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Sunday, December 2, 2018

सुमति



‘सिर दर्द के मारे फटा जा रहा है। समझ में नही आ रहा है कि क्या करूँ?’
‘करोगे क्या? कुछ झाड़–फूँक करवाओ या देवी का अनुष्ठान करो, लगता है, देवी नाराज़ हो गई हैं।’ पत्नी निर्णायक स्वर में बोली।
‘देवी तो नाराज़ है किन्तु मैं कैसे कह दूँ कि घर के किसी एक सदस्य का सर्वनाश कर दो।’ व्यथित होते हुए रामकिशन बोले।
बात यह थी कि आज प्रात: पूजा करते समय उन्हें लगा था कि देवी कह रही हैं कि ‘मैं तुमसे नाराज़ हूँ। घर के किसी एक सदस्य पर विपत्ति आएगी। तुम बता दो कि किस पर विपत्ति आए कल तक का समय देती हूँ।’ तबसे ही पूरा घर परेशान था।
नवविवाहिता पुत्रवधू ने कहा–‘पिताजी मैं एक सलाह
दूँ।’
रामकिशन पुत्रवधू से कुछ बोल तो नहीं पाए किन्तु उन्हें बहुत बुरा लगा कि उनसे आधी उम्र की बहू प्रिया क्या सलाह देगी, फिर भी बोले–‘बताओ क्या बता रही हो, तुम्हारी भी सुन लूँ।’
‘आप देवी जी से कह दीजिए कि आप चाहे घर के जिस सदस्य पर विपत्ति लावें, केवल घर में परस्पर सुमति रहे।’
‘क्यों।’
‘पिता जी! आप देवी जी से इतना कहिए, हमारे ऊपर विपत्ति नहीं आएगी क्योंकि जहाँ पर सुमति होती है, वहीं पर आनन्द होता है।’ बहू विनती के स्वर में बोली।
खैर––––दूसरा दिन आया। देवी जी आयीं, अन्य कोई विकल्प न देखकर रामकिशन जी ने देवी जी को प्रणाम करके कहा–‘भगवती! आप इतना आशीर्वाद दीजिए कि घर के सदस्यों में परस्पर सुमति बनी रहे। अब आपकी इच्छा है, यदि आवश्यक ही है किसी पर विपत्ति आना तो घर के किसी भी एक सदस्य पर विपत्ति आ जावे।’

देवी जी ने मुस्कराते हुए कहा– ‘रामकिशन!
जहाँ सुमति  तहँ सम्पति  नाना ।
जहाँ कुमति तहँ विपति निदाना ॥
अत: मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूँ कि तुम्हारा परिवार सदा सुख समृद्धि से भरा रहेगा। तुमने सुमति की कामना की है। अत: तुम्हारे परिवार में कभी विपत्ति आ ही नहीं सकती, क्योंकि सुमति होने पर एक व्यक्ति के ऊपर विपत्ति आने पर पूरा परिवार मिलजुल कर उस समस्या को सुलझा लेता है।’
सुमति से ही समृद्धि मिलती है।
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समस्या–समाधान


‘सारे कुटीर–उद्योग तो मशीनीकरण के आगे समाप्त होते जा रहे हैं। मैं तुम्हें कौन सा रास्ता बताऊँ घरेलू काम का।’
‘क्यों? पहले औरतें बड़ी, पापड़ बना–बना कर पूरी गृहस्थी चलाती थीं।’
बीच में बात काटते हुए अनन्त अपनी पत्नी वसुधा से बोला–‘यही तो मैं कह रहा हूँ। अब तो बड़ी–पापड़ भी मशीन से बनने लगे हैं, मशीन के बने बड़ी–पापड़ आदि देखने में साफ–सुथरे व अच्छे भी लगते हैं और हाथ के बने बड़ी–पापड़ों से सस्ते भी बैठते हैं। अब तुम्हीं बताओ कि घर के बने बड़ी–पापड़ कौन खरीदेगा? गाँधी जी इसीलिए तो मशीनीकरण का विरोध करते थे। उनकी कुटीर–उद्योग की अवधारणा भारत के लिए वरदान थी, किन्तु अत्यन्त दु:ख के साथ


