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Friday, November 23, 2018

बच्चों के मानसिक रोग (निदान, कारण और समाधान)

शैशवावस्था तथा बाल्यकाल में बच्चे की कई मानसिक समस्याएँ हो सकती हैं । बड़ों की छोटी–सी भूल बच्चे की किसी समस्या को जन्म दे सकती
है । जैसे – नवजात शिशु की स्तन चूसने की इच्छा अतृप्त रह जाने के कारण अँगूठा चूसने की आदत, कैल्शियम की कमी से मिट्टी खाने की आदत, बच्चे में मानसिक असुरक्षा के कारण रात में चैंकना, हीनता की भावना से हकलाना व मानसिक तनाव के कारण बिस्तर पर पेशाब करना आदि ।
यदि बचपन में इन समस्याओं को हल्के में लिया जाता है तो बड़े होने पर यही मानसिक समस्याओं को जन्म देती हैं । जैसे – चूसने की इच्छा अतृप्त रह जाने पर बड़े होने पर असामान्य सेक्स–सम्बन्ध की इच्छा प्रबल हो सकती है ।
1– स्कूल फोबिया
कई बच्चे स्कूल जाना पसन्द नहीं करते । जिस व्यवहार से उन्हें स्कूल न जाना पड़े, उसे अपना लेते हैं, जैसे – पेट–दर्द, सिर–दर्द आदि का बहाना करना । इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि बच्चा स्कूल क्यों नहीं जाना चाहता । इसके कई कारण हैं – अध्यापक की मार–डाँट व भय, शारीरिक कमजोरी या विद्यालय में थक जाना, किसी कारण सहपाठियों द्वारा मजाक उड़ाया जाना, क्लास टेस्ट में दूसरों की अपेक्षा कम अंक मिलना । देखने में लगता है कि समस्या अचानक प्रारम्भ हुई, किन्तु बच्चा भीतर–ही–भीतर काफी समय से घबराहट का अनुभव करता है । बच्चा माँ–बाप से विद्यालय जाने के विषय में सीधे–सीधे न कहकर बहाना बनाता है, क्योंकि उसे मालूम है कि स्कूल तो उसे जाना ही पड़ेगा ।
कुछ बच्चे अपनी माँ पर इतने अधिक आश्रित होते हैं कि उन्हें विद्यालय में भी अपनी माँ के बिना अच्छा नहीं लगता । ऐसे बच्चों को हमउम्र बच्चों के साथ खेलने–कूदने तथा अपना कार्य स्वयं करने की आदत डालनी चाहिए ।
यदि विद्यालय–पूर्व क्रियाएँ सही तरीके से करवाई जाएँ तो बच्चे पूरी तरह से विद्यालय शिक्षा के लिए शारीरिक–मानसिक रूप से परिपक्व हो जाते हैं ।
अब समस्या यह है कि यदि बच्चे की विद्यालय–पूर्व शिक्षा सही रूप से नहीं हुई है और प्राथमिक स्तर पर आने पर उसके मन में विद्यालय के प्रति भय बैठ गया है, उसे विद्यालय जाना अच्छा नहीं लगता है, विद्यालय के नाम पर वह घबराने लगता है तब अभिभावकों को क्या करना चाहिए ?
सबसे पहले समस्या के मूल कारण को जानना चाहिए । इस समस्या के मूल कारण निम्न हो सकते हैं—
(क) शारीरिक कारण—सम्भव है कि बच्चा शारीरिक रूप से कमजोर हो, विद्यालय में थक जाता हो । यदि ऐसा है तो उसकी शारीरिक स्थिति को समझना चाहिए । हो सकता है बच्चा रात को देर से सोता हो, इस कारण सुबह जल्दी उठने में परेशानी होती हो, फलस्वरूप वह विद्यालय में थका–थका रहता हो । रात्रि में देर से सोने के कारण सुबह उठने पर बच्चों को शौच नहीं हो पाता है, पेट खराब होता है, बीमारी आती है, थकान रहती है, शिक्षा में अरुचि होती है । इसलिए घर में देर रात तक टी.वी. नहीं चलना चाहिए । बच्चों को रात में आठ बजे तक अवश्य सुला देना चाहिए, जिससे वह आठ–नौ घण्टे की नींद पूरी करके सुबह चार–पाँच बजे तक उठ जावें ।
(ख) कुपोषण—बच्चों को ताजा पौष्टिक भोजन दें, साथ में फल–सब्जी व दूध की मात्रा भी पर्याप्त हो । कुपोषण के कारण भी स्वास्थ्य खराब हो सकता है । शरीर थका–थका सा रहता है, फलत: बच्चे का विद्यालय में मन नहीं लगता है । बिस्किट, ब्रेड, नूडल्स, बोतलबन्द पेय, दालमोठ, बाजार की चाट आदि से स्वास्थ्य खराब होता है ।
(ग) खेलकूद व व्यायाम की कमी—बच्चों के लिए खेल बहुत आवश्यक है । खेलकूद में शारीरिक रूप से दौड़–भाग वाले खेल होने आवश्यक हैं । इनसे बच्चों के शरीर व मन दोनों का ही व्यायाम हो जाता है । उनका स्वास्थ्य ठीक रहता है व मन प्रसन्न रहता है ।
(घ) बच्चे का पढ़ाई में कमजोर होना—यदि बच्चा किसी कारण पढ़ाई में कमजोर है, उसे विद्यालय में अच्छा नहीं लगता है । वह विद्यालय न जाने के लिए तरह–तरह के बहाने बनाता है । ऐसी अवस्था में सबसे पहले उसकी विषयगत कमजोरियों को दूर करना चाहिए ।
(ङ) अध्यापक का भय—कुछ अध्यापक बात–बात पर बच्चों को डाँटते–मारते हैं या भयभीत करते हैं या मनोवैज्ञानिक तनाव प्रदान करते हैं । ऐसी अवस्था में बच्चे विद्यालय जाने से घबराते हैं । अभिभावक को अध्यापक से मिलकर वार्तालाप करना चाहिए । यदि प्रेमपूर्ण वार्तालाप के बाद भी अध्यापक अपना व्यवहार बदलने के लिए तैयार नहीं होते हैं तब विद्यालय प्राचार्य की मदद लेनी चाहिए ।
(च) सहपाठियों द्वारा मजाक उड़ाया जाना—कई बार किसी विशेष कारण से सहपाठी किसी बच्चे का मजाक उड़ाते हैं, जैसे बच्चे की विकलांगता, बदसूरत होना, हकलाकर बोलना, गरीब होना आदि ।
यदि ऐसा है तब पहले तो बच्चे को ही प्रेरणा देनी चाहिए कि वह चिढ़ाने वाले बच्चों का सामना करे । उन्हें मुँहतोड़ जवाब दे, किन्तु यदि समस्या ने अधिक गंभीर रूप ले लिया हो तो अभिभावक को चाहिए कि अध्यापक से मिलकर इस  समस्या का समाधान करें ।
(छ) टेस्ट में दूसरे बच्चों से कम अंक मिलना—महत्त्वाकांक्षा या प्रतिस्पर्द्धा की भावना अच्छी होते हुए भी बच्चे में बहुत अधिक प्रतिस्पर्द्धा की भावना होना या सदा कक्षा में पहले स्थान पर ही होने की भावना बहुत अधिक घातक हो जाती
है ।
सदा कक्षा में प्रथम आने वाला विद्यार्थी कभी चैथे, पाँचवें या दसवें स्थान पर आ जाता है तो बहुत अधिक महत्त्वाकांक्षी होने पर वह विचलित हो जाता है । फलस्वरूप विद्यालय उसे अच्छा नहीं लगता है और वह विद्यालय जाना पसन्द नहीं करता है ।
पहली बात तो प्रारम्भ से ही बच्चे के मन में यह भावना डालनी चाहिए कि जीवन में सफलता और असफलता दोनों के लिए ही तैयार रहना चाहिए । सदा आवश्यक नहीं है कि बच्चा प्रथम स्थान पर ही आए । दूसरी बात, यदि बच्चा बहुत महत्त्वाकांक्षी हो ही गया हो तो धीरे–धीरे उसके मन से इस भावना को निकालने का प्रयास करना चाहिए ।
महत्त्वाकांक्षी होना अच्छा होता है किन्तु लक्ष्य की प्राप्ति न होने पर नैराश्य यथ्तनेजतंजपवदद्ध से घिर जाना बहुत बुरा होता है । जितने भी लोग जीवन में सफल हुए हैं, उन्होंने जीवन में कभी–न–कभी असफलता का सामना अवश्य किया है ।
2– हकलाना
जब बच्चे बोलना सीख रहे हों, तब यह आदत पड़ सकती है । यदि समय पर देखभाल न की जाए तो विद्यालय जाने के समय तक यह रोग पूर्णत: विकसित हो जाता है ।
हकलाने के कई कारण हो सकते हैं – शारीरिक कमी, हीनता की भावना या दूसरों को अपनी तरफ आकर्षित करना । हकलाने वाले बच्चे को सर्वप्रथम बाल रोग विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए । यदि हकलाने का कारण शारीरिक है, तब तो इलाज हो ही जायेगा ।
कुछ बच्चे सामान्य स्थिति में ठीक बोलते हैं किन्तु तनावपूर्ण स्थिति में या किसी नए व्यक्ति के सामने हकलाने लगते हैं । इसका प्रमुख कारण है कि वे अपने को दूसरे से हीन महसूस करते हैं । दूसरे के सामने बच्चा घबरा जाता है और वह हकलाने लगता है ।
इस समस्या का प्रारम्भ बहुत छोटेपन से होता है । कई बार हम अपनी इच्छाओं व आकांक्षाओं का केन्द्रबिन्दु बच्चे को बना लेते हैं । सोचते हैं कि बच्चा दूसरे के सामने एक आदर्श बच्चे का रूप प्रस्तुत करे या हमारी कल्पनाओं को साकार करे । सब लोग उसे अच्छा कहें । इस कारण हम उसे ऐसा व्यवहार सिखाने का प्रयास करते हैं, जिससे समाज में उसकी प्रशंसा हो । बच्चे की प्रशंसा होने पर हम स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं ।
एक सीमा तक तो लोक–व्यवहार सिखाना बच्चे के हित में होता है, किन्तु जब यही चीज अधिकता में हो जाती है, तब बच्चे के लिए हानिकारक हो जाता
है । कई बार वह अपने को अच्छा प्रदर्शित करने के चक्कर में दूसरे के सामने घबरा जाता है व घबराहट के कारण हकलाने लगता है ।
पहली बात तो हम बच्चे को बच्चा समझें, उसको सहज रूप में विकसित होने दें तब यह समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी । यदि बच्चे में हकलाने की समस्या उत्पन्न हो गई हो तो इस समस्या को दूर करने के लिए बड़े धैर्य की आवश्यकता है । यदि हकलाने का कारण शारीरिक विकृति न होकर मानसिक है तब समस्या के मूल में बच्चे की घबराहट छुपी होती है । अत: इसके निवारणार्थ—
बच्चे को अधिक से अधिक वार्तालाप का मौका दें । बच्चा यदि धीरे–धीरे बोल रहा है या हकलाकर भी बोल रहा है तो उसे बोलने दें । अधिक टोकाटाकी न करें, लेकिन जब बच्चा बिना हकलाए बोले तब उसकी प्रशंसा किसी–न–किसी तरह अवश्य करें ।
उससे स्वयं भी अधिक–से–अधिक बातें करें । जैसे—कहानियाँ सुनाना, विद्यालय की बातें करना, परी कथा सुनाना आदि । उसे भी स्वयं कहानी रचना व वाचन के लिए प्रेरित करें ।
