद्धान्त है । जब मनुष्य सहज होता है तभी तो उसकी चिन्तन क्षमता में अभिवृद्धि होती है । जब मस्तिष्क में सब कुछ ठूँस –ठूँस कर भरा हुआ है, तब बच्चे के मन में स्वतंत्र चिन्तन का स्थान कहाँ रहेगा । स्वचिन्तन ही तो प्रगति का आधार है । अत: शिशु का मस्तिष्क सहज रहे । ढाई–तीन वर्ष के बच्चे के मस्तिष्क में विचारों को ठूँस–ठूँस कर भरना, न जाने कितने विषयों में हम उसे दक्ष बनाने का प्रयास करते हैं ।
नर्सरी शिक्षा के नाम पर ढेर सारी सूचनाएँ उसके मस्तिष्क में भर दी जाती हैं । जैसे—पढ़ना–लिखना, गणित की शिक्षा आदि तथा भावविहीन कविताएँ
आदि । साथ में होती है विद्यालय के प्रति भयपूर्ण छवि और सूखा, कुम्हलाया हुआ चेहरा, जिसमें आनन्द का लक्षण नजर नहीं आता है । बच्चा एक सुकोमल, प्यारा, अबोध प्राणी है । वह हर समय उमंग में भरा रहना चाहता है । हर समय क्रियाशील रहना चाहता है । उसकी एक अनोखी दुनिया होती है । उसकी कल्पना की दुनिया बड़ी रंग–बिरंगी होती है । वह वास्तविकता में भी उसी प्रकार जीना चाहता है । बच्चा परमात्मा की पवित्रतम कृति है ।
बच्चा सहजतम सब कुछ सीखना चाहता है, लेकिन जब हम बोझ के रूप में, कठोर अनुशासन के साथ उसे कुछ सिखाना चाहते हैं तो उसकी आशाओं पर तुषारापात हो जाता है । उसकी इन्द्रधनुषी कल्पना और सीखने की इच्छा भंग हो जाती है । बच्चे के मन में बहुत से प्रश्न होते हैं, सीखने की उसकी इच्छा, योग्यता व क्षमता हमसे कहीं अधिक होती है । आवश्यकता है कि कैसे उसे स्वतंत्र रूप से उभारा जाए । बच्चे घर और बाहर के समयबद्ध सीखने के कार्यक्रम से ऊब जाते
 हैं । पढ़ाई से उन्हें नफरत हो जाती है, माता–पिता और शिक्षक उसे प्रतिद्वन्द्वी के रूप में दिखाई देने लगते हैं ।
बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए उसके जीवन के प्रथम छ: वर्ष बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं । मनुष्य का अधिकांश मानसिक विकास शैशवावस्था में ही हो जाता है । इस समय बच्चे को जैसा चाहे वैसा ढाला जा सकता है । उसके शरीर को स्वस्थ बनाया जा सकता है, मानसिक प्रक्रियाओं का विकास करवाया जा सकता है । अच्छी भावनाओं का बीजारोपण करके अच्छे चरित्र की नींव डाली जा सकती है । शैशवकाल पूरे जीवन की नींव है । इस प्रकार शैशवकाल में बच्चे को प्रफुल्लित, आनन्दित किन्तु सहज, स्वाभाविक जीवन देकर स्वस्थ व्यक्तित्त्व का निर्माण किया जा सकता है ।

आपका मस्तिष्क अपारशक्तियों का सागर



            स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा लास एन्जल्स कैलिफोर्निया में दिए हुए भाषण के अंश
सम्पूर्ण ज्ञान हममें ही निहित है
            स्वामी विवेकानन्द जी कहते हैं सम्पूर्ण ज्ञान हममें ही निहित है आत्मा स्वभावत: ही पूर्ण है, किन्तु यह पूर्णत: माया से ढका हुआ है आत्मा के शुद्ध स्वरूप पर प्रकृति के आवरण पर आवरण चढ़े हुए हैं तब ऐसी अवस्था में हमें क्या करना पड़ता है ? वास्तव में हम अपनी आत्मा की बिल्कुल उन्नति नहीं करते जो पूर्ण है, उसका विकास कौन कर सकता है ? हम केवल परदा दूर हटा देते हैं और आत्मा अपने नित्यशुद्ध, नित्यमुक्त रूप में प्रकट हो जाती है
––––शुद्ध हृदय ही सत्य के प्रतिबिम्ब के लिए सर्वोत्तम दर्पण है, इसलिए यह सारी साधना हृदय के शुद्धीकरण के लिए ही है, और ज्यों ही वह शुद्ध हो जाता है, त्यों ही सम्पूर्ण सत्य उसी क्षण उस पर प्रतिबिम्बित हो जाता है अगर तुम्हारा हृदय पर्याप्त शुद्ध होगा तो दुनिया के सारे सत्य उसमें प्रकट हो जायेंगे ––––तब हम मानो कोई नई ही भाषा बोलने लगेंगे और दुनिया हमें नहीं समझ सकेगी, क्योंकि इन्द्रिय ज्ञान के सिवाय उसे और दूसरा ज्ञान ही नहीं है सच्चा धर्म पूर्ण रूप से द्वैतातीत है विश्व में रहने वाले प्रत्येक जीव में इन्द्रियातीत होने की शक्ति सुप्त भाव में विद्यमान है
शरीरस्थ प्राण का नियंत्रण प्राणायाम से होता है