कहना पड़ता है कि-अब तो टेरीखादी तक बनने लगी है।’

अनन्त एक सरकारी कार्यालय में लिपिक के पद पर कार्यरत था। उसके पिता का देहान्त हो गया था। घर में माँ व दो छोटे भाई थे, अनन्त के भी दो छोटे बच्चे थे। कुल मिलाकर सात लोगों का परिवार था। भाई अभी पढ़ ही रहे थे। पिता की प्राइवेट नौकरी होने के कारण पेन्शन का कोई प्रावधान नहीं था। खाने के अतिरिक्त भाइयों व बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी था। यूँ तो मितव्ययता से खर्च करने पर सभी खर्च आराम से चल रहे थे, किन्तु आगे आने आने वाले खर्चों की चिन्ता स्वाभाविक ही थी।
वसुधा कह रही थी–‘अभी तो सब ठीक–ठीक चल ही रहा है किन्तु तुम्हारे भाई विपुल और वैभव पढ़ाई में अच्छे हैं। आगे पढ़ाई का खर्च बढ़ेगा, उसके लिए भी तो अभी से व्यवस्था करनी है।’
‘भाभी! तुम परेशान मत हो। हम लोग ट्यूशन कर लेते हैं। कम से कम पढ़ाई का खर्च तो निकलेगा ही।’–विपुल ने कहा ।
‘बेवकूफी की बात मत करो। तुम लोगों का काम सिर्फ पढ़ाई करना है। दिन भर ट्यूशन करोगे तो पढ़ोगे कब? मैं चाहती हूँ कि तुम लोग पढ़–लिखकर किसी अच्छे पद पर पहुँच जाओ।’
‘लेकिन भाभी’
‘लेकिन–वेकिन कुछ नहीं। तुम्हें घरेलू समस्याओं व खर्च से कोई मतलब नहीं है। जाओ तुम अपने कमरे में जा कर पढ़ो।’आदेशात्मक स्वर में वसुधा बोली।
विपुल उठ कर अपने कमरे में चला जाता है।
‘बहू! मैं सोच रही हूँ कि गाँव की खेती बेच दें, करने वाला भी कोई नहीं है। खर्च की भी सुविधा हो जाएगी।’माँ जी बोलीं।
‘हाँ माँ कह तो ठीक रही हैं।’अनन्त ने माँ की बात का समर्थन करते हुए कहा।
‘माँ जी! खेती, जमीन–जायदाद व जेवर आड़े वक्त के लिए होते हैं। वैसे भी खेती तो हमारे पुरखों की विरासत है। कब क्या जरूरत पड़ जाए? हम और खेत न भी खरीद सकें तो कम से कम जो हैं उसे तो रहने दें। मेरी सम्मति तो खेती बेचने की नहीं है, आगे आप लोगों की इच्छा।’ वसुधा ने कहा ।
‘बहू तू कहती तो ठीक है, लेकिन तू विपुल और वैभव को ट्यूशन भी नहीं करने देना चाहती, पढ़ाना भी चाहती है, आखिर गृहस्थी की गाड़ी कैसे चलेगी?’
‘माँ जी! मैं मेहनत करूँगी। मैं किसी घरेलू–उद्योग के बारे में विचार कर रही हूँ।’
इस प्रकार बहुत से घरेलू–उद्योगों के बारे में सोचती रही वसुधा और योजनाएँ बनती गर्इं, बिगड़ती गर्इं। अन्तत: एक दिन वसुधा ने कहा–‘अभी सिलाई के काम का तो पूरी तरह मशीनीकरण नहीं हुआ है। घर में सिलाई मशीन तो है ही, कल से ही बोर्ड लगाकर सिलाई का काम शुरू कर देते हैं। मोहल्ले के लोगों से भी कह देंगे, धीरे–धीरे प्रचार भी हो जाएगा। अच्छी सिलाई होगी तो लोग आवेंगे ही।’
और––––शुरू हो गया सिलाई का काम।
शाम को अनन्त ने आकर पूछा–‘आज कितना काम आया?’
‘आज पड़ोस का एक सलवार सूट सिलने आया था। दिन भर लग कर सिला व तैयार करके दे भी आई। पचास रुपए मिले, क्या बुरा है?’
‘हाँ! शुरूआत तो अच्छी है । हाँ! एक काम करो, अभी जो कमाई हो, उसे घर–खर्च में मत लगाओ, अलग जमा करती जाओ।’
‘क्यों ?’
‘जब कुछ पैसे इकट्ठे हो जाएँगे, तब एक नई मशीन ले लेना, जिसमें पीको भी होता है । तब तुम आसानी से
साड़ी के फाल भी लगा सकोगी।’