जब वह बिना झिझक बोलना सीख लेगा तब उसकी हकलाहट धीरे–धीरे स्वयं समाप्त हो जाएगी ।
यदि हकलाने वाला बच्चा विद्यालय जाता है तो यदि उसकी हकलाहट के कारण विद्यालय में मजाक बनाया जाता है तो अध्यापकों से मिलकर इस समस्या को दूर करने का प्रयास करें । अध्यापकों से कहें कि उसे भी बोलने के लिए प्रेरित करें । जो बच्चे उसका मजाक बनाते हैं, उन्हें ऐसा न करने के लिए समझाएँ ।
3– रात में चौंकना या बोलना
कुछ बच्चों में प्राय: रात में चौंकना, चिल्लाकर सोते से जाग जाना, अचानक भय से जगकर बैठ जाना आदि लक्षण मिलते हैं । इस दशा में बच्चा कई मिनट तक अशान्त रहता है । कई बार बच्चे दिन में सुनी हुई बात को नींद में बड़बड़ाने लगते हैं ।
इस समस्या का मुख्य कारण बच्चे में असुरक्षा की भावना होती है । साथ ही यदि घर में कलह–क्लेश होता रहता है या बच्चा किसी कारण से डर गया होता है या उसको कोई भयभीत करता है, तब वह नींद में बड़बड़ाता है या चौंकता है ।
कई बार बच्चे को स्कूल में या घर में पढ़ाई के लिए अधिक डाँटा जाता है, तब भी वह तनावग्रस्त हो जाता है और रात में चैंकने या बड़बड़ाने लगता है ।
इस समस्या का निवारण बहुत आवश्यक है अन्यथा भावी–जीवन के लिए कष्टकारक हो सकता है । बच्चे को भरपूर प्यार दें, उसके मस्तिष्क में किसी प्रकार का भय, तनाव व चिन्ता न पनपने दें । अभिभावक अपने प्यार से बच्चे के मन से असुरक्षा की भावना को दूर कर दें ।
4– चोरी करना
कुछ बच्चों में चोरी करने की आदत पड़ जाती है । इसके कई कारण हो सकते हैं । बहुत छोटे बच्चे अपने–पराए का भेद नहीं समझते हैं । बच्चे को जो चीज अच्छी लगती है वह उसे उठा लेता है । चार–पाँच वर्ष तक के बच्चे के लिए ऐसा करना खेल है । वह यह समझता भी नहीं है कि ऐसा करना चोरी है । बड़े लोगों के डर के कारण उसे छुपाने या छुपाकर रखने का प्रयास करता है । ऐसा होने पर अभिभावक दो तरह का व्यवहार कर सकते हैं—
बच्चे को समझाएँ कि ऐसा करना ठीक नहीं है क्योंकि यह चीज अपनी नहीं है, दूसरे की है । बच्चे से ही कहें कि उठाई हुई चीज वह स्वयं वापस करे । ऐसा करने से बच्चा वस्तुस्थिति समझ जाएगा व आगे से चोरी नहीं करेगा ।
कुछ अभिभावक बच्चे को डाँटना, मारना प्रारम्भ कर देते हैं । उसे झूठा, चोर आदि कहते हैं व यह भी कहते हैं कि तुमने हमारी बेइज्जती करवा दी । ऐसा करना ठीक नहीं है । बच्चा वस्तुस्थिति तो समझेगा नहीं, उल्टे अपमान महसूस करेगा व जिद्दी हो जाएगा ।
इसके अतिरिक्त बड़े बच्चों में चोरी की प्रवृत्ति के निम्न कारण व निवारण हो सकते हैं—
(क) बड़े बच्चे की उपेक्षा—अक्सर घर में छोटे बच्चे के आ जाने पर बड़े की उपेक्षा होने लगती है । अत: वह सबका ध्यानाकर्षित करने के लिए चोरी करना शुरू कर देता है । जैसे – घर की कोई आवश्यक वस्तु छुपा देना, जब घर के लोग उस वस्तु के लिए परेशान हों  तो ढूँढ़ने का नाटक करते हुए उस वस्तु को ढूँढ़कर दे देना, जिससे घर के सदस्य उसकी प्रशंसा करें व प्यार करें ।
धीरे–धीरे यही आदत चोरी में बदल जाती है । यदि इस प्रकार की स्थिति बार–बार आती है तब बड़े लोगों को ध्यान देना चाहिए कि कहीं बच्चा जान–बूझकर तो चीजें नहीं छुपा रहा है । साथ ही छोटे बच्चे के साथ ही बड़े बच्चे को भी समय व प्यार देना चाहिए ।
(ख) दोस्तों में हीरो बनने की लालसा—कई बार कुछ बड़े बच्चों में शर्त लगती है कि फलां चीज चुराकर दिखाओ या फलां काम करके दिखाओ तो हम तुम्हारा लोहा मानेंगे । इस अस्वास्थ्यकर प्रतिस्पर्द्धा में बच्चे कभी किसी अध्यापक की नजर बचाकर उनकी कोई चीज उठा लेते हैं या किसी सहपाठी का कोई सामान उठा लेते हैं और अपने उन साथियों के मध्य हीरो बन जाते हैं, जिनसे शर्त लगी थी ।
यह प्रवृत्ति जब अधिक विकसित होने लगती है तब बच्चे घर का सामान व रुपए भी चुराने लगते हैं व अपने साथियों के मध्य प्रशंसा के पात्र बनते हैं ।
यदि बच्चे को उसके अभिभावक पर्याप्त समय दें तब ऐसी प्रवृत्ति विकसित होगी ही नहीं, क्योंकि यदि बच्चे को मार–डाँट का भय न हो  तब वह अपनी सब बातें घर में बताता है । यदि फिर भी बच्चे ने कभी ऐसी हरकत की तो माता–पिता को शुरुआती दौर में ही आभास हो जाएगा । उसे समझाने–बुझाने से इसका समाधान भी हो जाएगा ।
(ग) कठोर अनुशासन—बच्चों के लिए दण्ड और पुरस्कार दोनों ही आवश्यक हैं । अनुशासन भी अच्छा है, किन्तु आवश्यकता से अधिक कुछ भी अच्छा नहीं होता है । घर में बच्चों की मनपसन्द कोई चीज बनी है या कोई फल, मिठाई या खाद्य वस्तु जो बच्चे को पसन्द है वह आई है । वह वस्तु उसे दण्डस्वरूप खाने के लिए न दी जाए व कहा जाए कि तुमने अमुक शरारत की थी या तुम्हारे परीक्षा में कम अंक आए हैं, इसलिए तुम्हें यह चीजें नहीं दी जा रही हैं ।
बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार करना ठीक नहीं है । बच्चे की गलती के लिए उसे डाँट दिया जाए यह तो ठीक है किन्तु दण्डस्वरूप खाने की चीज न देने से या तो वह अपने घर में चोरी करके खाएगा या दु:खी रहेगा या वह किसी मित्र या रिश्तेदार के यहाँ माँगकर या चुराकर खाएगा ।
5– ईर्ष्या की प्रवृत्ति
कोई बच्चा पढ़ने में बहुत तेज होता है तो स्वाभाविक रूप से घर व विद्यालय में उसकी प्रशंसा की जाती है । कभी–कभी किसी बच्चे से उसकी प्रशंसा सहन नहीं होती है व उस पढ़ाई में तेज बच्चे की कॉपी–किताबें चुरा लेता है ताकि वह परेशान हो और पढ़ न पाए । यही प्रवृत्ति धीरे–धीरे चोरी में बदल जाती है, तब बच्चा किसी के घर में कोई कीमती चीज देखकर भी उठा लेता है । ईर्ष्या और चोरी दोनों ही प्रवृत्तियाँ गलत हैं ।
जब बच्चे के मन में ईर्ष्या की भावना आती है, तब दूसरे के नुकसान के पहले तो उसका मन खराब हो जाता है । चाहे बात पढ़ाई की हो या धन की या किसी अन्य चीज की, ईर्ष्या की भावना ही गलत है । अभिभावकों को चाहिए कि बच्चे के मन में भरें कि तुम्हारे पास जितना है, उतना बहुत है । बहुत से लोग दुनिया में ऐसे भी हैं, जिनके पास हमसे बहुत कम है ।
उसे समझाएँ – ‘पढ़ाई में भी जिस विषय में तुम कमजोर हो उस कमजोरी को दूर करने का प्रयास करो । पढ़ाई में तेज बच्चे से ईर्ष्या करने से तुम पढ़ाई में तेज नहीं हो जाओगे ।’वैसे भी दुनिया में सभी बच्चे एक समान स्तर पर नहीं हो सकते । बच्चों को समझाएँ – ‘अपना पूरा प्रयास करो, जितनी सफलता मिलती है उसमें संतुष्ट रहो ।’अभिभावकों को यह देखना चाहिए कि बच्चे की किस बिन्दु पर कमजोरी है ।
6– बिस्तर पर पेशाब करना
कई बार बड़े बच्चे भी रात को या दिन में भी सोते समय बिस्तर पर पेशाब कर देते हैं । बच्चों के बिस्तर गीला करने के कुछ शारीरिक कारण भी हो सकते हैं, यदि शारीरिक कारण नहीं हैं तो मनोवैज्ञानिक कारण भी हो सकते हैं ।
(क) शारीरिक कारण
यदि बच्चे को कब्ज की शिकायत हो या पेट में कीड़े हों तब उसका मूत्राशय पर नियंत्रण नहीं रह पाता है और उसका बिस्तर पर पेशाब निकल जाता है । बच्चे को रात में सोते समय यदि कोई तरल पदार्थ (जैसे–दूध, जूस, पानी आदि) पिलाया जाता है तो गहरी नींद में होने के कारण पेशाब लगने पर वह जाग नहीं पाता है और उसका पेशाब निकल जाता है ।
कई बार जाड़े के दिनों में पेशाब लगने पर आलस्य के कारण बच्चे उठते नहीं हैं । यदि उठाया भी जाए तो भुनभुनाते हुए सो जाते हैं । ऐसी स्थिति में उनका पेशाब निकल जाता है ।
बच्चा बहुत कमजोर हो तब भी उसका अपने शरीर पर नियंत्रण नहीं रह जाता है, फलस्वरूप वह सोते में बिस्तर गीला कर सकता है ।
यदि बच्चे के पेशाब में अम्लता Acidity अधिक है तो उसके मूत्राशय के चारों ओर खुजली होती है, जिसके कारण उसके सोते समय उसका पेशाब निकल सकता है ।

(ख) मनोवैज्ञानिक तथा अन्य कारण
अपना ध्यानाकर्षित करना—कई बार छोटे बच्चे के घर में आ जाने के कारण बड़े बच्चे पर ध्यान नहीं दिया जाता है । फलस्वरूप वह ऐसी हरकतें करने लगता है जिससे उसकी तरफ भी घर के लोग आकर्षित हों । इस मनोवृत्ति के कारण वह जाने या अनजाने बिस्तर गीला कर देता है ।
बहुत अधिक लाड़–प्यार—बहुत अधिक लाड़–प्यार के कारण भी बच्चा सही आदतें नहीं सीख पाता है । कुछ लोगों में यह भावना होती है कि बच्चा जो कर रहा है, करने दो, बड़ा होने पर स्वयं सीख जाएगा । ऐसा ठीक नहीं है । बच्चे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी आवश्यक है, उसे कठोर अनुशासन में बद्ध न किया जाए, उसे नियमों में न बाँधा जाए यह सत्य है किन्तु सामाजीकरण की आदतों की नींव बचपन से डालनी आवश्यक है ।