            प्राणायाम नामक श्वासोच्छ्वास के अभ्यास से श्वासोच्छ्वास नियमित होता है और प्राण की क्रिया में नियमित गति उत्पन्न होती है जब प्राण की गति नियमित होती है तो सब कार्य ठीकठीक होने लगते हैं जब योगियों का शरीर उनके वश में हो जाता है, तब यदि शरीर के किसी अंग में रोग उत्पन्न होता है तो वे जान लेते हैं कि उस अंग में प्राण की गति अनियमित हो रही है और फिर वे प्राण को उस विकृत अंग की ओर प्रेरित करते हैं जिससे उसकी गति फिर से नियमित रूप से शुरू हो जाती है
दूर देश के प्राण का भी नियंत्रण कर सकते हैं
            जिस तरह तुम अपने शरीरस्थ प्राण को नियमित कर सकते हो, उसी प्रकार अगर तुम काफी शक्तिमान हो तो यहाँ से ही एक दूर देश के मनुष्य के प्राण का भी नियंत्रण कर सकते हो प्राण यहाँ से वहाँ तक एक ही है उसमें कहीं पर खण्ड नहीं है, एकत्व ही उसका लक्षण है, धर्म है आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक, मानसिक, नैतिक और तात्त्विक सभी दृष्टियों से सब एक ही है जीव तो सिर्फ उसकी एक लहर, एक स्पन्दन है बाह्य भौतिक प्रकृति को जो स्पन्दित करता है, वही तुम्हारे भीतर भी स्पन्दित हो रहा है जिस तरह सरोवर में बर्फ में विभिन्न घनत्व के भिन्नभिन्न स्तर होते हैं, उसी प्रकार यह विश्व ब्रह्माण्ड भी जड़ भूतों का एक विभिन्न स्तर वाला समुद्र है सूर्य, चन्द्र, तारे और हम स्वयं भी इस महाकाश में अलगअलग घनत्व की वस्तुएँ हैं, लेकिन वह आकाश तत्त्व अखण्ड है, एकरस है
मन के अवचेतन क्षेत्र पर अधिकार किस तरह कर सकते हैं
            यदि मनुष्य अपनी आत्मचेतना को अनन्तगुनी कर ले, उसका अनुभव सर्वत्र करे तो वह ईश्वररूप बन सकता है सम्पूर्ण विश्व पर अपना अधिकार चला सकता है
––––व्यावहारिक मनोविज्ञान प्रथम हमें यह सिखलाता है कि हम अपने मन के अवचेतन क्षेत्र पर अपना अधिकार किस तरह चला सकते हैं हम जानते हैं कि हम ऐसा कर सकते हैं इसीलिए कि हम जानते हैं कि मन का चेतन क्षेत्र ही इस अवचेतन क्षेत्र का कारण है हमारे जो लाखों पुराने जाग्रत विचार और चेतनायुक्त कार्य हैं, वे ही घनीभूत होकर प्रसुप्त हो जाने पर हमारे अज्ञान संस्कार बन जाते हैं हमारा इधर ख्याल ही नहीं जाता, हमें उनका ज्ञान नहीं होता, हम उन्हें भूल जाते हैं देखो, यदि प्रसुप्त अज्ञात संस्कारों में बुरा करने की शक्ति है तो उनमें अच्छा करने की भी शक्ति है हमारे भीतर नाना प्रकार के संस्कार भरे पड़े हैं मानो एक गठरी में बहुत सी चीजें बँधी हुई हैं उन्हें हम भूल गये हैं, हम उनका विचार तक नहीं करते उनमें से बहुत से संस्कार तो वहीं पड़े सड़ते रहते हैं और वास्तव में भयानक बनते जाते हैं वे ही प्रसुप्त कारण एक दिन मन के चेतन क्षेत्र पर उठते हैं और मानवता का नाश कर देते हैं
            अतएव सच्चा मनोविज्ञान इस बात की कोशिश करेगा कि ये प्रसुप्त भाव चेतन मन द्वारा नियन्त्रित हों मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को जाग्रत करना, जिससे कि वह अपना पूर्ण स्वामी बन जाए, एक बड़ा कार्य है शरीरान्तर्गत यकृत आदि इन्द्रियों की सहज क्रियाओं को भी हम अपना हुक्म मानने के लिए लगा सकते हैं
            अवचेतन क्षेत्र को अपने अधिकार में लाना हमारी साधना का पहला भाग
है दूसरा है चेतन क्षेत्र के परे चले जाना जिस तरह अवचेतन क्षेत्र चेतन क्षेत्र के नीचे उसके अतीत की एक अवस्था है जब मनुष्य इस अतीन्द्रिय, अवचेतन अवस्था को पहुँच जाता है तब वह मुक्त हो जाता है, ईश्वरत्व को प्राप्त हो जाता है तब मृत्यु अमरत्व में परिणत हो जाती है, दुर्बलता असीम शक्ति बन जाती है और अज्ञान की लौह श्रृंखलाएँ दूर हो जाती हैं वह अनन्त ज्ञानातीत अवस्था ही, यह इन्द्रियातीत राज्य ही हमारा एकमात्र लक्ष्य है
            अतएव यह स्पष्ट है कि हमें दो कार्य अवश्य ही करने होंगे एक तो यह कि इड़ा और पिंगला के प्रवाहों का नियमन कर अवचेतन कार्यों को नियमित करना, और दूसरा इसके साथ ही साथ चेतन के भी परे चले जाना