धीरे–धीरे वसुधा के पास इतने पैसे इकट्ठा हो गए कि उसने एक नई मशीन खरीद ली। अब वह पीको का काम भी करने लगी। उसने एक पार्ट–टाइम दर्जी भी रख लिया। वह पैन्ट, शर्ट, कोट आदि सिल लेता था।
अनन्त ने भी साथ दिया। वह अपने ऑफिस के लोगों का काम व दुकानों से भी काम लाने लगा।
इस प्रकार धीरे–धीरे काम बढ़ने लगा और रेडीमेड दुकानों के आर्डर भी मिलने लगे। अब यह लोग थान कि थान कपड़े खरीद कर रेडीमेड कपड़े बना कर थोक–सप्लाई करने लगे । माँ जी भी घर के काम में पूरा सहयोग देती थीं, ताकि वसुधा को अपने काम के लिए अधिक समय मिले।
अब वसुधा के यहाँ कई दर्जी काम कर रहे थे। इस प्रकार जो बीज उसने घर की सिलाई–मशीन से काम करके डाला था, वह अब विशाल–वृक्ष के रूप में पुष्पित–पल्लवित हो गया था।
आज अनन्त के घर में सब लोग बहुत प्रसन्न थे। घर में उत्सव जैसा वातावरण था। अनन्त के भाई विपुल का चयन आई.आई.टी. में इंजीनियरिंग के लिए हो गया था। वसुधा आगन्तुकों का स्वागत मिठाई से कर रही थी और विपुल की पढ़ाई के लिए आर्थिक समस्या तो थी ही नहीं।
और––––विपुल ने भाभी के चरणों में बैठ कर कहा–‘भाभी! अगर सभी महिलाएँ आपकी तरह हों तो हर घर स्वर्ग बन
जाए।’
त्याग, प्रेम व परिश्रम ही जीवन के सर्वोच्च गुण हैं।
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मान–प्रतिष्ठा की सही परिभाषा