अत्यधिक कठोरता—अत्यधिक कठोर अनुशासन भी बच्चे के लिए ठीक नहीं होता है । भयंकर जाड़े की रात है । बच्चे को रात में पेशाब लगी है, वह बिस्तर से नहीं निकलना चाहता है । वह बिस्तर से निकलता भी है तो शाल आदि ओढ़कर बाथरूम जाना चाहता है । यदि उसे ऐसा नहीं करने दिया जाता है तो वह डर के कारण बिस्तर से निकलता ही नहीं है व फिर सो जाता है और सोते में ही बिस्तर पर पेशाब निकल जाता है ।
भूत–प्रेत आदि का भय—बच्चों को डराने के लिए कई बार घर के बड़े लोग स्वयं ही भूत–प्रेत का डर मन में बैठा देते हैं या भूत–प्रेत की कथाएँ सुनकर उसके मन में भय बैठ जाता है । ऐसी स्थिति में रात में वह कमरे से बाहर निकलने में डरता है और सोते में ही उसका पेशाब निकल जाता है ।
यही भय धीरे–धीरे बच्चे के मन में स्थायी स्थान बना लेता है ।
7– झूठ बोलना
बहुत छोटे बच्चे को झूठ–सच में अन्तर पता ही नहीं होता है । वह खेल–खेल में ही अनायास झूठ बोलने लगता है, जैसे–बड़े लोगों ने उसका कोई खिलौना छुपाकर कहा—‘कौआ ले गया’फिर थोड़ी देर बाद कहा—‘देखो जादू से आ गया ।’ उसी प्रकार बच्चा भी खेल करता है—कोई चीज छुपाकर कहता है—‘देखो बिल्ली ले गई ।’ बड़े लोग हँसने लगते हैं, फिर वह उस चीज को दिखाकर कहता है—‘देखो मैं भी जादू जानता हूँ ।’
यह बात खेल तक तो ठीक है किन्तु बच्चे के और बड़ा होने पर यही आदत बढ़ती जाती है तो वह झूठ बोलने में परिवर्तित हो जाती है । इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि बच्चे के साथ इस प्रकार के खेल खेले ही न जाएँ या उसे सदा कठोर अनुशासन में ही रखा जाए या गम्भीर ही रहा जाए, किन्तु थोड़ा बड़ा होने पर यदि खेल झूठ बोलने की प्रवृत्ति में परिवर्तित होने लगे तो उसे झूठ और सच में अन्तर प्यार से समझा देना चाहिए ।
झूठ बोलने के और भी अनेक कारण व उनके निवारण प्रस्तुत हैं—
डाँट व मार के भय के कारण झूठ बोलना—अक्सर बच्चे घर व विद्यालय में मार व डाँट के भय के कारण झूठ बोलने लगते हैं । झूठ बोलने की शुरुआत घर से ही होती है । बच्चों से कोई चीज गिर गई या टूट गई, ऐसी स्थिति में उसे डाँट पड़ी या मार पड़ी । दुबारा ऐसी गलती होने पर उसने अनायास ही झूठ बोल दिया कि उसने तो ऐसा नहीं किया है । इस प्रकार झूठ बोलने से वह मार या डाँट से बच गया ।
धीरे–धीरे उसकी झूठ बोलने की आदत बढ़ती चली जाती है । बच्चा बड़ा होने पर विद्यालय गया । उसने होमवर्क नहीं किया या अन्य कोई गलती हो
गई । बच्चे ने झूठ बोल दिया – ‘हम लोग कहीं चले गए थे । इसलिए होमवर्क नहीं कर पाए ।’ शिक्षक ने उसे सजा नहीं दी । बच्च को ऐसा न करने के लिए प्यार से समझाएँ ।
सुधार के लिए बच्चे से गलती हो जाने पर उसे तुरन्त डाँटना या मारना शुरू न कर दें । उसकी पूरी बात धैर्य से सुननी चाहिए । यदि बच्चे से अनजाने में गलती हो गई है, जैसे कोई चीज गिर गई या टूट गई या खो गई तो उसे प्यार से समझाएँ व चीजें सम्भालकर रखना सिखाएँ । यदि बच्चा जान–बूझकर लापरवाही के कारण अपनी चीजें या घर का सामान इधर–उधर फेंकता रहता है तो उसे मीठी घुड़की दें ।
इसी प्रकार अध्यापक को भी धैर्य से काम लेना चाहिए–होमवर्क न करने पर वस्तुस्थिति को समझ लेना चाहिए । बच्चे के पास अधिक काम था, इस कारण वह होमवर्क नहीं कर पाया था, वह कुछ अस्वस्थ है या लापरवाही के कारण होमवर्क नहीं किया है या उसे पाठ समझ में नहीं आया है ।
पहली बात तो प्राथमिक कक्षाओं में (कक्षा एक से पाँच तक) होमवर्क देना ही गलत है । उसे जितना कार्य विद्यालय में करवा दिया जाए, उतना ही काफी
है । घर में उसे खेलने–कूदने, व्यवहार सीखने तथा अन्य क्रिया–कलापों जैसे – ड्रॉइंग, पेंटिंग, आर्ट, क्राफ्ट का काम या छोटी–छोटी कहानी, कविता आदि की पुस्तकें पढ़ने का समय मिलना चाहिए ।
बड़ी कक्षाओं में यदि होमवर्क दिया भी जाता है तो उसे पूरा न करने पर उसे सजा देना गलत है । बच्चे को सहज रहने दें । यदि बच्चा जान–बूझकर लापरवाही कर रहा है, तब उसे समझा दें किन्तु सजा न दें, क्योंकि चिन्ता व भय का बच्चे के मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है । इससे झूठ बोलना, जिद्दी होना, क्रोध करना आदि दुर्गुण पनपने लगते हैं ।
घर में बड़ों द्वारा झूठ बोलना – घर में बड़े अक्सर झूठ बोलते हैं, जैसे माँ को पिता से अपनी कोई गलती छुपानी है तब वह बच्चे से कहती हैं—‘पापा को मत बताना ।’
अवसर आने पर बच्चे से भी कोई गलती हो जाने पर वह गलती को छुपा लेता है और माँ से नहीं बताता है । इस प्रकार झूठ की नींव पड़ जाने पर बड़े हो जाने पर बच्चे का झूठ भी बड़ा होता जाता है ।
बड़ों को यदि किसी अपरिहार्य स्थिति में झूठ का सहारा लेना ही पड़ जाए तो कम–से–कम बच्चों को उस झूठ में शामिल न करें । जैसे – बच्चे से यह कहना – ‘पापा को मत बताना ।’ या किसी के आने पर बच्चे से यह कहलवा देना – ‘कह दो पापा घर पर नहीं हैं ।’ या किसी अनिच्छित व्यक्ति का फोन आ जाने पर बच्चे से कहलवा देना – ‘कह दो पापा मोबाइल घर पर भूल गए हैं, अभी घर पर नहीं हैं ।’
बड़ों को इस तरह की अपनी समस्याओं को स्वयं हल करना चाहिए, बच्चों को बीच में नहीं डालना चाहिए ।
यदि बच्चे की झूठ बोलने की आदत पड़ ही गई है तब उसे झूठ की बुराई और सच का महत्त्व छोटी–छोटी कहानियों के माध्यम से समझाया जा सकता
 है । साथ ही उसे यह भी बताना चाहिए कि एक सच को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ जाते हैं ।
झूठ खुल जाने पर समाज में बड़ी बेइज्जती होती है और उस बच्चे की सच बात को भी लोग झूठ मानने लगते हैं । इसलिए सदा सच ही बोलना चाहिए, चाहे इसके लिए थोड़ी देर के लिए हमें अपमान भी सहना पड़े किन्तु अन्तत: परिणाम अच्छा ही होता है ।
8– अँगूठा चूसना
प्रथम छह माह तक शिशु में चूसने की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है । इस आयु में शिशु का अँगूठा चूसना उसकी सामान्य अवस्था को दर्शाता है । कुछ बच्चे एक वर्ष की आयु तक अँगूठा चूसते देखे जाते हैं किन्तु इस आयु के बाद भी शिशु का अँगूठा चूसना एक समस्या बन जाती है ।
यह समस्या जन्म ही न ले, इसके लिए आवश्यक है कि माता बच्चे को प्यार से स्तनपान कराए । माँ स्तनपान कराते समय बच्चे को प्यार से देखती रहे तथा दूध पिलाने के साथ–ही–साथ धीरे–धीरे प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरती रहे । इससे बच्चे का पेट भरने के साथ–ही–साथ उसकी चूसने की प्रवृत्ति की संतुष्टि भी होगी और वह प्रसन्न भी रहेगा ।
प्रथम छह माह तक बच्चे की चूसने की प्रवृत्ति धीरे–धीरे शान्त हो जाती
 है । अत: बच्चे को तब तक स्तनपान कराते रहना चाहिए, जब तक वह स्तन से स्वयं मुँह न हटा ले ।
कई बार बच्चा दूध पीते समय बीच–बीच में हँसता है व माँ को आकर्षित करता है, वह बीच–बीच में खुश होकर माँ के साथ खेलना चाहता है । यदि उस समय माता झुंझलाहट में उसे डाँटती है व जल्दी दूधपीने के लिए प्रेरित करती है तब बच्चे पर इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत बुरा पड़ता है ।
माता को व्यस्तता के बावजूद शिशु को दूध पिलाने के लिए पूरा समय निकालना ही चाहिए । इससे शिशु स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है व उसे संतुष्टि का आभास होता हैय जो उसके पूरे जीवन के आनन्द का स्रोत है ।
जो बच्चे बोतल से दूध पीते हैं, उनकी भी चूसने की प्रवृत्ति की संतुष्टि नहीं हो पाती है । अत: माता का पहला प्रयास तो यह होना चाहिए कि वह बच्चे को स्तनपान ही कराए क्योंकि स्तनपान कराने से बच्चे का ही नहीं माता का भी स्वास्थ्य ठीक रहता है । स्तनपान से बच्चे के शरीर के लिए आवश्यक सभी तत्त्व तो उसे मिल ही जाते हैं, साथ ही उसे भावनात्मक सुरक्षा भी मिलती है, जो उसके सहज विकास के लिए आवश्यक है ।
यदि माता कार्यशील महिला है और वह हर समय अपना दूध नहीं पिला सकती है तब जितनी बार सम्भव हो अपना दूध पिलाए, जब माता घर पर न हो उस समय ही बच्चे को दूसरा दूध दिया जाए । माता जब भी बच्चे को दूधपिलाए, बच्चे को पूरा समय देना चाहिए ताकि बच्चे की भावनात्मक संतुष्टि हो सके ।
यदि माता के पर्याप्त दूध नहीं होता है तब दूसरा दूध पिलाते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए –
* बोतल के निपल के छेद को छोटा रखना चाहिए, ताकि बच्चों की चूसने की प्रवृत्ति की संतुष्टि हो सके ।
* बोतल का निपल भी जल्दी–जल्दी बदलते रहना चाहिए क्योंकि निपल का छेद बड़ा हो जाने पर दूध तेजी से निकलने लगता है और शिशु की चूसने की इच्छा अतृप्त रह जाती है ।
* बोतल का निपल मुलायम यैवजिद्ध होना चाहिए ।
* बोतल से दूध पिलाते समय भी माँ शिशु को अपनी गोद में लिटाकर सिर पर हाथ फेरती रहे, वह उसकी ओर प्यार से देखती रहे, जिससे शिशु स्तनपान के समान ही सुख प्राप्त कर सके ।
अँगूठा चूसने की आदत पड़ जाने पर क्या करें ?