            ग्रन्थों में कहा है कि योगी वही है जिसने दीर्घ काल तक चित्त की एकाग्रता का अभ्यास करके इस सत्य की उपलब्धि कर ली है अब सुषुम्ना का द्वार खुल जाता है और इस मार्ग से वह प्रवाह शुरू हो जाता है, जो इसके पहले वहाँ कभी नहीं गया था और वह (जैसा कि आलंकारिक भाषा में कहा है) धीरेधीरे विभिन्न कमलचक्रों में से होता हुआ, कमलदलों को खिलाता हुआ अन्त में मस्तिष्क तक पहुँच जाता है, वह जान लेता है कि वह स्वयं परमेश्वर ही है हममें से प्रत्येक व्यक्ति, बिना किसी अपवाद के, योग की इस अन्तिम अवस्था को प्राप्त कर सकता है
            आसन, प्राणायाम इत्यादि योग के सहायक हैं अवश्य, लेकिन वे केवल शारीरिक क्रियाएँ मात्र हैं मुख्य तैयारी तो मन की है सबसे पहले यह आवश्यक है कि हमारा जीवन शान्तिपूर्ण तथा समाधान युक्त हो
––––पहले ईश्वर के ठीकठीक अन्वेषण में लगे रहो और बाद में सब कुछ तुम्हें स्वयं ही मिल जाएगा ’ ––––आध्यात्मिक जीवन का सबसे बड़ा सहायक हैध्यान ध्यान के द्वारा हम अपनी भौतिक भावनाओं से अपने आपको स्वतंत्र कर लेते हैं और अपने ईश्वरीय स्वरूप का अनुभव करने लगते हैं ध्यान करते समय हमें बाहरी साधनों पर अवलम्बित नहीं रहना पड़ता गहरे अँधेरे स्थान को भी आत्मा की ज्योति दिव्य प्रकाश से भर देती है बुरी से बुरी वस्तु में भी वह अपना सौरभ उत्पन्न कर सकती है वह अत्यन्त दुष्ट मनुष्य को भी देवता बना देती हैऔर सम्पूर्ण स्वार्थी भावनाएँ, सम्पूर्ण शत्रुभाव नष्ट हो जाते हैं
दूसरा मनुष्य क्या सोच रहा है या भविष्य में क्या सोचेगा जाना जा सकता है
            सारे युगों से, संसार के सब लोगों का अलौकिक घटनाओं में विश्वास चला रहा है हम सभी ने अद्भुत चमत्कारों के बारे में सुना है और हममें से कुछ ने उनका स्वयं अनुभव भी किया है इस विषय का प्रारंभ आज मैं स्वयं देखे हुए चमत्कारों को बतला कर करूँगा मैंने एक बार ऐसे मनुष्य के बारे में सुना, जो किसी के मन के प्रश्न का उत्तर प्रश्न सुनने से पहले ही बता देता था मुझे यह भी बतलाया गया कि वह भविष्य की बातें भी बताता है मुझे उत्सुकता हुई और अपने कुछ मित्रों के साथ मैं वहाँ पहुँचा हममें से प्रत्येक ने पूछने का प्रश्न अपने मन में सोच रखा था गलती हो, इसलिए हमने वे प्रश्न कागज पर लिखकर जेब में रख लिए थे ज्यों ही हममें से एक वहाँ पहुँचा, त्यों ही उसने हमारे प्रश्न और उनके उत्तर कहना शुरू कर दिये फिर उस मनुष्य ने कागज पर कुछ लिखा, उसे मोड़ा और उसके पीछे मुझे हस्ताक्षर करने के लिए  कहा और बोला, ‘इसे पढ़ो मत, जेब में रख लो, जब तक मैं इसे फिर माँगू इस तरह उसने हर एक से कहा बाद में उसने हम लोगों को हमारे भविष्य की कुछ बातें बतलायीं फिर उसने कहा—‘अब किसी भी भाषा का कोई शब्द या वाक्य तुम लोग अपने मन में सोच लो मैंने संस्कृत का एक लम्बा वाक्य सोच लिया वह मनुष्य संस्कृत बिल्कुल जानता था उसने कहा, ‘अब अपनी जेब का कागज निकालो कैसा आश्चर्य! वही संस्कृत का वाक्य उस कागज पर लिखा था और नीचे यह भी लिखा था किजो कुछ मैंने इस कागज पर लिखा है, वही यह मनुष्य सोचेगा,’ और यह बात उसने एक घण्टा पहले ही लिख दी थी फिर हममें से दूसरे को, जिसके पास भी उसी तरह का एक दूसरा कागज था, कोई एक वाक्य सोचने को कहा गया उसने अरबी भाषा का एक फिकरा सोचा अरबी भाषा का जानना तो उसके लिए और भी असम्भव था वह फिकरा थाकुरान शरीफका, लेकिन मेरा मित्र क्या देखता है कि वह भी कागज पर लिखा है      हममें से तीसरा था डॉक्टर, उसने किसी जर्मन भाषा की वैद्यकीय पुस्तक का वाक्य अपने मन में सोचा उसके कागज पर वह वाक्य भी लिखा था
            यह सोच कर कि कहीं पहले मैंने धोखा खाया हो, कई दिनों बाद मैं फिर दूसरे मित्रों को साथ लेकर वहाँ गयाय लेकिन इस बार भी उसने वैसी ही आश्चर्यजनक  सफलता पायी ’ ––––प्राचीन समय में हजारों वर्ष पूर्व ऐसी बातें आज की अपेक्षा और भी अधिक परिणाम में हुआ करती थीं ––––ये बातें भी ठीक वैसी ही नियमबद्ध हैं, जैसी भौतिक जगत् की अन्यान्य बातें ––––वे लोग जिस सिद्धान्त पर पहुँचे हैं, वह यह है कि यह सारा अद्भुत सामर्थ्य मनुष्य के मन में अवस्थित है मनुष्य का मन समष्टि मन का अंश मात्र है प्रत्येक मन दूसरे हर एक मन में संलग्न है प्रत्येक मन, वह चाहे जहाँ रहे, सम्पूर्ण विश्व के व्यापार में प्रत्यक्ष भाग ले रहा है