ठाकुर दानबहादुर सिंह के दिन तंगहाली में गुज़र रहे थे। ज्यादातर जमीन भाई बहनों व बच्चों की शादी की भेंट चढ़ गयी थी। थोड़ी सी जमीन बची थी, उससे सारे खर्चे नहीं निकलते थे।
थक हार कर वह शहर आ गए व रिक्शा चलाने लगे। लेकिन अधिक दिन तक रिक्शा नहीं चला सके क्योंकि इतनी मेहनत की आदत तो थी नहीं। शहर में ही एक मंदिर में शरण मिल गयी थी। रात में वह वहीं सो जाते थे। उनके अच्छे आचरण से प्रभावित होकर मन्दिर के ट्रस्टी श्री कुमार साहू जी ने उन्हें एक कपड़े की दुकान में नौकरी दिलवा दी। वह अपने खाने–पीने में बहुत थोड़ा खर्च करते थे। कोशिश यह करते थे कि अधिक से अधिक पैसा बचा कर घर में दिया जाय।
उनके छोटे बेटे की शादी थी। पास में पैसा नहीं था। उन्होंने ठकुराइन से कहा–‘अपने पास थोड़ी सी ज़मीन बची है, उसे बेच दिया जाए क्या?’
ठकुराइन ने माथा ठोकते हुए कहा–‘शादी–ब्याहों में पानी की तरह पैसा बहाने के परिणामस्वरूप ही तो हमारी ये दशा हो गयी है। अब बाकी बची जमीन मैं नहीं बिकने दूँगी।’
‘ठकुराइन! आखिर शादी में दावत देनी होगी, बहू को जेवर कपड़ा देना होगा। बारात का खर्च आदि कहाँ से आएगा?’
‘आजकल सभी वर्गों में सामूहिक विवाह का प्रचलन हो गया है। इसमें आदमी अपनी सामर्थ्यानुसार अंशदान करता है। आप ठाकुर शमशेर सिंह जी से मिलिए न।’
शाम को वह ठाकुर शमशेर सिंह जी के यहाँ इस प्रस्ताव को लेकर गए। ठाकुर शमशेर सिंह धनी तो थे ही, उनसे आयु में भी बहुत बड़े थे। अत: ठाकुर दानबहादुर सिंह ने उनके पैर छूते हुए कहा–‘ठाकुर साहब! आपसे तो हमारी माली हालत छिपी नहीं है। ठकुराइन कह रही थीं कि छोटे लड़के का विवाह सामूहिक–विवाह में कर दिया जाए।’
  ‘बिल्कुल ठीक! बहुत अच्छा सोचा है। लेकिन सामूहिक विवाह किसी मजबूरीवश न किया जाए तो अच्छा है। मैं भी अपने लड़के का विवाह इसी पच्चीस मार्च को होने वाले सामूहिक विवाह में कर रहा हूँ।’
‘ठाकुर साहब! आपको क्या आवश्यकता पड़ गयी, सामूहिक विवाह में लड़के की शादी करने की?’ दानबहादुर सिंह ने आश्चर्य से पूछा।
‘दानबहादुर! ठाकुरों ने अपनी सारी सम्पत्ति झूठी शान–प्रतिष्ठा में खत्म कर दी। उससे न तो अपना हित हो पाया, न ही दूसरों का। यदि हमारे पास सामर्थ्य है तो हम दूसरों का हित क्यों न करें?’
‘मैं अपने बेटे की शादी में चार–पाँच लाख तो खर्च करता ही। मैं अभी भी चार–पाँच लाख ही खर्च करूँगा, लेकिन उससे केवल मेरे लड़के की शादी न होकर अन्य निर्धन जोड़ों का भी विवाह होगा। सबका विवाह एक ही स्तर से होगा। यह मैं अपनी मान–प्रतिष्ठा मे लिए नहीं कर रहा हूँ, वरन् समाज को सही दिशा दिखा रहा हूँ क्योंकि खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र बनाती हैं।’
जब दानबहादुर सिंह ठाकुर शमशेर सिंह जी के यहाँ से लौट रहे थे तो उन्हें मितव्ययिता और मान–प्रतिष्ठा की नई परिभाषा समझ में आ गई थी।
मितव्ययिता कर दूसरों की मदद करो।
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Friday, November 30, 2018

जैसा जमा, वैसा ब्याज


रमेश, विमल और अतुल का चयन बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा संचालित नए खुले हुए प्राथमिक विद्यालय में हुआ। तीनों की आयु लगभग बराबर थी।
घर से बाहर होने के कारण तीनों ने एक कमरा किराए पर ले लिया व एक साथ रहने लगे। साथ ही खाना बनाते, खाते व विद्यालय जाते। रमेश अपना आधा वेतन बैंक में जमा कर देता था, विमल पूरा वेतन खर्च कर देता था व अतुल का अपने वेतन से पूरा नहीं पड़ता था। अत: उसे अपने घर से भी पैसा माँगना पड़ता था।
इस प्रकार धीरे–धीरे तीनों का विवाह हुआ, सन्तानें हुर्इं, पदोन्नति हुई किन्तु उनके धन खर्च करने का तरीका यही रहा। समय बीतता गया। सबके बच्चे बड़े होकर अपने–अपने काम में लग गए। सेवानिवृत्त होने पर तीनों अपने–अपने गाँव चले गए। आदत के अनुसार रमेश ने सेवानिवृत्ति पर मिले पैसे में से कुछ पैसे से गाँव के मकान की मरम्मत करवाई, बाकी पैसा बैंक में जमा कर दिया। उसे विभाग से पेंशन भी मिलती थी।