यदि बच्चा एक वर्ष का हो जाता है और उसकी अँगूठा चूसने की आदत पड़ ही गई है तो उसे डाँटने–फटकारने की बजाय प्यार से समझाना चाहिए । निम्नलिखित कुछ उपाय भी किए जा सकते हैं –
* यदि बच्चा नींद में अँगूठा चूसता है तब सोते समय बच्चे के मुँह से अँगूठा निकाल देना चाहिए ।
* अँगूठा चूसने की समस्या आत्मकेन्द्रित है । अत: इसके बारे में अधिक टोका–टाकी न करें ।
* अँगूठे पर नीम की पत्ती पीसकर उसका लेप लगाया जा सकता है ।
* कई बार माताएँ बच्चे को चुसनी इसलिए चूसने को दे देती हैं ताकि बच्चा चुप रहे और वह अपना काम निपटा सकें, ऐसा करना गलत है । बच्चे को खिलौनों आदि की तरफ आकर्षित करें, चुसनी चूसने को न दें ।
* यदि माता के दूध नहीं होता है, तब बच्चे को बोतल या कटोरी–चम्मच से दूध पिलाएँ, किन्तु बच्चे को माता का स्तन चूसने दें । इससे बच्चे को भी भावनात्मक सहारा मिलता है और माता को भी आत्मसंतुष्टि मिलती है ।
चूसने की इच्छा अतृप्त रह जाने पर बड़े होने पर असामान्य सेक्स की इच्छा प्रबल हो सकती है ।

बच्चों के मस्तिष्क की सहजता

जीवन की सफलता के लिए आवश्यक है कि मस्तिष्क सहज रहे । जब बच्चे का जन्म होता है, तब उसका जीवन व मस्तिष्क सहज होता है । सहजता ही जीवन का मूलाधार है ।
यदि मकान की नींव सही पड़ जाए तो मकान का निर्माण अच्छा होता है और वह मकान आँधी–पानी में भी नहीं गिरता है ।
इसी प्रकार बच्चों का अच्छा बचपन हो, उनकी पूर्व प्राथमिक व प्राथमिक शिक्षा ठीक हो तो बच्चे बड़े होने पर पूर्ण प्रफुल्लित, सुयोग्य, सच्चरित्र व समायोजित मानसिकता वाले बनेंगे । जरा विचार करें—
आज तक आपने कोई भी छोटा बच्चा अपराधी प्रवृत्ति का नहीं देखा
होगा ।
 जो बच्चे अपराधी हो जाते हैं, वे भी थोड़ा बड़े होने पर हीअपराधी होते हैं । शिशु अर्थात् छह वर्ष तक का बच्चा अपराधी मानसिकता का नहीं होता है ।
 शिशु चिड़चिड़ा हो सकता है, तोड़–फोड़ करने वाला व जिद्दी हो सकता है किन्तु अपराधी प्रवृत्ति का नहीं हो सकता है । शिशु की इन मानसिक समस्याओं के अनेक कारण हो सकते हैं ।
 ये सभी कारण भी अर्जित Acquired होते हैं, घर–परिवार व समाज की स्थिति–परिस्थिति के कारण होते हैं ।
 बच्चे का दिमाग क्लीन स्लेट की तरह है, हम उसमें जो चाहे लिख सकते हैं, अर्थात् बच्चे के दिमाग में जैसे चाहें, वैसे संस्कार डाले जा सकते हैं ।
 इसका प्रमाण यह है कि आज तक किसी भी बच्चे को मातृभाषा सिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ी । एक मंदबुद्धि बच्चा भी मातृभाषा या स्थानीय भाषा सहज ही ग्रहण कर लेता है ।
 एक लड़की जो घर में अपने बड़ों को या माता को खाना बनाते देखती है, वह सहज ही थोड़ा प्रयास करने पर खाना बनाना सीख जाती है । उसे किसी कूकरी क्लास की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।
 हिन्दू का बच्चा हिन्दू संस्कारों वाला होता है, वह उन्हीं बातों को सही समझता है, जो उसे सिखाई जाती हैं । वह वेद, पुराण, गीता, रामायण, यज्ञ, मन्दिर आदि में विश्वास रखने वाला होता है ।
 इसी प्रकार ईसाई के बच्चे की ईसाई धर्म के रीति–रिवाजों में रुचि भी होती है व विश्वास भी ।
 मुसलमान की सन्तान कुरान, शरीयत व मस्जिद में विश्वास रखती है । पक्का मुसलमान पाँच वक्त नमाज अदा करना अपना कर्तव्य समझता है ।
अब जरा खुले दिमाग से विश्लेषण करें तो कुदरत का सत्य तो केवल एक ही होगा । हर धर्म के धर्मग्रन्थों में अलग–अलग बातें लिखी हैं । उस धर्म–विशेष का समर्थक केवल उसी बात को सत्य मानता है, जो उसके धर्म की पुस्तकों में लिखी हैं । हिन्दू कहते हैं वेद परमात्मा की वाणी है, मुसलमान कहते हैं कि कुरान ऊपर से आई है या अल्लाह की आवाज है । इसी प्रकार ईसाई बाइबिल को ईश्वरकृत कहते हैं ।
इन सब चीजों के मूल में कहा जा सकता है कि बचपन से हम जिस वातावरण में रहते हैं या हमें जो कुछ सिखाया जाता है, हम तदनुकूल ही आचरण करने लगते हैं । हमारे घर–परिवार, पास–पड़ोस के संस्कारों के साथ ही हमारी शिक्षा–दीक्षा जैसी होती है, वैसी ही हमारी सोच होती है । वैसी ही हमारी मानसिकता बनती जाती है ।
महान विचारक जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार—
‘अज्ञानी वह व्यक्ति नहीं है जो विद्वान नहीं है, अज्ञानी वह है जो स्वयं अपने को नहीं जानता और ऐसा विद्वान मूढ़ है, जो समझ अथवा बोध के लिए किताबों पर, जानकारियों पर और प्रमाण पर निर्भर रहता है । बोध केवल आत्मज्ञान से आता है और आत्मज्ञान आता है अपनी समस्त मानसिक प्रक्रिया के प्रति सहजता से । इस प्रकार शिक्षा का वास्तविक अर्थ स्वयं अपने को समझना है, क्योंकि हममें से प्रत्येक में सम्पूर्ण अस्तित्व समाहित है ।
सारांश यह है कि बच्चा स्वयं का अध्ययन करना सीखे । स्वयं के बारे में सीखना ही वास्तविक सीखना है ।’
प्रश्न यह है कि यह कैसे हो ?
देखें राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा निर्मित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के अनुसार—‘स्कूली पाठ्यचर्या और परीक्षा व्यवस्था दोनों में, जो बच्चों को बहुत सी जानकारी रटने और उसे उगलने के लिए विवश करती है, मूलभूत परिवर्तन किए जाएँ । यांत्रिक तरीके से परखे जाने के लिए सीखने की प्रक्रिया बच्चे से बच्चा होने का सुख छीन लेती है तथा स्कूली जानकारी को प्रतिदिन के अनुभव से अलग कर देती है ।
माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952) द्वारा की गई परिकल्पना स्मरण योग्य है—‘लोकतंत्र में नागरिकता की परिभाषा में कई बौद्धिक, सामाजिक व नैतिक गुण शामिल होते हैं : एक लोकतांत्रिक नागरिक में सच को झूठ से अलग छाँटने, प्रचार से तथ्य अलग करने, धर्र्मान्धता और पूर्वाग्रहों के खतरनाक आकर्षण को अस्वीकार करने की समझ व बौद्धिक क्षमता होनी चाहिए । वह न तो पुराने को इसलिए नकारे क्योंकि वह पुराना है, न ही नए को इसलिए स्वीकारे क्योंकि वह नया है – बल्कि उसे निष्पक्ष रूप से दोनों को परखना चाहिए और साहस से उसको नकार देना चाहिए जो न्याय व प्रगति के बलों को अवरुद्ध करता
हो ।––––’
‘लोकतंत्र प्रत्येक व्यक्ति के मनुष्य के रूप में सम्मान व योग्यता में आस्था पर आधारित होता है ––––अत: लोकतांत्रिक शिक्षा का उद्देश्य है – व्यक्तित्व का पूर्ण व चहुँमुखी विकास – अर्थात् एक ऐसी शिक्षा जो विद्यार्थियों को एक समुदाय में जीने की बहुआयामी कला में दीक्षित करे । बहरहाल, यह स्पष्ट है कि एक व्यक्ति अकेेले न तो रह सकता है, न ही विकसित हो सकता है ––––उस शिक्षा का कोई लाभ नहीं है जो अपने साथी नागरिकों के साथ शालीनता, सामंजस्य, कार्य–कुशलता के साथ जीने की शैली के लिए आवश्यक गुणों को पोषित न करती हो ।’
(माध्यमिक शिक्षा आयोग 1952–53, पृ– 20)
‘बाल केन्द्रित शिक्षा–शास्त्र का अर्थ है, बच्चों के अनुभवों, उनके स्वरों और उनकी सक्रिय सहभागिता को प्राथमिकता देना । इस प्रकार के शिक्षाशास्त्र में बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास व अभिरुचियों के मद्देनजर शिक्षा को नियोजित करने की आवश्यकता होती है ।’
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005, पृ– सं– 15)
‘बच्चों की आवाज व अनुभवों को कक्षा में अभिव्यक्ति नहीं मिलती है । प्राय: केवल शिक्षक का स्वर ही सुनाई देता है । बच्चे केवल अध्यापक के सवालों का जवाब देने के लिए या अध्यापक के शब्दों को दोहराने के लिए ही बोलते हैं । कक्षा में वे शायद ही कभी स्वयं कुछ करके देख पाते हैं । उन्हें पहल करने के अवसर भी नहीं मिलते हैं । किताबी ज्ञान को दोहराने की क्षमता के विकास के बजाय पाठ्यचर्या बच्चों को इतना सक्षम बनाए कि वे अपनी आवाज ढूँढ़ सकें, अपनी उत्सुकता का पोषण कर सकें, स्वयं करें, सवाल पूछें, जाँचें, परखें और अपने अनुभवों को स्कूली ज्ञान के साथ जोड़ सकें ।’
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 पृ– 15)
‘बच्चे उसी वातावरण में सीख सकते हैं, जहाँ उन्हें लगे कि उन्हें महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है । हमारे स्कूल आज भी सभी बच्चों को ऐसा महसूस नहीं करवा पाते हैं । सीखने का आनंद व संतोष के साथ रिश्ता होने की बजाय भय, अनुशासन व तनाव से सम्बन्ध हो तो यह सीखने के लिए अहितकारी होता
है ।’
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 पृ– सं– 16)
अब देखें किशोरावस्था में हमारी वर्तमान शिक्षा–प्रणाली का किशोरों पर क्या असर पड़ सकता है—
‘किशोरावस्था अस्मिता के विकास के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण समय है । स्वयं के बारे में समझने की प्रक्रिया का सम्बन्ध शारीरिक बदलाव और वयस्क के रूप में सामाजिक और शारीरिक माँगों से संगति बिठाने से है । स्वतंत्रता, घनिष्ठता, मित्रमंडली पर निर्भरता आदि कुछ ऐसे सरोकार हैं, जिनको पहचानने और उनसे निपटने की दिशा में उचित सहयोग देने की जरूरत है ।
बाहर की दुनिया तथा व्यक्ति की उस तक पहुँच और वहाँ आने–जाने की स्वतंत्रता व्यक्तित्व निर्माण को प्रभावित करती है । लड़कियों के विषय में यह तथ्य विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि प्राय: सामाजिक परम्पराएँ उन्हें चारदीवारों के भीतर रहने को बाध्य कर देती हैं ।
यही परम्पराएँ लड़कों के लिए ठीक इसके विपरीत रूढ़ि को प्रोत्साहित करती हैं, जो लड़कों को बाहरी व शारीरिक क्रियाकलापों से जोड़ती हैं । इस तरह की रूढ़ियाँ किशोरावस्था में अधिक प्रबल हो जाती हैं, जो शरीर के बढ़ने का समय होता है । इन शारीरिक बदलावों का प्रभाव किशोर जीवन के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर पड़ता है ।
अधिकतर किशोर इन परिवर्तनों का सामना बिना पूर्व ज्ञान एवं समझ के करते हैं, जो उन्हें खतरनाक स्थितियाँ जैसे – यौन रोगों, यौन दुर्व्यवहार, एच.आई.वी.एड्स एवं नशीली दवाओं के सेवन का शिकार बना सकती हैं ।
यह समय होता है जब आत्मसात किए गए विचारों व मानदण्डों पर प्रश्न उठाया जाता है, साथ ही अपने दोस्तों का मत बहुत महत्त्वपूर्ण बन जाता है । किशोरों की इन आवश्यकताओं को पहचानकर उनको जीवन में संकट से निपटने के कौशल सीखने की दिशा में सामाजिक और भावनात्मक सहारा दिया जा सकता है । साथ ही, मित्रों के दबाव और लिंग सम्बन्धी प्रचलित मान्यताओं से निपटने की दशा में भी उन्हें तैयार किया जा सकता है । इस प्रकार के सहयोग के अभाव में इन बदलावों को लेकर भ्रम और नासमझी की स्थिति पैदा हो सकती है और इससे किशोरों की अकादमिक और अन्य गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती
हैं ।
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005, पृ– 18)