            इस घटना के सम्बन्ध में मेरा व्यक्तिगत मत है कि जो व्यक्ति भविष्य में सोचे जाने वाले विचारों को पहले से कागज पर लिख देता था, जिस भाषा को वह जानता तक था, उसका कारण यह हो सकता है कि सामने वाला व्यक्ति क्या सोचेगा उसका चित्र उसके सामने जाता था उसी चित्र को वह कागज पर उकेर देता था भाषा जानते हुए भी वह उस सोची जाने वाली इबारत को कागज पर उतार देता था, चाहे वह किसी भी भाषा की हो इस घटना से यह भी सिद्ध होता है कि मनुष्य भविष्य में क्या सोचेगा यह भी जाना जा सकता है
विचार संक्रमण (मन एक अखण्ड वस्तु)
            क्या तुम लोगों ने विचार संक्रमण (Thought transference) का चमत्कार देखा है ? यहाँ एक मनुष्य कुछ विचार करता है और वह विचार अन्यत्र किसी दूसरे मनुष्य में प्रकट हो जाते हैं एक मनुष्य अपने विचार दूसरे मनुष्य के पास भेजना चाहता है इस दूसरे मनुष्य को यह मालूम हो जाता है कि इस तरह का सन्देश उसके पास रहा है वह उस सन्देश को ठीक उसी रूप में ग्रहण करता है, जिस रूप में वह भेजा गया था पूर्व साधनाओं से यह बात सिद्ध होती है यह केवल आकस्मिक घटना नहीं है, दूरी के कारण कुछ अन्तर नहीं पड़ता वह सन्देश उस दूसरे मनुष्य तक पहुँच जाता है और वह दूसरा मनुष्य उसे समझ लेता है
            अगर मेरा मन एक दूसरी स्वतंत्र वस्तु होता, जो वहाँ विद्यमान है, और मेरा मन एक दूसरी स्वतंत्र वस्तु होता, जो यहाँ विद्यमान है, और इन दोनों मनों में यदि कोई सम्बन्ध होता, तो मेरे विचार तुम्हारे पास कैसे पहुँच पाते ? सर्वसाधारण व्यवहार से मेरा विचार सीधा तुम्हारे पास नहीं पहुँचताय पर प्रथम मेरे विचार को आकाशतत्त्व के स्पन्दनों में परिणत होना पड़ता है ये स्पन्दन फिर तुम्हारे मस्तिष्क में पहुँचते हैं वहाँ फिर से इन स्पन्दनों का तुम्हारे अपने विचार में रूपान्तर होता है इस तरह मेरा विचार तुम्हारे पास पहुँचता है
            यहाँ पहले विचार विश्लिष्ट होकर आकाश तत्त्व में मिल जाता है और फिर उसी का वहाँ संश्लेषण हो जाता हैइस तरह का चक्राकार कार्यक्रम चलता है परन्तु विचारसंक्रमण (Thought transference) में इस तरह की कोई चक्राकार क्रिया नहीं होती, इसमें मेरा विचार सीधासाधा तुम्हारे पास पहुँच जाता है
            इससे स्पष्ट है कि मन एक अखण्ड वस्तु है, जैसा कि योगी कहते हैं मन विश्वव्यापी है तुम्हारा मन, मेरा मनये सब विभिन्न मन उस समष्टि मन के अंश मात्र हैं, मानो समुद्र पर उठने वाली छोटीछोटी लहरें हैंय और इस अखण्डता के कारण ही हम अपने विचारों को एकदम सीधे बिना किसी माध्यम के आपस में संक्रमित कर सकते हैं –––––हम सदा यही कहा करते हैं कि हमारे कर्मों पर, हमारे विचारों पर हमारा अधिकार नहीं चलता यह अधिकार हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं ? यदि हम सूक्ष्म गतियों पर नियंत्रण कर सकें और विचार के विचार बनने एवं कार्य रूप में परिणत होने से पूर्व ही यदि उसको मूल में ही अधीन कर सकें, तो इस सबको नियंत्रित कर सकना हमारे लिए सम्भव होगा
            अब अगर ऐसा कोई उपाय हो, जिसके द्वारा हम सूक्ष्म कारणों का, इन सूक्ष्म शक्तियों का विश्लेषण कर सकें, उन्हें समझ सकें और अन्त में अपने अधीन कर सकें, तभी हम खुद पर अपना अधिकार चला सकेंगे जिस मनुष्य का मन उसके अधीन होगा, निश्चय ही वह दूसरों के मनों को भी अपने अधीन कर सकेगा ––––यदि हम इन सूक्ष्म कारणों पर अपना अधिकार चला सकें तो हम अपने भौतिक दु:खों को अधिकांशत: दूर कर सकते हैं यदि ये सूक्ष्म गतियाँ हमारे अधीन हो जाएँ तो हम अपनी चिन्ताओं को दूर कर सकते हैं यदि हम इन सूक्ष्म शक्तियों को अपने अधीन कर लें तो अनेक अपयश टाले जा सकते हैं –––
––––मैंने ऐसा मनुष्य देखा है, जो आँखें बन्द कर लेता है और फिर भी बता देता है कि दूसरे कमरे में क्या हो रहा है ––––अगर मनुष्य कोने में बैठे हुए दूसरे मनुष्य के मन में क्या चल रहा है, यह जान सकता है, तो वह दूसरे कमरे में बैठे रहने पर भी क्यों जान सकेगा, और इतना ही क्यों, कहीं पर भी बैठकर क्यों जान सकेगा ?
