बच्चों को पहली कक्षा से पूर्व शिक्षा प्राप्ति के लिए तैयार करने हेतु जो शिक्षा अनौपचारिक रूप से या बिना पाठ्यक्रम निर्धारित किए हुए दी जाती है उसे पूर्व प्राथमिक शिक्षा, शाला पूर्व शिक्षा या स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम या नर्सरी शिक्षा कहते हैं । पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए नर्सरी और के0 जी0 विद्यालयों की स्थापना बच्चे की विद्यालय के प्रति रुचि जाग्रत करने के लिए हुई थी । उद्देश्य यह था कि इनके माध्यम से स्कूल से ऊबने वाले बच्चों की संख्या में कमी की जाए, किन्तु अब तो इन विद्यालयों में तीन वर्ष की आयु से ही बच्चों को पढ़ना–लिखना सिखाया जाने लगा है, यह गलत है । नर्सरी शिक्षा का उद्देश्य बच्चे को अक्षर ज्ञान करवाना नहीं वरन् उसकी क्षमता का अधिकतम सीमा तक विकास करना और विद्यालय के प्रति रुचि जाग्रत कर उसे पढ़ने के लिए तैयार करना है ।सरकारी विद्यालयों में भी कुछ सप्ताहों के लिए पूर्व प्राथमिक शिक्षा या नर्सरी शिक्षा की बहुत आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि बच्चा विद्यालय के वातावरण से परिचित हो सके तथा प्राथमिक शिक्षा के लिए तैयार हो सके । इसीलिए सन् 1999 में देश के केन्द्रीय विद्यालयों में पहली कक्षा में एडमीशन के बाद छ: सप्ताह का स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम प्रारम्भ किया गया । बच्चों का बचपन–प्रकृति का अमूल्य उपहार है । जिस प्रकार खेत के तैयार हो जाने पर उसमें बीज डालने पर बहुत अच्छी फसल तैयार होती है, उसी प्रकार बच्चे की पढ़ाई प्रारम्भ होने से पूर्व यह आवश्यक है कि उसकी पढ़ाई के प्रति रुचि जाग्रत की जाए । विद्यालय उसकी सुखद कल्पनाओं की परिपूर्ति का स्थान हो । इस पुस्तक में नर्सरी शिक्षा के उद्देश्य, केन्द्रीय विद्यालय के बच्चोंं पर किया गया प्रायोगिक अनुभव व निष्कर्ष, नर्सरी शिक्षक की प्राथमिक गतिविधियाँ, नर्सरी शिक्षा का कार्यान्वयन, बच्चों के स्वस्थ विकास हेतु कुछ गतिविधियाँ, बच्चों के मानसिक रोग (निदान, कारण और समाधान), बच्चों के संतुलित विकास में शिक्षक व अभिभावकों का योगदान वर्णित है । शिक्षा के माध्यम के रूप में खेल व खेल–सामग्री की उपलब्धता व निर्माण के बारे में भी बताया गया है । बच्चों के खेल, कहानियाँ व कुछ लोकप्रचलित पहेलियाँ तथा शिशुगीत भी दिए गए हैं । शिशुगीतों, कहानियों आदि का शिशु मन पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभाव के बारे में भी वर्णन है ।
प्राकृतिक जीवनशैली से सम्पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति पुस्तक का सार–संक्षेपइस पुस्तक में शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रखने के लिए जीवनयापन के तरीके की ओर इंगित किया गया है । यदि प्रकृति के नियमों का पालन किया जाए और मन को शान्त रखा जाए तो बीमार पड़ने की सम्भावना भी समाप्त हो सकती है । प्राकृतिक जीवनशैली का अर्थ है कि अपने शरीर को प्रकृति या कुदरत के ऊपर छोड़ दें । इस बात को हम इस प्रकार अधिक अच्छी तरह समझ सकते हैंµनदी के बहते हुए पानी में स्वत: शुद्धीकरण की क्षमता होती है । जो सामान्य गन्दगी आती है, उसे हमें साफ करने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है, नदी स्वत: साफ कर लेती है । नदी का जल तब ही प्रदूषित होता है, जब हम आवश्यकता से अधिक कचरा उसमें डालते रहते हैं । यदि गंगा, यमुना आदि नदियों में या किसी भी नदी में आज की तारीख से भी कचरा डालना बन्द कर दिया जाए तो नदी का पानी कुछ समय में स्वयं को शुद्ध कर लेगा । एक तरफ तो नदी में पिछला कचरा पड़ा है, दूसरी तरफ अब भी कचरा डालते रहते हैं तो यह नदी की स्वत: शुद्धीकरण क्षमता की सीमा से अधिक हो जाता है और नदी का जल प्रदूषित हो जाता है ।इसी प्रकार शरीर में कोई भी बीमारी होती है तो प्राकृतिक चिकित्सा का सिद्धान्त यह मानता है कि शरीर में कोई विकार है तो प्रकृति उस विकार को निकाल कर शरीर को स्वस्थ कर देगी ।प्राकृतिक जीवनशैली पर कुछ विभूतियों के विचार दिए गए हैं । यौगिक सूक्ष्म व्यायाम एवं सूर्य नमस्कार तथा हस्तमुद्राओं का भी सचित्र वर्णन है । सरल व सहज प्राणायाम के तरीके और अपक्वाहार क्या, कब, क्यों व कैसे करें वर्णित है ।