शैक्षिक कार्य की गुणवत्ता, उससे सीख पाने की योग्यता और विद्यार्थी के लिए उसकी महत्ता को प्रभावित करती है । वे अभ्यास जो बहुत सरल होते हैं, या बहुत कठिन, जो बार–बार एक ही बात यांत्रिक रूप से दोहराते हैं, जो पाठ्य–पुस्तक को याद करने पर आधारित होते हैं, जो बच्चे को आत्माभिव्यक्ति व प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं देते, शिक्षक के जाँच कार्य पर ही निर्भर रहते हैं, वे बच्चे को आज्ञा पालन करने वाली कठपुतली बना देते हैं । शिक्षार्थी अपने विचारों व विवेक को महत्त्व देना नहीं सीखते हैं ।
वह यह सीखते हैं कि ज्ञान दूसरों के द्वारा बनाया जाता है और उन्हें सिर्फ ज्ञान को ग्रहण करना चाहिए । इसीलिए अध्यापकों पर यह जिम्मेदारी आ जाती है कि जो बच्चे स्वाभाविक रूप से शिक्षा के प्रति उत्साहित नहीं लगते उन्हें वह प्रोत्साहित करें ।
शिक्षार्थी नियंत्रित होना स्वीकार कर लेते हैं और यह चाहने लगते हैं कि उन्हें नियंत्रण में रहना आए । यह अंतत: संज्ञानात्मक, आत्मचिन्तन और उस लचीलेपन के विकास के लिए हानिकारक हैं, जो दरअसल अधिगम से विद्यार्थी को सशक्त बनाने के लिए आवश्यक है ।
इस शैक्षिक वातावरण में बढ़ते हुए कई विद्यार्थी सातवीं कक्षा तक पहुँचते–पहुँचते आत्मविश्वास, स्वयं को अभिव्यक्त करने और स्कूली अनुभवों का अर्थ निकालने की क्षमता खो बैठते हैं । वे बार–बार परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए उसी यांत्रिक रटन्त विद्या का सहारा लेते हैं ।
जबकि स्वतंत्र विचार प्रक्रिया और हल करने के विविध तरीकों को प्रोत्साहित करने वाले चुनौतीपूर्ण कार्य शिक्षार्थियों में स्वतंत्रता, रचनात्मकता और आत्मानुशासन को प्रोत्साहित करते हैं । ‘क्विज’ संस्कृति को बढ़ावा देने के बदले जहाँ तत्काल सही जवाब देना जरूरी होता है, हमें विद्यार्थियों को गहन व सार्थक अधिगम पर समय व्यतीत करने देना चाहिए ।
सीखने के वे कार्य जो यह सुनिश्चित करने के लिए रचे गए हैं कि बच्चे पाठ्य–पुस्तकों के अलावा अन्य स्रोतों से भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित होंगे, इस दर्शन को संप्रेषित करते हैं कि बच्चे खुद ही खोज करके एवं प्रमाण जुटा कर सीखते हैं एवं ज्ञान का सृजन करते हैं और अध्यापक या पाठ्य–पुस्तक का ज्ञान पर प्रभुत्व नहीं होता है ।
बच्चे अपने खुद के अनुभवों से, पुस्तकालयों से और स्कूल के बाहर अन्य स्रोतों से ज्ञान तलाश सकते हैं । इस संदर्भ में अधिगम की दृष्टि से सांस्कृतिक विरासत स्थल बेहद महत्त्वपूर्ण बन जाते हैं । न केवल इतिहास बल्कि सभी विषयों के शिक्षकों को पुरातत्त्व महत्त्व के स्थलों के प्रति बच्चों में एक आदरभाव और उनकी महत्ता समझने व उनका अन्वेषण करने की इच्छा को पोषित करना चाहिए ।
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, पृष्ठ 23 –24)
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है – ‘स्कूल के दिनों में मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात से हुई कि स्कूल विश्व की सम्पूर्णता से रहित था ।’
सत्य है विद्यालय तो वह स्थान होना चाहिए जहाँ बच्चे को पूरा विश्व नजर आए, उसमें जो भी जिज्ञासाएँ हैं वे शान्त हो सकें । वह स्वयं को अभिव्यक्त कर सके, चाहे उसकी अभिव्यक्ति खेल द्वारा हो, जिज्ञासाएँ हों, प्रश्न हों या कला के द्वारा अपने को अभिव्यक्त करे । उसे अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता हो ।
यदि उसे अभिव्यक्ति के स्वस्थ व आनन्दमय अवसर नहीं मिलेंगे तो वह रोने, चीखने, जिद्द करने या मारने–पीटने द्वारा अपने को अभिव्यक्त करेगा । विद्यालय ही नहीं अभिभावक भी यह भूल जाते हैं कि नन्हे–मुन्ने बच्चों की शरारतें सहज, स्वाभाविक हैं ।
जिस आँगन में बच्चे की किलकारी नहीं गूँजती, शरारतें नहीं होतीं,  चीजों की फरमाइश नहीं होती, रोना–धोना, चीख–पुकार, शोर–शराबा नहीं होता, उस आँगन में खामोशी और मायूसी छायी रहती है । हम भूल जाते हैं कि बच्चे तो वे कोमल और रंग–बिरंगे फूल हैं, जिन्हें देखकर मन खुशी से झूम उठता है ।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली द्वारा निर्मित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या कार्यक्रम 2005 (National Curriculum Framework 2005) इस बात पर बल देता है कि बच्चा बाहरी जीवन के अनुभवों से विद्यालय में प्रदत्त ज्ञान को जोड़ सके ।
हम सोचते हैं कि बच्चा क्या, कैसे और कितना सीख ले, कितनी जल्दी हमारे समाज के नियम के अनुरूप ढल जाए, कितनी जल्दी उसे अधिक–से–अधिक सिखा दें । यही गलती उसके विकास को बाधित करती है, जिसका दंड उसकी पढ़ाई की गति को ही नहीं, उसके सम्पूर्ण विकास को बाधित करने के रूप में उसको भोगना पड़ता है ।
‘बच्चे का भविष्य अब इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है कि बच्चे के ‘वर्तमान’ को अनदेखा किया जा रहा है, जो बच्चे, समाज व राष्ट्र के लिए अहितकर है ।’
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005, पृ– 2  (ङ))
और शिक्षा बिना बोझ के (Learning Without Burden) समिति की रिपोर्ट ने सिफारिश की कि स्कूली पाठ्यचर्या और परीक्षा व्यवस्था दोनों में, जो बच्चों को बहुत–सी जानकारी रटने और उसे उगलने के लिए विवश करती है, मूलभूत परिवर्तन किए जाएँ । यांत्रिक तरीके से परखे जाने के लिए सीखने की प्रक्रिया बच्चे से बच्चा होने का सुख छीन लेती है तथा स्कूली जानकारी को प्रतिदिन के अनुभव से अलग कर देती है ।
छोटे बच्चों की याददाश्त फोटोग्राफिक होती है । पाँच वर्ष के बच्चे पूरी–की–पूरी किताब रटकर सुना सकते हैं, लेकिन वास्तव में वह कुछ नहीं समझते हैं । बिना समझे इस रटन्त विद्या का उनके मस्तिष्क पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि बिना समझे रटने से उन्हें आनन्द नहीं आता है ।
कुछ चीजें बच्चों को रटवाना आवश्यक है, जैसे – गिनती व पहाड़ा, लेकिन गिनती व पहाड़ा रट जाने के साथ ही यदि इसके मूलभाव को समझा दिया जाए तो बच्चे को रटने के साथ ही आनन्द की प्राप्ति होती है व उसका पढ़ने में भी मन लगेगा और प्राप्त ज्ञान भी स्थायी होगा । जैसे 1 और 1 त्2य इसके साथ ही दो पेंसिलें या दो रबड़ या दो अन्य कोई चीजें सामने रखकर उसे गिनती और इसी प्रकार पहाड़ा सिखाया जा सकता है । इस प्रकार बच्चों के मन में गिनती या पहाड़े का प्रत्यय यब्वदबमचजद्ध स्पष्ट हो जाएगा ।
सरकारी विद्यालयों में पहली कक्षा में कम–से–कम पाँच वर्ष के बच्चे का दाखिला होता है, तभी उसे पढ़ना–लिखना सिखाया जाता है अर्थात् राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के अनुसार कम–से–कम इतने बड़े बच्चों के लिए ही पढ़ना उपयुक्त
है । जबकि प्राइवेट स्कूल बच्चे से यही अपेक्षा तीन–साढ़े तीन वर्ष की आयु में करते हैं । शिशु की शैशवावस्था की कोमल भावनाओं को कठोर नियंत्रण में बद्ध कर दिया जाता है ।
यही नहीं उसके विद्यालय से आने के बाद उसके माता–पिता भी उससे होमवर्क करवाते हैं । घर व विद्यालय में बच्चे को पढ़ाई के लिए मार भी पड़ती है ताकि बच्चे अच्छे नम्बर लाएँ ।
इन विद्यालयों में खेल या कविता, कहानी का उपयोग भी इस तरह किया जाता है कि वह अध्यापक के वर्चस्व व दमन का माध्यम बन जाता है । जैसे–बच्चे से कहा गया – ‘ट्विंकल–ट्विंकल लिटिल–स्टार’याद करो तो उसे इसका अर्थ समझे बिना रटना पड़ता है । इस कविता के सौन्दर्य–बोध से वह अवगत नहीं हो पाता है । हमारा उद्देश्य बच्चे को कविता रटवाना नहीं है वरन् उसे विद्यालय शिक्षा के लिए तैयार करना है ।
माता–पिता भी चाहते हैं कि तीन वर्ष की आयु से ही बच्चे को अधिक–से–अधिक पढ़ाया जाए । वह ऐसे विद्यालय ढूँढते हैं जहाँ बच्चे को अधिक पढ़ाया जाए । घर के लिए भी होमवर्क मिले । माता–पिता का तर्क यह होता है कि आजकल इतना कम्पटीशन है, इतना कोर्स है कि शुरू से ही बच्चों की पढ़ाई पर अधिक ध्यान देना होगा ।
ज्ञातव्य है कि अत्यन्त विकसित देशों में बच्चों को छ: वर्ष तक औपचारिक शिक्षा से मुक्त रखा गया है । शिशु को खेल, कहानी, गीत, संगीत आदि का आनन्द उठाने का पर्याप्त अवसर दिया जाता है । यही उसकी असली शिक्षा है, किन्तु हम तो आज अपनी ही संतान को मानसिक रूप से पंगु बना रहे
 हैं ।
हमारे समाज में पहले संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी । दादी माँ बच्चों को कहानियों के माध्यम से बहुत कुछ सिखा देती थीं । बच्चा परिवार के बीच में रहकर सामाजिक ज्ञान प्राप्त करता था । साथ ही समायोजन व स्वाभाविक स्नेह, अनुराग आदि भी पा लेता था । अब संयुक्त परिवार बहुत कम रह गए हैं । अत: अब ऐसे नर्सरी स्कूलों में बच्चों को भेजा जाए, जहाँ पर वास्तविक रूप से नर्सरी शिक्षा के उद्देश्य की पूर्ति हो ।
अभिभावकों को चाहिए कि छोटी उम्र में बच्चों पर पढ़ाई का दबाव न डालें । न ही टीचर से कहें कि यह चार वर्ष का हो गया तथा आपकी नर्सरी में एक वर्ष से पढ़ रहा है, अभी तक इसे पूरी गिनती लिखनी नहीं आती ।
इस आयु में सबसे बड़ी शिक्षा यही है कि बच्चों के उत्सुकता भरे प्रश्नों का जवाब दें या ज्यादा–से–ज्यादा स्नेह दें । स्नेह बच्चे की प्राथमिक आवश्यकता
 है । अनेक अनुसंधानों से जो बात उभरकर सामने आई है, वह यह कि शिशु को डंडे की मार से नहीं पढ़ाना चाहिए । मनोवैज्ञानिक तनाव का शिशु पर बुरा असर पड़ता है । शिशु के दिमाग पर चिंता सबसे बुरा असर डालती है ।
शिशु हर समय व्यस्त रहना चाहता है, उसे कुछ करने के लिए चाहिए किन्तु वह चाहता है कि उस क्रिया में उसे आनन्द मिले । खेल में भी उसे आनन्द मिलता है । आनन्दयुक्त क्रिया ही उसे प्रिय होती है, चाहे हमारी परिभाषा में वह खेल हो या कोई कार्य या पढ़ना–लिखना । यूँ तो आनन्दयुक्त क्रिया हर एक को प्रिय होती है किन्तु बड़े होने पर तो बच्चा कुछ सीखने की इच्छा रखता है और वह यह सोचकर भी सीख लेता है कि कुछ सीखना उसके काम आएगा । दूसरी ओर शिशु केवल आनन्दयुक्त क्रिया ही करना चाहता है, इसी से वह प्रसन्न रहता है । प्रसन्नता उसके लिए आवश्यक भी है और अनिवार्य भी ।
शिशु के लिए उसके माता–पिता व अध्यापक सर्वसमर्थ होते हैं । चिन्ता उसके मन पर इतना बुरा प्रभाव डालती है, जितना भूख भी नहीं । भूख तो उसे थोड़ी देर के लिए व्यथित करती है किन्तु चिन्ता तो मन में स्थायी स्थान बना लेती है । हमें ऐसे विद्यालयों का विरोध करना होगा, जहाँ पर तीन वर्ष की आयु से बच्चों को पढ़ाने लगते हैं ।
शिशु के लिए कैसा वातावरण प्रदान करना है, इसके लिए आज के परिवेश में और भी सुनियोजित रूपरेखा की आवश्यकता है क्योंकि अब संयुक्त परिवार बहुत कम हैं । अत: एकाकी बच्चा क्या करे ? शिशु व्यस्त भी हो, प्रसन्न भी, अपनी क्षमता का अधिकतम सीमा तक विकास भी कर सके । अपने वातावरण से अधिकतम ग्रहण भी कर सके । इसके लिए हमें सोचना है कि हम अपने शिशुओं को क्या दें ?