अपनी आत्मा का प्रतिष्ठान करो
            अनेकों बार मैं मृत्युमुख में पड़ा हूँ, क्षुधातुर रहा हूँ, पैर फटे हैं और थकावट आयी, लगातार कई दिनों तक मुझे अन्न नहीं मिला और अक्सर मैं एक पग भी नहीं चल सकता थाय मैं पेड़ के नीचे बैठ जाता और ऐसा मालूम होता था कि अब प्राण निकले बोलना मुझे कठिन हो जाता था और मैं विचार तक नहीं कर सकता था अन्त में मेरा मन इस विचार पर लौट आया—‘मुझे डर कहाँ ? मैं कैसे मर सकता हूँ ? सोऽहम्!’ ––––ऐसा विचार आने पर मैं नवचैतन्य पा उठ खड़ा होता, और यह देखो, तुम लोगों के सामने आज जीताजागता खड़ा हूँ इस तरह जबजब अन्धकार का आक्रमण हो, तो अपनी आत्मा का प्रतिष्ठान करो, और जो प्रतिकूल है, नष्ट हो जाएगा, क्योंकि आखिर यह सब स्वप्न ही है
            आपत्तियाँ पर्वत जैसी भले ही हों, सब कुछ भयावह और अन्धकारपूर्ण भले ही दिखे, पर जान लो, यह सब माया है डरो मत, यह भाग जाएगी इसे कुचलो और यह लुप्त हो जाती है इसे ठुकराओ और यह मर जाती है डरो मत, कितनी बार असफलता मिलेगी, यह सोचो, चिन्ता करो, काल अनन्त है आगे बढ़ो, पुन: पुन: अपनी आत्मा का प्रतिष्ठान करो! प्रकाश अवश्य ही
आएगा
––––स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा मेडिसिन स्क्वेयर कन्सर्ट हाल, न्यूयार्क में दिये हुए भाषण का अंश
माँगो और तुम्हें दिया जाएगा
            ईसा के उन वचनों को याद रखो, ‘माँगो और वह तुम्हें दे दिया जाएगा, ढूँढ़ो और तुम पाओगे, खटखटाओ और तुम्हारे लिए दरवाजा खोल दिया जाएगा ये शब्द अक्षरश: सत्य हैं ये तो रूपक हैं, काल्पनिक ईश्वर के श्रेष्ठतम पुत्रों में से एक के हृदयोद्गार हैं, जिनका हमारे इस संसार में अवतार हुआ था ये शब्द साक्षात्कार के फलस्वरूप मिले थे, पुस्तकों से उद्धृत किये हुए नहीं थे ये हमें उन महापुरुषों से प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने ईश्वर का अनुभव प्राप्त किया था, स्वयं परमात्मा का साक्षात्कार किया थाय ईश्वर से बातें की थीं, जो ईश्वर के साथ रहते थेहम और आप जिस प्रकार इस इमारत को देख रहे हैं, उससे भी सौ गुना अधिक प्रत्यक्ष रूप से जिन्होंने ईश्वर को जाना था पर ईश्वर की चाह किसे है ? यही प्रश्न है क्या आप समझते हैं कि संसार का यह सारा जनसमुदाय ईश्वर प्राप्ति की इच्छा रखते हुए भी ईश्वर को नहीं पा सक रहा है, यह असम्भव है
स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा लन्दन में दिये हुए व्याख्यान का अंश
            मैं सब कुछ कर सकता हूँवेदान्त सबसे पहले मनुष्य को अपने ऊपर विश्वास करने के लिए है ––––वेदान्त कहता है कि जो व्यक्ति अपने आप पर विश्वास नहीं करता, वह नास्तिक है अपनी आत्मा की महिमा में विश्वास करने को ही वेदान्त में नास्तिकता कहते हैं बहुत से लोगों के लिए यह एक भीषण विचार है, इसमें कोई सन्देह नहीं, और हममें से अधिकांश सोचते हैं कि यह कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता, किन्तु वेदान्त दृढ़ रूप से कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति इस सत्य को जीवन में प्रत्यक्ष कर सकता है इसकी उपलब्धि में स्त्रीपुरुष, बालकबालिका, जाति या लिंग आदि से सम्बद्ध किसी प्रकार का भेद बाधक नहीं हैक्योंकि वेदान्त दिखा देता है कि वह सत्य पहले से ही सिद्ध है और पहले से ही विद्यमान है
हममें ब्रह्माण्ड की समूची शक्ति निहित है
            हममें ब्रह्माण्ड की समूची शक्ति पहले से ही है हम लोग स्वयं ही अपने नेत्रों पर हाथ रखकरअन्धकार’ ‘अन्धकारकहकर चीत्कार करते हैं जान लो कि तुम्हारे चारों ओर कोई अन्धकार नहीं है हाथ हटाने पर ही तुम देखोगे कि यहाँ प्रकाश पहले से ही वर्तमान था अन्धकार कभी था ही नहीं, दुर्बलता कभी नहीं थी हम लोग मूर्ख होने के कारण ही चिल्लाते हैं कि हम दुर्बल हैं, मूर्खतावश ही चिल्लाते हैं कि हम अपवित्र हैं ––––