मातृचेतना उपन्यास में निहित मूलभावइस लघु उपन्यास लिखने का कारण है कि पाठक सहज ही इसे एक या दो बैठकों में पढ़ लें । इससे पढ़ने की रोचकता भी बनी रहती है और उपन्यास का संदेश भी सहज ही ग्राह्य होता है । यह उपन्यास बुजुर्गों के प्रति सहज संवेदनाओं को जागरूक करता है ।जो बच्चा माँ का पल्लू पकड़ कर पीछे–पीछे घूमता था, वह इतना संवेदनशून्य कैसे हो जाता है कि वृद्धावस्था में उन्हें बृद्धाश्रम का रास्ता दिखा देता है । जिस देश की परम्परा रही है कि यहाँ पर मृतकों तक को तर्पण दिया जाता है, श्राद्ध किया जाता है । उस देश में उन्हें जीवित अवस्था में वृद्धाश्रम में भेज देना उचित नहीं है ।इस उपन्यास में वृद्धाश्रमों में रह रहे बुजुर्गों की दशा, वृद्धाश्रम में आने के कारण और उनके निवारण की तरफ संकेत किया गया है । बुजुर्ग हो गए लोगों को महत्त्वहीन समझना हमारी भूल है । वह कुछ न भी करें तो उनके अन्तर से निकला हुआ आशीर्वाद ही हमारे लिए काफी है । कई बार बुजुर्ग लोगों की भी बच्चों से बहुत अधिक अपेक्षाएँ होती हैं । सामञ्जस्य दोनों तरफ से आवश्यकहै । मातृचेतना तो हर प्राणी में जन्म के साथ ही सहज स्वाभाविक होती है । इस संसार में उसे लाने वाले उसके माता–पिता ही तो होते हैं । शिशु का प्रथम परिचय अपनी माता से ही होता है । प्रश्न है कि बड़े होते–होते कहाँ चली जाती है यह सहज स्वाभाविक चेतना । इस लघु उपन्यास को लिखने का उद्देश्य ही यह है कि लोगों की सहज संवेदनाएँ उनके मन में स्थिर रहें । सर्वत्र मातृ देवो भव, पितृ देवो भव की ध्वनि गुञ्जायमान हो । डॉ– शोभा अग्रवाल ‘चिलबिल’मो॰ – 09654135918 09335924979ई मेल–chilbil.shubh@gmail.com
आज तो धरती का अस्तित्व ही खतरे में है। प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय समस्या हमारे सिर पर काल की तरह मंडरा रही हैं। इस समय हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है- हमारे अपने अस्तित्व की रक्षा।मानव की ही अनेक क्रियाएँ पर्यावरण के संतुलन को बिगाड़ती हैं। उदाहरण के लिए नदी के जल में अपने को स्वच्छ करने की प्राकृतिक क्षमता होती है। हम इसमें घरेलू और कारखानों से निकलने वाला कूड़ा-कचरा, प्लास्टिक आदि इतनी ज़्यादा मात्रा में डाल देते हैं कि जल स्वयं को स्वच्छ नहीं कर पाता और हम इस अस्वच्छ जल को प्रदूषित जल का नाम देते हैं। पेयजल का संकट सभी विकसित और विकासशील देशों के बीच चर्चा का मुख्य विषय है।औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, भू प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण बढ़ रहा है। जो हमारे स्वास्थ्य के लिए गम्भीर रूप से हानिकारक है। ऐसे ही पानी के अत्यधिक दोहन के कारण पृथ्वी का भूजल स्तर नीचे जा रहा है, जो चिन्ता का विषय है। देखें कि कैसे हम छोटे-छोटे उपायों द्वारा समस्याओं को दूर करके धरती को स्वर्ग बना सकते हैं।बचपन में हम भी तुम्हारी तरह माँ के हाथ की बनी गुझिया, मिठाइयाँ वगैरह खूब खाया करते थे। खूब शरारत करते, खेलते, पढ़ते और मौजमस्ती करते। बड़े लोग जो कहते मान लेते और खुद चिन्तामुक्त रह कर मजे करते रहते। चलो आज अपनी दादी के हाथ की अनोखी मिठाइयों (नाटकों) का आनन्द लो। इन नाटकों की यह भी विशेषता है कि कोई नाटक किसी भी समय व किसी भी अवसर पर खेला जा सकता है। यह नाटक नुक्कड़ नाटक के रूप में भी खेले जा सकते हैं।दादी चिलबिल