शिशु की क्रियाशीलता को कैसे गति दें, यह भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है । उसकी जिज्ञासा को हम शान्त करें, यह उसका अधिकार है, उसको प्रसन्न रहने का अवसर दें, यह उसकी आवश्यकता है और चिन्तामुक्त रहना सम्यक विकास हेतु अनिवार्यता है ।
सहजता ही तो जीवन का मूल सिद्धान्त है । जब मनुष्य सहज होता है तभी तो उसकी चिन्तन क्षमता में अभिवृद्धि होती है । जब मस्तिष्क में सब कुछ ठूँस –ठूँस कर भरा हुआ है, तब बच्चे के मन में स्वतंत्र चिन्तन का स्थान कहाँ रहेगा । स्वचिन्तन ही तो प्रगति का आधार है । अत: शिशु का मस्तिष्क सहज रहे । ढाई–तीन वर्ष के बच्चे के मस्तिष्क में विचारों को ठूँस–ठूँस कर भरना, न जाने कितने विषयों में हम उसे दक्ष बनाने का प्रयास करते हैं ।
नर्सरी शिक्षा के नाम पर ढेर सारी सूचनाएँ उसके मस्तिष्क में भर दी जाती हैं । जैसे—पढ़ना–लिखना, गणित की शिक्षा आदि तथा भावविहीन कविताएँ
आदि । साथ में होती है विद्यालय के प्रति भयपूर्ण छवि और सूखा, कुम्हलाया हुआ चेहरा, जिसमें आनन्द का लक्षण नजर नहीं आता है । बच्चा एक सुकोमल, प्यारा, अबोध प्राणी है । वह हर समय उमंग में भरा रहना चाहता है । हर समय क्रियाशील रहना चाहता है । उसकी एक अनोखी दुनिया होती है । उसकी कल्पना की दुनिया बड़ी रंग–बिरंगी होती है । वह वास्तविकता में भी उसी प्रकार जीना चाहता है । बच्चा परमात्मा की पवित्रतम कृति है ।
बच्चा सहजतम सब कुछ सीखना चाहता है, लेकिन जब हम बोझ के रूप में, कठोर अनुशासन के साथ उसे कुछ सिखाना चाहते हैं तो उसकी आशाओं पर तुषारापात हो जाता है । उसकी इन्द्रधनुषी कल्पना और सीखने की इच्छा भंग हो जाती है । बच्चे के मन में बहुत से प्रश्न होते हैं, सीखने की उसकी इच्छा, योग्यता व क्षमता हमसे कहीं अधिक होती है । आवश्यकता है कि कैसे उसे स्वतंत्र रूप से उभारा जाए । बच्चे घर और बाहर के समयबद्ध सीखने के कार्यक्रम से ऊब जाते
 हैं । पढ़ाई से उन्हें नफरत हो जाती है, माता–पिता और शिक्षक उसे प्रतिद्वन्द्वी के रूप में दिखाई देने लगते हैं ।
बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए उसके जीवन के प्रथम छ: वर्ष बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं । मनुष्य का अधिकांश मानसिक विकास शैशवावस्था में ही हो जाता है । इस समय बच्चे को जैसा चाहे वैसा ढाला जा सकता है । उसके शरीर को स्वस्थ बनाया जा सकता है, मानसिक प्रक्रियाओं का विकास करवाया जा सकता है । अच्छी भावनाओं का बीजारोपण करके अच्छे चरित्र की नींव डाली जा सकती है । शैशवकाल पूरे जीवन की नींव है । इस प्रकार शैशवकाल में बच्चे को प्रफुल्लित, आनन्दित किन्तु सहज, स्वाभाविक जीवन देकर स्वस्थ व्यक्तित्त्व का निर्माण किया जा सकता है ।

बच्चों के स्वस्थ विकास में परिवार की भूमिका

गर्भावस्था से ही शिशु के मानसिक व बौद्धिक विकास पर उसकी माता के विचारों का प्रभाव पड़ने लगता है । माँ की जैसी भावनाएँ होंगी, उसका पूरा–पूरा प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है । अत: गर्भवती माता को चाहिए कि आन्तरिक ध्यान द्वारा आत्मशुद्धि करे । इस प्रकार वह अपने भावी शिशु के जीवन को सार्थक बनाने की दिशा में प्रयत्नशील हो सकती है ।
माँ ध्यानावस्था में बैठकर अपने गर्भ में पल रहे परमपिता परमात्मा के उस अंश को प्रभुभक्त होने के लिए प्रार्थना करे ताकि जन्म लेने के पूर्व ही वह प्रभुभक्त हो सके । शिशु के जन्म के बाद भी माँ के द्वारा किए गए भजन, पूजन व ध्यान का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव शिशु पर निश्चित रूप से पड़ता है । ध्यान करना निर्विचार होने की अवस्था है जो गर्भस्थ शिशु के बौद्धिक, मानसिक, चारित्रिक व आत्मिक विकास में सहायक होगा । भविष्य में यही बच्चे राष्ट्र के कर्णधार होंगे ।
मनुष्य जाने या अनजाने हर समय कुछ–न–कुछ विचार करता रहता है । उसका मस्तिष्क इन विचारों से कभी खाली नहीं रहता है । इससे उसकी शान्ति हर क्षण क्षीण होती रहती है ।
परमात्मा आनन्दस्वरूप है, ज्योतिर्मय है । अत: ध्यान करने वाला भी आनन्दमय व ज्योतियुक्त हो जाएगा । जहाँ ज्योति व आनन्द है, वहाँ विकार व अन्य सांसारिक कुवासनाएँ नहीं रह सकेंगी । कहा गया है – जिसके हृदय में उस प्रभु का स्मरण होगा, उसे सद्बुद्धि होगी । व्यक्ति की सद्बुद्धि ही उसकी सद्गति, परिवार, समाज व राष्ट्र की उन्नति, सुख–शान्ति व समृद्धि का आधार है ।
सद्बुद्धि होने पर बालक विश्वप्रेम करेगा अर्थात् सारे जगत को सर्वशक्तिमान प्रभु की रचना, उसकी ही सृष्टि मानकर चलेगा । यह वृत्ति बाल्यकाल में तभी उदित हो सकती है, जबकि उसी कोमल अवस्था में उसे सृष्टि–नियंता की शक्ति अथवा उसके अस्तित्व से परिचित करवाया जाए । 
इसका एक माध्यम प्रकृति–प्रेम अथवा सभी जीव–जन्तुओं, वनस्पति आदि से प्रेम करना सिखाना अथवा सीखने के अवसर प्रस्तुत करना हो सकता 
है । बच्चे स्वभाव से ही फूलों, तितलियों, पशु–पक्षियों आदि को पसन्द करते हैं, उनसे खेलना चाहते हैं, उन्हें प्यार करना चाहते हैं । यदि उसी अवस्था में उन्हें प्रकृति का साथ उपलब्ध करवाया जाए तो वह सहज–स्वाभाविक ढंग से ही प्रकृति के साथ स्नेह–सम्बन्ध स्थापित कर सकेंगे ।
साथ–ही–साथ प्राकृतिक चीजों को भगवान की संरचना बताकर बच्चे को प्रकृति–प्रेम, मानव–प्रेम, जगत–प्रेम, ईश–प्रेम की ओर ले जाया जा सकता है । यह बच्चे के निजी जीवन में सुख और सार्वजनिक सामाजिक जीवन में शान्ति का समावेश कराने में सहायक हो सकता है ।
अभिभावकों का सहयोग
बच्चे के मनोविज्ञान को समझकर अभिभावक उसके समुचित विकास में बहुत अधिक सहयोग दे सकते हैं ।
अभिभावकों को सफाई एवं स्वास्थ्य के नियमों की जानकारी होना भी आवश्यक है । घर की बनावट ठीक हो, उसमें रोशनी और हवा आने–जाने का समुचित प्रबंध हो । शिशु को सारे दिन कमरे में ही बन्द न रखा जाए बल्कि उसे खुली ताजी हवा व धूप भी मिलनी चाहिए ।
बच्चे को नियत समय पर सन्तुलित एवं पौष्टिक भोजन भी मिलना चाहिए । भोजन पौष्टिक होने के साथ–साथ हल्का व सुपाच्य हो । पौष्टिक भोजन देने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उन्हें महँगे फल, मेवा आदि ही दिए जाएँ । हरे पत्ते वाली सब्जी, मौसम के फल जैसे – अमरूद, केला, खीरा आदि जो भी उपलब्ध हों दिए जा सकते हैं । मौसमी फल तथा मौसमी सब्जियाँ सस्ते भी होते हैं तथा स्वास्थ्यवर्धक भी । भोजन उतना ही दिया जाए जिसका पाचन समुचित रूप से हो सके । बिना भूख के या आवश्यकता से अधिक भोजन शरीर में पोषण उत्पन्न न करके विकार उत्पन्न करता है ।
बच्चे की निम्नलिखित प्रमुख मनोसामाजिक आवश्यकताएँ होती
हैं—
1– प्यार की आवश्यकता
2– प्रशंसा एवं आत्म–पहचान की आवश्यकता ।
3– सुरक्षा की आवश्यकता ।
बच्चा स्नेह, सुरक्षा, प्रशंसा व सौहार्द्र के वातावरण में पलकर ही व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर पाता है । बच्चा अपनी प्रशंसा द्वारा अपनी एक विशेष पहचान बनाना चाहता है, किन्तु बच्चे की आवश्यकताओं को समझने के साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे में जितनी भी गलत आदतें पड़ जाती हैं जैसे—जिद्द करना, चोरी करना, घर से भागना, झगड़ालू होना आदि वह सब एक प्रकार के मनोरोग हैं । इन समस्याओं के उत्पन्न होने के तीन प्रमुख कारण हैं—
1– बहुत अधिक लाड़ प्यार
2– बहुत अधिक तिरस्कार
3– परिवार के सदस्यों का बच्चों  बच्चों के प्रति परस्पर विरोधी व्यवहार ।
इसलिए बच्चों के साथ सन्तुलित व्यवहार करना चाहिए, न तो उन्हें आवश्यकता से अधिक लाड़–प्यार देना चाहिए, न ही उनकी एकदम उपेक्षा ही कर देनी चाहिए ।
प्राय: देखा जाता है कि जिन बच्चों  को घर में अधिक मारा–पीटा जाता है, उनमें आक्रामक प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है । उनको घर में जो मारता है, उसे तो वह मार नहीं पाते हैं, अत: वह अपने से छोटे या कमजोर बच्चों को मारकर बदला लेते देखे जाते हैं ।
इसके अतिरिक्त माता–पिता के बीच का तनाव या परस्पर विरोधी व्यवहार भी बच्चे को प्रभावित करता है । उदाहरणत: माँ ने किसी बात के लिए बच्चे को मना किया, पिता ने उसी काम को करने के लिए कहा तो बच्चा यह निर्णय नहीं कर पाता है कि वह क्या करे ।
बच्चे के अन्दर प्रौढ़ व्यक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक क्रियाशीलता होती है, वह हर समय व्यस्त रहना चाहता है । घर में मनोरंजन के साधन अवश्य होने चाहिए, जैसे–सस्ते खिलौने आदि । बच्चों को रुचिकर व शिक्षाप्रद कहानियाँ आदि भी घर में सुनानी चाहिए ।
बच्चों में उत्सुकता, कौतूहल उसी प्रकार कूट–कूट कर भरा होता है, जिस प्रकार शरारत और भोलापन । नई–नई बातंे जानने का उन्हें बहुत शौक होता
 है । कुछ बच्चे तो नए खिलौनों को तोड़कर यह देखना चाहते हैं कि उनके अन्दर क्या छिपा है ।
वस्तुत: बच्चे का व्यक्तित्व बनाना माता–पिता की परीक्षा होती है, इस व्यक्तित्व–निर्माण की प्रक्रिया में उनकी जिज्ञासाओं की पूर्ति करना भी माता–पिता का कर्तव्य है । नई बातें जानने की प्रवृत्ति प्राकृतिक है । बच्चे के जितने उत्सुकता भरे प्रश्नों का जवाब हम देंगे, बच्चे की जिज्ञासा उतनी ही बढ़ेगी व उसकी बुद्धि उतनी ही कुशाग्र होगी ।
माँ या अध्यापक को बच्चों के प्रश्नों को सुनकर झल्लाना नहीं चाहिए । बड़ी शान्ति व धैर्य से बच्चे के प्रश्नों को सुनकर उनका समाधान करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए । अच्छा तरीका यह है कि जब बच्चा कोई प्रश्न पूछे तब बच्चे से ही सम्बन्धित प्रश्न पूछकर उत्तर निकलवाने का प्रयत्न करना चाहिए । इससे हमको यह पता लग जाएगा कि बच्चा इस सम्बन्ध में क्या और कहाँ तक सोच सकता है ।