––––वेदान्त पाप स्वीकार नहीं करता, भ्रम स्वीकार करता है वेदान्त कहता है कि सबसे बड़ा भ्रम हैअपने को दुर्बल, पापी, हतभाग्य कहनायह कहना कि मुझमें कुछ भी शक्ति नहीं है, मैं यह नहीं कर सकता आदिआदि कारण, जब तुम इस प्रकार सोचने लगते हो, तभी तुम मानो बन्धन Üाृखला में एक कड़ी और जोड़ देते हो जो कोई अपने को दुर्बल समझता है, वह भ्रान्त है, वह जगत में एक असत् विचार प्रवाहित करता है –––––हमें दूसरों को घृणा की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए हम सभी उसी एक लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं दुर्बलता और सबलता में भेद केवल परिमाणगत है प्रकाश और अन्धकार में भेद केवल परिमाणगत है, पाप और पुण्य के बीच भी भेद केवल परिमाणगत है, एक वस्तु का दूसरी वस्तु से भेद केवल परिमाणगत ही है, प्रकारगत नहीं, क्योंकि वास्तव में सभी वस्तुएँ वही एक अखण्ड वस्तुमात्र हैं सब वही एक हैं, जो अपने को विचार, जीवन, आत्मा या देह के रूप में अभिव्यक्त करता है और उनमें अन्तर केवल परिमाण का है
            अत: जो किसी कारणवश हमारे समान उन्नति नहीं कर पाये, उनके प्रति घृणा करने का अधिकार नहीं है किसी की निन्दा मत करो किसी की सहायता कर सकते हो तो करो, नहीं कर सकते हो तो हाथ पर हाथ रखकर चुपचाप बैठे
रहो उन्हें आशीर्वाद दो, अपने रास्ते जाने दो गाली देने अथवा निन्दा करने से कोई उन्नति नहीं होती इस प्रकार से कभी कोई कार्य नहीं होता दूसरे की निन्दा करने में हम अपनी शक्ति लगाते हैं आलोचना और निन्दा अपनी शक्ति वृथा खर्च करने का उपाय मात्र है ––––
            आत्मविश्वासआत्मविश्वास का आदर्श ही हमारी सबसे अधिक सहायता कर सकता है यदि इस आत्मविश्वास का और भी विस्तृत रूप से प्रचार होता और यह कार्यरूप में परिणत हो जाता, तो मेरा दृढ़ विश्वास है कि जगत में जितना दु: और अशुभ है, उसका अधिकांश गायब हो जाता मानव जाति के समग्र इतिहास में सभी महान स्त्री पुरुषों में यदि कोई महान प्रेरणा सबसे अधिक सशक्त रही है तो वह है आत्मविश्वास वे इस ज्ञान के साथ पैदा हुए थे कि वे महान बनेंगे और वे महान बने भी मनुष्य कितनी भी अवनति की अवस्था में क्यों पहुँच जाए, एक समय ऐसा अवश्य आता है, जब वह उससे बेहद आर्त होकर एक ऊर्ध्वगामी मोड़ लेता है, और अपने में विश्वास करना सीखता है किन्तु हम लोगों को इसे शुरू से ही जान लेना अच्छा है हम आत्मविश्वास सीखने के लिए इतने कटु अनुभव क्यों प्राप्त करें ?
            मनुष्य मनुष्य के बीच जो भेद है वह केवल आत्मविश्वास की उपस्थिति तथा अभाव के कारण ही है, यह सरलता से ही समझ में सकता है इस आत्मविश्वास के द्वारा सब कुछ हो सकता है मैंने अपने जीवन में ही इसका अनुभव किया है, अब भी कर रहा हूँ जैसेजैसे आयु बढ़ती जा रही है, उतना ही यह विश्वास दृढ़तर होता जा रहा है जिसमें आत्मविश्वास नहीं है, वही नास्तिक है ––––विश्वास का अर्थ हैसबके प्रति विश्वास, क्योंकि तुम सभी एक हो अपने प्रति प्रेम का अर्थ है सब प्राणियों से प्रेम, समस्त पशुपक्षियों से प्रेम, सब वस्तुओं से प्रेमक्योंकि तुम सब एक हो यही महान विश्वास जगत को अधिक अच्छा बना सकेगा यही मेरा विश्वास है वही सर्वश्रेष्ठ मनुष्य है, जो सच्चाई के साथ कह सकता है, ‘मैं अपने सम्बन्ध में सब कुछ जानता हूँ क्या तुम जानते हो कि तुम्हारी इस देह के भीतर कितनी ऊर्जा, कितनी शक्तियाँ, कितने प्रकार के बल अब भी छिपे पड़े हैं ?