सभी के जीवन में विभिन्न प्रकार के उतार–चढ़ाव आते रहते हैं । यदि हर परिस्थिति में शान्तचित्त से स्थिर मन से सोचे तो गम्भीर समस्या भी छोटी लगने लगती है । जीवनधारा से जुड़ी हुई इस पुस्तक में मन को स्वस्थ रखने के सहज साध्य उपायों का वर्णन है ।जिसका बचपन दुलार भरा होगा, बड़े होने पर भी उसका मस्तिष्क स्वस्थ रहेगा । वह विपरीत परिस्थितियों में भी स्वयं को समायोजित कर लेगा ।इस पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें बचपन को ही सँवारने को बताया गया है । सत्य है यदि जीवन की नींव सुदृढ़ होगी तो जीवन तो सुखद होगा ही ।शिवसंकल्प तथा स्वस्थ सोच मनुष्य को सदा प्रसन्न रखते हैं । हम अपना जीवन प्रबन्धन कैसे करें ? हमारे प्राचीन शास्त्रों जैसे, वेद, उपनिषद, पुराण, बाइबिल आदि में मन को स्वस्थ व प्रसन्न रखने के बारे में बहुत कुछ लिखा है । उसका कुछ अंश इस पुस्तक में देने का प्रयास है ।इस पुस्तक में एक ओर तो विभिन्न शास्त्रों के उदाहरण दिए हैं । दूसरी ओर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा अनुमोदित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 द्वारा भी यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि बचपन उल्लासपूर्ण होना चाहिए ।पूरी पुस्तक सहज व सुखद जीवनयापन की ओर इंगित करती है ।
हमारी सांस्कृतिक धरोहर क्या है ? वेदों व उपनिषदों आदि में क्या है ? हमारे मनीषियों का चिन्तन क्या है ?यदि बच्चों को प्रारम्भ से ही सहज जीवन व्यतीत करने दिया जाए, परिवार में प्यार–दुलार मिले तो हमारी संस्कृति स्वयं ही समृद्ध होगी व ऊँचाई के नए आयामों का संस्पर्श कर सकेगी । परिवार में गरीबी हो सकती है किन्तु बच्चे का बचपन सहज हो, मानसिक बोझ व चिन्ताओं से लदा हुआ न हो ।निर्भया जैसे काण्ड हमारी संस्कृति के लिए दाग हैं । ऐसी घटनाएँ भविष्य में न हो, उनका कारण व निवारण प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है । वास्तविक मूल्यपरक शिक्षा क्या है ? मूल्यों को कैसे सहजरूप में बालहृदय में स्थापित किया जा सकता है, वर्णित है ।इसका प्रत्यक्ष उदाहरण एक लेख में वर्णित है,‘जब राष्ट्रपति की पोती को घर में खाने के लिए चावल नहीं मिला ।’ यह सत्य घटना उस समय की है जब देश में अनाज की कमी थी । इसलिए जनता से आह्वान किया गया कि वह सप्ताह में एक दिन अन्न न खावें । तत्कालीन राष्ट्रपति ने इस नियम को अपने घर में भी लागू किया तथा घर में बच्चों तक को उस दिन अन्न खाने के लिए नहीं दिया जाता था ।यदि ऐसा सभी लोग करें तो हमारी संस्कृति एक आदर्श संस्कृति बन सकती है ।
वेद वैदिक संस्कृत में लिखे गए हैं। अतः सबके लिए सुपाठ्य नहीं हैं। वेदों में अनेक विषय वर्णित हैं। उनमें से इस पुस्तक में दो ही विषय लिए गए हैं. सम्पूर्ण स्वास्थ्य और एकेश्वरवाद। यह पुस्तक सबके लिए सुपाठ्य हो, इसलिए सरल भाषा में संक्षिप्त रूप में लिखी गई है।ईश्वर एक है, वह सर्वव्यापक, सर्वदर्शी, पूर्ण, सनातन, सर्वनियन्ता, सभी का पालक, जगत का धारक, सर्वसुखप्रदाता, अजन्मा व अनेक नामों वाला है। उसको किसी भी रूप में भजा जा सकता है। वह सर्वथा अपार, सम्पूर्ण दिशाओं में व्याप्त है। आवश्यकता है उसके प्रति पूर्ण समर्पण की।स्वास्थ्य में शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य सभी कुछ आ जाता है। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए मूलरूप से प्रकृति के नियमों का पालन करना आवश्यक है। जैसे सूर्योदय के पूर्व जागरण, सूर्य-दर्शन व शुद्ध वायु का सेवन आदि।मन को स्वस्थ रखने के लिए मन की स्थिरता व सबलता आवश्यक है। हर परिस्थिति में हम प्रसन्न रहें, शान्त रहें व सत्संगति हो। आलस्य का त्याग करके पुरुषार्थ करें व सत्य का पालन करें। परमात्मा पर पूर्ण श्रद्धा व विश्वास हो। वेदों के ज्ञान के सहज प्रस्तुतीकरण का लघु प्रयास है।