ऐसा करने से बच्चे को अपने दिमाग पर जोर देना पड़ेगा, जिससे उसकी बुद्धि कुशाग्र होगी व चिन्तन क्षमता बढ़ेगी । उसमें आत्मविश्वास भी बढ़ेगा कि बड़े लोग उसे उत्तर देने के योग्य समझते हैं ।
बच्चे को अधिक लम्बे–चौड़े उत्तर न दें, वरना वह ऊब जाएगा । संक्षिप्त उत्तर से ही उसकी जिज्ञासा शाँत करने का प्रयास करें । कई बार दृष्टिकोण में भी भिन्नता होती है । अध्यापक कहते हैं कि सवेरे नहाकर स्कूल आना चाहिए, माँ कहती हैं कि दोपहर को नहा लो । जब बच्चा देखता है कि कोई कुछ कहता है, कोई कुछ, तो वह चकरा जाता है । वह समझ नहीं पाता है कि सत्य क्या है ।
इस अवस्था में बच्चे को समझाएँ कि कुछ बातों में सबका दृष्टिकोण अलग–अलग हो सकता है । यह विचारों की भिन्नता उसे खुले दिमाग का बनाएगी, वह यह समझ लेगा कि लोगों के खान–पान, खाने के तरीके, वेशभूषा आदि में भिन्नता हो सकती है । अत: वह हर परिस्थिति में समायोजित कर 
लेगा ।
बच्चे को साथियों के साथ खेलने का अवसर प्रदान करना चाहिए, जिससे उसकी माँसपेशियों का सन्तुलित विकास हो सके, वह प्रसन्नचित्त रहे तथा अपनी भावनाओं को खेल द्वारा अभिव्यक्त कर सके ।
जैसे–जैसे बच्चा बड़ा होने लगता है उसके मन के भाव स्थायी होने लगते हैं । ये ही चरित्र का निर्धारण करते हैं । अत: अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को अच्छी रुचिकर एवं शिक्षाप्रद कहानियाँ सुनाएँ । अच्छे कार्य करने पर उन्हें पुरस्कृत करें ताकि उनके मन में अच्छी बातों के प्रति भाव स्थायी हो जाएँ । इस प्रकार बच्चों में सत्य, प्रेम, दया, सहानुभूति तथा सदाचार आदि के प्रति स्थायी भावों का निर्माण किया जा सकता है ।
बच्चे के मन में अपनी संस्कृति के प्रति आदर और सम्मान के बीज बोने चाहिए । बच्चे को सुसंस्कृत बनाने के लिए उसके सामने अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए, क्योंकि बच्चा जैसा घरवालों को करते देखता है, वैसा ही वह स्वयं करता है ।
इसके अतिरिक्त निम्नलिखित बातों का भी ध्यान रखना चाहिए—
1– बच्चों की भावनाओं का आदर करें ।
2– बच्चों की आपस में तुलना न करें, क्योंकि प्रत्येक बच्चे में व्यक्तिगत विशेषताएँ होती हैं ।
3– बच्चे में जो छुपी हुई क्षमता है, उसको विकसित करने का प्रयत्न करें ।
4– बच्चे में आत्मानुशासन की भावना विकसित करें ।
5– भाई–बहनों का एक–दूसरे के प्रति प्यार हो, घर का वातावरण भी प्रेमपूर्ण हो ।
समय–समय पर बच्चों को नागरिक के अधिकार और कर्तव्यों का व्यावहारिक ज्ञान करवाते रहना चाहिए । जैसे – सड़क पर बाएँ चलना, रास्ते में जगह–जगह छिलके व कूड़ा न फेंककर नियत स्थान पर ही कूड़ा फेंकना, देशभक्ति की भावना आदि । इससे बड़े होने पर उनमें नागरिकता की भावना का उचित विकास हो सकेगा और वह देश के आदर्श नागरिक बन सकेंगे ।

बच्चों के बचपन व कोमलता को सदा ध्यान में रखना


बच्चा प्रकृति का अमूल्य उपहार है । अत: आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रकृति प्रदत्त इस उपहार को सँभालकर रखें । उसको स्नेह एवं प्रेम से सींचे । उसकी हँसी को और अधिक मुखरित होने दें । उसके बचपन को समझें, उसकी हँसी में हम भी शामिल हों ।
बच्चा तन–मन से बहुत कोमल होता है । वह इतना सहज होता है कि उसे जहाँ अपनत्व व प्यार मिलता है वह उसका ही हो जाता है । अत: जो बात उसे हम प्यार से बता सकते हैं, वह मार–डाँट से नहीं । चिन्ता व तनाव बच्चे के मन पर बहुत बुरा प्रभाव डालते हैं, वह भय के कारण बात तो मान लेता है परन्तु धीरे–धीरे असहज होता जाता है । वह प्यार की भाषा के साथ–साथ भय की भाषा भी समझने लगता है, अर्थात् उसे जो मारता–डाँटता है, उसके डर के कारण वह उसकी बात मान लेता है ।
फिर भी इतना सत्य है कि वह भयवश पढ़ लेता है, रट लेता है या अन्य कार्य कर लेता है, किन्तु उसके विकास की सहज गति अवरुद्ध हो जाती है । जिन बच्चों को अधिक डाँटा–मारा जाता है, उनका मन सदैव आक्रोश से भरा रहता है । अवसर मिलने पर वे अपने से छोटों या निर्बल को सताने लगते हैं । कई बच्चे, जो सहज ही अपनी आक्रोश की भावनाओं को अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं, अपने से निर्बल बच्चे का गला तक दबाते देखे जाते हैं ।
बाल्यावस्था में पूरा प्यार–दुलार पाने वाला बच्चा बड़ा होकर कभी भी समाज का विद्रोही अंग नहीं बन सकता । यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि मनुष्य सदा सुखद घटनाएँ ही याद रखता है । इसी प्रकार बच्चे भी मार को भूल जाते हैं, प्यार को याद रखते हैं, क्योंकि प्यार उनके लिए सुखद होता है । इसलिए प्यार से दी हुई सीख अधिक याद रहती है ।
जिन बच्चों को प्यार कम मिलता है, उनमें बहुत–सी बुराइयाँ पनपने लगती हैं । आज हम अपने बच्चों का बचपन स्वयं खत्म करते जा रहे हैं । ढाई–तीन वर्ष के बच्चे विद्यालय व घर में पढ़ाई के बोझ तले अपना बालपन हमारी अहंतुष्टि के लिए होम करते जा रहे हैं । ‘बार–बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी’, अब दिवास्वप्न लगता है । इस भारी–भरकम पढ़ाई व होमवर्क ने तो बच्चों का बचपन ही खत्म कर दिया है ।
अब हमारे आँगन बच्चों की किलकारियों से सूने हो गए हैं । उनकी उन्मुक्त हँसी पता नहीं कहाँ चली गई है । आज के बच्चों की दिनचर्या विद्यालय, होमवर्क व टी.वी. हो गई है । उनको खेलने का समय ही नहीं मिलता है । रविवार भी होमवर्क व टी.वी. में चला जाता है । विद्यालय व घर दोनों ही जगह उबाऊ अनुशासन ने उनका जीवन दूभर कर रखा है ।
हमने बच्चों को एक शो–पीस की तरह समझना प्रारम्भ कर दिया है । मिलिट्री–अनुशासन की तरह खड़ा बच्चा हमें अच्छा लगता है । वह सॉरी और थैंक्यू की औपचारिकताएँ कर ले, हमें यही अच्छा लगता है । बाल–सुलभ चंचलता का भी कोई महत्त्व होता है, हम यह भूलते जा रहे हैं और इसका ऋण चुकाना पड़ रहा है हमारे नौनिहालों को ।
बहुधा यह देखा जाता है कि शिक्षक व अभिभावक अपनी बात बच्चे पर थोपने का प्रयत्न करते हैं । उसकी रुचि व योग्यता का ध्यान नहीं रखते । इससे बच्चा दब्बू हो जाता है । उसमें आत्महीनता की भावना आ जाती है । वह संकोची हो जाता
है । वह दु:खी और उदास रहता है । बच्चों की भावनाओं, व्यक्तिगत क्षमताओं व योग्यताओं को आदर देना चाहिए ।
हम एक बच्चे की दूसरे से तुलना न करें, क्योंकि प्रत्येक बच्चे में कोई–न–कोई विशेष क्षमता अवश्य होती है । आवश्यकता इस बात की है कि हम बच्चे की उस क्षमता को पहचान कर उसे विकसित करने का प्रयत्न करें । उसे स्वयं को अभिव्यक्त करने का अवसर प्रदान करें ।
बच्चों के लिए दुनिया की हर चीज नई है । हर आदमी व हर काम उनके लिए नया है । इस नवीनता के वातावरण में बच्चा पुलकित होता है, हर्षित होता है, हर चीज के बारे में जानकारी प्राप्त कर अपने को आनन्दित समझता है । इस समय कुछ पूछने पर फटकार दिए जाने पर उसके मन में एक ग्रन्थि बन जाती है, उसकी जिज्ञासा की प्रवृत्ति धीरे–धीरे समाप्त होने लगती है । अब वह अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए गलत रास्तों का प्रयोग करने लगता है या उच्छृंखल हो जाता है । बच्चे की जिज्ञासा को अतृप्त रखना, कुछ भी पूछने पर फटकार देना, उसे भूखा रखने से भी अधिक अहितकर है ।
इसी सन्दर्भ में एक बात विचारणीय है कि प्राय: घर में बड़ा बच्चा अधिक शान्त, संतुष्ट व गम्भीर देखा जाता है । लोग यह कहते देखे जाते हैं कि छोटा बच्चा लाड़–प्यार में बिगड़ जाता है । छोटा सदैव छोटा ही रहता है । छोटे बच्चे के आ जाने से बड़ा अपनी जिम्मेदारी का एहसास करने लगता है, इसलिए वह शान्त हो जाता है ।
हो सकता है इस बात में भी कुछ सत्यता हो, किन्तु इसका एक प्रधान कारण है कि महिला को प्रथम बार गर्भवती होने के सुख का अहसास ही अलग होता है । माँ के मन में शिशु–सम्बन्धी नित नई सुखद कल्पनाएँ आती रहती हैं, वह शान्त, प्रसन्नचित्त व उत्साहित रहती है । उस समय केवल गर्भवती माँ ही नहीं वरन् उसके साथ पिता व घर के अन्य सदस्य भी आने वाले मेहमान की उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं, गर्भवती माँ के खान–पान व रहन–सहन का पूरा ध्यान रखते हैं ।
इस प्रकार प्रथम शिशु के गर्भ में होने के समय माँ को जो शान्त व स्नेहमय वातावरण मिलता है, वह अन्य शिशुओं के समय नहीं मिल पाता है । स्नेह का पूरा–पूरा प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है ।
प्रथम शिशु के जन्म के समय भी एक उल्लासपूर्ण वातावरण रहता है । जहाँ महिला संसार की सर्वोत्तम रचना करने के उल्लास के साथ मातृत्व के गरिमामय पद को प्राप्त करती है, वहीं पुरुष पितृत्व पद प्राप्त करने के सुखद एहसास से नवागन्तुक शिशु की पूरी देखभाल में लग जाता है ।
पहले बच्चे के लालन–पालन में माँ–पिता व परिवार वालों की जो सहज अनुरक्ति होती है, वह बाद के बच्चों में कम हो जाती है । इसीलिए बड़ा बच्चा अपेक्षाकृत अधिक शाँत, संतुष्ट व गम्भीर होता है ।
इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि स्नेह का शिशु के जीवन पर स्थायी प्रभाव पड़ता है । वस्तुत: शिशु को स्नेह देकर हम स्वयं भी अनिर्वचनीय सुख पाते हैं ।
विचारणीय प्रश्न है कि आज की कृत्रिमता में जीते हुए हम अपने बच्चों को क्या दे रहे हैं ? ढाई–तीन वर्ष का शिशु भारी बस्ते का बोझ उठाए ए बी सी डी लिखने या पहाड़ा रटने के लिए विवश है । वह होमवर्क के बोझ तले दबा हुआ है । क्या यही उसका बचपन है ? क्या हम उसे उन्मुक्त वातावरण प्रदान कर रहे हैं, जहाँ वह स्वच्छन्दतापूर्वक अपने बचपन का आनन्द ले सके ?