उधर विमल व अतुल ने अपनी पेंशन का एक बड़ा भाग विभाग को बेच दिया। अत: अपेक्षाकृत उन्हें रमेश से अधिक धन मिला लेकिन पेंशन बहुत थोड़ी मिलती थी। उन्होने उस पैसे से गाँव में खूब अच्छा मकान बनवाया, अपनी सुख–सुविधा के सामान इकट्ठे किए। अतुल ने तो बची हुई खेती बेचकर भी मकान और सामान में लगा दी।
अब रमेश तो आराम से रह रहा था। उसे पैसे की कोई चिन्ता न थी। जब मन होता बच्चों के पास चला जाता, जब मन होता गाँव में रहता व सामाजिक–कार्य करता था व भजन–पूजन करता।
विमल जिसे थोड़ी पेंशन मिलती थी, उसको अपने गुज़ारे के लिए कुछ तो खेती पर निर्भर रहना पड़ता, कुछ ट्यूशन करनी पड़ती। अतुल को भी थोड़ी पेंशन मिलती थी। इसके अतिरिक्त उसके पास न तो पुरखों की खेती थी, न जमा पूँजी, उसे दिनभर ट्यूशन करनी पड़ती थीं।
अब देखें रमेश, विमल और अतुल तीनों ने एक साथ नौकरी शुरू की, समान वेतनमान होते हुए भी सेवानिवृत्त होने पर आज  रमेश आर्थिक रूप से काफी समृद्ध है, नियमित पेंशन भी पा रहा है। विमल ने अपने पुरखों की जायदाद खत्म नहीं की है। अत: उसे अपने गुजारे के लिए अपेक्षाकृत कम मेहनत करनी पड़ती है। अतुल जो अपनी व पुरखों दोनों की ही सम्पत्ति खर्च कर चुका थाय उसे गुज़ारे के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी।
इसी प्रकार जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है, वैसा ही उसका पुण्य संचित होता जाता है। उसी मात्रा में उसकी समृद्धि होती है । ऐसा क्यों होता है कि किसी का जन्म अमीर घर में होता है, किसी का गरीब घर में। जिसने पूर्वजन्म में जैसा कर्म (जमा) किया है, उसे वैसा ही फल (ब्याज) मिलता है।
इस जन्म में भी जो जैसा बैंक बैलेंस (कर्म) करता है, उसे वैसा ही परिणाम मिलता है। यथोचित बैंक बैंलेंस (सेवा) के फलस्वरूप उसका जीवन सुखी व समृद्ध होगा।
सत्कर्म करो
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जंगल में मंगल

सुयोग्य प्राकृतिक चिकित्सक रमेश जिस मरीज़ को हाथ लगाता, वह ठीक हो जाता किन्तु प्राकृतिक–चिकित्सा के लिए स्थान की काफी आवश्यकता होती है। उसके घर में स्थान का अभाव था। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक–चिकित्सा के मूल आधार शुद्ध मिट्टी, पानी, धूप, हवा के लिए भी गहरी मशक्कत करनी पड़ती थी।
रमेश के पिता अल्प वेतन भोगी थे। रमेश घर की स्थिति से अच्छी तरह से परिचित था। उसने अपने पिताजी से कहा–
‘पिताजी! मुझे एक योजना समझ में आ रही है, मैं जंगली नरभक्षी पशुओं से रहित जंगल में चला जाऊँ। वहीं कुटिया बना कर साधना करूँ, कन्द मूल, फल तो पेट भरने के लिए मिल ही जाएँगे। मेरी साधना तो होगी ही, भगवान ने चाहा तो प्राकृतिक चिकित्सा भी चल जाएगी।’
‘बेवकूफी की बात मत करो। एक तो तुम शहर में रहने के आदी हो चुके हो, दूसरे इतनी दूर जंगल में इलाज करवाने कौन जाएगा।’