            अपने को जानोमनुष्य में जो है, उस सबका ज्ञान कौन सा वैज्ञानिक प्राप्त कर सकता है ? लाखों वर्षों से मनुष्य पृथ्वी पर है, किन्तु अभी तक उसकी शक्ति का पारमाणविक अंश मात्र ही प्रकाशित हुआ है अतएव तुम कैसे अपने को जबर्दस्ती दुर्बल कहते हो ? ऊपर से दिखने वाली इस पतितावस्था के पीछे क्या सम्भावना है, क्या तुम यह जानते हो ? तुम्हारे अन्दर जो है, उसका थोड़ासा तुम जानते हो तुम्हारे पीछे है शक्ति और आनन्द का सागर
––––‘आत्मा वा अरे श्रोतव्य:’—अस आत्मा के बारे में सुनना चाहिए दिन रात श्रवण करो कि तुम्हीं वह आत्मा हो दिनरात यही भाव अपने में और तुम्हारी नसनस में समा जाए सम्पूर्ण शरीर को इसी एक आदर्श के भाव से पूर्ण कर दो—‘मैं अजर, अविनाशी, आनन्दमय, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, नित्य ज्योर्तिमय आत्मा हूँ’—दिनरात यही चिन्तन करते रहो, जब तक कि यह भाव तुम्हारे जीवन का अविच्छेद्य अंग नहीं बन जाता ––––अपने से किसी दूसरे से कभी यह कहो कि तुम दुर्बल हो ––––तुम अपने को पापी समझते हो यह  तुम्हें शोभा नहीं देता तुम अपने को दुर्बल समझते हो, यह तुम्हारे लिए उचित नहीं है ––––
प्रेम सत्य है, घृणा असत्य है
            प्रेम सत्य है घृणा असत्य है क्योंकि वह अनेकत्व को जन्म देती है घृणा ही मनुष्य को मनुष्य से पृथक करती हैअतएव वह गलत और मिथ्या हैय यह एक विघटक शक्ति हैय वह पृथक करती है, नाश करती है प्रेम जोड़ता है, प्रेम एकत्व स्थापित करता है ––––क्या विश्व के इतिहास में तुम्हें पैगम्बरों की शक्ति के स्त्रोत का पता नहीं चला ? क्या वह बुद्धि में था ? उनमें से क्या कोई दर्शन सम्बन्धी सुन्दर पुस्तक लिखकर छोड़ गया है ? किसी ने ऐसा नहीं किया वे केवल कुछ थोड़ी सी बातें कह गए हैं ईसा की भाँति भावना करो, तुम भी ईसा हो जाओगेय बुद्ध के समान भावना करो, तुम भी बुद्ध बन जाओगे
भावना ही बल हैभावना ही जीवन है, भावना ही बल है, भावना ही तेज हैभावना के बिना कितनी ही बुद्धि क्यों लगाओ, ईश्वरप्राप्ति नहीं होगी बुद्धि चलनशक्ति शून्य अंगप्रत्यंग के समान है जब भावना उसे अनुप्राणित करके गतियुक्त करती है, तभी वह दूसरे का हृदय स्पर्श करती है ––––हम लोगों में से प्रत्येक को पैगम्बर बनना पड़ेगाऔर तुम स्वरूपत: वही हो बस केवल यह जान लो यह कभी सोचना कि आत्मा के लिए कुछ असम्भव है ऐसा सोचना ही भयानक नास्तिकता है यदि पाप नामक कोई वस्तु है तो वह है यह कहना है कि मैं दुर्बल हूँ अथवा अन्य कोई दुर्र्बल है
            पवित्रात्मा पुरुषों की आँखों में जो एक विशेष प्रकार की ज्योति का आविर्भाव होता है, वह वास्तव में अन्त:स्थ सर्वव्यापी आत्मा की ही ज्योति है वह ज्योति ही ग्रहों, सूर्य, चन्द्र और तारों में प्रकाशित हो रही है
––––मनुष्य देह में स्थित मानव आत्मा ही एकमात्र उपास्य ईश्वर है पशु भी भगवान के मन्दिर हैं, किन्तु मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ मंदिर हैताजमहल जैसा यदि मैं उसकी उपासना नहीं कर सका, तो अन्य किसी भी मंदिर से कुछ भी उपकार नहीं होगा जिस क्षण मैं प्रत्येक मनुष्य देहरूपी मंदिर में उपविष्ट ईश्वर की उपलब्धि कर सकूँगा, जिस क्षण मैं प्रत्येक मनुष्य के सम्मुख भक्ति भाव से खड़ा हो सकूँगा और वास्तव में उनमें ईश्वर देख सकूँगा, जिस क्षण मेरे अन्दर यह भाव जाएगा, उसी क्षण मैं सम्पूर्ण बन्धनों से मुक्त हो जाऊँगाबाँधने वाले पदार्थ हट जाएँगे और मैं मुक्त हो जाऊँगा ––––हम केवल आशाएँ किये चले जा रहे हैं, उनका अन्त नहीं––––वेदान्त कहता है, इसी आशा का त्याग
 करो क्यों आशा करते हो ? तुम्हारे पास सब कुछ है तुम्हीं सब कुछ हो तुम आत्मा हो, तुम सम्राट स्वरूप हो, तुम भला किसकी आशा करते हो ? यदि राजा पागल होकर अपने देश मेंराजा कहाँ है ?’ ––––‘राजा कहाँ है ?’ खोजता फिरे तो वह कभी राजा को नहीं पा सकता, क्योंकि वह स्वयं ही राजा है वह अपने राज्य के प्रत्येक ग्राम में, प्रत्येक नगर में, यहाँ तक कि प्रत्येक घर में खोज करे, खूब रोएचिल्लाए, फिर भी राजा का पता नहीं लग सकताय क्योंकि वह व्यक्ति स्वयं ही राजा है इसी प्रकार हम लोग यदि जान सकें कि हम ईश्वर हैं और इस अन्वेषणरूपी व्यर्थ चेष्टा को छोड़ सकें, तो बहुत ही अच्छा हो इस प्रकार अपने को ईश्वरस्वरूप जान लेने पर ही हम सन्तुष्ट और सुखी हो सकते हैं यह सब पागलों जैसी चेष्टा छोड़ कर जगत् रूपी मंच पर एक अभिनेता के समान कार्य करते चलो