बचपन फिर लौटकर नहीं आता, यह एक ऐसी अनुभूति है, जो वृद्धावस्था तक मन को सहज ही पुलकित कर देती है । क्या हम बच्चे को सहज वातावरण देकर उसकी कोमलता, मासूमियत व भोलेपन का ध्यान रखते हुए उसको बचपन पूरे उल्लास के साथ जीने का अवसर दे सकेंगे ?
बच्चों को कहानियाँ सुनाना
बच्चों को कहानी सुनना बहुत अच्छा लगता है । दूरदर्शन के आगमन के पूर्व शाम होते ही संयुक्त परिवार में बच्चे अपनी दादी–नानी के पास कहानी सुनने पहुँच जाते थे । छोटे परिवार में भी यह कार्य माँ, पिता, दीदी, भइया या पास–पड़ोस की दादी–नानी करती थीं ।
संयुक्त परिवार में बच्चे का सामाजिक, मानसिक, बौद्धिक व भाषा का विकास सहज ही हो जाता था । उस समय अनौपचारिक शिक्षा का एक प्रधान माध्यम दादी–नानी की कहानियाँ थीं । जो बात हम बच्चों को सहज रूप में नहीं सिखा पाते हैं, वही बात वह कहानी के माध्यम से जल्दी सीख लेते हैं । उनके मन पर कहानी द्वारा स्थायी प्रभाव डाला जा सकता है । संक्षेप में कहानियों द्वारा निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं—
1– कल्पनाशक्ति का विकास होता है ।
2– भाषा का विकास तथा योग्यता–विस्तार अर्थात् किसी बात को विस्तार से कहने की क्षमता का विकास होता है ।
3– वाक्य संयोजन की प्रतिभा का विकास होता है ।
4– प्रकृति–प्रधान कहानियों को सुनने से प्रकृति के सचित्र सौन्दर्य–बोध का विकास होता है ।
5– नीतिपरक कथाएँ बाल–मस्तिष्क पर दीर्घकालिक प्रभाव डालती हैं ।
6– इतिहास की कठिनतम गुत्थियों को हम कहानी के माध्यम से बाल–मन तक सरलता से पहुँचा सकते हैं ।
7– बाल–हृदय में प्राचीन संस्कृति के प्रति अनुराग उत्पन्न करने के लिए कहानी एक सशक्त माध्यम है ।
इसी प्रकार विज्ञान कथाएँ, जानवरों की कहानियाँ, सामाजिक कहानियाँ तथा अन्य शिक्षाप्रद कहानियाँ बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायक हो सकती हैं ।
कहानी सुनाने की जरूरत
कहानियाँ अच्छी तरह सुनने की क्षमता का विकास करती हैं : ‘अच्छा श्रोता कौन है ? वह जो अन्त तक सुनता रहे ।’ यह बात थोड़ी अजीब है कि अच्छे श्रोता हमारे उस देश में दुर्लभ हो गए हैं, जहाँ कहानी सुनना और सुनाना  एक पुरानी और मजबूत मौलिक संस्कृति रही है । मेरा अन्दाज है कि इस परिस्थिति का सम्बन्धबचपन में कहानी सुनाने की अवहेलना से है । ऐसा लगता है कि आधुनिक भारत के पास बच्चों को नियमित रूप से कहानी सुनाने का समय ही नहीं है । इस कमी के परिणाम अब स्पष्ट होते जा रहे हैं ।
* कहानियाँ सुनने से अन्दाज लगाने का प्रशिक्षण मिलता है ।
* कहानियाँ हमारी दुनिया को फैलाती हैं ।
*  कहानियाँ शब्दों को अर्थ देती हैं ।
* कहानी कहने का महत्त्व हम बच्चे के भाषाई साधनों के विस्तार से देख सकते हैं । शब्द निहायत निजी सम्पत्ति होते हैं । वे हमें एक बहुत निजी अर्थ में संसार की चीजों को अलग–अलग नाम देने की क्षमता देते हैं । लेकिन दूसरी तरफ शब्द एक ऐसी सामाजिक सम्पत्ति भी हैं जिनका इस्तेमाल हम दूसरों से अपने अनुभव बाँटने के लिए करते हैं । शब्दों की ये दो–तरफा प्रकृति ही उन्हें अर्थ देती है ।’
प्राथमिक शिक्षक जनवरी 2007
प्रो– कृष्ण कुमार – निदेशक
N.C.E.R.T. प्राथमिक शिक्षा के मुद्दे
(D.P.E.P.  जनवरी–अप्रैल 2007)
बच्चों के लिए खेल, खेल का अर्थ व आवश्यकता
बच्चों के लिए खेल सहज विकास का अच्छा माध्यम है । बच्चे के लिए खेल ही उसका कार्य है । बच्चा खेल–खेल में जितना अधिक सीख सकता है, बलपूर्वक सिखाने पर उसका दसवाँ भाग भी सीखना कठिन हो जाता है । खेल के द्वारा सीखने में बच्चे की रुचि होती है । अत: वह ज्ञान स्थायी होता है । खेल द्वारा सीखने से एक लाभ यह भी है कि बच्चे की पढ़ाई से अरुचि नहीं होती है । अत: विद्यालय शिक्षा में भी उसकी शिक्षा के प्रति रुचि बनी रहती है ।
बच्चा स्वतंत्रतापूर्वक कार्य कर सके तो उसकी ज्ञान–प्राप्ति की गति में तीव्र विकास होता है । यदि वातावरण नियमों से जकड़ा हुआ होगा तो बच्चे का सहज विकास रुक जाएगा । अत: बच्चे को अनुशासन सिखाने के लिए ऐसे खेलों की व्यवस्था की जानी चाहिए कि उसमें आत्मविश्वास, आत्मनियन्त्रण तथा सामाजिक भावना का विकास हो सके तथा उसे अनुशासन–पालन की शिक्षा भी मिल सके, किन्तु खेल खेल हो, आनन्दपूर्ण हो ।
रवीन्द्रनाथ टैगोर जी के शब्दों में—
‘जब मैं बच्चा था तब छोटी–छोटी चीजों से खिलौने बनाने और अपनी कल्पना में नए–नए खेल इजाद करने की मुझे पूरी आजादी थी । मेरी खुशी में मेरे साथियों का पूरा हिस्सा होता थाय बल्कि मेरे खेलों का पूरा मजा उनके साथ खेलने पर निर्भर करता था । एक दिन हमारे बचपन के इस स्वर्ग में वयस्कों की बाजार प्रधान दुनिया से एक प्रलोभन ने प्रवेश किया । एक अंग्रेज दुकान से खरीदा गया खिलौना हमारे एक साथी को दिया गयाय वह कमाल का खिलौना था– बड़ा और मानो सजीव । हमारे साथी को उस खिलौने पर घमंड हो गया और अब उसका ध्यान हमारे खेलों में इतना नहीं लगता थाय वह उस कीमती चीज को बहुत ध्यान से हमारी पहुँच से दूर रखता था ।
अपनी इस खास वस्तु पर इठलाता हुआ वह अन्य साथियों से खुद को श्रेष्ठ समझता था क्योंकि उनके खिलौने सस्ते थे । मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि अगर  इतिहास की आधुनिक भाषा प्रयोग कर सकता तो वह यही कहता कि वह उस हास्यास्पद रूप से श्रेष्ठ खिलौने का स्वामी होने की हद तक हमसे अधिक सभ्य था ।
अपनी उत्तेजना में वह एक चीज भूल गया– वह तथ्य जो उस वक्त उसे बहुत मामूली लगा था कि इस प्रलोभन में एक ऐसी चीज खो गई जो उसके खिलौने से कहीं अधिक श्रेष्ठ थी, एक श्रेष्ठ और पूर्ण बच्चा । उस खिलौने से महज उसका धन व्यक्त होता था, बच्चे की रचनात्मक ऊर्जा नहीं, न ही उसके खेल में बच्चे का आनन्द था और न ही उसकी खेल की दुनिया में साथियों को खुला निमंत्रण ।’
रवीन्द्रनाथ टैगोर के निबंध ‘सभ्यता और प्रगति’ से
(राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005)
‘बच्चा जन्म से ही स्वाभाविक क्षमताओं के साथ पैदा होता है । हमारी शिक्षा–व्यवस्था उन स्वाभाविक क्षमताओं का आदर कर सके और उन क्षमताओं को इस हद तक बढ़ा सके कि उस बच्चे में एक लोकतांत्रिक समाज में सामूहिक भागीदारी के साथ काम करने की क्षमता विकसित की जा सके ।’
—प्रो– कृष्ण कुमार
‘शिक्षा का उद्देश्य और आज की व्यवस्था’
भारतीय आधुनिक शिक्षा अप्रैल, 2005’