 ‘पिता जी! आप एक बार अनुमति तो दें। आखिर हमारे ऋषि–मुनि भी तो जंगल में रह कर ही साधना करते थे। रही मरीज़ों के इतनी दूर जंगल में जाने की बात तो जब एक, दो मरीज़ ठीक होंगे, तब बाकी मरीज़ स्वयं आने लगेंगे। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए मनुष्य कहाँ–कहाँ नहीं जाता है।’
माँ ने कहा–‘मैं तुझे नहीं जाने दूँगी।’
रमेश बोला–‘माँ! मैं गाँधी जी के सपनों को साकार करना चाहता हूँ। उन्होंने रामनाम और प्राकृतिक चिकित्सा को ही स्वास्थ्य का मूल आधार बताया था।’
अब गाँधीवादी माता कुछ बोल न सकीं। पिता जी व माँ ने उसे जंगल में जाने की अनुमति दे दी। वह अपने साथ मात्र एक जोड़ कपड़े, रस्सी, चाकू, एक कुल्हाड़ी, एक बाल्टी, गिलास तथा मार्ग–व्यय के लिए एक हजार रुपए लेकर गया था।
जंगली लोगों के सहयोग से उसने धीरे–धीरे एक कुटिया बना ली। अब वह उनकी भाषा भी समझने लगा। साधना से तेज भी आ गया।
अब वह अपने घर आया। शहर के अस्पतालों में मरणासन्न मरीजों को अपनी कुटिया में आने का निमंत्रण दिया। इलाज पूरी तरह नि:शुल्क था।


जीवन से निराश हो चुके दो मरीज़ों ने सोचा कि वह यों भी ठीक नहीं हो रहे हैं। यह इलाज भी करके देख लिया जाए। अगर नहीं भी ठीक हुए तो अस्पताल की सूइयों से तो बेहतर है कि प्रकृति के समीप ही रहा जाए।
इस प्रकार दो मरीज़ तथा मरीज़ों के घर के दो–दो सदस्य रमेश के साथ गए। वह अपने साथ बनाने, खाने का सामान, कपड़े, बर्तन, बिस्तर आदि भी ले गए।
प्रार्थना, उपवास, साधना व प्राकृतिक चिकित्सा से दोनों मरीज पूर्ण स्वस्थ हो गए। साथ ही उनके घरवाले भी जो उनके साथ गए थे, सच्चे अर्थों में पूर्ण स्वस्थ हो गए।
अब तो रमेश के यहाँ मरीज़ों की भीड़ लगने लगी । मरीज़ों से मिले हुए पैसों से रमेश ने वन–विभाग से थोड़ी सी जमीन खरीद ली व टैक्स भी देने लगा। हालांकि चिकित्सा का कोई निर्धारित शुल्क नहीं था किन्तु लोग अपने सामर्थ्यानुसार धन देने में चूकते नहीं थे।
धीरे–धीरे गाँधीजी के सपनों के अनुरूप उसका आश्रम बहुत बड़े प्राकृतिक चिकित्सालय के रूप में परिवर्तित हो गया। उसने सोचा अगर पूरे देश में इसी प्रकार के आरोग्य–मंदिर बन सकें तो गाँधी जी का स्वास्थ्य सम्बन्धी सपना तो पूरा हो ही जाएगा।
रमेश के माता–पिता उसके आश्रम में आए हुए थे। उन्होंने कहा–‘बेटा! तूने तो जंगल में मंगल कर दिया।’
त्याग व परिश्रम से सब कुछ पाया जा सकता है।
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