            इसी प्रकार की अवस्था आने से हम लोगों की सम्पूर्ण दृष्टि परिवर्तित हो जाती है अनन्त: कारागार स्वरूप होकर यह जगत खेलने का स्थान बन जाता है प्रतियोगिता की जगह बनकर यह भौंरों के गुंजन से परिपूर्ण बसन्तकाल का रूप धारण कर लेता है पहले जो जगत् नरककुण्ड जैसा लगता था, वही अब स्वर्ग बन जाता है ––––तुम्हीं लोग अपने एक अंश को बाहर प्रक्षिप्त करते हो, किन्तु वास्तव में तुम्हीं असली वस्तु होतुम्हीं प्रकृत उपास्य देवता हो यही वेदान्त का मत है और यही यथार्थ में व्यावहारिक है–––
––––क्या तुम लोगों को बाइबिल का वह कथन याद नहीं है, ‘यदि तुम अपने भाई को, जिसे तुम देख रहे हो, प्यार नहीं कर सकते, तो ईश्वर को, जिसे तुमने कभी नहीं देखा, भला कैसे प्यार कर सकोगे
हममें अनन्त शक्ति है
            ससीम व्यक्ति मनुष्य अपना उत्पत्ति स्थल भूल जाता है, और अपने को नितान्त पृथक समझने लगता है व्यष्टीकृत और विभेदीकृत सत्ताओं के रूप में हम अपना स्वरूप भूल जाते हैं अत: अद्वैतवाद हमें विभेदीकरण को त्याग देने की शिक्षा नहीं देता, वरन् उसके रूप को समझ लेने को कहता है हम वस्तुत: वही अनन्त पुरुष हैं, हमारे व्यक्तित्व जल की उन धाराओं के सदृश हैं, जिनमें वह अनन्त सत्ता अपने को अभिव्यक्त कर रही है ––––हममें अनन्त सत्ता, अनन्त शक्ति, अनन्त आनन्द विद्यमान है हम लोगों को उन्हें उपार्जित नहीं करना है, वे सब हममें हैं, हमें तो उन्हें केवल प्रकाशित मात्र करना है ––––मनुष्य की आत्मा के भीतर अनन्त शक्ति भरी पड़ी है, मनुष्य को उसका ज्ञान हो या हो उसे केवल जानने की ही अपेक्षा है धीरेधीरे मानो वह अनन्त शक्तिमान दैत्य जागृत होकर अपनी शक्ति का ज्ञान प्राप्त कर रहा है और जैसेजैसे वह सचेतन होता जाता है, वैसेवैसे एक के बाद एक उसके बंधन हटते जाते हैं,  श्रृंखलाएँ छिन्नभिन्न होती जाती हैं
सहायता सदा अन्दर से मिलती है
            यदि देश में केवल दो सौ नरनारी देश के सच्चे हितैषी हों, तो पाँच दिन में सतयुग सकता है
            वेदान्त कहता है, दूसरे की सहायता से हमारा कुछ नहीं हो सकता हम रेशम के कीड़े के समान हैं अपने ही शरीर से अपने आप जाल बना कर उसी में आबद्ध हो गये हैं किन्तु यह बद्धभाव चिरकाल के लिए नहीं है हम लोग उससे तितली के समान बाहर निकल कर मुक्त हो जाएँगे हम लोग अपने चारों ओर इस मर्मजाल को लगा देते हैं और अज्ञानवश सोचने लगते हैं कि हम बद्ध हैं और सहायता के लिए रोतेचिल्लाते हैं, किन्तु बाहर से कोई सहायता नहीं मिलती, सहायता मिलती है भीतर से
            दुनिया के सारे के सारे देवताओं के पास तुम रो सकते हो, मैं भी बहुत वर्ष इसी तरह रोता रहा, अन्त में देखा कि मुझे सहायता मिल रही है, किन्तु यह सहायता भीतर से मिली भ्रान्तिवश इतने दिनों तक जो अनेक प्रकार के काम करता रहा, उस भ्रान्ति को मुझे दूर करना पड़ा यही एकमात्र उपाय है मैंने स्वयं अपने को जिस जाल में फँसा रखा है, वह मुझे ही काटना पड़ेगा और उसे काटने की शक्ति भी मुझमें ही है
अँधेरा मत भगाओ, प्रकाश करो
            जिन्हें हम भूलें या अशुभ कहते हैं, वह हम दुर्बल होने के कारण करते हैं, और हम दुर्बल हैं अज्ञानी होने के कारण मैं पाप शब्द के बजाय भूल शब्द का प्रयोग अधिक उपयुक्त समझता हूँ पाप शब्द यद्यपि मूलत: बड़ा अच्छा शब्द था, किन्तु अब उसमें जो व्यंजना गई है, उससे मुझे भय लगता है हमें किसने अज्ञानी बनाया ? स्वयं हमने हम लोग स्वयं अपनी आँखों पर हाथ रखकरअँधेरा, अँधेरा चिल्लाते हैं हाथ हटा लो और प्रकाश हो जाएगा क्योंकि मानव की प्रकाश स्वरूप आत्मा का प्रकाश सदा विद्यमान है –––
हम पापी नहीं हैं
            अतएव यदि मैं तुम्हें यह उपदेश दूँ कि तुम्हारी प्रकृति अशुभ है, और यह कहूँ कि तुमने कुछ भूलें की हैं, इसलिए अब तुम अपना जीवन केवल पश्चाताप करने तथा रोनेधोने में ही बिताओ, तो इससे तुम्हारा कुछ भी उपकार होगा, वरन् उससे तुम और भी दुर्बल हो जाओगे ऐसा करना तुम्हें सत्पथ के बजाय असत्पथ दिखाना होगा
            यदि हजारों साल तक इस कमरे में अँधेरा है कह कहकर रोते रहो, तो क्या अँधेरा चला जाएगा ? कभी नहीं! एक दियासलाई जलाते ही कमरा प्रकाशित हो उठेगा अतएव जीवन भर मैंने बहुत दोष किये हैं, मैंने बहुत अन्याय किया हैय यह सोचने से क्या तुम्हारा कुछ भी भला हो सकेगा ? हममें बहुत से दोष हैं, यह किसी को बतलाना नहीं पड़ता ज्ञानाग्नि प्रज्वलित करो, एक क्षण में सब अशुभ चला जाएगा